भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 1167 में से

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२६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे यमज (युग्म) सन्तान उत्पन्न होने का कारण—गर्भाशय के भीतर वायु के द्वारा जब रज वीर्य दो भागों में विभक्त हो जाता है तब जो दो जीव गर्भाशय में आते हैं, वे ही धर्मेतर-पुरःसर (धर्माधर्मजन्य) यमज कहलाते हैं ॥३९॥ ❖ तौ धर्मेतरपुरःसरौ=धर्मस्तदितरोऽधर्मस्तौ पुरःसरौ ययोः, तेन यमौ धर्माधर्माभ्यां भवत इत्यर्थः ॥३९॥ ‘धर्मेतरपुरःसरौ’ इस पद का अर्थ यह है कि धर्म (पुण्यजनक कर्म) और उससे इतर अधर्म, ये दोनों पुरःसर अर्थात् गर्भ में आने के कारण हैं जिनके, इसका फलितार्थ यह हुआ कि यमज धर्म और अधर्म से उत्पन्न होते हैं ॥३९॥ अथ स्त्रीपुंसनपुंसकसन्तानोत्पत्तौ हेतुमाह- आधिक्ये रेतसः पुत्रः कन्या स्यादार्त्तवेऽधिके । नपुंसकं तयोः साम्ये यथेच्छा१ पारमेश्वरी ॥४०॥ पुत्र, पुत्री और नपुंसक सन्तान होने के कारण—शुक्र के अधिक होने से पुत्र, रज के अधिक होने से कन्या और रज तथा वीर्य का भाग बराबर होने से नपुंसक सन्तान उत्पन्न होती है । क्योंकि ऐसी परमेश्वर की इच्छा है ॥४०॥ ❖ नन्वेवं सति कथं पुत्रोत्पत्तिः सदैवार्त्तवस्यैव बाहुल्यात् । यत उक्तम्- ‘आर्त्तवं चतुरञ्जलिप्रमाणं शुक्रं प्रसृतिमात्रम्’ इति । वाग्भटेऽप्युक्तमात्रेयादिभिः- ‘मज्जा मेदो वासा मूत्रपित्तश्लेष्मशकृन्त्यसृक् । रसो जलं च देहेऽस्मिन् त्वेकैकाञ्जलिवर्द्धितम् ॥३॥ पृथक् च प्रसृतं प्रोक्तमोजोमस्तिष्करेतसाम् । द्वावञ्जली तु दुग्धस्य चत्वारो रजसः स्त्रियः ।। समधातोरिदं मानं विद्याद् वृद्धिक्षयादृते’ ॥४॥ इस जगह शङ्का यह होती है कि—तब पुत्रोत्पत्ति कैसे होगी ? क्योंकि सदैव वीर्य की अपेक्षा रज का परिमाण अधिक रहता है । कहा भी है—‘रज का परिमाण चार अञ्जलि और शुक्र का १ प्रसृति (आधी अञ्जलि) है’ । ‘वाग्भट’ में आत्रेयादि महर्षियों ने भी इसी बात को कहा है कि—‘मज्जा, मेद, वसा (चर्बी), मूत्र, पित्त, कफ, पुरीष (मल), रक्त, रस और जल ये सब द्रव्य मनुष्य की देह में क्रमसे एक की अपेक्षा दूसरे एक-एक अञ्जलि अधिक हैं और ओज मस्तिष्क तथा शुक्र इन सबों का पृथक्-पृथक् एक-एक अञ्जलि प्रमाण है और स्त्रियों के शरीर में दूध २ अञ्जलि और रज ४ अञ्जलि प्रमाण रहता है, क्षय और वृद्धि से भिन्न समान धातु-वाले का ही यह प्रमाण जानना’ ॥३-४॥ ❖ नैवं यतो गर्भाशयस्थमेव शुक्रमार्त्तवं च गर्भोत्पत्तिहेतुः शुक्रं कदाचिदत्यन्तहर्षदशाद् दुग्धादिशुक्रलद्रव्यसेवनाद् शुक्रबाहुल्याद् गर्भाशये बहु स्रवति कदाचिद्वैमनस्यादिना शुक्राल्पत्वात्स्वल्पमिति, एवमार्त्तवमपीति न दोषः ।। सुश्रुतः पुनराह- ‘वैलक्षण्याच्छरीराणामस्थायित्वात्तथैव च । दोषधातुमलानां तु परिमाणं न विद्यते; ॥५॥ इसका उत्तर यह है कि-आपका शङ्का करना अनुचित है क्योंकि-गर्भाशय में ही स्थित जो शुक्र और रज हैं वे ही गर्भ उत्पन्न होने में कारण हैं न कि समस्त शरीर में स्थित रज और वीर्य । शुक्र कभी अत्यन्त हर्ष होने से अथवा दूध आदि शुक्र के बढ़ानेवाले द्रव्यों का सेवन करने से अथवा शुक्र की अधिकता होने से गर्भाशय में अधिक परिमाण में गिर पड़ता है और कभी दुःखित मन होने से अथवा शुक्र की कमी होने से थोड़ा ही गिरता है, इसी तरह से आर्तव के भी न्यूनाधिक्य होने का कारण समझना । सुश्रुत भी इसी विषय में कहते हैं कि—‘शरीरों की विलक्षणता तथा दोषादिकों की अस्थिरता होने से दोष, धातु और मल इन पदार्थों के परिमाण की स्थिरता नहीं रहती’ ॥५॥ १. परमेश्वरीति पाठान्तरं प्रामादिकम् ।

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