भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ३९ तथा च वाग्भटः- अन्नस्य पक्ता सर्वेषां पक्तॄणामधिको मतः । तन्मूलास्ते हि तद्वृद्धिक्षयात्मकाः' इति ।।८।। रसादि सात धातुओं के भी जो सात अग्नि हैं, उन सबों के बल का पाचक पित्त बढ़ानेवाला है। जिस प्रकार गृह में रखे हुए रत्न यद्यपि खद्योत (जुगनू) की भाँति थोड़ी दूर तक में ही प्रकाश करनेवाले होते हैं अर्थात् जिस भाँति खद्योत का प्रकाश थोड़ी दूर तक रहता है उसी भाँति यद्यपि रत्नों का भी रहता है, तथापि वे ही रत्न दीप का प्रकाश पड़ने से दूर तक प्रकाश पहुँचानेवाले हो जाते हैं, उसी तरह से यहाँ पर भी आमाशय में स्थित पाचकाग्नि के तेज से ही शरीर के सभी अग्नि बलवान् होते हैं । इसी विषय में 'वाग्भट' ने भी कहा है कि- 'जितने रसादिकों के पचानेवाले (रसादि सम्बन्धी अग्नि) हैं, उन सबों की अपेक्षा अन्न को पचानेवाला ही अग्नि अर्थात् अग्न्याशय में रहनेवाला पाचकाग्नि ही प्रधान समझा जाता है। क्योंकि पाचकाग्नि के अतिरिक्त शेष जो सम्पूर्ण अग्नि हैं उन सबों का मूल वही पाचकाग्नि है, क्योंकि उस पाचकाग्नि की वृद्धि तथा क्षय होने पर ही उन सब शेष अग्नियों की वृद्धि तथा क्षय होता है' ।।८।। ❖ ननु पित्तादन्योऽग्निराहोस्स्वित्पित्तमेवाग्निरिति सन्देहः । उच्यते । पित्तस्योष्णादिगुणद्वारा आहारपाचन- रञ्जनदर्शनादिकर्मणश्च न खलु पित्तव्यतिरेकेणान्योऽग्निः । तस्मादग्निरूपस्यैव पित्तस्य स्थानभेदात्पाचक- रञ्जकसाधकालोचकभ्राजकसंज्ञाः । तथा च वाग्भटः- 'पाचकं तिलमानं स्यात् काठिन्यान्नास्य दोषता । अनुगृह्णात्यविकृतं पित्तं पाकोष्मदर्शनैः ।।९।। क्षुत्तृड्रुचिप्रभामेधाधीशौर्यतनुमार्दवैः । पित्तं पञ्चात्मकं तच्च पक्वामाशयमध्यगम् ।।१०।। पञ्चभूतात्मकत्वेऽपि यत्तैजसगुणोदयम् । त्यक्तद्रव्यत्वं पाकादिकर्मणाऽनलशब्दितम् ।।११।। पचत्यन्नं विभजते सारकिट्टौ पृथक् तथा । तत्रस्थमेव पित्तानां शेषाणामप्यनुग्रहम् । करोति बलदानेन पाचकं नाम तत्स्मृतम् ।।१२।। अब यहाँ पर यह शङ्का होती है कि पित्त से अग्नि भिन्न है अथवा पित्त ही अग्नि है ? इसे दूर करने के लिए उत्तर यह है कि पित्त के ही उष्णादि गुणों द्वारा आहार का परिपाक होना, खून बनने के लिये अन्नरस का लाल होना और आँख से दिखाई पड़ना इत्यादि कर्म सम्पन्न होते हैं तब निःसन्देह पित्त से भिन्न अग्नि कोई पदार्थ नहीं है। अर्थात् पित्त ही अग्नि है अत एव अग्नि-रूपी पित्त के ही स्थानभेद होने से पाचक, रञ्जक, साधक, आलोचक और भ्राजक ये पाँच नाम होते हैं और इसी विषय में वाग्भट भी कहते हैं कि 'पाचक पित्त प्रमाण में तिल के सदृश है और कठिन होने से यह दोष नहीं कहलाता, अर्थात् दोषों के मध्य में कहे हुये पित्त से भिन्न समझना चाहिये और जब यह पित्त अधिकृत अर्थात् विकार युक्त नहीं रहता तब पाक, ऊष्मा, दर्शन-क्रिया, भूख, प्यास, रुचि, प्रभा, मेधा, बुद्धि, शूरता और शरीर की कोमलता इन सब कार्यों के करने से प्राणी का उपकार करता है और यह पाचक पित्त पञ्चभूतात्मक है तथा पक्वाशय और आमाशय के मध्य में स्थित रहता है, किन्तु इसके पञ्चभूतात्मक होने पर भी इसमें तेज का ही गुण प्रधान रूप से रहता है । अत एव तेजोगुण का ही प्राधान्य होने से यह द्रवत्व से रहित (कठिन) होता है और पाकादि कर्म करने से यह अग्नि कहलाता तथा अन्न को पकाता है और उस (अन्न) के सारभाग रस तथा किट्टभाग (मलमूत्रादि) को अलग-अलग करता है और उसी जगह अर्थात् पक्वाशय तथा आमाशय के मध्य में ही स्थित होकर भी शेष पित्तों को बलवान् बनाने से उन सबों का उपकार करता है। अत एव इसे पाचक पित्त कहते हैं ॥९-१२॥ ❖ ननु यदि पित्ताग्न्योरभेदस्तदा कथं घृतं पित्तस्य शामकमग्नेर्दीपकमिति । तथा मत्स्याःपित्तं कुर्वन्ति न च तेऽग्निदीप्तिकरा इति । तथा पित्ताधिक्यात्तीक्ष्णोऽग्निरित्यपि कथं स्यात् । तथा समदोषः समाग्निश्चेत्यपि वक्तुं न युज्यते । तथा-'द्रवं स्निग्धमधोगञ्च पित्तं वह्निरतोऽन्यथेति । अत्रोच्यते' । पित्तमग्नेः सन्तताधिष्ठानम् । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA