भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 807, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें७५६ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ चतुरम्लं पञ्चाम्लं च । तयोर्लक्षणमाह अम्लवेतसवृक्षाम्लबृहज्जम्बीरनिम्बुकैः । चतुरम्लं हि पञ्चाम्लं बीजपूरयुतैर्भवेत् ।। १५० ।। चतुरम्ल के लक्षण—अम्लवेतस, कोकम, जमीरी नीबू (बड़ा) और कागजी नीबू इन चारों के योग को 'चतुरम्ल' कहते हैं। पञ्चाम्ल के लक्षण—यदि चतुरम्ल (अम्लवेतस, कोकम, जमीरी नीबू, कागजी नीबू) में बिजौरा नीबू का और योग कर दिया जाय तो "पञ्चाम्ल" हो जाता है। [१५०] अथ परिभाषामाह फलेषु परिपक्वं यद् गुणवत्तदुदाहृतम् । बिल्वादन्यत्र विज्ञेयमामं तद्धि गुणाधिकम् ।। फलेषु सरसं यत्स्याद् गुणवत्तदुदाहृतम् ।। १५१ ।। द्राक्षाबिल्वशिवाऽऽदीनां फलं शुष्कं गुणाधिकम् । फलतुल्यगुणं सर्वं मज्जानमपि निर्दिशेत् ।। १५२ ।। फलं हिमाग्निदुर्वातव्यालकीटादिदूषितम् । अकालजं कुभूमीजं पाकातीतं न भक्षयेत् ।। १५३ ।। ❖ पाकातीतं = पाकमतिक्रम्य स्थितम् ।। १५३ ।। फल विषयक परिभाषा—फलों में जो पका होता है वह कच्चे की अपेक्षा अधिक गुणकारी होता है किन्तु यह नियम बेल के फल के लिये नहीं है क्योंकि बेल का फल कच्चा ही अधिक गुणकारी होता है। फलों में जो सरस होता है वह सूखे की अपेक्षा अधिक गुणकारी होता है किन्तु दाख, बेल तथा हरड़ आदि के फल सूखे ही अधिक गुणकारी होते हैं। फल के गुण के समान उसकी मींगी के भी गुण समझना चाहिये। जो फल—पाला, अग्नि, आँधी, सर्प तथा कीड़े आदि से खराब हो गये हों तथा अकाल अथवा दुष्टभूमि में उत्पन्न हुये हों एवं अधिक पक जाने से खराब हो गये हों उन्हें कभी नहीं खाना चाहिये । [१५१-१५३] यहाँ पर मूल में "पाकातीत" पद का "पकने की मर्यादा को लाँघ गये हों" अर्थात् अधिक पक जाने से खराब हो गये हों ऐसा अर्थ समझना चाहिये । [१५१-१५३] इति श्रीमिश्रलटकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे आम्रादिफलवर्गः समाप्तः ।