भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ गर्भः शुद्धः, अशुद्धस्तु गर्भोऽशुद्धशुक्रशोणितयोरपि दम्पत्योर्भवति यत आह- 'दम्पत्योःकुष्ठबाहुल्याद् दुष्टशोणितशुक्रयोः । यदपत्यन्तयोर्जातं ज्ञेयं तदपि कुष्ठितम्' इति ।। 'गर्भ' से 'शुद्ध गर्भ' अर्थ समझना चाहिये, क्योंकि जिन स्त्री-पुरुषों के रज और वीर्य वातादि दोषों से दुष्ट होते हैं। उनका जो गर्भ होता है, वह अशुद्ध कहलाता है जैसा कि कहा है—'अधिक कुष्ठ (कोढ़) होने से निज स्त्री और पुरुषों का रज और शुक्र दुष्ट हो गया है, उन लोगों की जो सन्तान होती है वह भी कुष्ठित अर्थात् कुष्ठयुक्त (कोढ़ी) होती है ॥२॥ ❖ कुष्ठं सञ्जातं यस्य तत् कुष्ठितम् । अत्र तारकादित्वादितच्प्रत्ययः ।। २ ।। जिसे कुष्ठ उत्पन्न हुआ हो वह 'कुष्ठित' कहलाता है यहाँ कुष्ठ शब्द से 'तारकादिभ्य इतच्' इस सूत्र से इतच् प्रत्यय होने पर कुष्ठित शब्द की सिद्धि हुई है ॥२॥ यत्तु—'वातादिदुष्टरेतसः प्रजोत्पादने न समर्थाः' । इति सुश्रुतः । तत्र शुद्धप्रजोत्पादने न समर्था इति बोद्धव्यम् । रोगादिनाऽशुद्धास्तु प्रजा वातादिदुष्टशुक्रा अपि जनयन्ति जन्मान्धवधिरपङ्ग्वादि सम्भवात् ॥२७॥ 'सुश्रुत' में जो लिखा है कि 'वातादि दोषों से जिनके वीर्य दुष्ट हो गये हैं, वे सन्तान उत्पन्न करने में समर्थ नहीं होते' वहाँ 'शुद्ध सन्तान उत्पन्न करने में समर्थ नहीं होते' ऐसा समझना चाहिये । रोगादिकों के द्वारा अशुद्ध सन्तान वातादिक दोषों से दुष्ट शुक्रवाले उत्पन्न करते हैं, जन्म से अन्धे, बहिरे, लूले आदि देखने में आते हैं ॥२७॥ ऋतौ स्त्रीपुंसयोर्योगे मकरध्वजवेगतः ।। २८ ।। मेढ्रयोन्यभिसङ्घर्षाच्छरीरोष्माऽनिलाहतः । पुंसः सर्वशरीरस्थं रेतो द्रावयतेऽथ तत् ।। २९ ।। वायुर्मेहनमार्गेण पातयत्यङ्गनाभगे । तत् संश्रुत्य व्यात्तमुखं याति गर्भाशयं प्रति । तत्र शुक्रवदायातेनार्त्तवेन युतं भवेत् ।। ३० ।। काम के वेग के वशीभूत होने से ऋतुकाल में जब स्त्री और पुरुष का संयोग होता है तब लिङ्ग और योनि के सङ्घर्ष (रगड़) से शरीर की ऊष्मा (गर्मी) वायु से आहत होकर पुरुष के सम्पूर्ण शरीर में स्थित वीर्य को द्रवित (बहने लायक पतला) कर देती है । उसके बाद वायु उसी द्रवित वीर्य को लिङ्ग के मार्ग से स्त्री की योनि में गिराता है । उसके बाद वही वीर्य बहकर जिसका मुँह खुला हुआ है ऐसे गर्भाशय में जाता है और गर्भाशय में वीर्य की भाँति आये हुए रज के साथ मिल जाता है ॥२८-३०॥ गर्भाशयस्य स्वरूपमाह- शङ्खनाभ्याकृतिर्योनिस्त्र्यावर्त्ता सा च कीर्त्तिता तस्यास्तृतीये त्वावर्त्ते गर्भशय्या प्रतिष्ठिता ।। गर्भाशय के स्वरूप—योनि को पण्डितों ने शङ्ख की नाभि (मुख के भीतर के भाग) के सदृश तीन आवर्त्तों से युक्त बतलाया है और उस योनि के तीसरे आवर्त्त में गर्भशय्या (गर्भाशय) है, ऐसा कहा है ॥३१॥ यथा रोहितमत्स्यस्य मुखं भवति रूपतः । तत्संस्थानां तथा रूपां गर्भशय्यां विदुर्बुधाः ।। जिस प्रकार रोहू मछली का मुख देखने में होता है, गर्भाशय की भी आकृति और रूप उसी भाँति होते हैं ॥३२॥ ❖ अयमर्थः-गर्भशय्याया मुखं रोहितमत्स्यस्येव भवति यथा च रोहितमत्स्यस्य स्थितिर्जले भवति तथा पित्ताशयपक्वाशयमध्ये गर्भशय्यायाः स्थितिर्भवति रूपमपि तस्येव भवति यथा रोहितस्य मुखं स्वल्पमाशयस्तु महानित्यर्थः ।। ३२ ।। उपर्युक्त श्लोक का भाव यह है कि—गर्भाशय का मुख रोहित (रोहू) मछली की भाँति होता है जैसे रोहित मछली