भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 797, कुल 1167 में से

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पृष्ठ 797

७४६ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका वृक्ष-३० फीट से अधिक ऊँचा नहीं होता। नयी शाखा, पत्र का अधर पृष्ठ एवं पुष्प व्यूह, श्वेताभ रजावरण से ढँके रहते हैं। पत्ते-२ से ३ इञ्च, अण्डाकार, गोल दन्तुर एवं कुछ लम्बाग्र होते हैं। पुष्प-१ १/२-२ इञ्च व्यास के एवं गुलाबी होते हैं। फल-गोल, छोटे डंठल एवं स्थाई बाह्यदल से युक्त एवं दोनों तरफ से अन्दर धंसा हुआ होता है। खट्टा तथा मीठा ऐसे दो भेद पाये जाते हैं। पके फल को लोग खाते हैं तथा उसका मुरब्बा भी बनाते हैं। इसकी छाल एवं मूल का भी उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-पत्ते एवं छाल में एक ग्लूकोसाइड फ्लोरिजिन् (Phlorizin) होता है। बीजों में ॲमिग्डॅलिन पाया जाता है। फ्लोरिजिन् के प्रयोग से वृक्क द्वारा शर्करा का अधिक उत्सर्ग होने लगता है। फल में मॅलिक अम्ल, खटिक, फॉस्फेट आदि होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके फल मधुर, शीत, ग्राही, शुक्रल, बृंहण, कफकर एवं वातपित्तहर होते हैं। यह हृदय, मस्तिष्क, यकृत् एवं आमाशय को शक्ति देनेवाला है। रक्तातिसार तथा आमातिसार में सेव का मुरब्बा देते हैं। विबंध में भी इसका उपयोग होता है। इसकी छाल का क्वाथ पार्यायिक ज्वर में दिया जाता है। इसकी जड़ कृमिघ्न, दाहशामक एवं निद्राजनक है। अथामृतफलम् (यद् बदक्सान-काबिल-प्रभृतिषु देशेषु "नाशपाती" तिनाम्ना प्रसिद्धम्) तस्य गुणानाह अमृतफलं लघु वृष्यं सुस्वादु त्रीन्हरेद्द्रोषान् । देशेषु मुग़लानां-बहुलं तल्लभ्यते लोकैः ॥१२७॥ अमृत फल—यह बदक्सान तथा काबिल आदि देशों में "नाशपाती" नाम से प्रसिद्ध है। नाशपाती-लघु, वृष्य (वीर्यवर्धक), अत्यन्त स्वादिष्ट एवम् तीनों दोषों को दूर करने वाली होती है और मुगलों के देश में इसे बहुलता से लोग पाते हैं। [१२७] ४८. नाशपाती सं०-टङ्क। हिं०-नाशपाती। म०-नास्पती। ता०-पेरिक्के। ते०-बेरिकाय। अं०-Pear (पीअर)। ले०- Pyrus communis Linn. (पाइरस कम्युनिस)। Fam. Rosaceae (रोज़ेसी)। उत्तर पश्चिम हिमालय में इसकी बहुत उपज की जाती है। यह कश्मीर, ईरान एवं अफगानिस्तान आदि में भी होती है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का होता है तथा नये वृक्षों की टहनियों पर कुछ काँटे होते हैं। पत्ते-चौड़ाई लिये हुए अण्डाकार, अखण्ड या कुण्ठित दन्तुर एवं पतले और पत्र बराबर लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-श्वेत आते हैं। फल-यह स्थान भेद से अनेक आकार प्रकार का होता है। कश्मीर आदि की नासपाती अधिक मुलायम रहती है। स्वाद में यह मधुर होती है। इसकी कलम करके सुधारी हुई जाति को नाक कहा जाता है जो अधिक मधुर तथा मुलायम होता है। गुण और प्रयोग-यह कषाय, मधुर, गुरु, शीतवीर्य, वातकर एवं ज्वरहर है। कुछ पक्व फल को काटकर, सुखाकर उसका चूर्ण बना, आटे में मिला रोगी को पथ्य रूप में दिया जाता है। इसके बीज, जिन्हें अंचू या अंचूक कहते हैं, उनकी मज्जा पौष्टिक मानी जाती है।

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