भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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आम्रादिफलवर्गः ७४७ अथ पीलुः । तस्य नामानि तत्फलगुणाँश्चाह पीलुर्गुडफलः स्रंसी तथा शीतफलोऽपि च । पीलु श्लेष्मसमीरघ्नं पित्तलं भेदि गुल्मनुत् ।। स्वादु तिक्तञ्च यत्पीलु तन्नात्युष्णं त्रिदोषहत् ।। १२८ ।। पीलु के संस्कृत नाम-पीलु, गुडफल, स्रंसी तथा शीतफल ये संब हैं। पीलु-मल का भेदन करने वाला, पित्तजनक एवम् कफ, वायु तथा गुल्म को दूर करने वाला है। जो पीलु-स्वादिष्ट तथा तिक्तरस युक्त होता है। यह अत्यन्त उष्ण नहीं होता तथा त्रिदोषनाशक होता है। [१२८] ४९. पीलु हिं०-पीलु, छोटा पीलु, खरजाल । बं०-पीलुगाछ । म०-पिलु । गु०-पीलु, खारी जाल । क०-गेनुमर । ते०-गोगु । ता०-पेरुन्गोलि । फा०-दरख्ते मिस्वाक् । अ०-अराक । पं०-पीलु, जाल, वष । राजपु०-झाल । ले०-Salvadora persica Linn. (साल्वेडोरा पर्सिका) । Fam. Salvadoraceae (साल्वेडोरेसी) । यह राजपुताना, बिहार, कोंकण, सरकार, डेक्कन, कर्णाटक, बलूचिस्तान, सिंध आदि स्थानों में शुष्क प्रदेशों में होता है। इसका वृक्ष-छोटा एवं सदा-हरा-भरा रहता है। स्तम्भ-टेढ़ा-मेढ़ा होता है और शाखायें नीचे झुकी हुई और दुर्बल होती हैं। पत्ते-विपरीत, चर्मसदृश या मांसल, अंडाकार, आयताकार, १।-२ इञ्च लम्बे तथा दोनों सिरों पर गोल होते हैं। इस पर छोटे-छोटे फूल बारहो मास आते रहते हैं और वे हरापन युक्त सफेद होते हैं। फल-आध इञ्च गोल, चिकने और पकने पर लाल हो जाते हैं। सूँघने पर इनमें राई आदि के समान तीक्ष्ण गंध आती है तथा इसमें एक बीज होता है। एक दूसरा बड़ा पीलु होता है जिसको लैटिन में-Salvadora oleoides Done. (साल्वेडोरा ओलीओडीस्) कहते हैं। इसके फल पकने पर पीले, सूखने पर लाली लिये भूरे रंग के होते हैं। रासायनिक संगठन-पीलु में एक क्षाराम् ट्राइमेथिलामाइन (Trimethylamine) पाया जाता है। बड़े पीलु में भी यह क्षाराम् होता है तथा बीज में दोनों प्रकार के तेल होते हैं। गुण और प्रयोग-लघु पीलु के पत्ते विरेचक होते हैं तथा कास में दिये जाते हैं। इसके बीजों का तेल राई के तेल की तरह होता है तथा आमवातादि में लगाया जाता है। इसके जड़ की छाल उत्तेजक, स्वेदजनन एवं कुछ मूत्रजनन है। इसका क्वाथ ज्वर में दौर्बल्य तथा प्रलाप दूर करने के लिये देते हैं। इसको गर्भिणी को न दें। वृद्धपीलु के पत्ते वातनाशक होने के कारण उनको गरम करके पीड़ायुक्त स्थानों को सेंकते हैं। छाल उत्तेजक एवं उष्ण होने के कारण ज्वर में दौर्बल्य होने पर तथा आर्तव रुक जाने पर देते हैं। फल-उष्ण, दीपन, वातहर एवं मूत्रजनक हैं। इनमें शर्करा बहुत रहती है। संधियात एवं प्लीहा वृद्धि में फल देते हैं। बीज आनुलोमिक एवं विषघ्न है। सर्पविष में इनका उपयोग करते हैं। बीजों का तेल स्वेदजनन एवं उत्तेजक होने के कारण पुराने सन्धिरोगों में इसकी मालिश की जाती है। इस तेल को किंकणेल या खिकणेल कहते हैं। अथाक्षोटः (अखरोट) तस्य नामगुणानाह पीलुः शैलभवोऽक्षोटः कर्पराल्लश्च कीर्तितः । अक्षोटकोपि वातादसदृशः कफपित्तकृत् ।।१२९।। अखरोट के संस्कृत नाम-शैलभव पीलु अक्षोट तथा कर्पराल ये सब हैं। (जो पीलू पर्वत पर उत्पन्न होता है उसको "अखरोट" कहते हैं)। अखरोट-गुणों में बादाम के सदृश होता है एवम् कफ तथा पित्त का वर्धक होता है। [१२९] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA