भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 809

७५८ भावप्रकाशनिघण्टुः उत्तम सुवर्ण के लक्षण— जो सुवर्ण तपाने में लाल, काटने में सफेद, कसौटी (कसने) में केशर के समान, चाँदी तथा ताँबा से रहित, स्निग्ध, कोमल तथा तौल में भारी हो तो उसे उत्तम समझना चाहिये । [८] ❖ सद् = उत्तमम् ।।८।। यहाँ पर मूल में “सत्” पद से “उत्तम्” यह अर्थ समझना चाहिये । [८] अथ निकृष्टसुवर्णलक्षणमाह तच्छ्वेतं कठिनं रूक्षं विवर्णं समलं दलम् । दाहे छेदेऽसितं श्वेतं कषे त्याज्यं लघु स्फुटम् ।।९।। निकृष्ट सुवर्ण के लक्षण— जो सुवर्ण देखने में कुछ सफेद, कठिन, रूखा, खराब, वर्णवाला, मैल के सहित, जोर वाला (गाँठ के सदृश), तपाने तथा काटने में काला, कसने में सफेद, तोल में हलका तथा घन की चोट से टूटने वाला हो उसे निकृष्ट समझ कर औषध के कार्य में त्याग कर देना चाहिये । [९] ❖ दलं = “जोर” इति लोके । स्फुटं = यद्धनाहतं स्फुटति ।।९।। यहाँ पर मूल में “दल” पद का “जोर” यह लोक प्रसिद्ध अर्थ तथा “स्फुट” का 'घन की चोट से टूटने वाला' यह अर्थ समझना चाहिये । [९] अथ सम्यङ्मारितसुवर्णगुणानाह सुवर्णं शीतलं वृष्यं बल्यं गुरुं रसायनम् । स्वादु तिक्तं च तुवरं पाके च स्वादु पिच्छिलम् ।।१०।। पवित्रं बृंहणं नेत्र्यं मेधास्मृतिमतिप्रदम् । हृद्यमायुष्करं कान्तिवाग्विशुद्धिस्थिरत्वकृत् । विषद्वयक्षयोन्मादत्रिदोषज्वरशोषजित् ।।११।। अच्छे प्रकार से भस्म किया हुआ सुवर्ण—मधुर, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, विपाक में मधुर, पिच्छिल, पवित्र, बृंहण (रस-रक्तादिबर्द्धक), नेत्र के लिये हितकर, शीतल, वीर्यवर्द्धक, बलकारक, गुरु, रसायन, हृदय को हितकर, मेधा (धारणशक्ति), स्मृति, बुद्धि, आयु, कान्ति, वाणी की शुद्धि तथा स्थिरता को करने वाला एवम्—दोनों प्रकार के (स्थावर- जङ्गम) विष, क्षय, उन्माद, त्रिदोष, ज्वर तथा शोथ को दूर करने वाला होता है । [१०-११] अथासम्यङ्मारितसुवर्णदोषानाह बलं सवीर्यं हरते नराणां रोगव्रजान् पोषयतीह काये । असौख्यकृच्चापि सदा सुवर्णमशुद्धमेतन्मरणञ्च कुर्यात् ।।१२।। असम्यङ्मारितं स्वर्णं बलं वीर्य्यञ्च नाशयेत् । करोति रोगान् मृत्युं च तद्धन्त्याद्यत्नत स्ततः ।।१३।। ठीक से भस्म न किये हुये सुवर्ण के दोष-- अशुद्ध सुवर्ण भस्म—मनुष्यों के बल तथा वीर्य को नष्ट करता है तथा शरीर में रोगों को पुष्ट करता है, सदा दुःख पहुँचाता है और अन्त में मृत्यु भी कर देता है । अच्छी तरह से बिना शोधे भस्म किया हुआ सुवर्ण—बल तथा वीर्य को नष्ट करता है एवम् रोग तथा मृत्यु को देता है अतएव यत्नपूर्वक उसकी भस्म बनानी चाहिये । [१२-१३] अथ रूप्यम् । तस्योत्पत्तिमाह त्रिपुरस्य वधार्थाय निर्निमेषैर्विलोचनैः । निरीक्षयामास शिवः क्रोधेन परिपूरितः ।।१४।। अग्निस्तत्कालमपतत्तस्यकस्माद्विलोचनात् । ततो रुद्रः समभवद् वैश्वानर इव ज्वलन् ।।१५।। द्वितीयादपतन्नेत्रादश्रुबिन्दुस्तु वामकात् । तस्माद्रजतमभूत्तन्मन्त्रमुक्तकर्मसु योजयेत् ।।१६।।