भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे जैसे गुड़, महुये का फूल, बबूल की छाल और बेर के मूलादि से निकाला हुआ सार मदिरा होता है। उसी भाँति अच्छी तरह से परिपक्व अन्न का सार रस होता है ॥१३५॥ अथ रसस्य स्थानमाह- सर्वदेहचरस्यापि रसस्य हृदयं स्थलम्। समानमरुता पूर्वं यदयं हृदये धृतः ॥१३६॥ रस के स्थान—सम्पूर्ण देह में विचरनेवाला रस का मुख्य स्थान हृदय है। क्योंकि समानवायु ने उसे शरीर के और भागों में जाने के पहले ही से हृदय में रख दिया है ॥१३६॥ अथ रसस्य कर्माणियाह- आरुह्य धमनीर्गत्वा धातून् सर्वानयं रसः। पुष्णाति तदनु स्वीयैर्व्याप्नोति च तनुं गुणः ॥१३७॥ रस के कर्म—रस धमनी (नाड़ियों) में स्थित होकर उसी के द्वारा जाकर सम्पूर्ण रक्तादि छः धातुओं को परिपुष्ट करता है। उसके बाद अपने गुणों के द्वारा शरीर में व्याप्त होकर रहता है ॥१३७॥ ❖ गुणैः=शीतस्निग्धपोषकत्वगुणैः ॥१३७॥ ‘गुणैः’ का अर्थ है शीत, स्निग्ध और पोषकत्व गुणों के द्वारा ॥१३७॥ मन्दवह्निविदग्धस्तु कटुर्वाऽम्लो भवेद्रसः। स कुर्याद्वहुलान् रोगान् विषकृत्यं करोत्यपि ॥१३८॥ जठराग्नि के मन्द होने से विदग्ध होकर अर्थात् अग्नि मन्द होने से भोजन का परिपाक ठीक न होने पर जो रस बनता है, वह कटु (चरपरा) अथवा अम्ल (खट्टा) होता है और वह (विदग्ध रस) अनेक रोगों को उत्पन्न करता है तथा विषकृत्य अर्थात् विष के समान मारणादि कृत्य भी करता है ॥१३८॥ अथ रक्तस्य स्वरूपमाह- यदा रसो थकृद्याति तत्र रञ्जकपित्ततः। रागं पाकं च सम्प्राप्य स भवेद्रक्तसंज्ञकः ॥१३९॥ रक्त के स्वरूप—जब रस यकृत् स्थान में जाता है तब वहाँ पर स्थिर रञ्जक नामक पित्त के द्वारा लालवर्ण तथा परिपक्व होकर ‘रक्त’ नाम से कहलाने लगता है ॥१३९॥ रक्तं सर्वशरीरस्थं जीवस्याधारमुत्तमम्। स्निग्धं गुरु चलं स्वादु विदग्धं पित्तवद्भवेत् ॥१४०॥ रक्त सम्पूर्ण शरीर में रहनेवाला, जीवात्मा का उत्तम आधार, स्निग्ध, गुरु (भारी), चलनशील और स्वादयुक्त होता है, यह विदग्ध (अच्छी तरह से परिपक्वं) होने पर विदग्ध पित्त की भाँति हो जाता है ॥१४०॥ ❖ पित्तवद्भवेत्=अम्लं भवेदित्यर्थः ॥१४०॥ ‘पित्तवद्भवेत्’ का अर्थ है ‘अम्ल हो जाना’ ॥१४०॥ ❖ जीवस्याधार मुत्तममिति। यत आह- ‘जीवो वसति सर्वस्मिन्देहे तत्र विशेषतः। वीर्ये रक्ते मले यस्मिन् क्षीणे याति क्षयं क्षणात्’ ॥२६॥ इति। रक्त जीव का उत्तम आधार है। क्योंकि कहा भी है कि—जीव सम्पूर्ण देह में रहता है किंतु वीर्य, रक्त तथा मल में विशेषरूप से रहता है। क्योंकि वीर्यादि में से जिस किसी के क्षय हो जाने पर वह जीव उसी क्षण क्षय को प्राप्त हो जाता है अर्थात् मर जाता है ॥२६॥