भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 78, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयगर्भप्रकरणम् २० की स्थिति जल के मध्य में रहती है गर्भाशय की भी स्थिति उसी भाँति पित्ताशय और पक्वाशय के मध्य में रहती है और गर्भशय्या का रूप भी रोहित मछली की भाँति होता है अर्थात् जिस भाँति रोहित का मुखभाग बहुत कम चौड़ा होता है और आशय (मुख के भीतर का भाग) बहुत चौड़ा होता है उसी भाँति गर्भाशय का भी मुखभाग बहुत छोटा और भीतर का भाग बहुत बड़ा होता है ॥३२॥ अथ गर्भे जीवप्रवेशप्रकारमाह- शुक्रार्त्तवसमाश्र्लेषो यदैव खलु जायते ।।३३।। जीवस्तदैव विशति युक्तः शुक्रार्त्तवान्तरः । सूर्यांशोः सूर्यमणित उभयस्माद्युताद्यथा । वह्निः सञ्जायते जीवस्तथा शुक्रार्त्तवायुतात् ।।३४।। गर्भ में जीव के प्रवेश करने का प्रकार—जिस समय शुक्र और आर्त्तव (रज) का संयोग होता है, उस समय जीव उसी मिले हुए वीर्य और रज के भीतर प्रवेश करता है। सूर्य की किरण और सूर्यकान्तमणि इन दोनों का संयोग होने से जैसे अग्नि उत्पन्न होती है, उसी तरह शुक्र और रज का संयोग होने से जीव उत्पन्न होता है ।।३३-३४।। आत्माऽनादिरनन्तश्चाऽव्यक्तो वक्तुं न शक्यते ।।३५।। चिदानन्दैकरूपोऽयं मनसाऽपि न गम्यते । एवम्भूतोऽपि जगतो भाविनी बलवत्तया । अविद्यास्वीकृते कर्मवशो गर्भे विशत्यसौ ।।३६।। जीवात्मा अनादि, अनन्त तथा अव्यक्त है अतएव इसके विषय में मुख से कुछ कहा नहीं जा सकता और वह चिदानन्दरूप (चैतन्य आनन्दस्वरूप) एक है अतः मन के लिये भी अगम्य है अर्थात् उसके स्वरूप की कल्पना मन भी नहीं कर सकता किन्तु जगत् की उत्पत्ति करनेवाली माया बलवती होने से कर्म के वश होकर अविद्या से स्वीकृत (अज्ञान से स्वीकार किये गये) गर्भ में प्रवेश करता है ।।३५-३६।। ❖ गर्भे=चतुर्विंशतितत्त्वमये ।।३५-३६।। यहाँ 'गर्भे' पद से 'चौबीस तत्त्वों से बने हुए गर्भ में' यह अर्थ समझना चाहिये ।।३५-३६।। स एव वेत्ता रसज्ञो द्रष्टा घ्राता स्पृशत्यसौ । श्रोता वक्ता च कर्त्ता च गन्ता रन्तोत्सृजत्यपि ।।३७।। (गर्भ में जाकर) वही जीवात्मा जाननेवाला, स्वाद ग्रहण करनेवाला, देखनेवाला, गन्ध ग्रहण करनेवाला, स्पर्श का बोध करनेवाला, सुननेवाला, बोलनेवाला, गमन करनेवाला, रमण करनेवाला तथा मलादि का त्याग करनेवाला होता है ॥३७॥ अथ गर्भाशयद्वारमुखसंवरणकालमाह- दिने व्यतीते नियतं सङ्कुचत्यम्बुजं यथा । ऋतौ व्यतीते नार्यास्तु योनिः संव्रियते तथा ।।३८।। गर्भाशय द्वार बन्द होने के समय—दिन के बीत जाने पर (रात्रि में) कमल जिस भाँति नियतरूप से संकुचित हो जाया करता है। उसी भाँति ऋतुकाल के बीत जाने पर स्त्रियों की योनि भी सङ्कुचित हो जाया करती हैं ॥३८॥ ❖ ऋतौ=रजोदर्शनात् षोडशनिशाऽऽत्मके काले । योनिरत्र धराद्वारम् ।।३८।। 'ऋतु' पद से 'रजोदर्शन होने के दिन से लेकर सोलह रात्रि पर्यन्त जो काल है' उसका बोध करना चाहिये और 'योनि' पद से 'गर्भाशय का द्वार' समझना चाहिये ।।३८।। अथ यमजसन्तानोत्पत्तौ हेतुमाह- बीजेऽन्तर्वायुना भिन्ने द्वौ जीवौ कुक्षिमागतौ । यमावित्यभिधीयेते धर्मेतरपुरःसरौ ।।३९।।