भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 85, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे चतुर्थमङ्गं वक्षस्तु तदुपाङ्गान्न्यथ ब्रुवे । स्तनौ पुंसस्तथा नार्या विशेष उभयोरयम् ।।७३।। यौवनागमने नार्याः पीवरौ भवतः स्तनौ । गर्भवत्याः प्रसूतायास्तावेव क्षीरपूरितौ ।।७४।। चौथा अङ्ग वक्षःस्थल (छाती) है, अब उसके उपाङ्गों को कहते हैं—दो स्तन, स्त्री और पुरुष के जो दो स्तन हैं, उसमें विशेषता यह है कि युवावस्था आने पर स्त्री के दोनों स्तन मोटे हो जाते हैं और गर्भवती तथा प्रसूता स्त्री के वे ही दोनों स्तन दूध से भर जाते हैं और पुरुष के दोनों स्तन सदा एक ही अवस्था में बने रहते हैं ।।७३-७४।। अथ हृदयस्य स्वरूपमाह- हृदयं पुण्डरीकेण सदृशं स्यादधोमुखम् । जाग्रतस्तद्विकसति स्वपतस्तु निमीलति ।।७५।। आशयस्तत्तु जीवस्य चेतनास्थानमुत्तमम् । अतस्तस्मिंस्तमोव्याप्ते प्राणिनः प्रस्वपन्ति हि ।।७६।। हृदय के स्वरूप—हृदय कमल के सदृश होता है, किन्तु कमल की भाँति ऊर्ध्वमुख न होकर वह अधोमुखवाला होता है । प्राणी जब जागता रहता है तब वह विकसित (खिला) और जब सोता रहता है तब सङ्कुचित रहता है, वह हृदय जीव का आशय (रहने का स्थान) तथा सबसे बढ़कर प्रधान चेतना का स्थान है । अतएव जब वह (हृदय) तमोगुण से व्याप्त हो जाता है, तब प्राणिमात्र सो जाते हैं ।।७५-७६।। ❖ चेतनास्थानमुत्तममिति । अयमभिप्रायः- 'चेतनानामधिष्ठानं मनो देहश्च सेन्द्रियः । ^१केशलोमनखाग्रान्नमलद्रवगुणैर्विना' ।।६।। 'उत्तम चेतना का स्थान है' इसके कहने का अभिप्राय यह है कि—'केश, लोम, नखों के अग्रभाग, अन्न का मल, द्रव पदार्थ मूत्रादिक और शब्दादि गुण, इन सब पदार्थों को छोड़कर इन्द्रियों के सहित सम्पूर्ण देह तथा मन चेतना का स्थान है' ।।६।। इत्युक्तवता चरकेण सकलं शरीरं चेनास्थानमुक्तं तदपेक्षया हृदयं विशेषतश्चेतनास्थानमिति ।।७५-७६।। यद्यपि इस प्रकार कहते हुये चरक भगवान् ने सम्पूर्ण शरीर को चेतना का स्थान बतलाया है, तथापि और अङ्गों की अपेक्षा हृदय विशेषरूप से चेतना का स्थान है ऐसा समझना चाहिये ।।७५-७६।। कक्षयोर्वक्षसः सन्धी जत्रुणी समुदाहृते । कक्षे उभे समाख्याते तयोः स्यातां च वङ्क्षणौ ।।७७।। दो जत्रु अर्थात् दोनों कक्षा (काँख) छाती के दो सन्धि और दोनों काँखों के दो वङ्क्षण (बाहुओं की सन्धि) अर्थात् बगल, ये सब वक्षःस्थल के उपाङ्ग हैं ।।७७।। उदरं पञ्चममङ्गं षष्ठं पार्श्वद्वयं मतम् । सपृष्ठवंशं पृष्ठं तु समस्तं सप्तमं स्मृतम् ।।७८।। उपाङ्गानि च कथ्यन्ते तानि जानीहि यत्नतः । शोणिताज्जायते प्लीहा वामतो हृदयादधः ।।७९।। रक्तवाहिशिराणां स मूलं ख्यातो महर्षिभिः । हृदयाद्वामतोऽधश्च फुप्फुसो रक्तफेनजः ।।८०।। अधो दक्षिणतश्चापि हृदयाद्यकृतः स्थितिः । तत्तु रञ्जकपित्तस्य स्थानं शोणितजं मतम् ।।८१।। पाँचवाँ अङ्ग (पेट), छठा अङ्ग दोनों पार्श्व (पँसुली) और सातवाँ अङ्ग पृष्ठवंश (मेरुदण्ड) के सहित समस्त पीठ है । अब उसके जिन उपाङ्गों को कहता हूँ, उन्हें यत्नपूर्वक समझो—हृदय के नीचे वामभाग में प्लीहा है, जो रक्त से उत्पन्न होती है और जिसे महर्षियों ने रक्तवाहिनी (जिसमें रक्त बहता है) शिराओं का मूल कहा है । हृदय के वाम भाग १. 'केशलोमनखाग्रं च मलं द्रव्यगुणै'रिति पाठान्तरमसङ्गतम् ।