भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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३६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे वेग होना तथा उसका प्रवर्तन (त्याग करना), धातुओं की गति अच्छी रखना, इन्द्रियों को अपने-अपने विषयों के ग्रहण करने में सामर्थ्य देना, इन सब कार्यों से हृदय, इन्द्रिय और चित्त को धारण करता हुआ अनुग्रह (देह की रक्षा) किया करता है और वायु रजोगुण से युक्त, सूक्ष्म से सूक्ष्म स्रोतों में गमन करने वाला, शीतल, रूक्ष, लघु, चलनशील, खर, मृदु (नरम) योगवाही, संयोग विशेष होने से दोनों अर्थों का करनेवाला है अर्थात् तेज सम्बन्धी पदार्थों से युक्त होकर दाह करनेवाला हो जाता है और सोमसम्बन्धी पदार्थों से युक्त होकर शीत करनेवाला हो जाता है, शरीर के सभी पदार्थों को परस्पर विभाग (अलग-अलग) करने से दोषों का जहाँ संग्रह किया गया है, वहाँ पर वायु ही प्रधान माना गया है और पक्वाशय, कटि, सक्थि (जानु की ऊपरी भाग), श्रोत्र (कान), अस्थि (हड्डी) और स्पर्शननेन्द्रिय (त्वक्) ये सब वायु के स्थान हैं, इनमें विशेष करके पक्वाशय ही वायु का स्थान है। उसकी अपेक्षा और सब स्थान गौण हैं ॥१०३-१०७॥ एको वायुः पित्तवन्नामस्थानकर्मभेदैः पञ्चविधस्तेषां नामान्याह- उदानस्तदनुप्राणः समानोऽपान एव च । व्यानश्चैतानि नामानि वायोः स्थानप्रभेदतः ॥१०८॥ ५ प्रकार के वायुओं के नाम—उदान, प्राण, समान, अपान और व्यान ये ५ नाम वायु के स्थानों के भेद से हुये हैं ॥१०८॥ अथोदानादीनां स्थानान्याह- कण्ठे हृदि तथाऽधस्तात्कोष्ठवह्नेर्मलाशये । सकलेऽपि शरीरेऽसौ क्रमेण पवनो वसेत् ॥१०९॥ उदानादि वायुओं के स्थान—उदान वायु कंठ में, प्राण वायु हृदय में, समान वायु नाभिप्रदेश में, अपान वायु मलाशय में तथा व्यान वायु सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर रहता है ॥१०९॥ अथ तेषां कर्माण्याह- उदानो नाम यत्तूर्ध्वमुपैति पवनोत्तमः । तेन भाषितगीतादिप्रवृत्तिः कुपितस्तु सः ॥११०॥ ऊर्ध्वजत्रुगतान् रोगान्विदधाति विशेषः । यो वायुः प्राणनामाऽसौ मुखं गच्छति देहधृक् ॥१११॥ सोऽन्नं प्रवेशयत्यन्तः प्राणांश्चाप्यवलम्बते । प्रायशः कुरुते दुष्टो हिक्काश्वासादिकान् गदान् ॥११२॥ उदानादि वायुओं के कर्म—कण्ठ देश में स्थित उदानसंज्ञक वायु जब कण्ठ से ऊपर होता है तब उससे प्राणी बोलने और गाने में प्रवृत्त होता है, और वही वायु जब कुपित होता है तब स्कंध और कक्षा की सन्धि में होने वाले रोगों को उत्पन्न करता है। देह का धारण करनेवाला हृदय में स्थित प्राथमिक वायु जब मुख की ओर जाता है तब भोजन के समय अन्न को पेट के अन्दर प्रवेश कराता है तथा प्राणों को अवलम्बन देता है और वही वायु जब कुपित होता है तब हिचकी, दमा आदि रोगों को पैदा करता है ॥११०-११२॥ आमपक्वाशयचरः समानो वह्निसङ्गतः । सोऽन्नं पचति तज्जांश्च विशेषान्विनक्ति हि ॥११३॥ आमाशय और पक्वाशय में रहनेवाला समान नामक वायु जठराग्नि से युक्त होकर अन्न को पचाता है तथा अन्न से उत्पन्न हुए विशेष पदार्थों को अलग करता है ॥१३॥ ❖ तज्जानित्यादि । अन्नगतान् रसमलमूत्रादीन् पृथक्करोतीत्यर्थः ॥११३॥ 'तज्जान्' इत्यादि का अर्थ यह है कि अन्न से उत्पन्न हुए रस, मल और मूत्र आदि को पृथक् करता है ॥११३॥ स दुष्टो वह्निमान्द्यातिसारगुल्मान् करोति हि । पक्वाशयालयोऽपानः काले कर्षति चाप्ययम् ॥११४॥ समीरणः शकृन्मूत्रशुक्रगर्भार्त्तवान्यधः । क्रुद्धस्तु कुरुते रोगान् घोरान्वस्तिगुदाश्रयान् ॥११५॥