भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 82, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयगर्भप्रकरणम् २९ श्लोक में 'पित्रोः' पद से 'माता-पिता का' और 'स्वल्पशुक्रार्तवात्' इसे 'रज और वीर्य कम होने से' ऐसा अर्थ समझना चाहिये। 'आसेक्य' का दूसरा नाम 'मुखयोनि' भी है, अतःआसेक्य नामक नपुंसक अर्थात् मुखयोनि नामक जो नपुंसक है, वह शुक्र का पान करके अर्थात् अन्य पुरुष से अपने मुख में मैथुन करा कर मुख में स्खलित हुये उस पुरुष के वीर्य का पान करके अपने लिङ्ग के खड़े होने की शक्ति को प्राप्त करता है ॥५१॥ अथ सौगन्धिकनपुंसकलक्षणमाह- यः पूतियोनौ जायेत स हि सौगन्धिको भवेत्। स योनिशेफसोर्गन्धमाघ्राय लभते बलम् ॥५२॥ जो दुर्गन्ध युक्त योनि से उत्पन्न होता है, वह सौगन्धिक नामक नपुंसक कहलाता है, और वह योनि तथा लिङ्ग के गन्ध को सूँघ कर मैथुन करने में सामर्थ्य प्राप्त करता है ॥५२॥ ❖ सौगन्धिकः = सौगन्धिकनामा, नासायोनिरिति नामान्तरम्। बलं मैथुने शक्तिम् ॥५२॥ श्लोक में 'सौगन्धिक' का दूसरा नाम नासायोनि भी है। 'बल' पद का अर्थ 'मैथुन करने में शक्ति' समझना चाहिये ॥५२॥ अथ कुम्भीकनपुंसकलक्षणमाह- स्वे गुदेऽब्रह्मचर्याद्यः स्त्रीषु पुंवत् प्रवर्त्तते। स कुम्भीक इति ज्ञेयो गुदयोनिस्तु स स्मृतः ॥५३॥ जो पुरुष अन्य पुरुष के द्वारा अपनी गुदा में मैथुन कराने पर मैथुन करने की शक्ति प्राप्त करता है, उसे कुम्भीक नामक नपुंसक समझना चाहिये। उसका दूसरा नाम 'गुदयोनि' भी प्रसिद्ध है ॥५३॥ ❖ अब्रह्मचर्याद् = ब्रह्मचर्यममैथुनम्; अब्रह्मचर्यम् = मैथुनम्, किन्तु स्त्रीवदधोभूतः स्वे गुदे पुरुषान्तरेण मैथुनं कारयति, तस्मात् ॥५३॥ 'अब्रह्मचर्यात्' — मैथुन से रहित, अत एव अब्रह्मचर्य का अर्थ मैथुन होने से इसका अर्थ जो 'अपनी गुदा में मैथुन कराने से' यह होता है, उसमें 'स्त्री की तरह स्वयं नीचे रह कर ऊपर से दूसरे पुरुष से अपनी गुदा में मैथुन कराने से' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥५३॥ अथेर्ष्यकनपुंसकलक्षणमाह- दृष्ट्वा व्यवायमन्येषां व्यवाये यः प्रवर्त्तते। ईर्ष्यकः स तु विज्ञेयो दृष्टियोनिस्तु स स्मृतः ॥५४॥ दूसरे पुरुष को मैथुन करते हुये देखकर जो मैथुन करने में प्रवृत्त होता है, उसे ईर्ष्यक नामक नपुंसक समझना चाहिये। इसका दूसरा नाम दृष्टियोनि भी प्रसिद्ध है ॥५४॥ अथ षण्डनपुंसकलक्षणमाह- यो भार्यायामृतौ मोहादङ्गनेव प्रवर्त्तते, तत्र स्त्रीचेष्टिताकारो जायते¹ षण्डसंज्ञकः ॥५५॥ जो मोह (मूर्खता) वश हो कर ऋतुकाल में स्त्री की भाँति मैथुन करने में प्रवृत्त होता है अर्थात् स्वयं स्त्री की भाँति नीचे रह कर और स्त्री को अपने ऊपर उठाकर स्त्री से मैथुन कराता है और उस समय जो गर्भ होता है, उससे स्त्री की तरह चेष्टा और आकारवाला षण्ढ नामक नपुंसक उत्पन्न होता है ॥५५॥ ❖ स्त्रीचेष्टिताकारः स्त्र्याकारश्मश्रुरहितः। स्त्रीचेष्टितः समेहनोऽपि पुरुषशक्तिरहितः ॥५५॥ 'स्त्रीचेष्टिताकारः' = स्त्री की तरह दाढ़ी और मूँछ से रहित। 'स्त्रीचेष्टितः' = 'स्त्री की तरह चेष्टावाला' अर्थात् लिङ्ग होने पर भी पुरुष की जो मैथुन करने की शक्ति है, उससे रहित ॥५५॥ १. 'षण्ड=खण्डे'ति पाठान्तरे अशुद्धे।