भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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७४८ भावप्रकाशनिघण्टुः ५०. अखरोट हिं०-अखरोट, अक्षोट, पहाड़ी पीलु। बं०-आखरोट। पं०-अखरोट। म०-अक्रोड। गु०-अखरोड। ते०-अक्षोलमु। ता०-अक्रोटु। क०-आखोट। आसा०-कवसिंग। फा०-चार मग्ज, जिर्दगां। अ०-ज़ोज़ हिन्दी, ज़ोज़ेजुल हिन्द, ज़ोज़। अफगा०-उप्पस्। अं०-Walnut (वालनट)। ले०-Juglans regia Linn. (जग्लान्स रेजीया)। Fam. Juglandaceae (जग्लैंडेसी)। यह हिमालय के उष्ण भागों में ३ से १० हजार फीट तक एवं खासिया पर्वत तथा बलुचिस्तान में होता है। कश्मीर में इसकी बहुत उपज की जाती है। इसका वृक्ष ऊँचा होता है तथा छाल धूसर एवं लम्बाई में फटी होती है। शाखाओं पर मृदु रजावरण होता है। पत्ते-असम पक्षवत्, एकान्तर तथा ६ से १५ इञ्च लम्बे होते हैं। पत्रक-संख्या में ५-१३, दीर्घवृत्ताभ से लेकर आयताकार मालाकार, ३-८ × १.५-४ इञ्च बड़े, न्यूनाधिक विनाल एवं प्रायः अखण्ड होते हैं। पुष्प-छोटे, पीताभ हरे एवं एक लिंगी होते हैं। फल-कुछ लंबाई लिये हुये गोल एवं २ इञ्च व्यास में एवं बाह्यस्तर (Exocarp) हरा तथा चर्मवत् रहता है। इसके अन्दर अन्तस्तर कठोर काष्ठीय, सिकुड़नदार एवं दो कोष्ठ युक्त होता है जिसमें ४ खण्डवाला तैल से भरा हुआ, टेढ़ा-मेढ़ा धूसर श्वेत रंग का बीज होता है। इन्हीं बीजों को लोग खाते हैं। स्थान भेद से अन्तस्तर (Endocarp) के स्वरूप के अनुसार इसके कई प्रकार होते हैं। इसमें सबसे अच्छा कागजी अखरोट होता है जो बड़ा, अन्तस्तर पतला तथा उसकी मींगी श्वेत तथा अधिक स्वादिष्ट रहती है। इसकी छाल डण्डासा के नाम से बिकती है जिसको दाँत साफ करने के लिये तथा चबाकर होंठ लाल करने के लिये उपयोग में लाते हैं। बाल रंगने के लिये हरे फल के छिलकों का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें तैल, अनेक पोषक तत्त्व, विटामिन 'बी', 'ए', 'सी', लेसिथिन तथा अनेक खनिज होते हैं। खनिज में लोह, ताम्र, खटिक, फास्फोरस, यशद, कोबाल्ट, मैगनेशियम, आर्सेनिक, गंधक, आयोडीन, मैंगेनीज, पोटेशियम् तथा सोडियम् होते हैं। इनके अतिरिक्त कच्चे फलों में विटामिन 'सी' बहुत होता है। पत्तों में विटामिन 'सी' एवं उड़नशील तैल रहता है। इनका जलीय सत्व अनेक जीवाणु के लिये घातक होता है। गुण और प्रयोग-इसकी मींगी, पौष्टिक, बल्य, बृंहण, क्षतक्षयनाशक एवं आमवातहर होती है। आमवात, वातरक्त आदि में इसका उपयोग करते हैं। इसके पत्ते पौष्टिक एवं कृमिघ्न होते हैं। इनका क्वाथ गंडमाला में लाभदायक होता है। इसकी छाल को पीसकर शोथ पर लगाते हैं। इसका तेल स्फीतकृमि में लाभदायक माना जाता है। नोट-एक जङ्गली अखरोट होता है जो आसाम तथा विशेष रूप से दक्षिण में होता है। यह एल्यूराइटिस् मोलुक्केना (Aleurites moluccara, Willd.), युफोर्बिएसी (Fam. Euphorbiaceae) है। इसके फल अंडाकार, दो इञ्च व्यास के होते हैं जिसके अन्दर दो बीज अखरोट जैसे निकलते हैं। इसमें तेल होता है। यह १ से २ औंस की मात्रा में विरेचक होता है। बीजों को भूनकर खाया जाता है जिसमें कुछ विरेचक गुण रहता है। इन्हें बिना भूने नहीं खाना चाहिये क्योंकि इसमें एक विषैला तत्त्व होता है जो भूनने से नष्ट हो जाता है। बीजों की बत्ती बनाकर जलाते हैं जिससे इसे 'दी कैंडल नट ट्री' (The candle nut tree) भी कहते हैं। भावप्रकाशकार अखरोट को पर्वत पर होने वाला पीलु कहते हैं किन्तु इसके स्वरूपादि से इनमें कोई साम्य नहीं मालूम पड़ता। अथ बीजपूरः (बिजौरा) । तस्य नामानि तत्फलगुणाँश्चाह बीजपूरो मातुलुङ्गो रोचकः फलपूरकः । बीजपूरफलं स्वादु रसेऽम्लं दीपनं लघु ।।१३०।। रक्तपित्तहरं कण्ठजिह्वाहृदयशोधनम् । श्वासकासारुचिहरं हृद्यं तृष्णाहरं स्मृतम् ।।१३१।।