भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 808, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथाष्टमो धात्वादिवर्गोपरनामको धातूपधातु- रसोपरसरत्नोपरत्नविषोपविषवर्गः तत्र धातूनां लक्षणानि गुणाँश्चाह तत्रादौ धातुसंख्यामाह स्वर्णं रूप्यञ्च ताम्रं च रङ्गं यशदमेव च । सीसं लौहञ्च सप्तैते धातवो गिरिसम्भवः ॥१॥ धातुओं की संख्या—सोना, चाँदी, ताँबा, राँगा, जस्ता, सीसा और लोहा ये सात-सात धातु पर्वत में उत्पन्न होने (खान से निकलने) वाले हैं । [१] अथ धातुशब्दस्य निरुक्तिमाह वलीपलितखालित्यकार्श्यबैल्यजरामयान् । निवार्य देहं दधति नृणां तद्धातवो मताः ॥२॥ धातु शब्द की निरुक्ति—मनुष्यों के बली, पलित, खालित्य (शिर से बाल झड़जाना), कृशता, निर्बलता, बुढ़ापा, रोग इन सब को दूर करके जो देह को स्थिर (कार्य करने में समर्थ) रखते हैं वे “धातु” कहलाते हैं । [२] तत्रादौ सुवर्णस्योत्पत्तिनामान्याह पुरा निजाश्रमस्थानां सप्तर्षीणां जितात्मनाम् । पत्नीर्विलोक्य लावण्यलक्ष्मीसम्पन्नयौवनाः ॥३॥ कन्दर्पदर्पविध्वस्तचेतसो जातवेदसः । पतितं यद्धरापृष्ठे रेतस्तद्धेमतामगात् ॥ कृत्रिमञ्चापि भवति तद्रसेन्द्रस्य वेधतः ॥४॥ सोने की उत्पत्ति—पहले एक समय जितेन्द्रिय सप्तर्षिगण अपने आश्रम में बैठे हुये थे, उस समय लावण्य तथा शोभा से पूर्ण यौवन वाली उनकी पत्नियों को देखकर कामदेव से जितेन्द्रियपने का अभिमान नष्ट हो जाने से (कामपीड़ित होने से) अग्निदेव का जो वीर्य स्खलित होकर धरातल पर पड़ा वही सोना हुआ अर्थात् तभी से सोने की उत्पत्ति हुई और पारे के वेध से कृत्रिम सोना भी होता है । [३-४] ❖ मरीचिरङ्गिरा अत्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । वसिष्ठश्चेति सप्तैते कीर्त्तिताः परमर्षयः ॥३-४॥ यहाँ पर मूल में “सप्तर्षि” पद से १ मरीचि, २ अङ्गिरा, ३ अत्रि, ४ पुलस्त्य, ५ पुलह, ६ क्रतु, ७ वशिष्ठ ये ७ परमर्षियों का बोध करना चाहिये । [३-४] स्वर्णं सुवर्णं कनकं हिरण्यं हेम हाटकम् ॥५॥ तपनीयं च गाङ्गेयं कलधौतञ्च काञ्चनम् । चामीकरं शातकुम्भं तथा कार्त्तस्वरं च तत् ॥६॥ जाम्बूनदं जातरूपं महारजतमित्यपि ॥७॥ सोना के संस्कृत नाम—स्वर्ण, सुवर्ण, कनक, हिरण्य, हेम, हाटक, तपनीय, गाङ्गेय, कलधौत, काञ्चन, चामीकर, शातकुम्भ, कार्त्तस्वर, जाम्बूनद, जातरूप तथा महारजत ये सब हैं । [५-७] अथोत्तमसुवर्णलक्षणमाह दाहे रक्तं सितं छेदे निकषे कुङ्कुमप्रभम् । तारशुल्बोज्झितं स्निग्धं कोमलं गुरु हेम सत् ॥८॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA