भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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आम्रादिफलवर्गः ७४९ बिजौरा नींबू के संस्कृत नाम-बीजपूर, मातुलुङ्ग, रोचक तथा फलपूरक ये सब हैं। बिजौरा के फल-स्वादिष्ट, अम्लरसयुक्त, अग्निदीपक, लघु, हृदय के लिये हितकर, कण्ठजिह्वा तथा हृदय को शोधन करने वाले एवम्-रक्तपित्त श्वास-कास-अरुचि तथा तृषा को दूर करने वाले होते हैं। [१३०-१३१] ५१. बिजौरा हिं०-बिजोरा नींबू, तुरंज। बं०-टावालेबु, छोलोंगनेबु, वेगपूर। म०-महातुङ्ग। गु०-बिजोरू। क०- मादल। ता०-मादलम्। ते०-लुंगमु, मादिफलमु। फा०-तुरंज, तरञ्ज। अ०-ऊत्तरञ्ज, उतरज। अं०-Citron (सिट्रोन)। ले०-Citrus medica Linn. (साइट्रस मेडिका)। Fam. Rutaceae (रूटेंसी)। इसके वृक्ष-छोटे, करीब १० फीट ऊँचे होते हैं और वाटिकाओं में लगाये जाते हैं। चटगाँव तथा सिताकुंड, खासिया एवं गारो पहाड़ों पर तथा कुमाऊँ में सरजू के किनारे यह वन्य भी पाया जाता है। शाखाएँ-मोटी, छोटी, कंटीली एवं इतस्ततः फैली होती हैं। इसके पत्ते-नींबू के पत्ते के आकार वाले परन्तु लम्बाई चौड़ाई में उनसे बड़े होते हैं। वृन्त- इस प्रजाति में वृन्त प्रायः पक्षयुक्त हुआ करता है किन्तु इस जाति में यह पक्षहीन या अल्प किनारेदार तथा छोटा होता है। फूल-सफेद आते हैं। फल-लम्बाई युक्त गोल, ४-६ इञ्च व्यास में और नोकदार सा होता है। इसका छिलका मोटा, खुरदरा, उभारदार एवं पकने पर पीले रंग का होता है। इसकी गुद्दी हल्की पीली, अल्प, साधारण अम्ल या मधुराम्ल किन्तु स्वादहीन होती है। इसके दो वर्ग मुख्यरूप से किये जाते हैं। एक मीठे तथा दूसरे खट्टे। इसके कई उपभेद पाये जाते हैं जिनमें ये मुख्य हैं। (१) छांगुरा-गुद्दीहीन तथा छोटे फल। (२) तुरंज-बड़े फल, अम्ल किन्तु छिलका मधुराम्ल। (३) बिजौरा- छोटे, अम्ल, रस से भरे एवं पतले छिलके वाले फल। (४) एक विशेष प्रकार उत्तर पश्चिम भारत में होता है जिसमें फल का स्वरूप मुड़ी हुई अंगुलियों से युक्त करतल के समान दिखलाई देता है। रासायनिक संगठन-छिलके में अत्यंत सुगंधित तेल होता है जिसे सिट्रोन तेल (Citron oil) कहते हैं। गुण और प्रयोग-यह अम्ल, दीपन, हृद्य, वमनरोधक, अरुचिनाशक एवं शोणिता स्थापन है। इसका छिलका ग्राही, सुगंधित तथा तिक्त पौष्टिक होता है। पुष्प तथा कलियाँ अल्प स्वप्नजनन एवं ग्राही होती है। मूल को पीसकर कृमि, वमन तथा मूत्राश्मरी में देते हैं। ज्वर में पत्तों का फांट पिलाते हैं। अथ मधुकर्कटी (बिजौराभेद, चकोतरा)। तस्या नामगुणानाह बीजपूरोऽपरः प्रोक्तो मधुरो मधुकर्कटी ।।१३२।। मधुकर्कटिका स्वाद्धी रोचनी शीतला गुरुः। रक्तपित्तक्षयश्वासकासहिध्माभ्रमापहा ।।१३३।। चकोतरा नींबू के संस्कृत नाम-दूसरी जाति का जो बिजौरा होता है उसे मधुर तथा मधुकर्कटी कहते हैं। चकोतरा (नींबू)-स्वादिष्ट, रोचक, शीतल, गुरु एवं रक्त पित्त, क्षय, खास, कास, हिक्का तथा भ्रमरोग को दूर करता है ॥१३२-१३३॥ ५२. चकोतरा हिं०, बं०-चकोतरा, महानिंबू। म०-पोपनस। गु०-ओबकोतल। ते०-पंपरंनासा। ता०-पंबालेमसु। क०-सकोतरे, सक्कोटा। अं०-Shaddock (शेडॉक्)। Pummelo (प्यूमेलो)। ले०-Citrus decumana Linn. (साइट्रस डेक्युर्मना)। Fam. Rutaceae (रूटेंसी)। इसको बागों में लगाते हैं। इसका वृक्ष-छोटा, करीब १५ फीट ऊँचा होता है और सदा हरा-भरा रहता है। पत्ते- गहरे हरे, बिजौरे से भी बड़े-बड़े होते हैं। वृन्त-चौड़े पक्षयुक्त होते हैं। फूल-सफेद रंग के आते हैं। फल-बड़े-बड़े,