भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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३८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे पाचकादि पित्तों के स्थान—पाचकादि पाचक पित्त अग्न्याशय में, रञ्जक पित्त यकृत् और प्लीहा में, साधक पित्त हृदय में, आलोचक पित्त दोनों नेत्रों में और भ्राजक पित्त सम्पूर्ण स्वचा में रहता है ॥१२२॥ अथ तेषां कर्माण्यप्याह— पाचकं पचते भुक्तं शेषाग्निबलवर्द्धनम्। रसमूत्रपुरीषाणि विरेचयति नित्यशः ॥१२३॥ पाचकादि पित्तों के कर्म—पाचक-संज्ञक-पित्त खाये हुए अन्न को पचाता तथा शेष अग्नियों के बल को बढ़ाता और रस, मूत्र तथा पुरीष (विष्ठा) का नित्य ही विरेचन (पृथक्) करता रहता है ॥१२३॥ ❖ पाचकं पित्तमामपक्वाशयमध्यस्थं षड्विधमाहारं भोज्यं भक्ष्यं चर्व्यं लेह्यं चोष्यं पेयं पचति, दोषरसमूत्रपुरीषाणि पृथक्करोति च। तदग्न्याशयस्थमेव स्वशक्त्या रसरञ्जनहृदयस्थकफतमोऽपनोदनरूपग्रहणप्रभाप्रकाशना - भ्यङ्गलेपादिपाचनाद्यग्निकर्मणा शेषाणां पित्तस्थानानामनुग्रहं करोति। शेषाण्यपि पित्तस्थानानि यकृत्प्लीहादीनि भागेन गत्वात्तत्र तत्र रसरञ्जनादिकर्मभिरुपकरोतीत्यर्थः। कथम्भूतं पाचकं पित्तं शेषाग्निबलवर्द्धनम्। शेषा अग्नयः पृथिव्यादिमहाभूतगुणाः। यत उक्तं चरकेण— 'भौमाप्याग्नेयवायव्याः पञ्चोष्माणः सनाभसाः'। इति ॥६॥ पाचक पित्त आमाशय और पक्वाशय के मध्य में स्थित होकर भोज्य, भक्ष्य, चर्व्य, लेह्य (चाटने लायक), चोष्य (चूसने लायक) और पेय (पीने लायक) इन ६ प्रकार के खाये हुये आहारों को पचाता और दोष, रस, मूत्र तथा पुरीष इन सबों को पृथक्-पृथक् करता है। वह पाचक पित्त अग्न्याशय में ही स्थित होकर अपनी सामर्थ्य से, रस का रञ्जक (लाल), हृदय में स्थित कफ का तथा तम का दूर, रूप का ग्रहण, प्रभा का प्रकाश, अभ्यङ्ग और लेपादि का पाक करना इत्यादि जो अग्नियों के कर्म हैं, उनके द्वारा शेष (अग्न्याशय के अतिरिक्त) जितने पित्त के स्थान हैं उन सबों के ऊपर अनुग्रह करता है, अर्थात् यकृत्प्लीहादि जो शेष पित्तस्थान हैं, उन सबों में जाकर अपने अंश से उन-उन पित्तस्थानों का रस रञ्जन आदि कर्मों के द्वारा उपकार करता है, अर्थात् शेष अग्नियों के जो रस रञ्जनादि कार्य होते हैं वे सब इसी के अंश से होते हैं। 'पाचक पित्त शेष अग्नियों के मल को बढ़ानेवाला है' इसकी व्याख्या यह है कि 'शेष अग्नि अर्थात् पृथिव्यादि पाँच महाभूतसम्बन्धी गुण (अग्नि)' क्योंकि चरक ने भी कहा है कि 'पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश सम्बन्धी पाँच ऊष्मा है' ॥६॥ ऊष्माणः अग्नयः ॥६॥ 'ऊष्मा' पद से अग्नि समझना चाहिये ॥६॥ यत उक्तं वाग्भटे—'दोषधातुमलादीनामूष्मेत्यात्रेयशासनम् ॥७॥ इति इसके अतिरिक्त और भी अग्नियों के सम्बन्ध में वाग्भट में कहा है—'दोष (वातादि तीन), धातु (रसरक्तादि सात) और मलादि की ऊष्मा (अग्नि) होती है। ऐसा आत्रेय का शासन (मत) है ॥७॥ दोषधातुमलादीनामूष्मैवाग्निरित्यर्थः ॥७॥ यहाँ पर 'दोष, धातु और मलादि की ऊष्मा ही अग्नि होती है' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥७॥ ❖ रसादिधातुगताः सप्त तेषां बलवर्धनम्। यथा गृहे स्थापितानि रत्नानि १खद्योतवददूरभास्वराणि तान्यपि दीपज्योतिषा दूरप्रकाशकानि भवन्ति। तथा—अग्न्याशयस्थपाचकाग्नितेजसा सर्वेऽग्नयो बलवन्तो भवन्ति। १. 'खद्योतवत्' इति पाठो भ्रान्तिमूलकः।