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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

७५६ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ चतुरम्लं पञ्चाम्लं च । तयोर्लक्षणमाह अम्लवेतसवृक्षाम्लबृहज्जम्बीरनिम्बुकैः । चतुरम्लं हि पञ्चाम्लं बीजपूरयुतैर्भवेत् ।। १५० ।। चतुरम्ल के लक्षण—अम्लवेतस, कोकम, जमीरी नीबू (बड़ा) और कागजी नीबू इन चारों के योग को 'चतुरम्ल' कहते हैं। पञ्चाम्ल के लक्षण—यदि चतुरम्ल (अम्लवेतस, कोकम, जमीरी नीबू, कागजी नीबू) में बिजौरा नीबू का और योग कर दिया जाय तो "पञ्चाम्ल" हो जाता है। [१५०] अथ परिभाषामाह फलेषु परिपक्वं यद् गुणवत्तदुदाहृतम् । बिल्वादन्यत्र विज्ञेयमामं तद्धि गुणाधिकम् ।। फलेषु सरसं यत्स्याद् गुणवत्तदुदाहृतम् ।। १५१ ।। द्राक्षाबिल्वशिवाऽऽदीनां फलं शुष्कं गुणाधिकम् । फलतुल्यगुणं सर्वं मज्जानमपि निर्दिशेत् ।। १५२ ।। फलं हिमाग्निदुर्वातव्यालकीटादिदूषितम् । अकालजं कुभूमीजं पाकातीतं न भक्षयेत् ।। १५३ ।। ❖ पाकातीतं = पाकमतिक्रम्य स्थितम् ।। १५३ ।। फल विषयक परिभाषा—फलों में जो पका होता है वह कच्चे की अपेक्षा अधिक गुणकारी होता है किन्तु यह नियम बेल के फल के लिये नहीं है क्योंकि बेल का फल कच्चा ही अधिक गुणकारी होता है। फलों में जो सरस होता है वह सूखे की अपेक्षा अधिक गुणकारी होता है किन्तु दाख, बेल तथा हरड़ आदि के फल सूखे ही अधिक गुणकारी होते हैं। फल के गुण के समान उसकी मींगी के भी गुण समझना चाहिये। जो फल—पाला, अग्नि, आँधी, सर्प तथा कीड़े आदि से खराब हो गये हों तथा अकाल अथवा दुष्टभूमि में उत्पन्न हुये हों एवं अधिक पक जाने से खराब हो गये हों उन्हें कभी नहीं खाना चाहिये । [१५१-१५३] यहाँ पर मूल में "पाकातीत" पद का "पकने की मर्यादा को लाँघ गये हों" अर्थात् अधिक पक जाने से खराब हो गये हों ऐसा अर्थ समझना चाहिये । [१५१-१५३] इति श्रीमिश्रलटकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे आम्रादिफलवर्गः समाप्तः ।

अथाष्टमो धात्वादिवर्गोपरनामको धातूपधातु- रसोपरसरत्नोपरत्नविषोपविषवर्गः तत्र धातूनां लक्षणानि गुणाँश्चाह तत्रादौ धातुसंख्यामाह स्वर्णं रूप्यञ्च ताम्रं च रङ्गं यशदमेव च । सीसं लौहञ्च सप्तैते धातवो गिरिसम्भवः ॥१॥ धातुओं की संख्या—सोना, चाँदी, ताँबा, राँगा, जस्ता, सीसा और लोहा ये सात-सात धातु पर्वत में उत्पन्न होने (खान से निकलने) वाले हैं । [१] अथ धातुशब्दस्य निरुक्तिमाह वलीपलितखालित्यकार्श्यबैल्यजरामयान् । निवार्य देहं दधति नृणां तद्धातवो मताः ॥२॥ धातु शब्द की निरुक्ति—मनुष्यों के बली, पलित, खालित्य (शिर से बाल झड़जाना), कृशता, निर्बलता, बुढ़ापा, रोग इन सब को दूर करके जो देह को स्थिर (कार्य करने में समर्थ) रखते हैं वे “धातु” कहलाते हैं । [२] तत्रादौ सुवर्णस्योत्पत्तिनामान्याह पुरा निजाश्रमस्थानां सप्तर्षीणां जितात्मनाम् । पत्नीर्विलोक्य लावण्यलक्ष्मीसम्पन्नयौवनाः ॥३॥ कन्दर्पदर्पविध्वस्तचेतसो जातवेदसः । पतितं यद्धरापृष्ठे रेतस्तद्धेमतामगात् ॥ कृत्रिमञ्चापि भवति तद्रसेन्द्रस्य वेधतः ॥४॥ सोने की उत्पत्ति—पहले एक समय जितेन्द्रिय सप्तर्षिगण अपने आश्रम में बैठे हुये थे, उस समय लावण्य तथा शोभा से पूर्ण यौवन वाली उनकी पत्नियों को देखकर कामदेव से जितेन्द्रियपने का अभिमान नष्ट हो जाने से (कामपीड़ित होने से) अग्निदेव का जो वीर्य स्खलित होकर धरातल पर पड़ा वही सोना हुआ अर्थात् तभी से सोने की उत्पत्ति हुई और पारे के वेध से कृत्रिम सोना भी होता है । [३-४] ❖ मरीचिरङ्गिरा अत्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । वसिष्ठश्चेति सप्तैते कीर्त्तिताः परमर्षयः ॥३-४॥ यहाँ पर मूल में “सप्तर्षि” पद से १ मरीचि, २ अङ्गिरा, ३ अत्रि, ४ पुलस्त्य, ५ पुलह, ६ क्रतु, ७ वशिष्ठ ये ७ परमर्षियों का बोध करना चाहिये । [३-४] स्वर्णं सुवर्णं कनकं हिरण्यं हेम हाटकम् ॥५॥ तपनीयं च गाङ्गेयं कलधौतञ्च काञ्चनम् । चामीकरं शातकुम्भं तथा कार्त्तस्वरं च तत् ॥६॥ जाम्बूनदं जातरूपं महारजतमित्यपि ॥७॥ सोना के संस्कृत नाम—स्वर्ण, सुवर्ण, कनक, हिरण्य, हेम, हाटक, तपनीय, गाङ्गेय, कलधौत, काञ्चन, चामीकर, शातकुम्भ, कार्त्तस्वर, जाम्बूनद, जातरूप तथा महारजत ये सब हैं । [५-७] अथोत्तमसुवर्णलक्षणमाह दाहे रक्तं सितं छेदे निकषे कुङ्कुमप्रभम् । तारशुल्बोज्झितं स्निग्धं कोमलं गुरु हेम सत् ॥८॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

७५८ भावप्रकाशनिघण्टुः उत्तम सुवर्ण के लक्षण— जो सुवर्ण तपाने में लाल, काटने में सफेद, कसौटी (कसने) में केशर के समान, चाँदी तथा ताँबा से रहित, स्निग्ध, कोमल तथा तौल में भारी हो तो उसे उत्तम समझना चाहिये । [८] ❖ सद् = उत्तमम् ।।८।। यहाँ पर मूल में “सत्” पद से “उत्तम्” यह अर्थ समझना चाहिये । [८] अथ निकृष्टसुवर्णलक्षणमाह तच्छ्वेतं कठिनं रूक्षं विवर्णं समलं दलम् । दाहे छेदेऽसितं श्वेतं कषे त्याज्यं लघु स्फुटम् ।।९।। निकृष्ट सुवर्ण के लक्षण— जो सुवर्ण देखने में कुछ सफेद, कठिन, रूखा, खराब, वर्णवाला, मैल के सहित, जोर वाला (गाँठ के सदृश), तपाने तथा काटने में काला, कसने में सफेद, तोल में हलका तथा घन की चोट से टूटने वाला हो उसे निकृष्ट समझ कर औषध के कार्य में त्याग कर देना चाहिये । [९] ❖ दलं = “जोर” इति लोके । स्फुटं = यद्धनाहतं स्फुटति ।।९।। यहाँ पर मूल में “दल” पद का “जोर” यह लोक प्रसिद्ध अर्थ तथा “स्फुट” का 'घन की चोट से टूटने वाला' यह अर्थ समझना चाहिये । [९] अथ सम्यङ्मारितसुवर्णगुणानाह सुवर्णं शीतलं वृष्यं बल्यं गुरुं रसायनम् । स्वादु तिक्तं च तुवरं पाके च स्वादु पिच्छिलम् ।।१०।। पवित्रं बृंहणं नेत्र्यं मेधास्मृतिमतिप्रदम् । हृद्यमायुष्करं कान्तिवाग्विशुद्धिस्थिरत्वकृत् । विषद्वयक्षयोन्मादत्रिदोषज्वरशोषजित् ।।११।। अच्छे प्रकार से भस्म किया हुआ सुवर्ण—मधुर, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, विपाक में मधुर, पिच्छिल, पवित्र, बृंहण (रस-रक्तादिबर्द्धक), नेत्र के लिये हितकर, शीतल, वीर्यवर्द्धक, बलकारक, गुरु, रसायन, हृदय को हितकर, मेधा (धारणशक्ति), स्मृति, बुद्धि, आयु, कान्ति, वाणी की शुद्धि तथा स्थिरता को करने वाला एवम्—दोनों प्रकार के (स्थावर- जङ्गम) विष, क्षय, उन्माद, त्रिदोष, ज्वर तथा शोथ को दूर करने वाला होता है । [१०-११] अथासम्यङ्मारितसुवर्णदोषानाह बलं सवीर्यं हरते नराणां रोगव्रजान् पोषयतीह काये । असौख्यकृच्चापि सदा सुवर्णमशुद्धमेतन्मरणञ्च कुर्यात् ।।१२।। असम्यङ्मारितं स्वर्णं बलं वीर्य्यञ्च नाशयेत् । करोति रोगान् मृत्युं च तद्धन्त्याद्यत्नत स्ततः ।।१३।। ठीक से भस्म न किये हुये सुवर्ण के दोष-- अशुद्ध सुवर्ण भस्म—मनुष्यों के बल तथा वीर्य को नष्ट करता है तथा शरीर में रोगों को पुष्ट करता है, सदा दुःख पहुँचाता है और अन्त में मृत्यु भी कर देता है । अच्छी तरह से बिना शोधे भस्म किया हुआ सुवर्ण—बल तथा वीर्य को नष्ट करता है एवम् रोग तथा मृत्यु को देता है अतएव यत्नपूर्वक उसकी भस्म बनानी चाहिये । [१२-१३] अथ रूप्यम् । तस्योत्पत्तिमाह त्रिपुरस्य वधार्थाय निर्निमेषैर्विलोचनैः । निरीक्षयामास शिवः क्रोधेन परिपूरितः ।।१४।। अग्निस्तत्कालमपतत्तस्यकस्माद्विलोचनात् । ततो रुद्रः समभवद् वैश्वानर इव ज्वलन् ।।१५।। द्वितीयादपतन्नेत्रादश्रुबिन्दुस्तु वामकात् । तस्माद्रजतमभूत्तन्मन्त्रमुक्तकर्मसु योजयेत् ।।१६।।

धात्वादिवर्गः ७५९ चाँदी की उत्पत्ति—त्रिपुरासुर के वध के लिए क्रोध से युक्त होकर शिवजी निर्निमेष-दृष्टि से जब उसे देखने लगे तब उसी समय उनके एक नेत्र से अग्नि निकली उससे अग्नि के समान रुद्र भगवान् प्रज्वलित हो उठे और दूसरे बाएँ नेत्र से आँसू की बूंदें निकलीं उन्हीं से चाँदी की उत्पत्ति हुई, जिसका वैद्यक शास्त्रानुकूल कर्म में उपयोग लेना चाहिये। [१६] अथ कृत्रिमरूप्योत्पत्तिमाह कृत्रिमं च भवेत्तद्धि वङ्गादिरसयोगतः ॥१७॥ कृत्रिम (बनावटी) चाँदी की उत्पत्ति—कृत्रिम चाँदी उसे कहते हैं जो कि—वङ्ग आदि ने पारा का योग करने से तैयार की जाती है। [१७] अथ रूप्यनामान्याह रूप्यं तु रजतं तारं चन्द्रकान्ति सितप्रभम् ॥१८॥ चाँदी के संस्कृत नाम—रूप्य, रजत, तार, चन्द्रकान्ति तथा सितप्रभ ये सब हैं। [१८] अथोत्तमाधमयो रूप्ययोर्लक्षणान्याह गुरु स्निग्धं मृदु श्वेतं दाहे छेदे घनक्षमम् । वर्णाढ्यं चन्द्रवत्स्वच्छं रूप्यं नवगुणं शुभम् ।। कठिनं कृत्रिमं रूक्षं रक्तं पीतदलं लघु। दाहच्छेदघनैर्नष्टं रूप्यं दुष्टं प्रकीर्तितम् ॥१९॥ उत्तम चाँदी के लक्षण—जो चाँदी तौल में भारी, स्निग्ध, कोमल, तपाने तथा काटने में सफेद, घन की चोट को सहने वाली अर्थात् टुकड़े-टुकड़े न होने वाली, उत्तम वर्णवाली, चन्द्रमा के समान स्वच्छ कान्ति युक्त होती है अर्थात् इन नव गुणों से युक्त होती है वह उत्तम समझी जाती है। निकृष्ट चाँदी के लक्षण—जो चाँदी कठिन, कृत्रिम (बनावटी), रूक्ष, लाल, पीले दल (जोर) वाली, तौल में हल्की, तपाने, काटने तथा घन की चोट मारने पर जो अलग-अलग बिखर जाने वाली होती है वह खराब समझी जाती है। [१९] अथ सम्यङ्मारितरूप्यगुणानाह रूप्यं शीतं कषायाम्लं स्वादुपाकरसं सरम् । वयसः स्थापनं स्निग्धं लेखनं वातपित्तजित् । प्रमेहादिकरोगांश्च नाशयत्यचिराद् ध्रुवम् ॥२०॥ अच्छी तरह से शुद्धकर भस्म किये हुये चाँदी के गुण—चाँदी भस्म—कषाय, अम्ल तथा मधुर रस युक्त एवम्—विपाक में भी मधुर रस युक्त, शीतल, सारक, युवावस्था को स्थिर रखने वाला, स्निग्ध, लेखन एवम्—वात— पित्त तथा प्रमेहादि रोगों को शीघ्र तथा निश्चित रूप से दूर करने वाला है। [२०] अथासम्यङ् मारितरूप्यदोषानाह तारं शरीरस्य करोति तापं विध्वंसनं यच्छति शुक्रनाशम् । वीर्य बलं हन्ति तनोश्च पुष्टिं महागदान्पोषयति ह्यशुद्धम् ॥२१॥ बिना अच्छी तरह से शोधी हुई एवम् कच्ची चाँदी के भस्म के दोष—अशुद्ध चाँदी शरीर को संतप्त तथा नष्ट करने वाली, शुक्रनाशक एवम्-शरीर के वीर्य, बल तथा पुष्टि को नष्ट करने वाली और महारोगों की वृद्धि करने वाली होती है। [२१]

७६० भावप्रकाशनिघण्टुः अथ ताम्रम्। तस्योत्पत्तिमाह शुक्रं यत् कार्तिकेयस्य पतितं धरणीतले। तस्मात्ताम्रं समुत्पन्नमिदमाहुः पुराविदः ।।२२।। ताँबा की उत्पत्ति-कार्तिकेय भगवान् का जो शुक्र पृथ्वीतल पर गिरा उसी से ताँबे की उत्पत्ति हुई ऐसा पुराणज्ञ लोग कहते हैं। [२२] अथ ताम्रनामान्याह ताम्रमौदुम्बरं शुल्बमुदुम्बरमपि स्मृतम्। रविप्रियं म्लेच्छमुखं सूर्यपर्यायनामकम् ।।२३।। ताँबा के संस्कृत नाम-ताम्र, औदुम्बर, शुल्ब, उदुम्बर, रविप्रिय, म्लेच्छमुख तथा सूर्य के पर्याय वाची (अर्क- तपन-अहस्कर-भास्कर इत्यादि सभी) शब्द ये सब हैं। [२३] अथोत्तमताम्रलक्षणान्याह जपाकुसुमसदृशं स्निग्धं मृदु घनक्षमम्। लौहनागोज्झितं ताम्रं मारणाय प्रशस्यते ।।२४।। उत्तम ताँबा के लक्षण-भस्म करने के लिये वही ताँबा उत्तम होता है जो कि-अढ़ौल के फूल के समान लाल वर्ण वाला, स्निग्ध, कोमल, घन की चोट सहने वाला, लोहा तथा सीसा से रहित होता है। [२४] अथाधमताम्रलक्षणान्याह कृष्णं रूक्षमतिस्तब्धं श्वेतञ्चापि घनासहम्। लौहनागयुतञ्चेति शुल्बं दुष्टं प्रकीर्त्तितम् ।।२५।। निकृष्ट ताँबा के लक्षण-जो ताँबा-काला, रूखा, अत्यन्त कठिन, सफेद, घन की चोट न सहने वाला, लोहा तथा सीसा से युक्त होता है उसे निकृष्ट अर्थात् भस्म करने के अयोग्य समझना चाहिये। [२५] अथ सम्यङ्मारितताम्रगुणानाह ताम्रं कषायं मधुरं च तिक्तमम्लं च पाके कटु सारकं च। पित्तापहं श्लेष्महरं च शीतं तद्रोपणं स्याल्लघु लेखनञ्च ।।२६।। पाण्डूदराशोर्ज्वरकुष्ठकासश्वासक्षयान् पीनसमम्लपित्तम्। शोथं कृमिं शूलमपाकरोति प्राहुः परे बृंहणमल्पमेतत् ।।२७।। अच्छी प्रकार से भस्म किये हुये ताँबे के गुण-उत्तम ताम्रभस्म-कषाय, मधुर, तिक्त तथा अम्लरस युक्त, विपाक में कटु रस युक्त, सारक, पित्त तथा कफ नाशक, शीतल, रोपण (घाव भरने वाला), लघु, लेखन एवम्-पाण्डु तथा उदर रोग, अर्श, ज्वर, कुष्ठ, कास श्वास, क्षय, पीनस, अम्लपित्त, शोथ, क्रिमि तथा शूल का नाश करने वाला होता है। और कोई-कोई इसे थोड़ा बृंहण (रस रक्तादिवर्धक) भी मानते हैं। [२६-२७] अथसम्यङ्मारितताम्रस्य दोषाष्टकमाह एको दोषो विषे ताम्रेत्वसम्यङ्मारितेऽष्टते। दाहः स्वेदोऽरुचिर्मूर्च्छाक्लेदो रेको वमिर्भ्रमः ।।२८।। अच्छे प्रकार से भस्म न किये हुये ताँबे के आठ दोष-विष में तो केवल एक ही दोष है किन्तु अच्छे प्रकार ये भस्म न किये हुए ताँबे में (१) दाह, (२) स्वेद (पसीना), (३) अरुचि, (४) मूर्च्छा, (५) क्लेद (शरीर की आर्द्रता), (६) विरेचन, (७) वमन तथा ८ भ्रम का होना ये ८ दोष होते हैं अर्थात् उसके सेवन से उक्त दोष उत्पन्न होते हैं। [२८] ❖ रेकः = विरेकः ।।२८।। यहाँ पर मूल में 'रेक' पद से विरेक अर्थात् विरेचन अर्थ समझना चाहिये। [२८]

धात्वादिवर्गः ७६१ अथ रङ्गम् (राँगा)। तस्य नामानि भेदांश्चाह रङ्गं वङ्गं त्रपु प्रोक्तं तथा पिच्चटमित्यपि। खुरकं मिश्रकं चापि द्विविधं वङ्ग मुच्यते।।२९।। उत्तमं खुरकं तत्र मिश्रकं त्ववरं मतम्।।३०।। राँगा के संस्कृत नाम-रङ्ग, वङ्ग, त्रपु तथा पिच्चट ये सब हैं। राँगा के भेद-खुरक तथा मिश्रक ये दो भेद राँगा के होते हैं। इसमें “खुरक” उत्तम होता है एवम् “मिश्रक” निकृष्ट होता है ऐसा विद्वानों का मत है। [२९-३०] अथ सम्यङ्भारितरङ्गगुणानाह रङ्गं लघु सरं रूक्षमुष्णं मेहकफक्रिमीन्। निहन्ति पाण्डुं सश्वासं चक्षुष्यं पित्तलं मनाक् ।।३१।। सिंहो यथा हस्तिगणं निहन्ति तथैव वङ्गोऽखिलमेहवर्गम्। देहस्य सौख्यं प्रबलेन्द्रियत्वं नरस्य पुष्टिं विदधाति नूनम् ।।३२।। अच्छे प्रकार से भस्म किये हुये राँगे के गुण—राँगा का उत्तम भस्म—लघु, सारक, रूक्ष, उष्ण, नेत्रों के लिये हितकर, किञ्चित् पित्तजनक एवम्-प्रमेह, कफ, क्रिमि, पाण्डु और श्वास रोग को दूर करता है। और जिस प्रकार सिंह हाथियों के झुण्ड को नष्ट कर डालता है उसी प्रकार वंग (राँगा) भी सभी प्रकार के प्रमेहों को नष्ट कर डालता है। और देह सम्बन्धी सुख, इन्द्रियों की प्रबलता और पुष्टि ये सब सेवन करने वाले लोगों को निश्चित रूप से करता है। [३१-३२] अथ यशदम् (जस्ता)। तस्य नामगुणानाह यशदं रङ्गसदृशं रीतिहेतुश्च तन्मतम्। यशदं तुवरं तिक्तं शीतलं कफपित्तहृत्। चक्षुष्यं परमं मेहान् पाण्डुं श्वासं च नाशयेत् ।।३३।। जस्ता के संस्कृत नाम-यशद, रङ्गसदृश और रीतिहेतु ये सब हैं। जस्ता-कषाय तथा तिक्तरसयुक्त, शीतल, नेत्रों के लिये परम हितकर-एवम्-कफ-पित्त-समस्त प्रमेह-पाण्डु और श्वास को दूर करता है। [३३] अथ सीसम् (सीसा)। तस्योत्पत्तिं नामानि चाह दृष्ट्वा भोगिसुतां रम्यां वासुकिस्तु मुमोच यत्। वीर्यं जातस्ततो नागः सर्वरोगापहा नृणाम् ।।३४।। सीसं ब्रध्नं च वप्रं च योगेष्टं नागनामकम् ।।३५।। सीसा की उत्पत्ति—एक समय वासुकिनामक सर्पराज का किसी सुन्दरी नागकन्या को देखकर कामपीडित होने से जो शुक्र स्खलित हुआ उसी से मनुष्यों के सम्पूर्ण रोगों को नष्ट करने वाले सीसे की उत्पत्ति हुई इसी से इसे “नाग” कहते हैं। सीसा के संस्कृत नाम-सीस, ब्रध्न, वप्र, योगेष्ट और नागनामक (नाग के पर्यायवाची) शब्द, ये सब हैं। [३४-३५] ❖ नागनामकम् = नागो भुजङ्ग इत्यादि ।।३५।। यहाँ पर मूल में “नागनामक” पद से नाग के पर्यायवाची-नाग-भुजङ्ग-सर्प-उरग-द्विजिह्व इत्यादि सभी शब्द समझना चाहिये। [३४-३५] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

७६२ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ सीसस्य गुणानाह सीसं रङ्गगुणं ज्ञेयं विशेषान्मेहनाशनम् ।।३६।। नागस्तु नागशततुल्यबलं ददाति व्याधिं विनाशयति जीवनमातनोति । वह्निं प्रदीपयति कामबलं करोति मृत्युं च नाशयति सन्ततसेवितः सः ।।३७।। सीसा—सीसा गुणों में राँगा के समान ही है किन्तु विशेषतः यह प्रमेह नाशक होता है। और यदि निरन्तर सेवन किया जाय तो नाग (सीसा) सौ नाग (हाथी) के समान बल देता है, व्याधि नाश करता है, जीवन की वृद्धि करता है, जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, कामदेव सम्बन्धी बल को बढ़ाता है तथा मृत्यु को भी नष्ट करता है अर्थात् अनियत विपाक वाले मृत्यु को भी नष्ट करता है अर्थात् अनियत विपाक वाले मृत्यु से रक्षा करता है । [ ३६-३७] अथाशुद्धवङ्गनागयोर्दोषानाह पाकेन हीनौ किल वङ्गनागौ कुष्ठानि गुल्मांश्च तथाऽतिकष्टान् । कण्डूप्रमेहानिलसादशोथभगन्दरादीन् कुरुतः प्रयुक्तौ ।।३८।। अशुद्ध वंग (राँगा) तथा सीसा के दोष—भलीभाँति से यदि भस्म न किये गये हों तो प्रयोग करने से राँगा तथा सीसा ये दोनों कुष्ठ-गुल्म, अत्यन्त कष्ट, खुजली, प्रमेह, वायुरोग, शरीर का अवसन्न होना, शोथ, भगन्दर आदि रोगों को उत्पन्न करते हैं । [ ३८] अथ लोहम् । तस्योत्पत्तिं नामानि चाह पुरा लोमिनदैत्यानां निहतानां सुरैर्युधि । उत्पन्नानि शरीरेभ्यो लोहानि विविधानि च ।। लोहोऽस्त्री शस्त्रकं तीक्ष्णं पिण्डं कालायसायसी ।।३९।। लोहा की उत्पत्ति—पहले समय में एक बार युद्ध में देवताओं द्वारा मारे हुये लोमिन नामक दैत्यों के शरीर से अनेक प्रकार के लोहा उत्पन्न हुये । लोहा के संस्कृत नाम—लोह (यह स्त्रीलिङ्ग को छोड़ कर अन्य सभी लिङ्गों में होता है), शस्त्रक, तीक्ष्ण, पिण्ड, कालायस तथा अयस् ये सब हैं । [ ३९] अथ लोहस्य सप्तदोषानाह गुरुता दृढतोत्क्लेदः कश्मलं दाहकारिता। अश्मदोषः सुदुर्गन्धो दोषाः सप्तायसस्य तु ।।४०।। लोहा के सात-सात दोष—गुरुता, दृढ़ता, उत्क्लेद (वमन होने के समान मालूम होना), कश्मल (मूर्च्छा), दाह उत्पन्न करना, खान में रहने से पत्थर सम्बन्धी दोष, अत्यन्त दुर्गन्ध ये सब हैं । [ ४०] अथ लोहगुणानाह लोहं तिक्तं सरं शीतं मधुरं तुवरं गुरु। रूक्षं वयस्यं चक्षुष्यं लेखनं वातलं जयेत् ।।४१।। कफं पित्तं गरं शूलं शोथार्शः प्लीहपाण्डुताः । मेदोमेहक्रिमीन् कुष्ठं तक्किटं तद्वदेव हि ।।४२।। लोहा के गुण—लोहा-तिक्त-मधुर तथा कषायरस युक्त, सारक, शीतल, गुरु, रूक्ष, आयु को स्थिर रखने वाला, नेत्रों के लिये हितकर, लेखन गुण विशिष्ट, वातजनक एवम्-कफ-पित्त-विष-शूल-शोथ, अर्श, प्लीहा, पाण्डु, मेद, प्रमेह, क्रिमि तथा कुष्ठ को दूर करनेवाला होता है। लोहा के किट्ट (मैल) के गुण—लोहकिट्ट के भी गुण लोहे के समान ही होते हैं । [४३] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

धातुवादिवर्गः ७६३ अथाशुद्धलोहदोषानाह षण्ढत्वकुष्ठामयमृत्युदं भवेद्धृद्रोगशूलौ कुरुतेऽश्मरीञ्च । मानारुजानाञ्च तथा प्रकोपं करोति हृल्लासमशुद्धलोहम् ।।४३।। जीवहारि मदकारि चायसं चेदशुद्धिमद संस्कृतं ध्रुवम् । पाटवं न तनुते शरीरके दारुणां हृदि रुजाञ्च यच्छति ।।४४।। अशुद्ध लोहा के दोष—नपुंसकता, कुष्ठरोग, मृत्यु, हृद्रोग, शूल, पथरी, अनेक प्रकार के रोगों का प्रकोप, हृल्लास (उबकाई) ये सब बिना शुद्ध किये हुये लोहे के भस्म के सेवन से होते हैं । और यदि लोहे का शोधन तथा संस्कार न किया गया हो तो उसका भस्म जीवन को नष्ट करने वाला, मदकारक, शरीर में फुर्तीपन का अभाव तथा हृदय में असह्य पीड़ा का करने वाला होता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है । [४३-४४] अथ लोहसेविनां त्याज्यपदार्थानाह कूष्मांडं तिलतैलञ्च माषान्नं राजिकां तथा । मद्यम्लरसं चापि त्यजेल्लोहस्य सेवकः ।।४५।। लोहा सेवन करने वाले लोगों के लिये त्याग करने योग्य पदार्थ—सफेद कोंहड़ा, तिल का तैल, उरद के बने हुये पदार्थ, राई, मद्य, अम्लरस युक्त पदार्थ (खटाई आदि), इन सबको लोह सेवन करने वाला व्यक्ति छोड़ देवे । [४५] अथ सारलोहस्य लक्षणं गुणाँश्चाह क्ष्माभृच्छिखराकाराण्यङ्गान्यम्लेन लेपिते । लौहे स्युर्यत्र सूक्ष्माणि तत्सारमभिधीयते ।। लौहं साराह्वयं हन्याद् ग्रहणीमतिसारकम् ।।४६।। अर्द्धं सर्वाङ्गजं वातं शूलं च परिणामजम् । छर्दिं च पीनसं पित्तं श्वासं कासं व्यपोहति ।।४७।। सारलोह के लक्षण—जिस लोहे के ऊपर अम्ल (खट्टे पदार्थ) रस का लेपन करने से पर्वत के शिखर की भाँति आकारवाले सूक्ष्म-सूक्ष्म अंग उत्पन्न हो जायँ उसे सारलोह समझना चाहिये । सारलौह—ग्रहणी, अतिसार, अर्द्धाङ्ग तथा सर्वाङ्गवात, परिणामशूल, वमन, पीनस, पित्त, श्वास तथा कास को दूर करने वाला होता है । [४६-४७] अथ कान्तलौहस्य लक्षणं गुणाँश्चाह यत्पात्रे न प्रसरति जले तैलबिन्दुः प्रतप्ते-हिङ्गुर्गन्धं त्यजति च निजं तिक्ततां निम्बवल्कः । तप्तं दुग्धं भवति शिखराकारकं नैति भूमिं-कृष्णाङ्गस्स्यात् सजलचणकः कान्तलोहंतदुक्तम् ।।४८।। गुल्मोदरार्शःशूलाममामवातं भगन्दरम् । कामलाशोथकुष्ठानि क्षयं कान्तमयो हरेत् ।।४९।। प्लीहानमम्लपित्तञ्च यकृच्चापि शिरोरुजम् ।।५०।। सर्वान् रोगान् विजयते कान्तलोहं न संशयः । बलं वीर्यं वपुःपुष्टिं कुरुतेऽग्निं विवर्द्धयेत् ।।५१।। कान्तलौह के लक्षण—जिस लोहे के पात्र में जल रखकर उसमें तेल का बूँद डालने से यदि वह न फैले तथा जिसके पात्र में गरम करने से हींग अपने गन्ध को छोड़ दे और नीम की छाल गरम करने से अपनी कड़वाहट को छोड़ दे, एवम् जिसमें दूध खौलाने से जोरों से उबाल आने पर भी वह भूमि पर न गिरे और जिसमें चने भिगोने से काले हो जायें उसे कान्तलौह समझना चाहिये । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

७६४ भावप्रकाशनिघण्टुः कान्तलौह—गुल्म, उदररोग, अर्श, शूल, आम, आमवात, भगन्दर, कामला, शोथ, कुष्ठ, क्षय, प्लीहा, अम्लपित्त, यकृत् तथा शिर के रोग इत्यादि सभी रोगों को निःसन्देह दूर करता है और शरीर में बल, वीर्य की वृद्धि तथा पुष्टि करता है एवम् अग्निवर्द्धक होता है। [४८-५१] अथ किट्टी। तस्या नामगुणानाह ध्मायमानस्य लोहस्य मलं मण्डूरमुच्यते। लोहसिंहानिका किट्टी सिंहानञ्च निगद्यते। यल्लोहं यद्गुणं प्रोक्तं तत्किट्टमपि तद्गुणम् ।।५२।। किट्टी के लक्षण—लोह को अग्नि में धौंकाने से जो मल निकलता है उसे मण्डूर (किट्टी) कहते हैं। संस्कृत नाम—लोहसिंहानिका, किट्टी, सिंहान तथा मण्डूर ये सब हैं। किट्टी—जिस लोहे के जो गुण हैं उसके मेल (किट्टी) के भी वे ही गुण होते हैं। अथोपधातवः। तेषां संख्यामाह सप्तोपधातवः स्वर्णमाक्षिकं तारमाक्षिकं। तुत्थं कांस्यं च रीतिश्च सिन्दूरञ्च शिलाजतुः ।।५३।। उपधातुओं की संख्या—(१) सोनामाखी, (२) रूपामाखी, (३) तूतिया, (४) काँसा, (५) पीतल, (६) सिन्दूर, (७) शिलाजीत ये सात उपधातु हैं। [५३] ❖ उपधातवः—गौणा धातवः ।।५३।। यहाँ पर “उपधातु” से “गौणधातु” यह अर्थ समझना चाहिये। [५३] अथोपधातुष्वपि तत्तत्प्रधानधातुगुणाः स्वल्पमात्रया सन्तीत्याह उपधातुषु सर्वेषु तत्तद्धातुगुणा अपि। सन्ति किन्त्वेषु ते गौणास्तत्तदंशाल्पभावतः ।।५४।। उपर्युक्त सभी उपधातुओं में जिनके जो प्रधान धातु हैं उनके भी गुण उनमें रहते हैं किन्तु प्रधान के गुण गौणभाव से (थोड़ी मात्रा में हों) रहते हैं क्योंकि—धातु का अंश उपधातु में बहुत थोड़ा रहता है। [५४] तत्र सुवर्णमाक्षिकम् (सोनामाखी)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह स्वर्णमाक्षिकमाख्यातं तापीजं मधुमाक्षिकम् ।।५५।। ताप्यं माक्षिकधातुश्च मधुधातुश्च स स्मृतः। किञ्चित्सुवर्ण साहित्यात्स्वर्णमाक्षिकमीरितम् ।।५६।। उपधातुः सुवर्णस्य किञ्चित्स्वर्णगुणान्वितम्। तथा च काञ्चनाभावे दीयते स्वर्णमाक्षिकम् ।।५७।। किन्तु तस्यानुकल्पत्वात्किञ्चिदूनगुणास्ततः। न केवलं स्वर्णगुणा वर्त्तन्ते स्वर्णमाक्षिके ।।५८।। द्रव्यान्तरस्य संसर्गात्सन्त्यन्येऽपि गुणा यतः। सुवर्णमाक्षिकं स्वादु तिक्तं वृष्यं रसायनम् ।।५९।। चक्षुष्यं वस्तिरुक्कुष्ठपाण्डुमेहविषोदरान्। अर्शः शोथं विषं कण्डूं त्रिदोषमपि नाशयेत् ।।६०।। सोनामाखी के संस्कृत नाम—स्वर्णमाक्षिक, तापीज, मधुमाक्षिक, ताप्य, माक्षिकधातु और मधुधातु ये सब हैं। सोनामाखी—थोड़े सोने की भी मिलावट होने से किंचित् सोने के गुणों से युक्त 'सोनामाखी' को सोने का उपधातु कहते हैं। तथा सोने के अभाव में इसे देते भी हैं किन्तु सोने का अनुकल्प होने से इसमें सोने की अपेक्षा कम गुण रहता है और इसमें केवल सोने के ही गुण नहीं रहते हैं किन्तु दूसरे भी द्रव्यों का संयोग होने से अन्यों के भी गुण रहते हैं। सोनामाखी मधुर तथा तिक्त रसयुक्त, वृष्य (वीर्यवर्धक), रसायन, नेत्रों के लिए हितकर एवं-बस्ति (मूत्राशय) सम्बन्धी रोग, कुष्ठ, पाण्डु, प्रमेह, विष, उदररोग, अर्श, शोथ, खुजली तथा त्रिदोषनाशक है। [५५-६०] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

धात्वादिवर्गः ७६५ अथाशुद्धसुवर्णमाक्षिकदोषानाह मन्दानलत्वं बलहानिमुग्रां विष्टम्भितां नेत्रगदान्सकुष्ठान्। तथैव मालां व्रणपूर्विकां च करोति तापीजमशुद्धमेतत् ।। ६१ ।। अशुद्ध सोनामाखी के दोष-यदि यह सोनामाखी शोधी हुई न हो तो अग्नि की मन्दता, बल की हानि, अत्यन्त विष्टम्भ, नेत्ररोग, कुष्ठ तथा व्रणमाला (कण्ठमाला) आदि रोगों को उत्पन्न करने वाली होती है। [६१] अथ तारमाक्षिकम् (रूपामाखी) तस्य नामानि गुणाँश्चाह तारमाक्षिकमन्यत् तु तद्भवेद् रजतोपमम्। किञ्चिद्रजतसाहित्यात्तारमाक्षिकमीरितम् ।। ६२ ।। अनुकल्पतया तस्या ततो हीनगुणाः स्मृताः। न केवलं रूप्यगुणा यतः स्यात्तारमाक्षिकम् ।। ६३ ।। स्वादु पाके रसे किञ्चित्तिक्तं वृष्यं रसायनम्। चक्षुष्यं बस्तिरुक्कुष्ठपाण्डुमेह विषोदरान् ।। अर्श शोथं क्षयङ्कण्डूं त्रिदोषमपि नाशयेत् ।। ६४ ।। रूपामाखी के संस्कृत नाम-तारमाक्षिक, रौप्यमाक्षिक आदि हैं। रूपामाखी-दूसरा जो रूपामाखी है वह गुण में चाँदी के तुल्य ही होता है और कुछ चाँदी का संयोग होने से इसे 'रूपामाखी' कहते हैं। चाँदी का अनुकल्प होने से उसकी अपेक्षा इसके गुण स्वल्प होते हैं। और इसमें केवल चाँदी ही के गुण नहीं रहते हैं बल्कि दूसरे द्रव्यों का भी योग होने से औरों के भी गुण आ जाते हैं। रूपामाखी-विपाक में मधुर रसयुक्त तथा मधुर एवं किञ्चित् तिक्तरसयुक्त, वीर्यवर्धक, रसायन, नेत्रों के लिये हितकर एवम् बस्ति (मूत्राशय) सम्बन्धी रोग, कुष्ठ, पाण्डु, प्रमेह, विष, उदररोग, अर्श, शोथ, क्षय, खुजली तथा त्रिदोष को दूर करता है। [६२-६४] अथाशुद्धतारमाक्षिकदोषानाह मन्दानलत्वं बलहानिमुग्रां विष्टम्भितां नेत्रगदान्सकुष्ठान्। तथैव मालां व्रणपूर्विकाञ्च करोति तापीजमिदञ्च तद्वत् ।। ६५ ।। अशुद्ध रूपामाखी के दोष-यह भी सोनामाखी की भाँति यदि शोधी हुई न हो तो अग्नि की मन्दता, बल की हानि, अत्यन्त विष्टम्भ, नेत्ररोग, कुष्ठ तथा व्रणमाला (गण्डमाला आदि) रोगों को उत्पन्न करती है। [६५] अथ तुत्थम् (तूतिया) खर्परञ्च (खपरिया) तुत्थनामगुणान् खर्परगुणाँश्चाह तुत्थं वितुन्नकं चापि शिखिग्रीवं मयूरकम्। तुत्थं ताम्रोपधातुर्हि किञ्चित्ताम्रेण तद्भवेत् ।। ६६ ।। किञ्चित्ताम्रगुणं तस्माद्वक्ष्यमाणगुणं च तत्। तुत्थकं कटुकं क्षारं कषायं वामकं लघु ।। ६७ ।। लेखनं भेदनं शीतं चक्षुष्यं कफपित्तहृत्। विषाश्मकुष्ठकण्डूघ्नं खर्परं चापि तद्गुणम् ।। ६८ ।। तूतिया के संस्कृत नाम-तुत्थ, वितुन्नक, शिखिग्रीव तथा मयूरक ये सब हैं। तूतिया-यह ताँबे का उपधातु है, इससे कुछ ताँबा का भी अंश इसमें रहता है अतः कुछ ताँबे के गुण और अन्य द्रव्यों के संयोग से आगे कहे हुए गुण इसमें होते हैं। तूतिया-कटु तथा कषायरस युक्त, क्षार, वमन कराने वाला, लघु, लेखन, मलभेदक, शीतल, नेत्रों के लिए हितकर, एवम् कफ-पित्त-विष-पथरी-कुष्ठ तथा खुजली को दूर करने वाला होता है। खपरिया-खपरिया भी तूतिया के समान गुण वाली होती है। [६६-६८] अथ कांस्यम् (काँसा)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह ताम्रत्रपुजमाख्यातं कांस्यं घोषं च कंसकम्। उपधातुर्भवेत्कांस्यं द्वयोस्तरणिराङ्गयोः ।। ६९ ।। कांस्यस्य तु गुणा ज्ञेयाः स्वयोनिसदृशाजनैः। संयोगजप्रभावेण तस्यान्येऽपि गुणाः स्मृता ।। ७० ।। कास्यं कषायं तिक्तोष्णं लेखनं विशदं सरम्। गुरु नेत्रहितं रूक्षं कफपित्तहरं परम् ।। ७१ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

७६६ भावप्रकाशनिघण्टुः काँसा के संस्कृत नाम—ताम्रत्रपुज, कांस्य, घोष तथा कंसक ये सब हैं । काँसा—ताँबा तथा राँगा इन दोनों का उपधातु काँसा होता है । अतः अपनी उत्पत्ति का मूलकारण ताँबा तथा राँगा के होने से लोग काँसा को उपर्युक्त धातुओं (ताँबा तथा राँगा) के सदृश गुणवाला बतलाते हैं, अर्थात् जो ताँबा तथा राँगा के गुण हैं वे ही काँसा के भी होते हैं परन्तु स्वल्पमात्रा में, अन्य द्रव्यों का भी संयोग होने से अन्यों के भी गुण होते हैं । काँसा—कषाय तथा तिक्त रसयुक्त, उष्ण, लेखन, विशद गुणयुक्त, सारक, गुरु, नेत्रों के लिए हितकर, रूक्ष तथा कफ और पित्त का नाशक होता है । [६९-७१] अथारकूटम् (पीतल-कच्चापीतल) । तस्यनामगुणानाह पित्तलं त्वारकूटं स्यादारो रीतिश्च कथ्यते । राजरीतिर्ब्रह्मरीतिः कपिला पिङ्गलापि च ॥७२॥ रीतिरप्युपधातुः स्यात्ताम्रस्य यशदस्य च । पित्तलस्य गुणा ज्ञेयाः स्वयोनिसदृशा जनैः ॥७३॥ संयोगजप्रभावेण तस्याप्यन्ये गुणाः स्मृताः ॥७४॥ रीतिकायुगलं रूक्षं तिक्तञ्च लवणं रसे । शोधनं पाण्डुरोगघ्नं कृमिघ्नं नातिलेखनम् ॥७५॥ पीतल के संस्कृत नाम—पित्तल, आरकूट, आर एवं रीति हैं । इसके दूसरे भेद के नाम—राजरीति, ब्रह्मरीति, कपिला तथा पिङ्गला ये सब हैं । पीतल—ताँबा तथा जस्ता का उपधातु है, इससे अपने मूलकारण (ताँबा तथा जस्ता) के सदृश ही इसके भी गुण लोगों ने बतलाये हैं और अन्य द्रव्यों के संयोग से इसमें अन्यों के भी गुण रहते हैं । दोनों प्रकार के पीतल-तिक्त तथा लवण रसयुक्त, रूक्ष, शोधक, अत्यन्त लेखन नहीं अर्थात् किञ्चित् लेखन एवम्—पाण्डु और कृमिरोग के नाशक हैं । [७२- ७५] सिन्दूरम् । तस्य नामगुणानाह सिन्दूरं रक्तरेणुश्च नागगर्भश्च सीसजम् । सीसोपधातुः सिन्दूरं गुणैस्तत्सीसवन्मतम् ॥७६॥ संयोगजप्रभावेण तस्यान्येऽपि गुणाः स्मृताः । सिन्दूरमुष्णं वीसर्पकुष्ठकण्डूविषापहम् । भग्नसन्धानजननं व्रणशोधनरोपणम् ॥७७॥ सिन्दूर के संस्कृत नाम—सिन्दूर, रक्तरेणु, नागगर्भ तथा सीसज ये सब हैं । सिन्दूर—सीसा का उपधातु सिन्दूर है, अतः सीसा के समान इसके भी गुण हैं, अन्य द्रव्यों के संयोग-प्रभाव से इसके अत्य भी गुण होते हैं । सिन्दूर— उष्ण एवम् वीसर्प, कुष्ठ, खुजली तथा विष का नाशक है तथा टूटी अस्थियों को जोड़ने वाला, व्रण का शोधन और रोपण (पूरा) करने वाला होता है । [७६-७७] अथ शिलाजतु (शिलाजीत) तस्योत्पत्तिं भेदान् नामानि गुणांश्चाह निदाघे धर्मसन्तप्ता धातुसारं धराधराः । निर्यासवत्प्रमुञ्चन्ति तच्छिलाजतु कीर्त्तितम् ॥७८॥ सौवर्णं राजतं ताम्रमायसं तच्चतुर्विधम् । शिलाजत्वद्रिजतु च शैलनिर्यास इत्यपि ॥७९॥ गैरेयमश्मजं चापि गिरिजं शैलधातुजम् । शिलाजं कटु तिक्तोष्णं कटुपाकं रसायनम् ॥८०॥ छेदि योगवहं हन्ति कफमे १हाश्मशर्कराः । मूत्रकृच्छ्रं क्षयं श्वासं वातार्शांसि च पाण्डुताम् ॥८१॥ अपस्मारं तथोन्मादं शोथकुष्ठोदरकृमीन् ॥८२॥ १. मेदोश्मशर्कराः इति पाठ० ।

धात्वादिवर्गः ७६७ शिलाजीत की उत्पत्ति—ग्रीष्म ऋतु में धूप से तप्त होकर पर्वत धातुओं के सार भाग को गोंद की भाँति छोड़ते हैं अर्थात् पर्वतों पर गर्मी में जो धातुओं का सार पिघल कर पत्थरों से निकलता है—उसे “शिलाजीत" कहते हैं। भेद- (१) सौवर्ण (सोने का), (२) रजत (चांदी का), (३) ताम्र (तांबे का), (४) आयस (लोहे का) इस भाँति शिलाजीत के ४ भेद हैं। संस्कृत नाम-शिलाजतु, अद्रिजतु, शैलनिर्यास, गैरेय, अश्मज, गिरिज तथा शैलधातुज ये सब हैं। शिलाजीत-कटु तथा तिक्त रस युक्त, पाक में कटु, रसायन, मलों का छेदन करने वाला, योगवाही एवम्-कफ, प्रमेह, पथरी, शर्करा, मूत्रकृच्छ्र, क्षय, श्वास, बादी बवासीर, पाण्डुरोग, अपस्मार, उन्माद, शोथ, कुष्ठ तथा उदर के क्रिमि इन सबों को नष्ट करने वाला होता है। [७८-८२] अथ गुणलक्षणसहिताँस्तद्भेदानाह सौवर्णं तु जपापुष्पवर्णं भवति तद्रसात् । मधुरं कटु तिक्तं च शीतलं कटुपाकि च ।।८३।। रजतं पाण्डुरं शीतं कटुकं स्वादुपाकि च । ताम्रं मयूरकण्ठाभं तीक्ष्णमुष्णं च जायते ।।८४।। लौहं जटायुपक्षाभं सतिक्तं लवणं भवेत् । विपाके कटुकं शीतं सर्वश्रेष्ठमुदाहृतम् ।।८५।। सौवर्ण (सोने का) शिलाजीत के लक्षण-यह जपा (अढ़ौल) के पुष्प के समान लाल वर्ण का होता है। सौवर्णशिलाजीत-यह मधुर, कटु तथा तिक्त रस युक्त, विपाक में कटु रस युक्त तथा शीतल होता है। रजत (चाँदी का) शिलाजीत के लक्षण-यह पाण्डुर वर्ण का होता है। रजत शिलाजीत-यह कटु रस युक्त, विपाक में मधुर रस युक्त तथा शीतल होता है। ताम्र (ताँबे का) शिलाजीत के लक्षण-यह मयूर के कण्ठ के समान वर्ण वाला होता है। ताम्रशिलाजीत- यह तीक्ष्ण तथा उष्ण होता है। लौह (लोहे का) शिलाजीत के लक्षण-यह जटायु (गिद्ध) के पक्ष के सदृश वर्ण वाला होता है। लौह शिलाजीत-यह तिक्त तथा लवण रसयुक्त, विपाक में कटु रस युक्त तथा शीतल होता है और यही सर्वश्रेष्ठ होता है। [८३-८५] अथ रसः । तत्र रसशब्दस्य निरुक्तिमाह रसायनार्थिभिर्लोकैः पारदो रस्यते यतः। ततो रस इति प्रोक्तः स च धातुरपि स्मृतः ।।८६।। रस शब्द की निरुक्ति-रसायन को चाहने वाले लोग इस पारे का सेवन (भक्षण) करते हैं इससे यह ‘रस’ कहलाता है। और शरीर का पोषण करने से 'धातु' भी कहलाता है अर्थात् रस तथा धातु पद से पारे का बोध किया जाता है। [८६] अथ पारदः । तस्योत्पत्तिं भेदानाह शिवाङ्गात्प्रच्युतं रेत: पतितं धरणीतले। तद्देहसारजातत्वाच्छुक्लमच्छमभूच्च तत् ।।८७।। क्षेत्रभेदेन विज्ञेयं शिववीर्यं चतुर्विधम् । श्वेतं रक्तं तथा पीतं कृष्णं तत् तु भवेत्क्रमात् ।। ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रश्च खलु जातितः ।।८८।। श्वेतं शस्तं रुजां नाशे रक्तं किल रसायने। धातुवादे तु तत्पीतं खे गतौ कृष्णमेव च ।।८९।। पारे की उत्पत्ति-श्री शिवजी के अंग से स्खलित होकर जो वीर्य पृथ्वी पर गिरा वही ‘पारा' हुआ। और देह के सारभाग (वीर्य) से उत्पन्न होने से वह सफेद तथा स्वच्छ हुआ। भेद-क्षेत्रभेद से शिववीर्य (पारा) चार प्रकार का होता

७६८ भावप्रकाशनिघण्टुः है। जैसे—सफेद, लाल, पीला तथा काला और ये क्रम से ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र ४ जाति के कहलाते हैं अर्थात् ब्राह्मण जाति का पारा सफेद वर्ण का, क्षत्रिय जाति का लाल वर्ण का, वैश्य जाति का पीले वर्ण का और शूद्र जाति का काले वर्ण का होता है। उपर्युक्त भेदों का उपयोग—सफेद वर्ण का पारा—रोगों के नाश करने में उत्तम होता है। लाल वर्ण का पारा—रसायन के कार्य में, पीले वर्ण का पारा—धातुवाद अर्थात् सोना-चाँदी आदि बनाने के कार्य में और काले वर्ण का पारा आकाश गमन के कार्य में उत्तम होता है। [८७-८९] अथ पारदस्य नामगुणानाह पारदो रसधातुश्च रसेन्द्रश्च महारसः ।।९०।। चपलः शिववीर्यश्च रसः सूतः शिवाह्वयः । पारदः षड्रसः स्निग्धस्त्रिदोषघ्नो रसायनः ।।९१।। योगवाही महावृष्यः सदा दृष्टिबलप्रदः । सर्वामयहरः प्रोक्तो विशेषात्सर्वकुष्ठनुत् ।।९२।। पारा के संस्कृत नाम—पारद, रसधातु, रसेन्द्र, महारस, चपल, शिववीर्य, रस, सूत, शिवजी के नामवाचक सभी शब्द। (जैसे—शिव, रुद्र, हर, धूर्जटि इत्यादि) ये सब हैं। पारद—पारा मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय तथा तिक्त इन छ रसों से युक्त, स्निग्ध, त्रिदोष नाशक, रसायन, योगवाही, अत्यन्त वीर्यवर्धक, सदा नेत्रों की शक्ति तथा बल को देने वाला, सम्पूर्ण रोगों को दूर करने वाला तथा विशेष रूप से कुष्ठ का नांशक होता है। [९०-९२] अथ पारदस्यावस्थाभेदेन नामानि सर्वश्रेष्ठतां चाह स्वस्थो रसो भवेद् ब्रह्मा बद्धो ज्ञेयो जनार्दनः । रञ्जितः १कामितश्चापि साक्षाद्देवो महेश्वरः ।।९३।। मूर्च्छितो हरति रुजं बन्धनमनुभूय खे गतिं कुरुते। अजरीकरोति हि मृतः कोऽन्यः करुणाऽऽकरः सूतात्।।९४।। असाध्यो यो भवेद्रोगो यस्य नास्ति चिकित्सितम् ।। रसेन्द्रो हन्ति तं रोगं नरकुञ्जरवाजिनाम् ।।९५।। पारे का अवस्था भेद से नाम—स्वस्थ पारा—ब्रह्मा, बद्ध (बँधा हुआ) पारा—जनार्दन (विष्णु), रञ्जित तथा कामित पारा—साक्षात् महेश्वर संज्ञक होता है। पारे की सर्वश्रेष्ठता—पारा—मूर्च्छित होकर रोगों को दूर करता है और बन्धन का अनुभव करके अर्थात् बद्धपारा— आकाश में चलने की शक्ति देता है और मरा हुआ होकर अर्थात् मृतपारा—मनुष्यों को अजर (वृद्धावस्थाशून्य) करता है, अतः पारे से बढ़ कर कोई दूसरा कृपासागर नहीं हो सकता है। मनुष्य, हाथी तथा घोड़ों के जो रोग असाध्य हो गये हों अथवा जिन रोगों की चिकित्सा नहीं हो सकती है ऐसे रोगों को केवल पारा ही दूर कर देता है। [९३-९५] अथ फलनिर्देशपूर्वकं पारदस्थितदोषानाह मलं विषं वह्निगिरित्वचापलं नैसर्गिकं दोषमुशन्ति पारदे । उपाधिजौ द्वौ त्रपुनागयोगजौ दोषौ रसेन्द्रे कथितौ मुनीश्वरैः ।।९६।। मलेन मूर्च्छा मरणं विषेण दाहोऽग्निना कष्टतरः शरीरे । देहस्य जाड्यं गिरिणा सदा स्युश्चाञ्चल्यतो वीर्यहृतिश्च पुंसाम् । वङ्गेन कुष्ठं भुजगेन षण्ढो भवेदतोऽसौ परिशोधनीयः ।।९७।। वह्निर्विषं मलं चेति मुख्या दोषास्त्रयो रसे । एते कुर्वन्ति सन्तापं मृतिं मूर्च्छा नृणांक्रमात् ।।९८।। अन्येऽपि कथिता दोषा भिषग्भिः पारदे यदि । तथाऽप्येते त्रयो दोषा हरणीया विशेषतः ।।९९।। १. क्रामित इति पाठो० ।

धात्वादिवर्गः ७६९ पारे के स्वाभाविक दोष-मल, विष, अग्नि, गिरिदोष, चपलता ये सब हैं और आगन्तुक दोष-राँगा और सीसा के योग से होने वाले अन्य दोष हैं। इस भाँति से पारे के सब ७ दोष मुनीश्वरों ने कहे हैं। उक्त दोषों के फल-मल से मूर्च्छा, विष से मरण, अग्नि से शरीर में अत्यन्त कष्टकर दाह, गिरि से सदा शरीर की जड़ता, चपलता से पुरुषों का वीर्यनाश, वङ्ग (राँगा) से कुष्ठ, भुजंग अर्थात् नाग से नपुंसकता ये सब क्रम से होते हैं। अतः पारे का शोधन उक्त दोष की निवृत्ति के लिये परमावश्यक है। मुख्यरूप से तो पारा में-(१) अग्नि-(२) विष तथा (३) मल ये ही तीन दोष होते हैं। ये तीनों क्रम से मनुष्यों को (१) सन्ताप-(२) मरण-(३) मूर्च्छा करने वाले होते हैं। इनके अतिरिक्त अन्य भी दोष यद्यपि पारे में ऋषियों ने कहे हैं तथापि पारे के ये ३ दोष ही विशेष रूप से दूर करने योग्य हैं। [९७-९९] अथसंस्कृतपारदसेवननिषेधमाह संस्कारहीनं खलु सूतराजं यः सेवते तस्य करोति बाधाम्। देहस्य नाशं विदधाति नूनं कष्टांश्च रोगाञ्जनयेन्नराणाम् ।।१००।। असंस्कृत पारे के सेवन का निषेध-जो कोई बिना संस्कार किये हुये ही पारे का सेवन करता है तो वह उस (सेवन करने वाले) को पीड़ा पहुँचाता है, देह का नाश कर देता है, निश्चित रूप से मनुष्यों के रोगों को उत्पन्न करता है। तात्पर्य यह है कि भूल कर भी असंस्कृत पारे का सेवन नहीं करना चाहिये अन्यथा कष्टाधिक्य से मृत्यु तक हो जाती है। [१००] अथोपरसाः । तेषां संख्यामाह गन्धो हिङ्गुलमभ्रतालकशिलाः स्रोतोऽञ्जनं टङ्कणं राजावर्तकचुम्बकौ स्फटिकया शङ्खः खटी गैरिकम्। कासीसं रसकं कपर्दसिकताबोलाश्च कङ्गुष्ठकं सौराष्ट्री च मता अमी उपरसाः सूतस्य किञ्चिद्गुणै ।।१०१।। उपरसों की संख्या-गन्धक, हिङ्गुल, अभ्रक, हरताल, मैनशिल, सुरमा, सुहागा, राजावर्तक, चुम्बक, फिटकरी, शंख, खरिया, गेरू, कसीस, खपरिया, कौड़ी, बालु, बोल, कङ्गुष्ठ एवं सोरठी माटी ये सब उपरस कहे जाते हैं क्योंकि ये कुछ रस (पारा) के गुणों से युक्त होते हैं। [१०१] अथ हिङ्गुलम् । तस्य नामानि सलक्षणभेदान् गुणांश्चाह हिङ्गुलं दरदं म्लेच्छमिङ्गुलं श्चूर्णपारदम्। दरदस्त्रिविधः प्रोक्तश्चर्मारः शुकतुण्डकः ।।१०२।। हंसपादस्तृतीयः स्याद् गुणवानुत्तरोत्तरम् ।।१०३।। चर्मारः शुक्लवर्णः स्यात्स पीतः शुकतुण्डकः । जपाकुसुमसंङ्काशो हंसपादो महोत्तमः ।।१०४।। तिक्तं कषायं कटु हिङ्गुलं स्यान्नेत्रामयघ्नं कफपित्तहारि । हल्लासकुष्ठज्वरकामलाश्च प्लीहामवातौ च गरं निहन्ति ।।१०५।। हिङ्गुल के संस्कृत नाम-हिङ्गुल, दरद, म्लेच्छ, इङ्गुल और चूर्णपारद ये सब हैं। भेद-हिङ्गुल तीन प्रकार का होता है। (१) चर्मार, (२) शुकतुण्डक, (३) हंसपाद । इनमें से एक दूसरे की अपेक्षा उत्तरोत्तर गुणवान् होता है। जैसे-चर्मार की अपेक्षा शुकतुण्ड और शुकतुण्ड की अपेक्षा हंसपाद अधिक गुणवान् होता है। [१०२-१०५] उक्त भेदों के लक्षण-चर्मार-सफेद वर्ण का होता है, शुकतुण्ड-पीले वर्ण का एवम् हंसपाद जो कि सर्वोत्तम है वह जपाकुसुम (अढ़ौल के फूल) के समान लाल वर्ण का होता है। हिङ्गुल-तिक्त, कषाय, कटुरस युक्त एवम्-नेत्रसम्बन्धी-रोग, कफ, पित्त, हल्लास (उबकाई), कुष्ठ, ज्वर, कामला, प्लीहा, आमवात और विष को दूर करने वाला होता है। ५२ भाव. I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

७७० भावप्रकाशनिघण्टुः अथ हिङ्गुलोत्थं पारदं शुद्धमित्याह ऊर्ध्वपातनयुक्त्या तु डमरूयंत्रपाचितम्। हिङ्गुलं तस्य सूतं तु शुद्धमेव न शोधयेत् ।।१०६।। हिंगुल से निकाले हुये पारे की शुद्धि की अनावश्यकता—ऊर्ध्वपातन की युक्ति से डमरूयन्त्र में पकाया हुआ जो हिंगुल है, उससे निकाला हुआ जो पारा है वह स्वयं शुद्ध होता है अतः उसकी पुनः शुद्धी करने की आवश्यकता नहीं रहती है । [१०६] अथ गन्धकः । तस्योत्पत्तिं नामानि भेदांश्चाह श्वेतद्वीपे पुरा देव्याः क्रीडन्त्या रजसाऽऽप्लुतम् । दुकूलं तेन वस्त्रेण स्नातायाः क्षीरनीरधौ ।।१०७।। प्रसूतं यद्रजस्तस्माद्गन्धकः समभूत्ततः । गन्धको गन्धिकश्चापि गन्धपाषाण इत्यपि ।।१०८।। सौगन्धिकश्च कथितो बलिर्बलरसोऽपि च । चतुर्धा गन्धकः प्रोक्तो रक्तः पीतः सितोऽसितः ।।१०९।। गन्धक की उत्पत्ति—पहले एक समय श्वेतद्वीप में क्रीड़ा करती हुई श्री पार्वती जी का वस्त्र रजोधर्म होने से रज से भींग गया तब उसी समय क्षीर समुद्र में स्नान करने से जो रज इधर-उधर फैला उसी से गन्धक की उत्पत्ति हुई । गन्धक के संस्कृत नाम—गन्धक, गन्धिक, गन्धपाषाण, सौगन्धिक, बलि तथा बलरस ये सब हैं । भेद—गन्धक ४ प्रकार का होता है । (१) रक्तवर्ण का, (२) पीत वर्ण का, (३) श्वेत वर्ण का, (४) कृष्णवर्ण का होता है । [१०७-१०९] अथ गन्धकभेदानामुपयोगविषयानाह रक्तो हेमक्रियासूक्तः पीतश्चैव रसायने । व्रणादिलेपने श्वेतः कृष्णः श्रेष्ठः सुदुर्लभः ।।११०।। गन्धक के उक्त भेदों के उपयोग—रक्तवर्ण का गन्धक—सोना बनाने के कार्य में उपयुक्त होता है, पीत वर्ण का गन्धक—रसायन के कार्य में आता है, श्वेत वर्ण का गन्ध—व्रण आदि के ऊपर लेप करने के लिये उपयोगी होता है एवं कृष्णवर्ण का गन्ध-पूर्वोक्त सभी कार्यों में श्रेष्ठ होता है किन्तु यह अत्यन्त दुर्लभ होता है । [११०] ❖ श्रेष्ठः = हेमक्रियाऽऽदिषु सर्वत्र प्रशस्ततरः ।।११०।। यहाँ पर “श्रेष्ठ” पद से “हेमक्रिया (सोना बनाने) आदि पूर्वोक्त सभी कार्यों में अत्यन्त प्रशस्त होता है” यह अर्थ समझना चाहिये । [११०] अथ गन्धकगुणानाह गन्धकः कटुकस्तिक्तो वीर्योष्णास्तुवरः सरः । पित्तलः कटुकः पाके जन्तुकण्डूविसर्पजित् । हन्ति कुष्ठक्षयप्लीहकफवातान् रसायनः ।।१११।। गन्धक—कटु, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, विपाक में कटु रसयुक्त, उष्णवीर्य, सारक, पित्तजनक, रसायन एवम्- क्रिमि, खुजली, विसर्प, कुष्ठ, क्षय, प्लीहा, कफ तथा वात को दूर करने वाला होता है । [१११] अथाशुद्धगन्धकदोषानाह अशोधितो गन्धक एष कुष्ठं करोति तापं विषमं शरीरे । सौख्यं च रूपं च बलं तथौजः शुक्रं निहन्त्येव करोति चास्रम् ।।११२।। अशुद्ध गन्धक के दोष—बिना शोधा हुआ गन्धक यदि भक्षण किया जाय तो वह कुष्ठ, शरीर में विषम ज्वर तथा रक्तविकार को करता है एवम्—सुख, रूप, बल, ओज एवं शुक्र को नष्ट करता है । [११२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA

धात्वादिवर्गः ७७१ अथाभ्रकम्। तस्योत्पत्तिमाह पुरा वधाय वृत्रस्य वज्रिणा वज्रमुद्यतम्। विस्फुलिङ्गास्ततस्तस्य गगने परिसर्पिताः ।।१९३।। ते निपेतुर्घनध्वानाच्छिखरेषु महीभृताम्। तेम्य एवं समुत्पन्नं तत्तद्गिरिषु चाभ्रकम् ।।१९०४।। तद्वज्रं वज्रजातत्वादभ्रमभ्ररवोद्भवात्। गगनात्स्खलितं यस्माद्गगनं च ततो मतम् ।।१९५।। अभ्रक की उत्पत्ति-पहले एक समय जब इन्द्र ने वृत्रासुर के वध के लिए वज्र उठाया तब उससे उसकी चिनगारियां निकल कर आकाश में फैल गई। और उसके बाद वे सब मेघ का शब्द होने पर पर्वतों के शिखरों पर जाकर गिर पड़ीं और जिन-जिन पर्वतों पर वे गिरी थीं उन्हीं-उन्हीं पर्वतों पर उन चिनगारियों से अभ्रक की उत्पत्ति हुई। अभ्रक के कतिपय नामों के पड़ने का हेतु-वज्र से उत्पन्न होने से इसे 'वज्र', अभ्र अर्थात् मेघ के शब्द होने से उत्पत्ति हुई अतः 'अभ्रक' और गगन अर्थात्-आकाश से गिरा अतएव इसे 'गगन' भी कहते हैं। [१९३-१९५] अथाभ्रकभेदाँस्तेषामुपयोगविषयानाह विप्रक्षत्रियविट्शूद्रभेदात्तस्याच्चतुर्विधम्। क्रमेणैव सितं रक्तं पीतं कृष्णं च वर्णतः ।।१९६।। प्रशस्यते सितं तारे रक्तं तत्तु रसायने। पीतं हेमनि कृष्णं तु गदेषु द्रुतयेऽपि च ।।१९७।। अभ्रक के भेद-(१) ब्राह्मण-(२) क्षत्रिय, (३) वैश्य तथा (४) शूद्र ये ४ जातियाँ अभ्रक की होती हैं। उनके जाति वर्ण-क्रम से अर्थात् ब्राह्मण जाति का अभ्रक सफेद रंग का, क्षत्रिय जाति का लाल रंग का, वैश्य जाति का पीले रंग का और शूद्र जाति का काले रंग का होता है। उक्त भेदों के उपयोग-चाँदी बनाने के कार्य में सफेद अभ्रक का, रसायन के कार्य में लाल अभ्रक का, सोना बनाने में पीले अभ्रक का और रोग नष्ट करने में काले अभ्रक का उपयोग किया जाता है। [१९६-१९७] अथाभ्रकस्यान्यानपि भेदाँल्लक्षणगुणनिर्देशपूर्वकमाह पिनाकं दर्दुरं नागं वज्रं चेति चतुर्विधम्। मुञ्चत्यग्नौ विनिक्षिप्तं पिनाकं दलसञ्चयम् ।।१९८।। अज्ञानाद्भक्षणं तस्य महाकुष्ठप्रदायकम्। दर्दुरं त्वग्निनिक्षिप्तं कुरुते दर्दुरध्वनिम् ।।१९९।। गोलकान्बहुशः कृत्वा स स्यान्मृत्युप्रदायकः। नागं तु नागवद्वह्नौ फूत्कारं परिमुञ्चति ।।१२०।। तद्भक्षितमवश्यं तु विदधाति भगन्दरम्। वज्रं तु वज्रवत्तिष्ठेत्तन्नाग्नौ विकृतिं व्रजेत् ।। १२१ ।। सर्वाभ्रेषु वरं वज्रं व्याधिवाद्धैंक्यमृत्युहृत् ।।१२२।। अभ्रक के और भी भेदों के नाम-(१) पिनाक, (२) दर्दुर, (३) नाग, (४) वज्र, ये ४ भेद अभ्रक के हैं। उक्त भेदों के लक्षण-पिनाक नामक अभ्रक के लक्षण-अग्नि में डाल देने पर जिससे परत निकल-निकल कर अलग होने लगे उसे 'पिनाक' समझना चाहिये। पिनाक-यदि अज्ञान से खा लिया जाय तो महाकुष्ठ हो जाता है। दर्दुर के लक्षण-जो अग्नि में छोड़ने पर मेढक की भाँति शब्द करे वह 'दर्दुर' कहलाता है। दर्दुर-इसे खा लेने से शरीर में बहुत सी गाँठों की उत्पत्ति होकर मृत्यु हो जाती है। नागनामक अभ्रक के लक्षण-अग्नि में डालने पर जिससे साँप के समान फुंकार निकले उसे 'नाग' समझना चाहिये। नाग-इसके खाने से भगन्दर अवश्य हो जाता है। वज्र के लक्षण-जो कि अग्नि में डालने पर किसी तरह की विकृति को न प्राप्त होकर वज्र की भांति स्थिर रहता है वह "वज्र" नामक अभ्रक कहलाता है। वज्र-सम्पूर्ण अभ्रकों में वज्र नामक ही अभ्रक सर्वश्रेष्ठ होता है, क्योंकि यह रोग, बुढ़ापा तथा मृत्यु को भी दूर करने वाला होता है। [१९८-१२२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA

७७२ भावप्रकाशनिघण्टुः अथोत्पत्तिस्थानाभेदेनाभ्रकस्य गुणभेदानाह अभ्रमुत्तरशैलोत्थं बहुसत्त्वं गुणाधिकम् । दक्षिणाद्रिभवं स्वल्पसत्त्वमल्पगुणप्रदम् ।।१२३।। उत्पत्ति स्थान के भेद से अभ्रक के गुणों में भेद—उत्तर के पर्वतों पर उत्पन्न होने वाला अभ्रक—अत्यन्त वीर्यशाली अतएव अधिक गुणकारी होता है और दक्षिण के पर्वतों पर उत्पन्न होने वाला अभ्रक—स्वल्प वीर्यवाला अतएव स्वल्प गुणकारी होता है । [१२३] अथ मृताभ्रकगुणानाह अभ्रं कषायं मधुरं सुशीतमायुष्करं धातुविवर्द्धनं च । हन्यात्रिदोषं व्रणमेहकुष्ठप्लीहोदरग्रन्थिविषक्रिमींश्च ।।१२४।। रोगान्हन्ति द्रढयति वपुर्वीर्यवृद्धिं विधत्ते तारुण्याढ्यं रमयति शतं योषितां नित्यमेव । दीर्घायुष्काञ्जनयति सुतान्विक्रमैःसिंहतुल्यान् मृत्योर्भीतिं हरति सततं सेव्यमानं मृताभ्रम् ।।१२५।। अभ्रक भस्म (मृत अभ्रक)—यह कषाय तथा मधुर रसयुक्त, अत्यन्त शीतल, आयु को बढ़ाने वाला, धातुवर्धक एवम्-त्रिदोष, व्रण, प्रमेह, कुष्ठ, प्लीहा, उदररोग, ग्रन्थि (गिल्टी), विष तथा क्रिमि को दूर करने वाला होता है । यदि मृत अभ्रक (अभ्रक भस्म) का नित्य सेवन किया जाय तो वह—रोगों को दूर करता है तथा शरीर को दृढ़ और वीर्य की वृद्धि करता है और नित्य तरुणाई से भरा हुआ सौ स्त्रियों से रमण करने की शक्ति देता है तथा सिंह के समान पराक्रमी, दीर्घ आयु वाले पुत्रों को उत्पन्न करता है और मृत्यु के भय को दूर करता है । [१२४-१२५] अथाशुद्धाभ्रकदोषानाह पीडां विधत्ते विविधां नराणां कुष्ठं क्षयं पाण्डुगदं च शोथम् । हृत्पार्श्वपीडां च करोत्यशुद्धमभ्रं त्वसिद्धं गुरु तापदं स्यात् ।।१२६।। अशुद्ध अभ्रक के दोष—बिना शोधन किया हुआ अभ्रक—सेवन करने से मनुष्यों को अनेक प्रकार की पीड़ा करता है एवं-कुष्ठ, क्षय, पाण्डुरोग, शोथ, हृदय तथा पार्श्व (पसुली) में पीड़ा करता है । असिद्ध अभ्रक के दोष—यदि अभ्रक भस्म असिद्ध (कच्ची) हो तो सेवन करने से अत्यन्त ताप देने वाला होता है । [१२६] अथ हरितालम् । तस्य गुणलक्षणसहितान् भेदान् गुणाँश्चाह हरितालं तु तालं स्यादालं तालकमित्यपि । हरितालं द्विधा प्रोक्तं पत्राख्यं पिण्डसंज्ञकम् ।।१२७।। तयोराद्यं गुणैः श्रेष्ठं ततो हीनगुणं परम् । स्वर्णवर्णं गुरु स्निग्धं सपत्रं चाभ्रपत्रवत् ।।१२८।। पत्राख्यं तालकं विद्याद् गुणाढ्यं तद्रसायनम् । निष्पत्रं पिण्डसदृशं स्वल्पसत्त्वं तथा गुरु ।।१२९।। स्त्रीपुष्पहरकं स्वल्पगुणं तत्पिण्डतालकम् । हरितालं कटु स्निग्धं कषायोष्णं हरिद्विषम् । कण्डुकुष्ठास्यरोगास्रकफपित्तकचव्रणान् ।।१३०।। हरताल के संस्कृत नाम—हरिताल, ताल, आल और तालक ये सब हैं। भेद—हरताल दो प्रकार का होता है। (१) पत्राख्य (तबकिया) हरताल, (२) पिण्डसंज्ञक हरताल। इनमें से पहला जो पत्राख्य (तबकिया) हरताल है वह गुणों में श्रेष्ठ होता है और दूसरा जो पिण्डसंज्ञक हरताल है वह हीन गुणवाला होता है। पत्राख्य (तबकिया) हरताल के लक्षण—सोने के समान वर्ण वाला, गुरु, स्निग्ध, अभ्रक के पत्र के समान पत्रवाला जो पत्राख्य (तबकिया) हरताल होता है, वह गुणों से युक्त तथा रसायन होता है। और जो पत्र से रहित पिण्ड के समान पिण्ड हरताल होता है, वह CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA.

धात्वादिवर्गः ७७३ स्वल्प वीर्यशाली, गुरु, स्त्री के पुष्प को नष्ट करने वाला एवं अल्प गुणयुक्त होता है। हरताल-कटु तथा कषाय रसयुक्त, स्निग्ध, उष्ण होता है एवं-विष, खुजली, कुष्ठ, मुख के रोग, रक्तविकार, कफ, पित्त, केश तथा व्रण (घाव) को नष्ट करनेवाला होता है। [१२७-१३०] अथाशुद्धस्यासम्यङ्मारितस्य च हरितालस्य दोषानाह हरति च हरितालं चारुतां देहजातां सृजति च बहुतापञ्चाङ्गसङ्कोचपीडाम्। वितरति कफवातौ कुष्ठरोगं विदध्या दिदमाशितमशुद्धं मारितं चाप्यसम्यक् ।।१३१।। बिना शोधा हुआ दोनों प्रकार का हरताल-भक्षण करने से शरीर की सुन्दरता को दूर करता है, अत्यन्त ताप को उत्पन्न करता है, अंगों में सङ्कोच की पीड़ा देता है एवम्-कफ, वात तथा कुष्ठ को करता है। [१३१] अथ मनःशिला (मैनसिला)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह मनःशिला मनोगुप्ता मनोह्वा नागजिह्विका। नेपाली कुनटी गोला शिला दिव्यौषधिः स्मृता ।।१३२।। मनःशिला गुरुर्वर्ण्या सरोष्णा लेखनी कटुः । तिक्ता स्निग्धा विषश्वासकासभूतकफास्रनुत् ।।१३३।। मैनशिल के संस्कृत नाम-मनःशिला, मनोगुप्ता, मनोह्वा, नागजिह्विका, नेपाली, कुनटी, गोला, शिला तथा दिव्यौषधि ये सब हैं। मैनशिल-यह कटु तथा तिक्त रसयुक्त, गुरु, शरीर के वर्ण को उत्तम बनाने वाली, सारक, उष्ण, लेखन तथा स्निग्ध होती है एवम्-विष, श्वास, कास, भूतबाधा, कफ तथा रक्तविकार को दूर करने वाली होती है। [१३२-१३३] अथाशुद्धायास्तस्यादोषानाह मनःशिला मन्दबलं करोति जन्तुं ध्रुवं शोधनमन्तरेण। मलानुबन्धं किल मूत्ररोधं सशर्करं कृच्छ्रगदं च कुर्यात् ।।१३४।। अशुद्ध मैनशिल के दोष-बिना शोधी हुई मैनशिल-सेवन करने वाले मनुष्य के बल को मन्द करने वाली तथा मल का अनुबन्ध (दस्त की रुकावट), मूत्ररोध और शर्करायुक्त मूत्रकृच्छ्र रोग को पैदा करती है। [१३४] अथ स्रोतोऽञ्जनं सौवीरं च (काला, सफेद सुरमा)। तयोर्नामलक्षणगुणानाह अञ्जनं यामुनंवापि कापोताञ्जनमित्यपि। तत्तु स्रोतोऽञ्जनं कृष्णं सौवीरं श्वेतमीरितम् ।।१३५।। वल्मीकशिखराकारे भिन्नमञ्जनसन्निभम्। घृष्टं तु गैरिकाकारमेतत्स्त्रोतोऽञ्जनं स्मृतम् ।।१३६।। स्रोतोऽञ्जनसमं ज्ञेयं सौवीरं तत्तु पाण्डुरम्। स्रोतोऽञ्जनं स्मृत स्वादु चक्षुष्यं कफपित्तनुत् ।।१३७।। कषायं लेखनं स्निग्धं ग्राहि च्छर्दिविषापहम्। सिध्माक्षयास्रहृच्छीतं सेवनीयं सदा बुधैः ।।१३८।। स्रोतोऽञ्जनगुणाः सर्वे सौवीरेऽपिमता बुधः। किन्तु द्वयोरञ्जनयोः श्रेष्ठं स्रोतोऽञ्जनं स्मृतम् ।।१३९।। सुरमा के साधारण संस्कृत नाम-अञ्जन, यामुन तथा कापोताञ्जन ये सब हैं। भेद और उनके लक्षण-सुरमा में जो काला होता है उसे संस्कृत में "स्रोतोऽञ्जन" कहते हैं और जो सफेद होता है उसे "सौवीर" कहते हैं। लक्षण-स्रोतोऽञ्जन (काला सुरमा)-यह वल्मीक (बाँबी) के शिखर के समान आकारवाला, तोड़ने पर अञ्जन के टुकड़ों के समान एवं घिसने पर "गेरू" के समान होता है। सौवीर (सफेद सुरमा)-यह पाण्डुर वर्ण का तथा गुणों में काले सुरमे के समान ही होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

७७४ भावप्रकाशनिघण्टुः काला सुरमा—स्वादिष्ट, कषाय रसयुक्त, नेत्रों के लिये हितकर, लेखन, स्निग्ध, ग्राही तथा शीतल होता है एवम्—कफ, पित्त, वमन, विष, सिध्म (क्षुद्रकुष्ठ के भेद), क्षय तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। अतएव बुद्धिमानों को सदा इसे सेवन करना चाहिये। काले सुरमे में जो गुण हैं वे ही सब सफेद सुरमे में भी रहते हैं ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं। किन्तु इन दोनों अञ्जनों में श्रेष्ठ 'स्रोतोऽञ्जन' काला सुरमा ही समझा जाता है। [१३५-१३९] अथ टङ्कणः (सोहागा)। तस्य गुणानाह टङ्कणोऽग्निकरो रूक्षः कफघ्नो वातपित्तकृत् ।।१४०।। सुहागा—अग्निकारक, रूक्ष, कफनाशक तथा वात और पित्त को उत्पन्न करने वाला होता है। [१४०] अयमुपरसत्वात् पुनरुक्तः ।।१४०।। यहाँ पर यह समझना चाहिये कि—यह उपरस होने से पुनः यहाँ पर कहा गया है। [१४०] अथ स्फटिका (फिटकिरी)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह स्फटी च स्फटिका प्रोक्ता श्वेता शुभ्रा च रङ्गदा। दृढरङ्गा रङ्गदृढा रङ्गाङ्गाऽपि च कथ्यते ।।१४१।। स्फटिका तु कषायोष्णा वातपित्तकफव्रणान्। निहन्ति श्वित्रवीसर्पान् योनिसङ्कोचकारिणी ।।१४२।। फिटकिरी के संस्कृत नाम—स्फटी, स्फटिका, श्वेता, शुभ्रा, रङ्गदा, दृढरङ्गा, रङ्गाङ्गा ये सब हैं। फिटकिरी—कषाय रस युक्त, उष्ण, योनिमार्ग को संकुचित करने वाली एवम्—वात, पित्त, कफ, व्रण (घाव), श्वेत कुष्ठ तथा विसर्प को दूर करने वाली होती है। [१४१-१४२] अथ राजावर्त्तः (रेवटी)। तस्य नामगुणानाह राजावर्त्तो नृपावर्त्तो राजन्यावर्त्तकस्तथा। आवर्त्तमणिसंज्ञश्च ह्यावर्त्तोऽपि तथैव च ।।१४३।। राजावर्त्तः कटुस्तिक्तः शिशिरः पित्तनाशनः। राजावर्त्तः प्रमेहघ्नश्छर्दिहिक्कानिवारणः ।।१४४।। रेवटी के संस्कृत नाम—राजावर्त्त, नृपावर्त्त, राजन्यावर्त्तक, आवर्त्तमणिसंज्ञक, आवर्त्त (आवर्त्तक) ये सब हैं। राजावर्त्त—कटु तथा तिक्त रसयुक्त, शीतल, पित्तनाशक एवम्—प्रमेह, वमन तथा हिचकी को दूर करने वाली होती है। [१४३-१४४] अथ चुम्बकः। तस्य नामगुणानाह चुम्बकः कान्तपाषाणोऽयस्कान्तो लौहकर्षकः। चुम्बको लेखनः शीतो मेदोविषगरापहः ।।१४५।। चुम्बक के संस्कृत नाम—चुम्बक, कान्तपाषाण, अयस्कान्त और लौहकर्षक ये सब हैं। चुम्बक—लेखन, शीतल तथा मेद, विष और गर (उपविष) को नष्ट करने वाला होता है। यहाँ पर नानाप्राण्यङ्गजमलविरुद्धौषधभस्मनाम्। विषाणाञ्चाल्पवीर्याणां योगो गर इति स्मृतः ।।१।। अर्थ—अनेक प्रकार के प्राणियों के अङ्गों का मल, विरुद्ध औषधों के भस्म, अल्पवीर्य वाले विषों के परस्पर योग को 'गर' कहते हैं। यह गर का विशेष अर्थ समझना चाहिये। [१४५] अथ गैरिकं सुवर्णगैरिकं च (गेरू-सोनागेरू)। तयोर्नामगुणानाह गैरिकं रक्तधातुश्च गैरैयं गिरिजं तथा। सुवर्णगैरिकं त्वन्यत्ततो रक्ततरं हि तत् ।।१४६।। गैरिकद्वितयं स्निग्धं मधुरं तुवरं हिमम्। चक्षुष्यं दाहपित्तास्रकफहिक्काविषापहम् ।।१४७।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

धात्वादिवर्गः ७७५ गेरू के संस्कृत नाम-गैरिक, रक्तधातु, गैरेय, गिरिज ये सब हैं। गेरू के भेद-गेरू से भिन्न एक प्रकार का और भी गेरू होता है जो इसकी अपेक्षा अत्यन्त लाल रंग का होता है उसे संस्कृत में 'स्वर्णगैरिक' कहते हैं। दोनों गेरू (गेरू-सोना गेरू) - यह मधुर तथा कषाय रस युक्त, स्निग्ध, शीतल, नेत्रों के लिये हितकर एवम्-दाह-पित्त-रक्तविकार-कफ-हिचकी तथा विष इन सबों को दूर करने वाले होते हैं। [१४६-१४७] अथ खटिका गौरखटिका च (खडिया, गौरखरिया) । तयोर्नामगुणानाह खटिका कठिनी चापि लेखनी च निगद्यते । खटी दाहास्त्रजिच्छीता मधुरा विषशोथजित् ।।१४८।। लेपादेतद्गुणा प्रोक्ता भक्षिता मृत्तिकासमा । खटी गौरखटी द्वे च गुणैस्तुल्ये प्रकीर्त्तिते ।।१४९।। खड़िया के संस्कृत नाम-खटिका, कठिनी तथा लेखनी ये सब हैं। खड़िया-मधुर रस युक्त, शीतल एवं-दाह-रक्तविकार-विष तथा शोथ को दूर करने वाली होती है। लेप करने से ही उक्त गुण खड़िया के ज्ञात होते हैं। खाने पर तो मिट्टी के समान गुण वाली होती है। खड़िया तथा गैर खरिया ये दोनों ही गुणों में समान ही मानी जाती हैं। [१४८-१४९] अथ वालुका (बालू) । तस्या नामगुणानाह वालुका सिकता प्रोक्ता शर्करा रेतजाऽपि च । वालुका लेखनी शीता व्रणोरःक्षतनाशिनी ।।१५०।। बालू के संस्कृत नाम-वालुका, सिकता, शर्करा और रेतजा ये सब हैं। बालू-लेखन, शीतल तथा व्रण और उरःक्षत को दूर करने वाली होती है। [१५०] अथ तुत्थभेदः खर्परी (खपरिया) तस्या नामगुणानाह खर्परी तुत्थकं तुत्थादन्यत्तद्रसकं स्मृतम् । ये गुणास्तुत्थके प्रोक्तास्ते गुणा रसके स्मृताः ।।१५१।। खपरिया के संस्कृत नाम-खर्परी, तुत्थक, रसक, तुत्थभेद ये सब हैं। खपरिया-जो गुण तूतिया के कहे हुये हैं वे ही सब इसके भी होते हैं। [१५१] अथ काशीशम् (कसीस) । तस्य नामानि भेदान् गुणाँश्चाह काशीशं धातुकाशीशं पांशुकाशीशमित्यपि । तदेव किञ्चित्पीतं तु पुष्पकाशीशमुच्यते ।।१५२।। काशीशमम्लमुष्णं च तिक्तञ्च तुवरं तथा । वातश्लेष्महरं केश्यं नेत्रकण्डूविषप्रणुत् ।। मूत्रकृच्छ्राश्मरीश्वित्रनाशनं परिकीर्तितम् ।।१५३।। कसीस के संस्कृत नाम-काशीश, धातुकाशीश, पांशुकाशीश ये सब हैं। भेद-कसीस यदि थोड़ा पीला हो तो उसका संस्कृत नाम-पुष्पकाशीश होता है। कसीस-अम्ल, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, उष्ण (गरम), बालों के लिये हितकर, वात, कफ, नेत्रों की खुजली, विष, मूत्रकृच्छ्र, पथरी तथा श्वेत कुष्ठ को दूर करने वाला होता है। [१५२-१५३] अथ सौराष्ट्री मृत्तिका (सोरठी माटी) । तस्या नामगुणानाह सौराष्ट्री तुवरी काली मृत्तालकसुराष्ट्रजे ।। १५४ ।। आढकी चापि सा ख्याता मृत्स्ना च सुरमृत्तिका । स्फटिकाया गुणाः सर्वे सौराष्ट्र्या अपि कीर्तिताः ।। १५५ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA