भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् २७ ❖ वैलक्षण्यात् दीर्घह्रस्वकृशादिभेदेन सादृश्याभावाद् अस्थायित्वात् वयोऽहर्निशर्तुभुक्तेष्वेकमात्रानवस्थानात् (५) ।।४०।। यहाँ पर 'वैलक्षण्यात्' से 'दीर्घ (लम्बा) ह्रस्व (छोटा) और कृश (दुबला) आदि भेदों से परस्पर शरीरों का सादृश्य न होने से' और 'अस्थायित्वात्' से अवस्था, दिन, रात्रि, ऋतु (वसन्तादि) और भोजन इन सबों के आदि, मध्य और अन्त में दोषादिकों की मात्रा की स्थिरता न होने से' यह अर्थ समझना चाहिये (५) ।।४०।। एवं तामभिसङ्गम्य पुनर्मासाद् भजेदसौ ।।४१।। पूर्वोक्त नियमों से ऋतुमती स्त्री का सङ्ग करने के बाद पुनः ऋतुमती होने पर एक मास के बाद उसका सङ्ग करे ।।४१।। ❖ मासादूर्ध्वमिति शेषः । अर्वाग्गमनेन गर्भद्वारविघटनाद् गर्भच्युतिप्रसङ्गः स्यात्, केचित्तु, पुनः पुष्पदर्शनेन गर्भलाभनिश्चये मासादूर्ध्व