भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ३१ पुत्राणामाहाराचारचेष्टाभेदस्य हेतुमाह- आहाराचारचेष्टाभिर्यादृशीभिः समन्वितौ । स्त्रीपुंसौ समुपेयातां तथोः पुत्रोऽपि तादृशः ।।६२।। सन्तानों में चेष्टादि भेद के कारण-जिस तरह के आहार, आचार और चेष्टा से युक्त होकर स्त्री और पुरुष ऋतुकाल में मैथुन करते हैं, उन दोनों के पुत्र भी उत्पन्न होने पर उसी तरह के आहार, आचार और चेष्टा से युक्त होते हैं ॥६२॥ समुपेयातां संयोगं गच्छेताम् ।।६२।। 'समुपेयाताम्' अर्थात् 'मैथुन के लिये परस्पर संयुक्त होते हैं' ।।६२।। अथ गर्भलक्षणमाह- गर्भाशयगतं शुक्रमार्त्तवं जीवसंज्ञकः । प्रकृतिः सविकारा च तत्सर्वं गर्भसंज्ञकम् ।।६३।। कालेन वर्द्धितो गर्भो यद्यङ्गोपाङ्गसंयुतः । भवेत्तदा स मुनिभिः शरीरीति निगद्यते ।।६४।। गर्भ के लक्षण-गर्भाशयगत शुक्र, रज, जीव और सोलह विकारों से युक्त प्रकृति ये सब गर्भसंज्ञक हैं अर्थात् इन्हीं को गर्भ कहते हैं। काल पाकर बढ़ा हुआ गर्भ जब अङ्ग और उपाङ्गों से युक्त हो जाता है, तब उसे मुनि लोग 'शरीरी' कहते हैं ।।६३-६४।। अङ्गोपाङ्गसंयुतः=व्यक्ताङ्गोपाङ्ग ।।६३-६४।। 'अङ्गोपाङ्गसंयुतः' अर्थात् 'जब अङ्ग और उपाङ्ग व्यक्त हो जाते हैं ।।६३-६४।। तस्य त्वङ्गान्यनुपाङ्गानि ज्ञात्वा सुश्रुतशास्त्रतः । मस्तकादभिधीयन्ते शिष्याः ! शृणुत यत्नतः ।।६५।। आद्यमङ्गं शिरः प्रोक्तं तदुपाङ्गानि कुन्तलाः । तस्यान्तर्मस्तुलुङ्गं च ललाटं भ्रूयुगन्तथा ।।६६।। नेत्रद्वयं तयोरन्तर्वर्त्तन्ते द्वे कनीनिके । दृष्टिद्वयं कृष्णगोलौ श्वेतभागौ च वर्त्मनी ।।६७।। पच्माण्यपाङ्गौ शङ्खौ च कर्णौ तच्छष्कुलीद्वयम् । पालिद्वयं कपोलौ च नासिका च प्रकीर्त्तिता ।।६८।। ओष्ठाधरौ च सृक्किण्यौ मुखं तालु हनुद्वयम् । दन्ताश्च दन्तवेष्टश्च रसना चिबुकङ्गलः ।।६९।। द्वितीयमङ्गं ग्रीवा तु यया मूर्द्धा विधार्यते । तृतीयं बाहुयुगलं तदुपाङ्गान्न्यथ ब्रुवे ।।७०।। तत्रोपरि मतौ स्कन्धौ प्रगण्डौ भवतस्त्वधः । कफोणियुग्मं तदधः प्रकोष्ठयुगलन्तथा ।।७१।। मणिबन्धौ तले हस्तौ तयोरङ्ङ्गुलयो दश। नखाश्च दश ते स्थाप्या दश च्छेद्याः प्रकीर्त्तिताः ।।७२।। हे शिष्यो ! मैं उस शरीरी के अङ्ग और उपाङ्गों को 'सुश्रुत' शास्त्र से जान कर मस्तक से आरम्भ करके कहता हूँ ! तुम लोग उसे यत्नपूर्वक सुनो-पहिला अङ्ग शिर कहा है और उसके उपाङ्ग केश, मस्तक के अन्दर रहनेवाला मस्तुलुङ्ग (घृत की तरह एक प्रकार का पदार्थ), ललाट, दो भौंहें, दो नेत्र, दोनों नेत्रों के अन्दर रहनेवाली दो कनीनिकायें (पुतलियाँ), दो दृष्टिमण्डल (निगाह-जिससे दिखाई पड़ता है), दो कृष्ण वर्ण के मण्डल, दो श्वेत भाग, दो पलकें, दो पक्ष्म (नेत्रलोम), दो अपाङ्ग (नेत्रों के प्रान्तभाग), दो शङ्ख (मस्तक की हड्डी-कान के पास की कनपटी), दो कान, दो कान की शष्कुलि (कान के छिद्रप्रदेश), दो पाली (पत्ते की भाँति कान के नीचे का भाग), दो कपोल (गाल), नाक, ओष्ठ और अधर (नीचे का ओष्ठ), दो सृक्किणी (ओष्ठों के दोनों प्रान्तभाग), मुख, तालु, दो हनु (दोनों कपोलों के नीचे तरफ के दोनों भाग), दाँत, जबड़ा, (मसूड़ा), जिह्वा, चिबुक (ठोढ़ी) और गला ये सब हैं। दूसरा अङ्ग ग्रीवा (गर्दन) है, जिसके आधार पर शिर स्थित है। तीसरा अङ्ग दोनों बाँहें हैं। अब उसके उपाङ्गों को कहते हैं-उसमें दोनों बाहुओं के ऊपर दो कन्धे और दोनों कन्धों के नीचे दो प्रगण्ड (बाजू) दोनों बाजुओं के नीचे दो कफोणि (केहुनी), उनके नीचे दो प्रकोष्ठ, उनके नीचे दो मणिबन्ध (कलाई), उसके नीचे दो हथेली और दो हाथ, दोनों हाथों की दस अङ्गुलियाँ, दस नख तथा उन नखों के ऊपर के दस स्थाप्य (नहीं काटने योग्य) और नीचे के नखों के दस अग्रभाग छेद्य (काटने योग्य) कहे हुए हैं। ये सब दोनों बाहुओं के उपाङ्ग हैं ॥६५-७२॥