भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ४३ ये दोनों पास २ रहते हैं तथा रस के स्वाद को भी दोनों ही जानते हैं अर्थात् रस का आस्वादन लेने में दोनों ही की शक्ति रहती है। अतः ये दोनों ही समान भाव से माने जाते हैं ॥१३१॥ रसना=रसनेन्द्रियम्, रसनः=कण्ठस्थकफः ॥१३१॥ ‘रसना’ से ‘रसनेन्द्रिय अर्थात् जिह्वाग्रवर्त्ती इन्द्रिय’ और ‘रसन’ से ‘कण्ठ में रहनेवाला कफ’ ऐसा समझना चाहिये ॥१३१॥ अथ स्नेहनश्लेषणकफयोः कर्माण्याह- स्नेहनः स्नेहदानेन समस्तेन्द्रियतर्पणः। श्लेषणः सर्वसन्धीनां संश्लेषं विदधात्यसौ ॥१३२॥ स्नेहन और श्लेषण नामक कफों के कार्य—स्नेहन नामक कफ अपने स्नेहदान करने के द्वारा समस्त इन्द्रियों को तृप्त करता रहता है तथा श्लेषण नामक कफ सम्पूर्ण सन्धियों को भली-भाँति जोड़े रहता है ॥१३२॥ अथ धातुशब्दस्य निरुक्तिमाह- एते सप्त स्वयं स्थित्वा देहं दधति यन्नृणाम्। रसासृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्राणि धातवः ॥१३३॥ ‘धातु’ शब्द की निरुक्ति—रस, रक्त, मांस, मेद, हड्डी, मज्जा और शुक्र ये सात पदार्थ स्वयं स्थित होकर मनुष्यों के देह को धारण करते हैं। अत एव ये धातु कहलाते हैं ॥१३३॥ ❖ धातव इति। धाधातोस्तुप्रत्ययः ॥१३३॥ ‘धा’ धातु से तु प्रत्यय होने पर प्रथमा बहुवचन में ‘धातवः’ सिद्ध होता है ॥१३३॥ अथ धातूनां कर्माण्याह- प्रीणनं जीवनं लेपः स्नेहो धारणपूरणे। गर्भोत्पादश्च कर्माणि धातूनां कथितानि हि ॥१३४॥ धातुओं के कार्य—प्रीणन (तृप्त करना), जीवन (जीवित रखना), लेप, स्नेह, धारण, पूरण और गर्भ को उत्पन्न करना, ये सात कार्य रसादि धातुओं के यथाक्रम से हैं ॥१३४॥ तत्र रसशब्दस्य निरुक्तिमाह- गत्यर्थो१ रसधा२ तुर्यस्ततोऽभवदयं३ रसः। सद्रवं सकलं देहे रसतीति रसः स्मृतः ॥१३४॥ रस धातु की निरुक्ति—गत्यर्थक (गति अर्थ में वर्त्तमान) ‘रस’ धातु से रस शब्द की सिद्धि होती है। यह द्रवयुक्त होकर सम्पूर्ण शरीर में गमन करता है अतः रस कहलाता है ॥१३४॥ अथ रसस्य स्वरूपमाह- सम्यक्पक्कस्य भुक्तस्य सारो निगदितो रसः। स तु द्रवः सितः शीतः स्वादुः स्निग्धश्चलो भवेत् ॥१२५॥ रस के स्वरूप—खाये हुये अन्न के भलीभाँति परिपक्क (पच) जाने पर उससे जो सार पदार्थ उत्पन्न होता है वही रस कहलाता है। वह रस द्रव (बहनेवाले पानी की भाँति), श्वेतवर्ण, शीतल, स्वादयुक्त, स्नेहयुक्त (चिकना) और चलनशील होता है ॥१२५॥ ❖ सारो यथा—गुडमधूकपुष्पबब्बूलत्वग्वदरीमूलादिभवः सारो मदिरा ॥१२५॥ १. ‘यत्पायो’ इति पाठान्तरम्। २. ‘रसधातो’रिति पाठान्तरम्। ३. ‘दपामि’ति पाठान्तरम्। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA