भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 83, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें३० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ नरचेष्टितायाः कन्याया उत्पत्तौ हेतुमाह- ऋतौ ऋतौ पुरुषवत् प्रवर्त्तेताङ्गना यदि। तत्र कन्या यदि भवेत् सा भवेन्नरचेष्टिता ॥५६॥ पुरुष चेष्टावाली कन्या उत्पन्न होने के कारण—प्रत्येक ऋतुकाल में यदि स्त्री पुरुष की तरह (पुरुष के ऊपर चढ़कर) मैथुन करने के लिये प्रवृत्त हो और उससे यदि कन्या उत्पन्न हो तो वह पुरुषों की भाँति चेष्टा करनेवाली होती है ॥५६॥ ❖ पुरुषवत् स्त्रियमारुह्य सा तस्या योनौ स्वयोनिघर्षणं करोति ।।५६।। 'पुरुष की भाँति चेष्टा करनेवाली' होती है अर्थात् (युवती होने पर) 'पुरुष की भाँति स्त्री के ऊपर चढ़ कर स्त्री की योनि में अपनी योनि को रगड़नेवाली होती है' ऐसा समझना चाहिये ।। अपरा अपि गर्भप्रकृतीराह- यदा नार्यावुपैयातां वृष्यन्त्यौ कथञ्चन। मुञ्चन्त्यौ शुक्रमन्योन्यमनस्थिस्तत्र जायते ।।५७।। अनस्थि सन्तानोत्पत्ति के लक्षण—यदि दो स्त्रियाँ काम से उन्मत्त हो करके परस्पर योनि रगड़ने के द्वारा शुक्र (रज) का त्याग करें, तो उससे अनस्थि सन्तान उत्पन्न होती है ॥५७॥ ❖ अनस्थिः-अत्रेषदर्थेनञ् तेनाल्पकोमलास्थिरित्यर्थः ।।५७।। 'अनस्थि' पद में ईषदर्थ में नञ् होने से इसका 'थोड़ी और कोमल हड्डियोंवाली' अर्थ होता है ॥५७॥ ऋतुस्नाता तु या नारी स्वप्ने मैथुनमाचरेत्। आर्तवं वायुरादाय कुक्षौ गर्भं करोति हि ॥५८॥ मासि मासि प्रवर्द्धेत स गर्भो. गर्भलक्षणः। कललं जायते तस्य वर्जितं पैतृकैर्गुणैः ॥५९॥ ऋतुस्नाता (रजोधर्म होने के बाद स्नान किये हुई) स्त्री यदि स्वप्न में मैथुन करे अर्थात् स्वप्न में देखे कि पुरुष उसके साथ मैथुन कर रहा है और वह भी उसमें प्रवृत्त हो रही है तो उस समय वायु उसके रज को गर्भाशय में पहुँचा कर गर्भ उत्पन्न कर देता है और वही गर्भ, गर्भ के लक्षणों से युक्त होकर महीने-महीने बढ़ा करता है, उसके बाद पैतृक गुणों से रहित वह गर्भ कललरूप (कीचड़ रूप) में उत्पन्न होता है ॥५८-५९॥ ❖ गर्भलक्षणः=प्रकृतगर्भलक्षणः। पैतृकैर्गुणैः=केशश्मश्रुलोमनखदन्तशिरास्नायुधमनीरेतः- प्रभृतिभिः ।।५८-५९।। 'गर्भलक्षणः' का अर्थ है वस्तुतः गर्भ के लक्षणों से युक्त और 'पैतृकैर्गुणैः' का अर्थ—केश, दाढ़ी, मूँछ, रोम, नख, दाँत, शिरा, स्नायु, धमनी और शुक्र आदि से (वर्जितं=वर्जित) ॥५८-५९॥ सर्पवृश्चिककूष्माण्डाकृतयो१ विकृताश्च ये। गर्भास्ते योषितस्ताश्च ज्ञेयाः पापकृतो भृशम् ।।६०।। गर्भो वातप्रकोपेण दोहदे चापमानिते२। भवेत् कुब्जः कुणिः पङ्गुर्मूको भिन्निन एव च ।।६१।। जिन स्त्रियों को साँप, बिच्छू और कूष्माण्ड के आकार के तथा विकृत (कुष्ठादि विकारों से युक्त) जो गर्भ उत्पन्न होते हैं उन गर्भो को तथा उन स्त्रियों को अत्यन्त पापात्मा समझना चाहिये । गर्भिणी के दोहद को अपमानित करने पर अर्थात् गर्भिणी को अभिलषित वस्तु न देने पर वायु के कोप से गर्भ कुब्जा, कुणि (जिसका हाथ टेढ़ा-मेढ़ा हो गया हो), पङ्गु (लुञ्ज पैरोंवाला), गूँगा और मिनमिना अर्थात् मिनमिना कर बोलनेवाला उत्पन्न होता है ॥६०-६१॥ १. 'कुष्माण्डे'ति पाठान्तरमसङ्गतम्। २. 'चावमानिते' इति पाठान्तरम्। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA