भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
२४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ गर्भः शुद्धः, अशुद्धस्तु गर्भोऽशुद्धशुक्रशोणितयोरपि दम्पत्योर्भवति यत आह- 'दम्पत्योःकुष्ठबाहुल्याद् दुष्टशोणितशुक्रयोः । यदपत्यन्तयोर्जातं ज्ञेयं तदपि कुष्ठितम्' इति ।। 'गर्भ' से 'शुद्ध गर्भ' अर्थ समझना चाहिये, क्योंकि जिन स्त्री-पुरुषों के रज और वीर्य वातादि दोषों से दुष्ट होते हैं। उनका जो गर्भ होता है, वह अशुद्ध कहलाता है जैसा कि कहा है—'अधिक कुष्ठ (कोढ़) होने से निज स्त्री और पुरुषों का रज और शुक्र दुष्ट हो गया है, उन लोगों की जो सन्तान होती है वह भी कुष्ठित अर्थात् कुष्ठयुक्त (कोढ़ी) होती है ॥२॥ ❖ कुष्ठं सञ्जातं यस्य तत् कुष्ठितम् । अत्र तारकादित्वादितच्प्रत्ययः ।। २ ।। जिसे कुष्ठ उत्पन्न हुआ हो वह 'कुष्ठित' कहलाता है यहाँ कुष्ठ शब्द से 'तारकादिभ्य इतच्' इस सूत्र से इतच् प्रत्यय होने पर कुष्ठित शब्द की सिद्धि हुई है ॥२॥ यत्तु—'वातादिदुष्टरेतसः प्रजोत्पादने न समर्थाः' । इति सुश्रुतः । तत्र शुद्धप्रजोत्पादने न समर्था इति बोद्धव्यम् । रोगादिनाऽशुद्धास्तु प्रजा वातादिदुष्टशुक्रा अपि जनयन्ति जन्मान्धवधिरपङ्ग्वादि सम्भवात् ॥२७॥ 'सुश्रुत' में जो लिखा है कि 'वातादि दोषों से जिनके वीर्य दुष्ट हो गये हैं, वे सन्तान उत्पन्न करने में समर्थ नहीं होते' वहाँ 'शुद्ध सन्तान उत्पन्न करने में समर्थ नहीं होते' ऐसा समझना चाहिये । रोगादिकों के द्वारा अशुद्ध सन्तान वातादिक दोषों से दुष्ट शुक्रवाले उत्पन्न करते हैं, जन्म से अन्धे, बहिरे, लूले आदि देखने में आते हैं ॥२७॥ ऋतौ स्त्रीपुंसयोर्योगे मकरध्वजवेगतः ।। २८ ।। मेढ्रयोन्यभिसङ्घर्षाच्छरीरोष्माऽनिलाहतः । पुंसः सर्वशरीरस्थं रेतो द्रावयतेऽथ तत् ।। २९ ।। वायुर्मेहनमार्गेण पातयत्यङ्गनाभगे । तत् संश्रुत्य व्यात्तमुखं याति गर्भाशयं प्रति । तत्र शुक्रवदायातेनार्त्तवेन युतं भवेत् ।। ३० ।। काम के वेग के वशीभूत होने से ऋतुकाल में जब स्त्री और पुरुष का संयोग होता है तब लिङ्ग और योनि के सङ्घर्ष (रगड़) से शरीर की ऊष्मा (गर्मी) वायु से आहत होकर पुरुष के सम्पूर्ण शरीर में स्थित वीर्य को द्रवित (बहने लायक पतला) कर देती है । उसके बाद वायु उसी द्रवित वीर्य को लिङ्ग के मार्ग से स्त्री की योनि में गिराता है । उसके बाद वही वीर्य बहकर जिसका मुँह खुला हुआ है ऐसे गर्भाशय में जाता है और गर्भाशय में वीर्य की भाँति आये हुए रज के साथ मिल जाता है ॥२८-३०॥ गर्भाशयस्य स्वरूपमाह- शङ्खनाभ्याकृतिर्योनिस्त्र्यावर्त्ता सा च कीर्त्तिता तस्यास्तृतीये त्वावर्त्ते गर्भशय्या प्रतिष्ठिता ।। गर्भाशय के स्वरूप—योनि को पण्डितों ने शङ्ख की नाभि (मुख के भीतर के भाग) के सदृश तीन आवर्त्तों से युक्त बतलाया है और उस योनि के तीसरे आवर्त्त में गर्भशय्या (गर्भाशय) है, ऐसा कहा है ॥३१॥ यथा रोहितमत्स्यस्य मुखं भवति रूपतः । तत्संस्थानां तथा रूपां गर्भशय्यां विदुर्बुधाः ।। जिस प्रकार रोहू मछली का मुख देखने में होता है, गर्भाशय की भी आकृति और रूप उसी भाँति होते हैं ॥३२॥ ❖ अयमर्थः-गर्भशय्याया मुखं रोहितमत्स्यस्येव भवति यथा च रोहितमत्स्यस्य स्थितिर्जले भवति तथा पित्ताशयपक्वाशयमध्ये गर्भशय्यायाः स्थितिर्भवति रूपमपि तस्येव भवति यथा रोहितस्य मुखं स्वल्पमाशयस्तु महानित्यर्थः ।। ३२ ।। उपर्युक्त श्लोक का भाव यह है कि—गर्भाशय का मुख रोहित (रोहू) मछली की भाँति होता है जैसे रोहित मछली
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् २० की स्थिति जल के मध्य में रहती है गर्भाशय की भी स्थिति उसी भाँति पित्ताशय और पक्वाशय के मध्य में रहती है और गर्भशय्या का रूप भी रोहित मछली की भाँति होता है अर्थात् जिस भाँति रोहित का मुखभाग बहुत कम चौड़ा होता है और आशय (मुख के भीतर का भाग) बहुत चौड़ा होता है उसी भाँति गर्भाशय का भी मुखभाग बहुत छोटा और भीतर का भाग बहुत बड़ा होता है ॥३२॥ अथ गर्भे जीवप्रवेशप्रकारमाह- शुक्रार्त्तवसमाश्र्लेषो यदैव खलु जायते ।।३३।। जीवस्तदैव विशति युक्तः शुक्रार्त्तवान्तरः । सूर्यांशोः सूर्यमणित उभयस्माद्युताद्यथा । वह्निः सञ्जायते जीवस्तथा शुक्रार्त्तवायुतात् ।।३४।। गर्भ में जीव के प्रवेश करने का प्रकार—जिस समय शुक्र और आर्त्तव (रज) का संयोग होता है, उस समय जीव उसी मिले हुए वीर्य और रज के भीतर प्रवेश करता है। सूर्य की किरण और सूर्यकान्तमणि इन दोनों का संयोग होने से जैसे अग्नि उत्पन्न होती है, उसी तरह शुक्र और रज का संयोग होने से जीव उत्पन्न होता है ।।३३-३४।। आत्माऽनादिरनन्तश्चाऽव्यक्तो वक्तुं न शक्यते ।।३५।। चिदानन्दैकरूपोऽयं मनसाऽपि न गम्यते । एवम्भूतोऽपि जगतो भाविनी बलवत्तया । अविद्यास्वीकृते कर्मवशो गर्भे विशत्यसौ ।।३६।। जीवात्मा अनादि, अनन्त तथा अव्यक्त है अतएव इसके विषय में मुख से कुछ कहा नहीं जा सकता और वह चिदानन्दरूप (चैतन्य आनन्दस्वरूप) एक है अतः मन के लिये भी अगम्य है अर्थात् उसके स्वरूप की कल्पना मन भी नहीं कर सकता किन्तु जगत् की उत्पत्ति करनेवाली माया बलवती होने से कर्म के वश होकर अविद्या से स्वीकृत (अज्ञान से स्वीकार किये गये) गर्भ में प्रवेश करता है ।।३५-३६।। ❖ गर्भे=चतुर्विंशतितत्त्वमये ।।३५-३६।। यहाँ 'गर्भे' पद से 'चौबीस तत्त्वों से बने हुए गर्भ में' यह अर्थ समझना चाहिये ।।३५-३६।। स एव वेत्ता रसज्ञो द्रष्टा घ्राता स्पृशत्यसौ । श्रोता वक्ता च कर्त्ता च गन्ता रन्तोत्सृजत्यपि ।।३७।। (गर्भ में जाकर) वही जीवात्मा जाननेवाला, स्वाद ग्रहण करनेवाला, देखनेवाला, गन्ध ग्रहण करनेवाला, स्पर्श का बोध करनेवाला, सुननेवाला, बोलनेवाला, गमन करनेवाला, रमण करनेवाला तथा मलादि का त्याग करनेवाला होता है ॥३७॥ अथ गर्भाशयद्वारमुखसंवरणकालमाह- दिने व्यतीते नियतं सङ्कुचत्यम्बुजं यथा । ऋतौ व्यतीते नार्यास्तु योनिः संव्रियते तथा ।।३८।। गर्भाशय द्वार बन्द होने के समय—दिन के बीत जाने पर (रात्रि में) कमल जिस भाँति नियतरूप से संकुचित हो जाया करता है। उसी भाँति ऋतुकाल के बीत जाने पर स्त्रियों की योनि भी सङ्कुचित हो जाया करती हैं ॥३८॥ ❖ ऋतौ=रजोदर्शनात् षोडशनिशाऽऽत्मके काले । योनिरत्र धराद्वारम् ।।३८।। 'ऋतु' पद से 'रजोदर्शन होने के दिन से लेकर सोलह रात्रि पर्यन्त जो काल है' उसका बोध करना चाहिये और 'योनि' पद से 'गर्भाशय का द्वार' समझना चाहिये ।।३८।। अथ यमजसन्तानोत्पत्तौ हेतुमाह- बीजेऽन्तर्वायुना भिन्ने द्वौ जीवौ कुक्षिमागतौ । यमावित्यभिधीयेते धर्मेतरपुरःसरौ ।।३९।।
२६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे यमज (युग्म) सन्तान उत्पन्न होने का कारण—गर्भाशय के भीतर वायु के द्वारा जब रज वीर्य दो भागों में विभक्त हो जाता है तब जो दो जीव गर्भाशय में आते हैं, वे ही धर्मेतर-पुरःसर (धर्माधर्मजन्य) यमज कहलाते हैं ॥३९॥ ❖ तौ धर्मेतरपुरःसरौ=धर्मस्तदितरोऽधर्मस्तौ पुरःसरौ ययोः, तेन यमौ धर्माधर्माभ्यां भवत इत्यर्थः ॥३९॥ ‘धर्मेतरपुरःसरौ’ इस पद का अर्थ यह है कि धर्म (पुण्यजनक कर्म) और उससे इतर अधर्म, ये दोनों पुरःसर अर्थात् गर्भ में आने के कारण हैं जिनके, इसका फलितार्थ यह हुआ कि यमज धर्म और अधर्म से उत्पन्न होते हैं ॥३९॥ अथ स्त्रीपुंसनपुंसकसन्तानोत्पत्तौ हेतुमाह- आधिक्ये रेतसः पुत्रः कन्या स्यादार्त्तवेऽधिके । नपुंसकं तयोः साम्ये यथेच्छा१ पारमेश्वरी ॥४०॥ पुत्र, पुत्री और नपुंसक सन्तान होने के कारण—शुक्र के अधिक होने से पुत्र, रज के अधिक होने से कन्या और रज तथा वीर्य का भाग बराबर होने से नपुंसक सन्तान उत्पन्न होती है । क्योंकि ऐसी परमेश्वर की इच्छा है ॥४०॥ ❖ नन्वेवं सति कथं पुत्रोत्पत्तिः सदैवार्त्तवस्यैव बाहुल्यात् । यत उक्तम्- ‘आर्त्तवं चतुरञ्जलिप्रमाणं शुक्रं प्रसृतिमात्रम्’ इति । वाग्भटेऽप्युक्तमात्रेयादिभिः- ‘मज्जा मेदो वासा मूत्रपित्तश्लेष्मशकृन्त्यसृक् । रसो जलं च देहेऽस्मिन् त्वेकैकाञ्जलिवर्द्धितम् ॥३॥ पृथक् च प्रसृतं प्रोक्तमोजोमस्तिष्करेतसाम् । द्वावञ्जली तु दुग्धस्य चत्वारो रजसः स्त्रियः ।। समधातोरिदं मानं विद्याद् वृद्धिक्षयादृते’ ॥४॥ इस जगह शङ्का यह होती है कि—तब पुत्रोत्पत्ति कैसे होगी ? क्योंकि सदैव वीर्य की अपेक्षा रज का परिमाण अधिक रहता है । कहा भी है—‘रज का परिमाण चार अञ्जलि और शुक्र का १ प्रसृति (आधी अञ्जलि) है’ । ‘वाग्भट’ में आत्रेयादि महर्षियों ने भी इसी बात को कहा है कि—‘मज्जा, मेद, वसा (चर्बी), मूत्र, पित्त, कफ, पुरीष (मल), रक्त, रस और जल ये सब द्रव्य मनुष्य की देह में क्रमसे एक की अपेक्षा दूसरे एक-एक अञ्जलि अधिक हैं और ओज मस्तिष्क तथा शुक्र इन सबों का पृथक्-पृथक् एक-एक अञ्जलि प्रमाण है और स्त्रियों के शरीर में दूध २ अञ्जलि और रज ४ अञ्जलि प्रमाण रहता है, क्षय और वृद्धि से भिन्न समान धातु-वाले का ही यह प्रमाण जानना’ ॥३-४॥ ❖ नैवं यतो गर्भाशयस्थमेव शुक्रमार्त्तवं च गर्भोत्पत्तिहेतुः शुक्रं कदाचिदत्यन्तहर्षदशाद् दुग्धादिशुक्रलद्रव्यसेवनाद् शुक्रबाहुल्याद् गर्भाशये बहु स्रवति कदाचिद्वैमनस्यादिना शुक्राल्पत्वात्स्वल्पमिति, एवमार्त्तवमपीति न दोषः ।। सुश्रुतः पुनराह- ‘वैलक्षण्याच्छरीराणामस्थायित्वात्तथैव च । दोषधातुमलानां तु परिमाणं न विद्यते; ॥५॥ इसका उत्तर यह है कि-आपका शङ्का करना अनुचित है क्योंकि-गर्भाशय में ही स्थित जो शुक्र और रज हैं वे ही गर्भ उत्पन्न होने में कारण हैं न कि समस्त शरीर में स्थित रज और वीर्य । शुक्र कभी अत्यन्त हर्ष होने से अथवा दूध आदि शुक्र के बढ़ानेवाले द्रव्यों का सेवन करने से अथवा शुक्र की अधिकता होने से गर्भाशय में अधिक परिमाण में गिर पड़ता है और कभी दुःखित मन होने से अथवा शुक्र की कमी होने से थोड़ा ही गिरता है, इसी तरह से आर्तव के भी न्यूनाधिक्य होने का कारण समझना । सुश्रुत भी इसी विषय में कहते हैं कि—‘शरीरों की विलक्षणता तथा दोषादिकों की अस्थिरता होने से दोष, धातु और मल इन पदार्थों के परिमाण की स्थिरता नहीं रहती’ ॥५॥ १. परमेश्वरीति पाठान्तरं प्रामादिकम् ।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् २७ ❖ वैलक्षण्यात् दीर्घह्रस्वकृशादिभेदेन सादृश्याभावाद् अस्थायित्वात् वयोऽहर्निशर्तुभुक्तेष्वेकमात्रानवस्थानात् (५) ।।४०।। यहाँ पर 'वैलक्षण्यात्' से 'दीर्घ (लम्बा) ह्रस्व (छोटा) और कृश (दुबला) आदि भेदों से परस्पर शरीरों का सादृश्य न होने से' और 'अस्थायित्वात्' से अवस्था, दिन, रात्रि, ऋतु (वसन्तादि) और भोजन इन सबों के आदि, मध्य और अन्त में दोषादिकों की मात्रा की स्थिरता न होने से' यह अर्थ समझना चाहिये (५) ।।४०।। एवं तामभिसङ्गम्य पुनर्मासाद् भजेदसौ ।।४१।। पूर्वोक्त नियमों से ऋतुमती स्त्री का सङ्ग करने के बाद पुनः ऋतुमती होने पर एक मास के बाद उसका सङ्ग करे ।।४१।। ❖ मासादूर्ध्वमिति शेषः । अर्वाग्गमनेन गर्भद्वारविघटनाद् गर्भच्युतिप्रसङ्गः स्यात्, केचित्तु, पुनः पुष्पदर्शनेन गर्भलाभनिश्चये मासादूर्ध्व
२८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे श्लोक में ‘पिण्ड’ पद का अर्थ ‘गोल’ है और ‘मासे द्वितीयेके’ (दूसरे महीने में) इस पद का अन्वय ‘गर्भः पिण्डाकारो लक्ष्यः’ (गर्भ पिण्डाकार दिखलाई पड़ता है) इस वाक्य के साथ है न कि आगे के श्लोकों के साथ ॥४५॥ दक्षिणाक्षिमहत्त्वं स्यात् प्राक्क्षीरं दक्षिणे स्तने। दक्षिणोरुः सुपुष्टः स्यात्प्रसन्नमुखवर्णता ॥४६॥ पुन्नामधेयद्रव्येषु स्वप्नेष्वपि मनोरथः। आम्रादिफलमाप्नोति स्वप्नेषु कमलादि च ॥४७॥ दहिने नेत्र का बड़ा हो जाना, दहिने स्तन में पहले दूध का उतरना, दक्षिण ऊरु (जंघा) का भलीभाँति पुष्ट होना, मुख के रंग का प्रसन्न (साफ) होना, स्वप्न में पुरुष संज्ञक द्रव्यों की अभिलाषा होना, स्वप्न में आम्रादि फलों और कमलादिक पुष्पों की प्राप्ति होना, ये सब लक्षण दूसरे महीने के बाद से प्रकट होते हैं ॥४६-४७॥ अथ कन्यागर्भवत्या लक्षणम्- कन्या गर्भवती गर्भे पेशी मासि द्वितीयेके। पुत्रगर्भस्य लिङ्गानि विपरीतानि चेक्षते ॥४८॥ कन्यागर्भवती स्त्रियों के लक्षण—जिसके गर्भ में कन्या रहती है, उस गर्भवती स्त्री का गर्भ दूसरे महीने में पेशी (लंबा) की तरह दिखलाई पड़ता है और पुत्रगर्भ के जो लक्षण हैं उनसे विपरीत लक्षण दिखलाई पड़ते हैं अर्थात् वायें नेत्र का बड़ा होना, वायें स्तन में पहले दूध उतरना इत्यादि विपरीत लक्षण समझना ॥४८॥ ❖ पेशी दीर्घाकृतिः ॥४८॥ श्लोक में ‘पेशी’ का अर्थ है लम्बा आकारवाला ॥४८॥ अथ नपुंसकगर्भवत्या लक्षणमाह- नपुंसकं यदा गर्भे भवेद् गर्भोऽर्बुदाकृतिः। उन्नते भवतः पार्श्वे पुरस्तादुदरं महत् ॥४९॥ नपुंसक गर्भ के लक्षण—यदि गर्भ में नपुंसक हो तो गर्भिणी का गर्भ आकार में अर्बुद के समान दिखाई पड़ता है और उदर के दोनों भाग ऊँचे तथा सम्मुख भाग बड़ा दिखाई पड़ता है ॥४९॥ ❖ अर्बुदं=वर्त्तुलफलार्द्धतुल्यम् ॥४९॥ ‘अर्बुद’ पद से ‘गोलाकार फल के अर्धभाग के तुल्य’ अर्थ समझना चाहिये ॥४९॥ नपुंसकविशेषानाह१- आसेक्यश्च सुगन्धी च कुम्भीकश्चेर्ष्यकस्तथा। अमी सशुक़ा बोद्धव्या अशुक़ः षण्डसंज्ञकः२ ॥५०॥ नपुंसकों के भेद—आसेक्य, सुगन्धी, कुम्भीक और ईर्ष्यक, ये चार प्रकार के नपुंसक को शुक्र होता है और षण्ड नामक नपुंसक अशुक़ (शुक्ररहित) होता है ॥५०॥ एतेषां लक्षणान्याह, तत्रादावासेक्यलक्षणमाह- पित्रोस्तु स्वल्पवीर्यत्वादासेक्यः पुरुषो भवेत्। सशुक़ं प्राश्य लभते ध्वजोन्नतिमसंशयम् ।। नपुंसकों के लक्षण—माता-पिता का वीर्य कम होने से आसेक्य नामक नपुंसक पुरुष उत्पन्न होता है। जब वह शुक्र पान करता है तभी निश्चित रूप से उसका लिङ्ग चैतन्य होता है ॥५१॥ ❖ पित्रोर्मातापित्रोः स्वल्पवीर्यत्वात् स्वल्पशुक्रार्त्तवत्वाद्, आसेक्यनामा मुखयोनीति नामान्तरम्। स शुक्रं प्राश्येति स पुरुषोऽन्यपुरुषेण मैथुनं कारयित्वा तस्य शुक्रं प्राश्य मेहनोत्थानं लभत इत्यर्थः ॥५१॥ १. ‘विशेषमाहे’ति पाठान्तरम्। २. ‘षण्ड-खण्डे’ति च पाठान्तरे प्रामादिके। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् २९ श्लोक में 'पित्रोः' पद से 'माता-पिता का' और 'स्वल्पशुक्रार्तवात्' इसे 'रज और वीर्य कम होने से' ऐसा अर्थ समझना चाहिये। 'आसेक्य' का दूसरा नाम 'मुखयोनि' भी है, अतःआसेक्य नामक नपुंसक अर्थात् मुखयोनि नामक जो नपुंसक है, वह शुक्र का पान करके अर्थात् अन्य पुरुष से अपने मुख में मैथुन करा कर मुख में स्खलित हुये उस पुरुष के वीर्य का पान करके अपने लिङ्ग के खड़े होने की शक्ति को प्राप्त करता है ॥५१॥ अथ सौगन्धिकनपुंसकलक्षणमाह- यः पूतियोनौ जायेत स हि सौगन्धिको भवेत्। स योनिशेफसोर्गन्धमाघ्राय लभते बलम् ॥५२॥ जो दुर्गन्ध युक्त योनि से उत्पन्न होता है, वह सौगन्धिक नामक नपुंसक कहलाता है, और वह योनि तथा लिङ्ग के गन्ध को सूँघ कर मैथुन करने में सामर्थ्य प्राप्त करता है ॥५२॥ ❖ सौगन्धिकः = सौगन्धिकनामा, नासायोनिरिति नामान्तरम्। बलं मैथुने शक्तिम् ॥५२॥ श्लोक में 'सौगन्धिक' का दूसरा नाम नासायोनि भी है। 'बल' पद का अर्थ 'मैथुन करने में शक्ति' समझना चाहिये ॥५२॥ अथ कुम्भीकनपुंसकलक्षणमाह- स्वे गुदेऽब्रह्मचर्याद्यः स्त्रीषु पुंवत् प्रवर्त्तते। स कुम्भीक इति ज्ञेयो गुदयोनिस्तु स स्मृतः ॥५३॥ जो पुरुष अन्य पुरुष के द्वारा अपनी गुदा में मैथुन कराने पर मैथुन करने की शक्ति प्राप्त करता है, उसे कुम्भीक नामक नपुंसक समझना चाहिये। उसका दूसरा नाम 'गुदयोनि' भी प्रसिद्ध है ॥५३॥ ❖ अब्रह्मचर्याद् = ब्रह्मचर्यममैथुनम्; अब्रह्मचर्यम् = मैथुनम्, किन्तु स्त्रीवदधोभूतः स्वे गुदे पुरुषान्तरेण मैथुनं कारयति, तस्मात् ॥५३॥ 'अब्रह्मचर्यात्' — मैथुन से रहित, अत एव अब्रह्मचर्य का अर्थ मैथुन होने से इसका अर्थ जो 'अपनी गुदा में मैथुन कराने से' यह होता है, उसमें 'स्त्री की तरह स्वयं नीचे रह कर ऊपर से दूसरे पुरुष से अपनी गुदा में मैथुन कराने से' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥५३॥ अथेर्ष्यकनपुंसकलक्षणमाह- दृष्ट्वा व्यवायमन्येषां व्यवाये यः प्रवर्त्तते। ईर्ष्यकः स तु विज्ञेयो दृष्टियोनिस्तु स स्मृतः ॥५४॥ दूसरे पुरुष को मैथुन करते हुये देखकर जो मैथुन करने में प्रवृत्त होता है, उसे ईर्ष्यक नामक नपुंसक समझना चाहिये। इसका दूसरा नाम दृष्टियोनि भी प्रसिद्ध है ॥५४॥ अथ षण्डनपुंसकलक्षणमाह- यो भार्यायामृतौ मोहादङ्गनेव प्रवर्त्तते, तत्र स्त्रीचेष्टिताकारो जायते¹ षण्डसंज्ञकः ॥५५॥ जो मोह (मूर्खता) वश हो कर ऋतुकाल में स्त्री की भाँति मैथुन करने में प्रवृत्त होता है अर्थात् स्वयं स्त्री की भाँति नीचे रह कर और स्त्री को अपने ऊपर उठाकर स्त्री से मैथुन कराता है और उस समय जो गर्भ होता है, उससे स्त्री की तरह चेष्टा और आकारवाला षण्ढ नामक नपुंसक उत्पन्न होता है ॥५५॥ ❖ स्त्रीचेष्टिताकारः स्त्र्याकारश्मश्रुरहितः। स्त्रीचेष्टितः समेहनोऽपि पुरुषशक्तिरहितः ॥५५॥ 'स्त्रीचेष्टिताकारः' = स्त्री की तरह दाढ़ी और मूँछ से रहित। 'स्त्रीचेष्टितः' = 'स्त्री की तरह चेष्टावाला' अर्थात् लिङ्ग होने पर भी पुरुष की जो मैथुन करने की शक्ति है, उससे रहित ॥५५॥ १. 'षण्ड=खण्डे'ति पाठान्तरे अशुद्धे।
३० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ नरचेष्टितायाः कन्याया उत्पत्तौ हेतुमाह- ऋतौ ऋतौ पुरुषवत् प्रवर्त्तेताङ्गना यदि। तत्र कन्या यदि भवेत् सा भवेन्नरचेष्टिता ॥५६॥ पुरुष चेष्टावाली कन्या उत्पन्न होने के कारण—प्रत्येक ऋतुकाल में यदि स्त्री पुरुष की तरह (पुरुष के ऊपर चढ़कर) मैथुन करने के लिये प्रवृत्त हो और उससे यदि कन्या उत्पन्न हो तो वह पुरुषों की भाँति चेष्टा करनेवाली होती है ॥५६॥ ❖ पुरुषवत् स्त्रियमारुह्य सा तस्या योनौ स्वयोनिघर्षणं करोति ।।५६।। 'पुरुष की भाँति चेष्टा करनेवाली' होती है अर्थात् (युवती होने पर) 'पुरुष की भाँति स्त्री के ऊपर चढ़ कर स्त्री की योनि में अपनी योनि को रगड़नेवाली होती है' ऐसा समझना चाहिये ।। अपरा अपि गर्भप्रकृतीराह- यदा नार्यावुपैयातां वृष्यन्त्यौ कथञ्चन। मुञ्चन्त्यौ शुक्रमन्योन्यमनस्थिस्तत्र जायते ।।५७।। अनस्थि सन्तानोत्पत्ति के लक्षण—यदि दो स्त्रियाँ काम से उन्मत्त हो करके परस्पर योनि रगड़ने के द्वारा शुक्र (रज) का त्याग करें, तो उससे अनस्थि सन्तान उत्पन्न होती है ॥५७॥ ❖ अनस्थिः-अत्रेषदर्थेनञ् तेनाल्पकोमलास्थिरित्यर्थः ।।५७।। 'अनस्थि' पद में ईषदर्थ में नञ् होने से इसका 'थोड़ी और कोमल हड्डियोंवाली' अर्थ होता है ॥५७॥ ऋतुस्नाता तु या नारी स्वप्ने मैथुनमाचरेत्। आर्तवं वायुरादाय कुक्षौ गर्भं करोति हि ॥५८॥ मासि मासि प्रवर्द्धेत स गर्भो. गर्भलक्षणः। कललं जायते तस्य वर्जितं पैतृकैर्गुणैः ॥५९॥ ऋतुस्नाता (रजोधर्म होने के बाद स्नान किये हुई) स्त्री यदि स्वप्न में मैथुन करे अर्थात् स्वप्न में देखे कि पुरुष उसके साथ मैथुन कर रहा है और वह भी उसमें प्रवृत्त हो रही है तो उस समय वायु उसके रज को गर्भाशय में पहुँचा कर गर्भ उत्पन्न कर देता है और वही गर्भ, गर्भ के लक्षणों से युक्त होकर महीने-महीने बढ़ा करता है, उसके बाद पैतृक गुणों से रहित वह गर्भ कललरूप (कीचड़ रूप) में उत्पन्न होता है ॥५८-५९॥ ❖ गर्भलक्षणः=प्रकृतगर्भलक्षणः। पैतृकैर्गुणैः=केशश्मश्रुलोमनखदन्तशिरास्नायुधमनीरेतः- प्रभृतिभिः ।।५८-५९।। 'गर्भलक्षणः' का अर्थ है वस्तुतः गर्भ के लक्षणों से युक्त और 'पैतृकैर्गुणैः' का अर्थ—केश, दाढ़ी, मूँछ, रोम, नख, दाँत, शिरा, स्नायु, धमनी और शुक्र आदि से (वर्जितं=वर्जित) ॥५८-५९॥ सर्पवृश्चिककूष्माण्डाकृतयो१ विकृताश्च ये। गर्भास्ते योषितस्ताश्च ज्ञेयाः पापकृतो भृशम् ।।६०।। गर्भो वातप्रकोपेण दोहदे चापमानिते२। भवेत् कुब्जः कुणिः पङ्गुर्मूको भिन्निन एव च ।।६१।। जिन स्त्रियों को साँप, बिच्छू और कूष्माण्ड के आकार के तथा विकृत (कुष्ठादि विकारों से युक्त) जो गर्भ उत्पन्न होते हैं उन गर्भो को तथा उन स्त्रियों को अत्यन्त पापात्मा समझना चाहिये । गर्भिणी के दोहद को अपमानित करने पर अर्थात् गर्भिणी को अभिलषित वस्तु न देने पर वायु के कोप से गर्भ कुब्जा, कुणि (जिसका हाथ टेढ़ा-मेढ़ा हो गया हो), पङ्गु (लुञ्ज पैरोंवाला), गूँगा और मिनमिना अर्थात् मिनमिना कर बोलनेवाला उत्पन्न होता है ॥६०-६१॥ १. 'कुष्माण्डे'ति पाठान्तरमसङ्गतम्। २. 'चावमानिते' इति पाठान्तरम्। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ३१ पुत्राणामाहाराचारचेष्टाभेदस्य हेतुमाह- आहाराचारचेष्टाभिर्यादृशीभिः समन्वितौ । स्त्रीपुंसौ समुपेयातां तथोः पुत्रोऽपि तादृशः ।।६२।। सन्तानों में चेष्टादि भेद के कारण-जिस तरह के आहार, आचार और चेष्टा से युक्त होकर स्त्री और पुरुष ऋतुकाल में मैथुन करते हैं, उन दोनों के पुत्र भी उत्पन्न होने पर उसी तरह के आहार, आचार और चेष्टा से युक्त होते हैं ॥६२॥ समुपेयातां संयोगं गच्छेताम् ।।६२।। 'समुपेयाताम्' अर्थात् 'मैथुन के लिये परस्पर संयुक्त होते हैं' ।।६२।। अथ गर्भलक्षणमाह- गर्भाशयगतं शुक्रमार्त्तवं जीवसंज्ञकः । प्रकृतिः सविकारा च तत्सर्वं गर्भसंज्ञकम् ।।६३।। कालेन वर्द्धितो गर्भो यद्यङ्गोपाङ्गसंयुतः । भवेत्तदा स मुनिभिः शरीरीति निगद्यते ।।६४।। गर्भ के लक्षण-गर्भाशयगत शुक्र, रज, जीव और सोलह विकारों से युक्त प्रकृति ये सब गर्भसंज्ञक हैं अर्थात् इन्हीं को गर्भ कहते हैं। काल पाकर बढ़ा हुआ गर्भ जब अङ्ग और उपाङ्गों से युक्त हो जाता है, तब उसे मुनि लोग 'शरीरी' कहते हैं ।।६३-६४।। अङ्गोपाङ्गसंयुतः=व्यक्ताङ्गोपाङ्ग ।।६३-६४।। 'अङ्गोपाङ्गसंयुतः' अर्थात् 'जब अङ्ग और उपाङ्ग व्यक्त हो जाते हैं ।।६३-६४।। तस्य त्वङ्गान्यनुपाङ्गानि ज्ञात्वा सुश्रुतशास्त्रतः । मस्तकादभिधीयन्ते शिष्याः ! शृणुत यत्नतः ।।६५।। आद्यमङ्गं शिरः प्रोक्तं तदुपाङ्गानि कुन्तलाः । तस्यान्तर्मस्तुलुङ्गं च ललाटं भ्रूयुगन्तथा ।।६६।। नेत्रद्वयं तयोरन्तर्वर्त्तन्ते द्वे कनीनिके । दृष्टिद्वयं कृष्णगोलौ श्वेतभागौ च वर्त्मनी ।।६७।। पच्माण्यपाङ्गौ शङ्खौ च कर्णौ तच्छष्कुलीद्वयम् । पालिद्वयं कपोलौ च नासिका च प्रकीर्त्तिता ।।६८।। ओष्ठाधरौ च सृक्किण्यौ मुखं तालु हनुद्वयम् । दन्ताश्च दन्तवेष्टश्च रसना चिबुकङ्गलः ।।६९।। द्वितीयमङ्गं ग्रीवा तु यया मूर्द्धा विधार्यते । तृतीयं बाहुयुगलं तदुपाङ्गान्न्यथ ब्रुवे ।।७०।। तत्रोपरि मतौ स्कन्धौ प्रगण्डौ भवतस्त्वधः । कफोणियुग्मं तदधः प्रकोष्ठयुगलन्तथा ।।७१।। मणिबन्धौ तले हस्तौ तयोरङ्ङ्गुलयो दश। नखाश्च दश ते स्थाप्या दश च्छेद्याः प्रकीर्त्तिताः ।।७२।। हे शिष्यो ! मैं उस शरीरी के अङ्ग और उपाङ्गों को 'सुश्रुत' शास्त्र से जान कर मस्तक से आरम्भ करके कहता हूँ ! तुम लोग उसे यत्नपूर्वक सुनो-पहिला अङ्ग शिर कहा है और उसके उपाङ्ग केश, मस्तक के अन्दर रहनेवाला मस्तुलुङ्ग (घृत की तरह एक प्रकार का पदार्थ), ललाट, दो भौंहें, दो नेत्र, दोनों नेत्रों के अन्दर रहनेवाली दो कनीनिकायें (पुतलियाँ), दो दृष्टिमण्डल (निगाह-जिससे दिखाई पड़ता है), दो कृष्ण वर्ण के मण्डल, दो श्वेत भाग, दो पलकें, दो पक्ष्म (नेत्रलोम), दो अपाङ्ग (नेत्रों के प्रान्तभाग), दो शङ्ख (मस्तक की हड्डी-कान के पास की कनपटी), दो कान, दो कान की शष्कुलि (कान के छिद्रप्रदेश), दो पाली (पत्ते की भाँति कान के नीचे का भाग), दो कपोल (गाल), नाक, ओष्ठ और अधर (नीचे का ओष्ठ), दो सृक्किणी (ओष्ठों के दोनों प्रान्तभाग), मुख, तालु, दो हनु (दोनों कपोलों के नीचे तरफ के दोनों भाग), दाँत, जबड़ा, (मसूड़ा), जिह्वा, चिबुक (ठोढ़ी) और गला ये सब हैं। दूसरा अङ्ग ग्रीवा (गर्दन) है, जिसके आधार पर शिर स्थित है। तीसरा अङ्ग दोनों बाँहें हैं। अब उसके उपाङ्गों को कहते हैं-उसमें दोनों बाहुओं के ऊपर दो कन्धे और दोनों कन्धों के नीचे दो प्रगण्ड (बाजू) दोनों बाजुओं के नीचे दो कफोणि (केहुनी), उनके नीचे दो प्रकोष्ठ, उनके नीचे दो मणिबन्ध (कलाई), उसके नीचे दो हथेली और दो हाथ, दोनों हाथों की दस अङ्गुलियाँ, दस नख तथा उन नखों के ऊपर के दस स्थाप्य (नहीं काटने योग्य) और नीचे के नखों के दस अग्रभाग छेद्य (काटने योग्य) कहे हुए हैं। ये सब दोनों बाहुओं के उपाङ्ग हैं ॥६५-७२॥
३२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे चतुर्थमङ्गं वक्षस्तु तदुपाङ्गान्न्यथ ब्रुवे । स्तनौ पुंसस्तथा नार्या विशेष उभयोरयम् ।।७३।। यौवनागमने नार्याः पीवरौ भवतः स्तनौ । गर्भवत्याः प्रसूतायास्तावेव क्षीरपूरितौ ।।७४।। चौथा अङ्ग वक्षःस्थल (छाती) है, अब उसके उपाङ्गों को कहते हैं—दो स्तन, स्त्री और पुरुष के जो दो स्तन हैं, उसमें विशेषता यह है कि युवावस्था आने पर स्त्री के दोनों स्तन मोटे हो जाते हैं और गर्भवती तथा प्रसूता स्त्री के वे ही दोनों स्तन दूध से भर जाते हैं और पुरुष के दोनों स्तन सदा एक ही अवस्था में बने रहते हैं ।।७३-७४।। अथ हृदयस्य स्वरूपमाह- हृदयं पुण्डरीकेण सदृशं स्यादधोमुखम् । जाग्रतस्तद्विकसति स्वपतस्तु निमीलति ।।७५।। आशयस्तत्तु जीवस्य चेतनास्थानमुत्तमम् । अतस्तस्मिंस्तमोव्याप्ते प्राणिनः प्रस्वपन्ति हि ।।७६।। हृदय के स्वरूप—हृदय कमल के सदृश होता है, किन्तु कमल की भाँति ऊर्ध्वमुख न होकर वह अधोमुखवाला होता है । प्राणी जब जागता रहता है तब वह विकसित (खिला) और जब सोता रहता है तब सङ्कुचित रहता है, वह हृदय जीव का आशय (रहने का स्थान) तथा सबसे बढ़कर प्रधान चेतना का स्थान है । अतएव जब वह (हृदय) तमोगुण से व्याप्त हो जाता है, तब प्राणिमात्र सो जाते हैं ।।७५-७६।। ❖ चेतनास्थानमुत्तममिति । अयमभिप्रायः- 'चेतनानामधिष्ठानं मनो देहश्च सेन्द्रियः । ^१केशलोमनखाग्रान्नमलद्रवगुणैर्विना' ।।६।। 'उत्तम चेतना का स्थान है' इसके कहने का अभिप्राय यह है कि—'केश, लोम, नखों के अग्रभाग, अन्न का मल, द्रव पदार्थ मूत्रादिक और शब्दादि गुण, इन सब पदार्थों को छोड़कर इन्द्रियों के सहित सम्पूर्ण देह तथा मन चेतना का स्थान है' ।।६।। इत्युक्तवता चरकेण सकलं शरीरं चेनास्थानमुक्तं तदपेक्षया हृदयं विशेषतश्चेतनास्थानमिति ।।७५-७६।। यद्यपि इस प्रकार कहते हुये चरक भगवान् ने सम्पूर्ण शरीर को चेतना का स्थान बतलाया है, तथापि और अङ्गों की अपेक्षा हृदय विशेषरूप से चेतना का स्थान है ऐसा समझना चाहिये ।।७५-७६।। कक्षयोर्वक्षसः सन्धी जत्रुणी समुदाहृते । कक्षे उभे समाख्याते तयोः स्यातां च वङ्क्षणौ ।।७७।। दो जत्रु अर्थात् दोनों कक्षा (काँख) छाती के दो सन्धि और दोनों काँखों के दो वङ्क्षण (बाहुओं की सन्धि) अर्थात् बगल, ये सब वक्षःस्थल के उपाङ्ग हैं ।।७७।। उदरं पञ्चममङ्गं षष्ठं पार्श्वद्वयं मतम् । सपृष्ठवंशं पृष्ठं तु समस्तं सप्तमं स्मृतम् ।।७८।। उपाङ्गानि च कथ्यन्ते तानि जानीहि यत्नतः । शोणिताज्जायते प्लीहा वामतो हृदयादधः ।।७९।। रक्तवाहिशिराणां स मूलं ख्यातो महर्षिभिः । हृदयाद्वामतोऽधश्च फुप्फुसो रक्तफेनजः ।।८०।। अधो दक्षिणतश्चापि हृदयाद्यकृतः स्थितिः । तत्तु रञ्जकपित्तस्य स्थानं शोणितजं मतम् ।।८१।। पाँचवाँ अङ्ग (पेट), छठा अङ्ग दोनों पार्श्व (पँसुली) और सातवाँ अङ्ग पृष्ठवंश (मेरुदण्ड) के सहित समस्त पीठ है । अब उसके जिन उपाङ्गों को कहता हूँ, उन्हें यत्नपूर्वक समझो—हृदय के नीचे वामभाग में प्लीहा है, जो रक्त से उत्पन्न होती है और जिसे महर्षियों ने रक्तवाहिनी (जिसमें रक्त बहता है) शिराओं का मूल कहा है । हृदय के वाम भाग १. 'केशलोमनखाग्रं च मलं द्रव्यगुणै'रिति पाठान्तरमसङ्गतम् ।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ३३ में नीचे की ओर फुफ्फुस है, जो रक्त के फेन (झाग) से उत्पन्न होता है। हृदय के दक्षिण भाग में नीचे की ओर यकृत् है, जिसे मुनियों ने रञ्जक पित्त का स्थान और रक्त से उत्पन्न हुआ माना है ॥७८-८१॥ अधस्तु दक्षिणे भागे हृदयात् क्लोम तिष्ठति। जलवाहिशिरामूलं तृष्णाऽऽच्छादानकृन्मतम् ।।८२।। हृदय के दक्षिण भाग में क्लोम रहता है, जिसे मुनियों ने जलवाहिनी शिराओं का मूल तथा तृष्णा (प्यास) का आच्छादन करनेवाला माना है ॥८२॥ ❖ क्लोम=तिलकम्, एतत्तु वातरक्तजम्। अत्र वृद्धवाग्भटोऽप्याह-‘रक्तादनिलसंयुक्तात् कालीयकसमुद्भवः' (६) इति ।।८२।। 'क्लोम' का नाम तिलक भी है और यह क्लोम वात युक्त रक्त से उत्पन्न होता है। इस विषय में 'वृद्ध वाग्भट' भी कहते हैं कि 'वायु युक्त रक्त से क्लोम अर्थात् कालीयक की उत्पत्ति होती है' (६) ।।८२।। मेदःशोणितयोः साराद् १वृक्कयोर्युगलं भवेत्। तौ तु पुष्टिकरी प्रोक्तौ जठरस्थस्य भेदसः ।।८३।। अर्द्धव्यामेन हीनानि योषितोऽन्त्राणि निर्दिशेत् ।।८४।। उक्ताः सार्द्धास्त्रयो व्यामाः पुंसामन्त्राणि सूरिभिः । उन्दुकश्च कटी चापि त्रिकं बस्तिश्च वङ्क्षणौ । कण्डराणां प्ररोहः २स्यान्मेढ्रोऽध्वा वीर्यमूत्रयोः ।।८५।। स एव गर्भस्याधानं कुर्याद्गर्भाशये स्त्रियाः ३ । शङ्खनाभ्याकृतिर्योनिस्त्र्यावर्त्ता सा च कीर्त्तिता ।।८६।। तस्यास्तृतीये त्वावर्त्ते गर्भशय्या प्रतिष्ठिता । वृषणौ भवतः सारात्कफासृङ्मांसमेदसाम् ४ ।।८७।। वीर्यवाहिशिराधारौ तौ मतौ पौरुषावहौ । गुदस्य मानं सर्वस्य सार्द्धं स्याच्चतुरङ्गुलम् ।।८८।। तत्र स्युर्वलयस्तिस्रः शङ्खावर्त्तनिभास्तु ताः । प्रवाहिणी भवेत्पूर्वा सार्द्धाङ्गुलमिता ५ मता ।।८९।। उत्सर्जनी तु तदधः सा सार्द्धाङ्गुलसम्मता । तस्याधः संवरणी ६ स्यादेकाङ्गुलसमा मता ।।९०।। अर्द्धाङ्गुलप्रमाणं तु बुधैर्गुदमुखं मतम् । मलोत्सर्गस्य मार्गोऽयं पायुदहे विनिर्मितः ।।९१।। पुंसः प्रोथौ स्मृतौ यौ तु त
३४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
माना है। अतएव यह जिसको नहीं होता अथवा रोगाक्रान्त होता है तो वह मैथुन करने में समर्थ नहीं हो सकता। सम्पूर्ण गुदा का मान ४ अङ्गुल है, उसमें शङ्ख के आवर्त्त की भाँति तीन बली हैं, उसमें पहिली बली प्रवाहिणी नाम की है और उसका मान डेढ़ अङ्गुल का माना गया है। उसके नीचे उत्सर्जनी नाम की दूसरी बली है और उसका मान भी डेढ़ अङ्गुल है, फिर उसके नीचे संवरणी नाम की तीसरी बली है, जिसका मान एक अङ्गुल है और आधे अङ्गुल प्रमाण पण्डितों ने गुदा का मुख माना है। यही गुदामुख पायु कहलाता है। विधाता ने देह के बीच में इसी को अन्न के मल निकलने का मार्ग बनाया है। पुरुषों के जो दो प्रोथ (कूले) होते हैं, वे ही दोनों स्त्रियों के नितम्ब कहलाते हैं और उन दोनों (प्रोथ या नितम्बों) के दो कुकुन्दर अर्थात् नितम्बों के ऊपर के दो गड्ढे होते हैं, ये सब उदर के उपाङ्ग हैं। आठवाँ अङ्ग दोनों सक्थि अर्थात् दोनों पैर हैं। अब मैं इनके उपाङ्गों को कहता हूँ-दो जानु, दो पिंडली, दो जंघा, दो घुण्टिका (घुटने), दो एड़ी दो पैर के तलुये, दो चरण और दस पैर की अङ्गुलियाँ एवं उनके दस नख ये सब उपाङ्ग हैं ॥८३-९३॥
अथेदं शरीरमपरेणापि येन येन समवायिकारणेनोत्पद्यते तानि सर्वाण्याह-
अथ दोषाः प्रवक्ष्यन्ते धातवस्तदनन्तरम् ॥९४॥ अहारादेर्गतिस्तस्य परिणामश्च वक्ष्यते। आर्तवं चाथ धातूनां मलास्तदुपधातवः ॥९५॥ आशयाश्च कलाश्चापि मर्मांण्यथ च सन्धयः। शिराश्च स्नायवश्चापि धमन्यः कण्डरास्तथा ॥९६॥ रन्ध्राणि भूरि स्रोतांसि जालैः कूर्च्चाश्च रज्जवः। सेवन्यश्चाथ सङ्घाताः सीमन्ताश्च तथा त्वचः ॥९७॥ लोमानि लोमकूपाश्च देह एतन्मयो मतः।
शरीरोत्पत्ति में अन्यान्य समवायिकारण-अब प्रथम दोषों का वर्णन करेंगे, तदनन्तर धातुओं का, उसके बाद आहार आदि की गति और उसका परिणाम तथा आर्तव और धातुओं के मल तथा उपधातु, आशय, कला, मर्म, सन्धि, शिरा, स्नायु, धमनी, कण्डरा, रन्ध्र, स्रोत, जाल, कूर्च, रज्जु, सेवनी, सङ्घात, सीमन्त, त्वचा, लोम और लोमकूप, इन सबों का वर्णन करेंगे, क्योंकि इन्हीं सबों से शरीर बना हुआ है ॥९४-९७॥
तत्र दोषस्वरूपमाह वाग्भटः-
वायुः पित्तं कफश्चेति त्रयो दोषाः समासतः ॥९८॥ विकृताविकृता देहं घ्नन्ति ते१ वर्द्धयन्ति च। ते व्यापिनोऽपि हृन्नाभ्योरधो मध्योर्ध्वसंश्रयाः। वयोऽहोरात्रिभुक्तानामन्तमध्यादिगाः क्रमात् ॥९९॥
शरीरस्थ दोषों का स्वरूप-वायु, पित्त और कफ संक्षेप से यही तीन दोष कहे गये हैं और ये विकृत (दुष्ट) होने से देह का नाश तथा अविकृत (शुद्ध) होने से शरीर को बढ़ाते हैं। यद्यपि ये सब दोष शरीर में व्याप्त होकर रहने वाले हैं तथापि हृदय और नाभि के नीचे, मध्य तथा ऊपर भाग में विशेषरूप से रहते हैं। वायु, पित्त और कफ ये अवस्था, दिन, रात्रि और भोजन इन सबों के अन्त, मध्य और आदि में क्रम से विशेष रूप से बलवान् रहते हैं अर्थात् वृद्धावस्था में वायु, युवावस्था में पित्त, बाल्यावस्था में कफ, दिन तथा रात्रि के अन्त में वायु, मध्य में पित्त, आरम्भ में कफ, भोजन के अन्त में (पचजाने पर) वायु, मध्य (पचने के समय) पित्त आरम्भ (भोजन कर चुकने के बाद) कफ की वृद्धि होती है ॥९८-९९॥
दोषशब्दस्य निरुक्तिमाह-
धातवश्च मलाश्चापि दुष्यन्त्येभिर्यतस्ततः। वातपित्तकफा एते त्रयो दोषा इति स्मृताः ॥१००॥
दोष शब्द की निरुक्ति-वात, पित्त और कफ ये ही तीनों धातुओं तथा सम्पूर्ण मल पदार्थों को दूषित कर देते हैं, इसी से ये वातादिक तीनों दोष कहलाते हैं ॥१००॥
१. 'सम्' इति पाठान्तरम्।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ३५ ❖ दोषा इत्यत्र 'दुष वैकृत्ये' इति दुषधातोर्दुष्यन्त्येभिरिति वाक्येन 'अकर्त्तरि च कारके संज्ञायामि'त्यनेन सूत्रेण करणेऽर्थे घञ्प्रत्ययः ।।१००।। "दोषाः' इस पद में 'दुष-वैकृत्ये' अर्थात् वैकृत्यार्थक दुष धातु से 'दुष्यन्त्येभिरिति वाक्येन' अर्थात् 'रस, रक्त आदि धातु और मल जिससे दूषित हों, उसे दोष कहते हैं' ऐसा अर्थ करने से 'अकर्त्तरि च कारके संज्ञायाम्' इस सूत्र से करण अर्थ में घञ्प्रत्यय हुआ है ।।१००।। ते धातवोऽपि विद्वद्भिर्गदिता देहधारणात् ।।१०१।। वे ही वातादि देह को धारण करते हैं, इससे उनकी धातु संज्ञा भी है ।।१०१।। यत आह सुश्रुतः- ❖ 'विसर्गादानविक्षेपैःसोमसूर्यानिला यथा । धारयन्ति जगद्देहंकफपित्तानिलास्तथा (७) इति' । चन्द्र, सूर्य और वायु जिस प्रकार विसर्ग (अमृत बरसाना), आदान (रसादिकों का ग्रहण करना) और विक्षेप के द्वारा जगत् को धारण करते हैं, उसी प्रकार से कफ, पित्त और वायु भी देह को धारण करते हैं (७) ।।१०१।। ❖ अत्र यथासङ्घ्येनान्वयो बोद्धव्यः । विसर्गादानं वातस्यैव । विक्षेपः शीतोष्णादीनां विविधप्रकारेण प्रेरणम् (७) ।।१०१।। यहाँ पर विसर्ग, आदान और विक्षेप इन तीनों का कफ, पित्त और वायु इन तीनों के साथ तथा चन्द्रादिक तीनों के साथ क्रम से अन्वय समझना चाहिये । विसर्ग और आदान ये दो क्रियायें यद्यपि क्रमानुसार कफ और पित्त की हैं तथापि ये वायु के द्वारा ही होती हैं ऐसा समझना चाहिये । अतएव विक्षेप का अर्थ शीत और उष्णादिकों का अनेक प्रकार से प्रेरणा करना है अर्थात् जो शीत और उष्णादि हैं सो क्रम से कफ और वित्तजन्य होते हैं, किन्तु इनका अनेक प्रकार से प्रेरणा करना वायु का ही काम है, अतः स्वतन्त्र विक्षेपणक्रिया वायु की ही हुई (७) ।।१०१।। मलाश्च ते रसादीनां मलिनीकरणान्मताः ।। ये ही वातादि तीन दोष रसरक्तादिकों को मलिन कर देते हैं । अतएव 'मल' इस नाम से समझे जाते हैं ।। तत्र वायोः स्वरूपमाह- दोषधातुमलादीनां नेता शीघ्रः समीरणः । रजोगुणमयः सूक्ष्मो रूक्षः शीतो लघुश्चलः ।।१०२।। त्रिदोषों में वायु के स्वरूप-वायु, दोष (कफ, पित्त), धातु (रसरक्तादि) और मलादि पदार्थों का नेता, शीघ्रकारी, रजोगुण से युक्त, सूक्ष्म, रूक्ष (रूखा), शीतल, हल्का और चञ्चल है ।। ❖ नेता=स्थानान्तरं प्रापयिता । शीघ्रः=आशुकारी ।।१०२।। 'नेता' का अर्थ है एक स्थान से दूसरे स्थान में पहुँचानेवाला और 'शीघ्रः' का अर्थ है 'शीघ्रता करने वाला' ।।१०२।। अन्यच्च-उत्साहोच्छ्वासनिःश्वासचेष्टावेगप्रवर्त्तनैः ।।१०३।। गम्यग् गत्या च धातूनामिन्द्रियाणाञ्च पाटवैः । अनुगृह्णात्यविकृतो हृदयेन्द्रियचित्तधृक् ।।१०४।। रजोगुणमयः सूक्ष्मः शीतो रूक्षो लघुश्चलः । खरो मृदुर्योंगवाही संयोगादुभयार्थकृत् ।।१०५।। दाहकृत् तेजसा युक्तः१ शीतकृत्सोमसंश्रयात् । विभागकरणाद्वायुः प्रधानं दोषसंग्रहे ।।१०६।। पक्वाशयकटीसक्थिश्रोत्रास्थिस्पर्शनेन्द्रियम् । स्थानं वातस्य तत्रापि पक्वाधानं विशेषतः ।।१०७।। अधिकृत (शुद्ध) वायु उत्साह, उच्छ्वास (श्वास का लेना), निःश्वास (श्वास का छोड़ना), चेष्टा, मलमूत्रादिक का
३६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे वेग होना तथा उसका प्रवर्तन (त्याग करना), धातुओं की गति अच्छी रखना, इन्द्रियों को अपने-अपने विषयों के ग्रहण करने में सामर्थ्य देना, इन सब कार्यों से हृदय, इन्द्रिय और चित्त को धारण करता हुआ अनुग्रह (देह की रक्षा) किया करता है और वायु रजोगुण से युक्त, सूक्ष्म से सूक्ष्म स्रोतों में गमन करने वाला, शीतल, रूक्ष, लघु, चलनशील, खर, मृदु (नरम) योगवाही, संयोग विशेष होने से दोनों अर्थों का करनेवाला है अर्थात् तेज सम्बन्धी पदार्थों से युक्त होकर दाह करनेवाला हो जाता है और सोमसम्बन्धी पदार्थों से युक्त होकर शीत करनेवाला हो जाता है, शरीर के सभी पदार्थों को परस्पर विभाग (अलग-अलग) करने से दोषों का जहाँ संग्रह किया गया है, वहाँ पर वायु ही प्रधान माना गया है और पक्वाशय, कटि, सक्थि (जानु की ऊपरी भाग), श्रोत्र (कान), अस्थि (हड्डी) और स्पर्शननेन्द्रिय (त्वक्) ये सब वायु के स्थान हैं, इनमें विशेष करके पक्वाशय ही वायु का स्थान है। उसकी अपेक्षा और सब स्थान गौण हैं ॥१०३-१०७॥ एको वायुः पित्तवन्नामस्थानकर्मभेदैः पञ्चविधस्तेषां नामान्याह- उदानस्तदनुप्राणः समानोऽपान एव च । व्यानश्चैतानि नामानि वायोः स्थानप्रभेदतः ॥१०८॥ ५ प्रकार के वायुओं के नाम—उदान, प्राण, समान, अपान और व्यान ये ५ नाम वायु के स्थानों के भेद से हुये हैं ॥१०८॥ अथोदानादीनां स्थानान्याह- कण्ठे हृदि तथाऽधस्तात्कोष्ठवह्नेर्मलाशये । सकलेऽपि शरीरेऽसौ क्रमेण पवनो वसेत् ॥१०९॥ उदानादि वायुओं के स्थान—उदान वायु कंठ में, प्राण वायु हृदय में, समान वायु नाभिप्रदेश में, अपान वायु मलाशय में तथा व्यान वायु सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर रहता है ॥१०९॥ अथ तेषां कर्माण्याह- उदानो नाम यत्तूर्ध्वमुपैति पवनोत्तमः । तेन भाषितगीतादिप्रवृत्तिः कुपितस्तु सः ॥११०॥ ऊर्ध्वजत्रुगतान् रोगान्विदधाति विशेषः । यो वायुः प्राणनामाऽसौ मुखं गच्छति देहधृक् ॥१११॥ सोऽन्नं प्रवेशयत्यन्तः प्राणांश्चाप्यवलम्बते । प्रायशः कुरुते दुष्टो हिक्काश्वासादिकान् गदान् ॥११२॥ उदानादि वायुओं के कर्म—कण्ठ देश में स्थित उदानसंज्ञक वायु जब कण्ठ से ऊपर होता है तब उससे प्राणी बोलने और गाने में प्रवृत्त होता है, और वही वायु जब कुपित होता है तब स्कंध और कक्षा की सन्धि में होने वाले रोगों को उत्पन्न करता है। देह का धारण करनेवाला हृदय में स्थित प्राथमिक वायु जब मुख की ओर जाता है तब भोजन के समय अन्न को पेट के अन्दर प्रवेश कराता है तथा प्राणों को अवलम्बन देता है और वही वायु जब कुपित होता है तब हिचकी, दमा आदि रोगों को पैदा करता है ॥११०-११२॥ आमपक्वाशयचरः समानो वह्निसङ्गतः । सोऽन्नं पचति तज्जांश्च विशेषान्विनक्ति हि ॥११३॥ आमाशय और पक्वाशय में रहनेवाला समान नामक वायु जठराग्नि से युक्त होकर अन्न को पचाता है तथा अन्न से उत्पन्न हुए विशेष पदार्थों को अलग करता है ॥१३॥ ❖ तज्जानित्यादि । अन्नगतान् रसमलमूत्रादीन् पृथक्करोतीत्यर्थः ॥११३॥ 'तज्जान्' इत्यादि का अर्थ यह है कि अन्न से उत्पन्न हुए रस, मल और मूत्र आदि को पृथक् करता है ॥११३॥ स दुष्टो वह्निमान्द्यातिसारगुल्मान् करोति हि । पक्वाशयालयोऽपानः काले कर्षति चाप्ययम् ॥११४॥ समीरणः शकृन्मूत्रशुक्रगर्भार्त्तवान्यधः । क्रुद्धस्तु कुरुते रोगान् घोरान्वस्तिगुदाश्रयान् ॥११५॥
, तीक्ष्ण और पाक होने पर अम्ल
(खट्टा) हो जाता है ।।२००।।
❖ पीतं निरामम्। नीलं सामम् ।।२००।।
'पीतं' का निराम अर्थात् पाक को प्राप्त हुआ, पीला और 'नीलं' का साम अर्थात् बिना पका हुआ नीला ।।२००।।
एकं पित्तं वातवन्नामस्थानकर्मभेदैः पञ्चविधम्। तेषां पित्तानां नामान्याह-
पाचकं रञ्जकञ्चापि साधकालोचके तथा। भ्राजकञ्चेति पित्तस्य नामानि स्थानभेदतः ।।२०१।।
पित्तों के नाम—स्थान के भेद से पित्त के पाचक, रञ्जक, साधक, आलोचक और भ्राजक ये पाँच नाम हैं ।।२०१।।
अथ पाचकादीना स्थानान्याह-
(Wait, let's verify L31: पाचकादीना स्थानान्याह- or पाचकादीनां? It has no dot over ना: पाचकादीना स्थानान्याह-. Wait, look at ना: there is no dot above it! It really says पाचकादीना स्थानान्याह-).
अग्
३८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे पाचकादि पित्तों के स्थान—पाचकादि पाचक पित्त अग्न्याशय में, रञ्जक पित्त यकृत् और प्लीहा में, साधक पित्त हृदय में, आलोचक पित्त दोनों नेत्रों में और भ्राजक पित्त सम्पूर्ण स्वचा में रहता है ॥१२२॥ अथ तेषां कर्माण्यप्याह— पाचकं पचते भुक्तं शेषाग्निबलवर्द्धनम्। रसमूत्रपुरीषाणि विरेचयति नित्यशः ॥१२३॥ पाचकादि पित्तों के कर्म—पाचक-संज्ञक-पित्त खाये हुए अन्न को पचाता तथा शेष अग्नियों के बल को बढ़ाता और रस, मूत्र तथा पुरीष (विष्ठा) का नित्य ही विरेचन (पृथक्) करता रहता है ॥१२३॥ ❖ पाचकं पित्तमामपक्वाशयमध्यस्थं षड्विधमाहारं भोज्यं भक्ष्यं चर्व्यं लेह्यं चोष्यं पेयं पचति, दोषरसमूत्रपुरीषाणि पृथक्करोति च। तदग्न्याशयस्थमेव स्वशक्त्या रसरञ्जनहृदयस्थकफतमोऽपनोदनरूपग्रहणप्रभाप्रकाशना - भ्यङ्गलेपादिपाचनाद्यग्निकर्मणा शेषाणां पित्तस्थानानामनुग्रहं करोति। शेषाण्यपि पित्तस्थानानि यकृत्प्लीहादीनि भागेन गत्वात्तत्र तत्र रसरञ्जनादिकर्मभिरुपकरोतीत्यर्थः। कथम्भूतं पाचकं पित्तं शेषाग्निबलवर्द्धनम्। शेषा अग्नयः पृथिव्यादिमहाभूतगुणाः। यत उक्तं चरकेण— 'भौमाप्याग्नेयवायव्याः पञ्चोष्माणः सनाभसाः'। इति ॥६॥ पाचक पित्त आमाशय और पक्वाशय के मध्य में स्थित होकर भोज्य, भक्ष्य, चर्व्य, लेह्य (चाटने लायक), चोष्य (चूसने लायक) और पेय (पीने लायक) इन ६ प्रकार के खाये हुये आहारों को पचाता और दोष, रस, मूत्र तथा पुरीष इन सबों को पृथक्-पृथक् करता है। वह पाचक पित्त अग्न्याशय में ही स्थित होकर अपनी सामर्थ्य से, रस का रञ्जक (लाल), हृदय में स्थित कफ का तथा तम का दूर, रूप का ग्रहण, प्रभा का प्रकाश, अभ्यङ्ग और लेपादि का पाक करना इत्यादि जो अग्नियों के कर्म हैं, उनके द्वारा शेष (अग्न्याशय के अतिरिक्त) जितने पित्त के स्थान हैं उन सबों के ऊपर अनुग्रह करता है, अर्थात् यकृत्प्लीहादि जो शेष पित्तस्थान हैं, उन सबों में जाकर अपने अंश से उन-उन पित्तस्थानों का रस रञ्जन आदि कर्मों के द्वारा उपकार करता है, अर्थात् शेष अग्नियों के जो रस रञ्जनादि कार्य होते हैं वे सब इसी के अंश से होते हैं। 'पाचक पित्त शेष अग्नियों के मल को बढ़ानेवाला है' इसकी व्याख्या यह है कि 'शेष अग्नि अर्थात् पृथिव्यादि पाँच महाभूतसम्बन्धी गुण (अग्नि)' क्योंकि चरक ने भी कहा है कि 'पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश सम्बन्धी पाँच ऊष्मा है' ॥६॥ ऊष्माणः अग्नयः ॥६॥ 'ऊष्मा' पद से अग्नि समझना चाहिये ॥६॥ यत उक्तं वाग्भटे—'दोषधातुमलादीनामूष्मेत्यात्रेयशासनम् ॥७॥ इति इसके अतिरिक्त और भी अग्नियों के सम्बन्ध में वाग्भट में कहा है—'दोष (वातादि तीन), धातु (रसरक्तादि सात) और मलादि की ऊष्मा (अग्नि) होती है। ऐसा आत्रेय का शासन (मत) है ॥७॥ दोषधातुमलादीनामूष्मैवाग्निरित्यर्थः ॥७॥ यहाँ पर 'दोष, धातु और मलादि की ऊष्मा ही अग्नि होती है' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥७॥ ❖ रसादिधातुगताः सप्त तेषां बलवर्धनम्। यथा गृहे स्थापितानि रत्नानि १खद्योतवददूरभास्वराणि तान्यपि दीपज्योतिषा दूरप्रकाशकानि भवन्ति। तथा—अग्न्याशयस्थपाचकाग्नितेजसा सर्वेऽग्नयो बलवन्तो भवन्ति। १. 'खद्योतवत्' इति पाठो भ्रान्तिमूलकः।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ३९ तथा च वाग्भटः- अन्नस्य पक्ता सर्वेषां पक्तॄणामधिको मतः । तन्मूलास्ते हि तद्वृद्धिक्षयात्मकाः' इति ।।८।। रसादि सात धातुओं के भी जो सात अग्नि हैं, उन सबों के बल का पाचक पित्त बढ़ानेवाला है। जिस प्रकार गृह में रखे हुए रत्न यद्यपि खद्योत (जुगनू) की भाँति थोड़ी दूर तक में ही प्रकाश करनेवाले होते हैं अर्थात् जिस भाँति खद्योत का प्रकाश थोड़ी दूर तक रहता है उसी भाँति यद्यपि रत्नों का भी रहता है, तथापि वे ही रत्न दीप का प्रकाश पड़ने से दूर तक प्रकाश पहुँचानेवाले हो जाते हैं, उसी तरह से यहाँ पर भी आमाशय में स्थित पाचकाग्नि के तेज से ही शरीर के सभी अग्नि बलवान् होते हैं । इसी विषय में 'वाग्भट' ने भी कहा है कि- 'जितने रसादिकों के पचानेवाले (रसादि सम्बन्धी अग्नि) हैं, उन सबों की अपेक्षा अन्न को पचानेवाला ही अग्नि अर्थात् अग्न्याशय में रहनेवाला पाचकाग्नि ही प्रधान समझा जाता है। क्योंकि पाचकाग्नि के अतिरिक्त शेष जो सम्पूर्ण अग्नि हैं उन सबों का मूल वही पाचकाग्नि है, क्योंकि उस पाचकाग्नि की वृद्धि तथा क्षय होने पर ही उन सब शेष अग्नियों की वृद्धि तथा क्षय होता है' ।।८।। ❖ ननु पित्तादन्योऽग्निराहोस्स्वित्पित्तमेवाग्निरिति सन्देहः । उच्यते । पित्तस्योष्णादिगुणद्वारा आहारपाचन- रञ्जनदर्शनादिकर्मणश्च न खलु पित्तव्यतिरेकेणान्योऽग्निः । तस्मादग्निरूपस्यैव पित्तस्य स्थानभेदात्पाचक- रञ्जकसाधकालोचकभ्राजकसंज्ञाः । तथा च वाग्भटः- 'पाचकं तिलमानं स्यात् काठिन्यान्नास्य दोषता । अनुगृह्णात्यविकृतं पित्तं पाकोष्मदर्शनैः ।।९।। क्षुत्तृड्रुचिप्रभामेधाधीशौर्यतनुमार्दवैः । पित्तं पञ्चात्मकं तच्च पक्वामाशयमध्यगम् ।।१०।। पञ्चभूतात्मकत्वेऽपि यत्तैजसगुणोदयम् । त्यक्तद्रव्यत्वं पाकादिकर्मणाऽनलशब्दितम् ।।११।। पचत्यन्नं विभजते सारकिट्टौ पृथक् तथा । तत्रस्थमेव पित्तानां शेषाणामप्यनुग्रहम् । करोति बलदानेन पाचकं नाम तत्स्मृतम् ।।१२।। अब यहाँ पर यह शङ्का होती है कि पित्त से अग्नि भिन्न है अथवा पित्त ही अग्नि है ? इसे दूर करने के लिए उत्तर यह है कि पित्त के ही उष्णादि गुणों द्वारा आहार का परिपाक होना, खून बनने के लिये अन्नरस का लाल होना और आँख से दिखाई पड़ना इत्यादि कर्म सम्पन्न होते हैं तब निःसन्देह पित्त से भिन्न अग्नि कोई पदार्थ नहीं है। अर्थात् पित्त ही अग्नि है अत एव अग्नि-रूपी पित्त के ही स्थानभेद होने से पाचक, रञ्जक, साधक, आलोचक और भ्राजक ये पाँच नाम होते हैं और इसी विषय में वाग्भट भी कहते हैं कि 'पाचक पित्त प्रमाण में तिल के सदृश है और कठिन होने से यह दोष नहीं कहलाता, अर्थात् दोषों के मध्य में कहे हुये पित्त से भिन्न समझना चाहिये और जब यह पित्त अधिकृत अर्थात् विकार युक्त नहीं रहता तब पाक, ऊष्मा, दर्शन-क्रिया, भूख, प्यास, रुचि, प्रभा, मेधा, बुद्धि, शूरता और शरीर की कोमलता इन सब कार्यों के करने से प्राणी का उपकार करता है और यह पाचक पित्त पञ्चभूतात्मक है तथा पक्वाशय और आमाशय के मध्य में स्थित रहता है, किन्तु इसके पञ्चभूतात्मक होने पर भी इसमें तेज का ही गुण प्रधान रूप से रहता है । अत एव तेजोगुण का ही प्राधान्य होने से यह द्रवत्व से रहित (कठिन) होता है और पाकादि कर्म करने से यह अग्नि कहलाता तथा अन्न को पकाता है और उस (अन्न) के सारभाग रस तथा किट्टभाग (मलमूत्रादि) को अलग-अलग करता है और उसी जगह अर्थात् पक्वाशय तथा आमाशय के मध्य में ही स्थित होकर भी शेष पित्तों को बलवान् बनाने से उन सबों का उपकार करता है। अत एव इसे पाचक पित्त कहते हैं ॥९-१२॥ ❖ ननु यदि पित्ताग्न्योरभेदस्तदा कथं घृतं पित्तस्य शामकमग्नेर्दीपकमिति । तथा मत्स्याःपित्तं कुर्वन्ति न च तेऽग्निदीप्तिकरा इति । तथा पित्ताधिक्यात्तीक्ष्णोऽग्निरित्यपि कथं स्यात् । तथा समदोषः समाग्निश्चेत्यपि वक्तुं न युज्यते । तथा-'द्रवं स्निग्धमधोगञ्च पित्तं वह्निरतोऽन्यथेति । अत्रोच्यते' । पित्तमग्नेः सन्तताधिष्ठानम् । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA
४० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे तथा चोक्तं तन्त्रान्तरे- अग्निर्भिन्नगुणैर्युक्तः पित्तं भिन्नगुणैस्तथा ।।१३।। द्रवं स्निग्धमधोगञ्च पित्तं वह्निरतोऽन्यथा। तस्मात्तेजोमयं पित्तं पित्तोष्मा यः स शक्तिमान् ।।१४।। स सञ्चरति कुक्षिस्थःसर्वतो धमनीमुखैः। सकायाग्निः स कायोष्मा सपक्ता स च जीवनम् ।। अनन्यगतिरित्येवं देहे कायाग्निरुच्यते ।।१५।। अब इस जगह यह शङ्का होती है कि यदि पित्त और अग्नि का अभेद है अर्थात् दोनों एक हैं तो क्यों घृत पित्त का शमन करनेवाला तथा अग्नि का दीपन करनेवाला होता है तथा मत्स्य पित्त का उत्पन्न करनेवाला होता है किन्तु अग्नि का दीपन करनेवाला नहीं होता। पित्त की अधिकता से अग्नि तीक्ष्ण होता यह भी कैसे होता है तथा जिसके दोष समान होते हैं अर्थात् कोई दोष न्यूनाधिक रूप से नहीं रहते हैं तो उसका अग्नि सम (न विषम और न मन्द) होता है यह भी कहना ठीक नहीं हो सकता तथा 'पित्त द्रव (पतला)', स्निग्ध (स्नेह युक्त) और अधोगामी होता है किन्तु अग्नि इसके विपरीत (द्रवत्वादि रहित) यह भी कहना कैसे ठीक हो सकता ? इसका उत्तर यह है कि पित्त अग्नि के निरन्तर रूप से रहने का स्थान है और इसी विषय को लेकर दूसरे तन्त्रों में मुनियों ने कहा है- 'अग्नि और पित्त भिन्न गुणों से युक्त है अर्थात् अग्नि और पित्त के गुण भिन्न-भिन्न हैं। अतएव उसमें से पित्त-द्रव, स्निग्ध और अधोगामी है अग्नि उस (पित्त) से विपरीत है, इसीसे पित्त तेजोमय है तथा पित्त की जो ऊष्मा है वह शक्तिमान् है और वह उदर में स्थित होकर भी धमनियों के द्वारा शरीर में चारों ओर सञ्चार करता रहता है। वही शरीर की अग्नि और गर्मी है तथा वही पचानेवाला प्राणियों का जीवन है और वही देह के बीच में उसके समान अन्य किसी की गति नहीं है, अतएव वह कायाग्नि कहलाता है' ।।१३-१५।। अन्यच्च-वामपार्श्वाश्रितं नाभेः किञ्चित् सोमस्य मण्डलम् ।।१६।। तन्मध्ये मण्डलं सौर्यं तन्मध्येऽग्निर्व्यवस्थितः। जरायुमात्रप्रच्छन्नः काचकोशस्थदीपवत् ।।१७।। ग्रन्थान्तरों में और भी लिखा है-'नाभि वे वाम भाग में अत्यन्त छोटा सा एक चन्द्रमण्डल है, फिर उसके मध्य में सूर्यमण्डल है और उस सूर्यमण्डल के मध्य में अग्नि स्थित रहता है तथा वह काँच (शीशे) के कोश (चिमनी) के मध्य में स्थित दीप की भाँति जरायु मात्र से ढँका हुआ है' ।।१६-१७।। तथा च मधुकोषे-❖ 'द्रवतेजः समुदायात्मकस्यापि पित्तस्य तेजोभागोऽग्निरि'ति । तेन पित्तमप्यग्निवन्मन्यते । अतितापितायोगोलकवत्। परमार्थतस्तु-अग्निः पित्ताद्भिन्न एवेति सिद्धान्तः ।। अत एवाह रसप्रदीपे- 'जाठरो भगवानग्निरीश्वरोऽन्नस्य पाचकः। सौक्ष्म्याद्रसानाऽऽददानो विवक्तुं नैव शक्यते ।।१८।। नाभिमध्ये १ शरीरस्य विशेषात्सोममण्डलम्। सोममण्डलमध्यस्थं विद्यात्सूर्यस्य मण्डलम् ।।१९।। प्रदीपवत्तन्न नृणां स्थितो मध्ये हुताशनः। सूर्यो दिवि यथा तिष्ठस्तेजोयुक्तैर्गभस्तिभिः ।।२०।। विशोषयति सर्वाणि पल्वला निसरांसि च। तद्वच्छरीरिणां भुक्तं ज्वलनो नाभिमाश्रितः ।।२१।। मयूखैः पचते क्षिप्रं नानांव्यञ्जनसंस्कृतम्। स्थूलकायेषु सत्त्वेषु यवमात्रः प्रमाणतः ।।२२।। ह्रस्वकायेषु सत्त्वेषु तिलमात्रः प्रमाणतः। कृमिकीटपतङ्गेषु बलामात्रोऽवतिष्ठतेः ।।२३।। 'मधुकोश' में भी यह कहा है कि- 'द्रव के रूप में स्थित जो तेज है उसके समूहरूप से स्थित पित्त का जो तेजोभाग है वही अग्नि है' इससे पित्त को भी अग्नि की भाँति मुनि लोग मानते हैं, जैसे कि अत्यन्त तपाये हुये लोहे.के गोले को भी अग्नि की तरह लोग मानते हैं। वस्तुतस्तु अग्नि पित्त से भिन्न ही है यही सिद्धान्त है। इसीसे 'रसप्रदीप' में भी १. 'नाभा'विति पाठान्तरम्।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ४१ कहा है कि—'भगवान् जठर (उदर) स्थित अग्नि ईश्वर अर्थात् सामर्थ्यवान् तथा उदरस्थित अन्न के पचानेवाले हैं, उनके सम्पूर्ण रसों को ग्रहण करते हुए भी उनके रूप का भलीभाँति से वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि वे अत्यन्त सूक्ष्म हैं, शरीर के मध्य में नाभिस्थल में जो सोम (चन्द्र) मण्डल नामक एक विशेष स्थान है, उसीके मध्य में सूर्यमण्डल नामक एक दूसरा भी मण्डल है और उसी सूर्यमण्डल में प्रत्येक मनुष्यों के शरीर में रहनेवाले अग्नि प्रदीप की भाँति रहते हैं। जिस भाँति सूर्य भगवान् आकाश में ही स्थित होकर तेज से युक्त अपने किरणों से सब पल्वल (छोटा जलाशय) और तालाबों को सुखाते रहते हैं, उसी भाँति अग्नि भी नाभि में स्थित होकर अनेक मनुष्यों के अनेक प्रकार के व्यञ्जनों से संस्कृत (युक्त) खाये हुये अन्न को अपनी किरणों के द्वारा अर्थात् अपने तेज से शीघ्र ही पचाते रहते हैं, मोटे (भारी) शरीरवाले हाथी आदि के शरीर में अग्नि यव (जौ) के बराबर, छोटे शरीरवाले (मनुष्यादि) जीवों के शरीर में तिल के बराबर कृमि, कीट (कीड़े) और पतङ्ग (उड़नेवाले मच्छड़) आदि जीवों के शरीर में बाल के बराबर रहते हैं ॥१८-२३॥ इत्यलमप्रकृतिचिन्तनेन, पुनः प्रकृतमनुसरति- रञ्जकं नाम यत्पित्तं तद्रसं शोणितं नयेत् । यत्तु साधकसंज्ञं तत्कुर्याद् बुद्धिं धृतिं स्मृतम् ।।१२४।। प्रकृति विषय का पुनः अनुसरण रञ्जक नाम का पित्त रस को रक्त के रूप में परिणत करता है साधक नाम का पित्त बुद्धि, धृति, स्मृति को उत्पन्न करता है ।।१२४।। ❖ 'धृति'=मेधाम् ।।१२४।। 'धृति' का अर्थ है 'मेधा' अर्थात् धारण शक्तिवाली बुद्धि ।।१२४।। यदालोचकसंज्ञं तद्रूपग्रहणकारणम् । भ्राजकं कान्तिकारिस्याल्लेपाभ्यङ्गादिपाचकम् ।। १२५ ।। आलोचक नाम का जो पित्त है वह रूप ग्रहण का कारण है अर्थात् उसी के सामर्थ्य से रूप का ग्रहण होता है, तथा भ्राजक नाम का जो पित्त है, वह शरीर में कान्ति पैदा करता है तथा किये गये लेप और अभ्यङ्गादिकों को पचाता है ।।१२५।। अथ श्लेष्मस्वरूपमाह- श्लेष्माश्वेतो गुरुः स्निग्धः पिच्छिलः शीतलस्तथा । तमोगुणाधिकः स्वादुर्विदग्धो लवणो भवेत् ।।१२६।। श्लेष्मा (कफ) का स्वरूप—कफ श्वेत, गुरु (भारी), स्निग्ध (स्नेह से युक्त), पिच्छिल (फिसलने वाला) शीतल, प्रधानरूप से तमोगुणी, स्वादु (स्वादयुक्त) तथा विदग्ध (परिपक्क) होने से लवण रसयुक्त (नमकीन) हो जाता है ।।१२६।। एकः श्लेष्मा वातपित्तवन्नामस्थानकर्मभेदैः पञ्चविधोऽतः श्लेष्मां नामान्याह१- कफस्यैतानि नामानि क्लेदनश्चावलम्बनः । रसनःस्नेहनश्चापि श्लेषणः स्थानभेदतः ।। १२७।। पाँच प्रकार के कफों के नाम—क्लेदन, अवलम्बन, रसन, स्नेहन और श्लेषण ये पाँच नाम कफ के स्थानभेद से हैं ।।१२७।। अथ क्लेदनादीनां स्थानान्याह- आमाशयेऽथ हृदये कण्ठे शिरसि सन्धिषु । स्थानेष्वेष्ठु मनुष्याणां श्लेष्मा तिष्ठत्यनुक्रमात् ।।१२८।। क्लेदनादि कफों के स्थान—क्लेदन कफ आमाशय में, अवलम्बन कफ हृदय में, रस न कफ कण्ठ में, स्नेहन कफ मस्तक में और श्लेषण कफ सन्धिसमूह में यथाक्रम से स्थित रहता है ।।१२८।। १. 'तन्नामान्याहे'ति पाठान्तरम् ।
४२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ 'दोषाणां सकलशरीरव्यापिनामपि पञ्च पञ्च स्थानानी'ति बाहुल्याभिप्रायेणोक्तानि ।। तथा च वाग्भटः— 'इति प्रायेण दोषाणां स्थानान्यविकृतात्मनाम् । व्यापिनामपि जानीयात् कर्माणि च पृथक् पृथक्' । इति । चरकश्च— 'ते व्यापिनोऽपि हृन्नाभ्योरधोमध्योर्ध्वसंश्रया ।' इति ।। २४ ।। यद्यपि सभी (वातादि) दोष सारे शरीर में व्याप्त होकर रहते हैं, तथापि उन दोषों के पाँच-पाँच स्थान हैं ऐसा जो कहा गया वह बाहुल्य के अभिप्राय से अर्थात् और स्थानों की अपेक्षा प्रत्येक दोष अपने पूर्वोक्त पाँचों स्थानों में अधिक रूप से रहते हैं। इसी विषय में 'वाग्भट' भी कहते हैं कि—जो विकृत नहीं हैं ऐसे सर्वशरीरव्यापी उन वातादि दोषों के प्रायः करके ये स्थान हैं अर्थात् पूर्वोक्त उन २ स्थानों में वे दोष अधिकता से रहते हैं ऐसा जानना चाहिये और उनके जो अलग-अलग कर्म हैं उन्हें भी जानना चाहिये । चरक में भी कहा है कि—वे वातादि दोष सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर भी हृदय और नाभि के नीचे, मध्य और ऊपर के भाग में विशेष रूप से रहते हैं, अर्थात् वायु नाभि के नीचे, पित्त हृदय तथा नाभि के मध्य में और कफ हृदय के ऊपर में विशेष रूप से रहता है ।।२४।। १२८।। अथ तत्तत्स्थानगतस्य श्लेष्मणः (कर्माणि वक्तुकामस्तत्रादौ क्लेदनस्य) कर्माण्याह- क्लेदनः क्लेदयत्यन्नमात्मशक्त्याऽपराण्यपि । अनुगृह्णाति च श्लेष्मस्थानान्युदककर्मणा ।। क्लेदन नामक कफ के कार्य—क्लेदन नामक कफ भोजन किये हुये अन्नको क्लिन्न (गीला) करता है और अपनी सामर्थ्य से कफ के दूसरे और चौथे स्थानों का भी जलकर्म के द्वारा उपकार करता है ।। ❖ अयमर्थः—क्लेदनोऽन्नं क्लेदयति तेन संहतमन्नं भेदं प्राप्नोति । अपराण्यपि श्लेष्मस्थानानि हृदयादीनि भागेन गत्वा तत्र तत्र हृदयालम्बनत्रिकसन्धारणरसग्रहणसमस्तेन्द्रियतर्पणसन्धिसंश्लेषणाद्युदककर्मभिरनुगृह्णाति उपकरोति । तदेवोत्तरत्रोच्यते ।। १२९ ।। ऊपर कहे हुए श्लोक का भाव यह है कि—क्लेदन नामक कफ खाये हुए अन्न को क्लेदयुक्त (गीला) करता है जिससे इकट्ठा हुआ अन्न अलग-अलग हो जाता है और दूसरे भाग जो कफ के स्थान हृदयादि हैं, उन सबों में वही क्लेदन नामक कफ भाग (अंश) से आकर हृदय का अवलम्बन, त्रिकसन्धान, रस ग्रहण करना, सम्पूर्ण इन्द्रियों को तृप्त करना और सभी सन्धियों को जोड़ना आदि जो उदक (जल) के कर्म हैं उनके द्वारा उन २ स्थानों का उपकार करता है। किस कर्म के द्वारा किस स्थान का क्या उपकार करता है उसे आगे के श्लोकों में कहते हैं ।। १२९ ।। अथावलम्बनकफस्य कर्माण्याह- रसयुक्तात्मवीर्येण हृदयस्यावलम्बनम् । त्रिकसन्धारणं चापि विदधात्यवलम्बकः ।। १३० ।। अवलम्बन नामक कफ के कर्म—अवलम्बन नामक कफ रस से युक्त होकर अपने वीर्य (सामर्थ्य) से हृदय का अवलम्बन और त्रिक का सन्धारण (भली भाँति से जुटा रहना) रूप कार्य करता है ।। १३० ।। ❖ त्रिकं=शिरोबाहुहृदयसन्धिः ।। १३० ।। 'त्रिक' का अर्थ है 'शिर और दोनों बाहुओं की सन्धि' ।। १३० ।। अथ रसनकफस्य कर्माण्याह- उभावपि ततः सौम्यौ तिष्ठतश्चान्तिके यतः । यतो रसान्विजानीतो रसनारसनौ समौ ।। १३१ ।। रसक नामक कफ के कर्म—रसना और 'रसन' नामक कफ ये दोनों ही सौम्य गुण युक्त पदार्थ हैं। क्योंकि
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ४३ ये दोनों पास २ रहते हैं तथा रस के स्वाद को भी दोनों ही जानते हैं अर्थात् रस का आस्वादन लेने में दोनों ही की शक्ति रहती है। अतः ये दोनों ही समान भाव से माने जाते हैं ॥१३१॥ रसना=रसनेन्द्रियम्, रसनः=कण्ठस्थकफः ॥१३१॥ ‘रसना’ से ‘रसनेन्द्रिय अर्थात् जिह्वाग्रवर्त्ती इन्द्रिय’ और ‘रसन’ से ‘कण्ठ में रहनेवाला कफ’ ऐसा समझना चाहिये ॥१३१॥ अथ स्नेहनश्लेषणकफयोः कर्माण्याह- स्नेहनः स्नेहदानेन समस्तेन्द्रियतर्पणः। श्लेषणः सर्वसन्धीनां संश्लेषं विदधात्यसौ ॥१३२॥ स्नेहन और श्लेषण नामक कफों के कार्य—स्नेहन नामक कफ अपने स्नेहदान करने के द्वारा समस्त इन्द्रियों को तृप्त करता रहता है तथा श्लेषण नामक कफ सम्पूर्ण सन्धियों को भली-भाँति जोड़े रहता है ॥१३२॥ अथ धातुशब्दस्य निरुक्तिमाह- एते सप्त स्वयं स्थित्वा देहं दधति यन्नृणाम्। रसासृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्राणि धातवः ॥१३३॥ ‘धातु’ शब्द की निरुक्ति—रस, रक्त, मांस, मेद, हड्डी, मज्जा और शुक्र ये सात पदार्थ स्वयं स्थित होकर मनुष्यों के देह को धारण करते हैं। अत एव ये धातु कहलाते हैं ॥१३३॥ ❖ धातव इति। धाधातोस्तुप्रत्ययः ॥१३३॥ ‘धा’ धातु से तु प्रत्यय होने पर प्रथमा बहुवचन में ‘धातवः’ सिद्ध होता है ॥१३३॥ अथ धातूनां कर्माण्याह- प्रीणनं जीवनं लेपः स्नेहो धारणपूरणे। गर्भोत्पादश्च कर्माणि धातूनां कथितानि हि ॥१३४॥ धातुओं के कार्य—प्रीणन (तृप्त करना), जीवन (जीवित रखना), लेप, स्नेह, धारण, पूरण और गर्भ को उत्पन्न करना, ये सात कार्य रसादि धातुओं के यथाक्रम से हैं ॥१३४॥ तत्र रसशब्दस्य निरुक्तिमाह- गत्यर्थो१ रसधा२ तुर्यस्ततोऽभवदयं३ रसः। सद्रवं सकलं देहे रसतीति रसः स्मृतः ॥१३४॥ रस धातु की निरुक्ति—गत्यर्थक (गति अर्थ में वर्त्तमान) ‘रस’ धातु से रस शब्द की सिद्धि होती है। यह द्रवयुक्त होकर सम्पूर्ण शरीर में गमन करता है अतः रस कहलाता है ॥१३४॥ अथ रसस्य स्वरूपमाह- सम्यक्पक्कस्य भुक्तस्य सारो निगदितो रसः। स तु द्रवः सितः शीतः स्वादुः स्निग्धश्चलो भवेत् ॥१२५॥ रस के स्वरूप—खाये हुये अन्न के भलीभाँति परिपक्क (पच) जाने पर उससे जो सार पदार्थ उत्पन्न होता है वही रस कहलाता है। वह रस द्रव (बहनेवाले पानी की भाँति), श्वेतवर्ण, शीतल, स्वादयुक्त, स्नेहयुक्त (चिकना) और चलनशील होता है ॥१२५॥ ❖ सारो यथा—गुडमधूकपुष्पबब्बूलत्वग्वदरीमूलादिभवः सारो मदिरा ॥१२५॥ १. ‘यत्पायो’ इति पाठान्तरम्। २. ‘रसधातो’रिति पाठान्तरम्। ३. ‘दपामि’ति पाठान्तरम्। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA