भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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धात्वादिवर्गः ७७१ अथाभ्रकम्। तस्योत्पत्तिमाह पुरा वधाय वृत्रस्य वज्रिणा वज्रमुद्यतम्। विस्फुलिङ्गास्ततस्तस्य गगने परिसर्पिताः ।।१९३।। ते निपेतुर्घनध्वानाच्छिखरेषु महीभृताम्। तेम्य एवं समुत्पन्नं तत्तद्गिरिषु चाभ्रकम् ।।१९०४।। तद्वज्रं वज्रजातत्वादभ्रमभ्ररवोद्भवात्। गगनात्स्खलितं यस्माद्गगनं च ततो मतम् ।।१९५।। अभ्रक की उत्पत्ति-पहले एक समय जब इन्द्र ने वृत्रासुर के वध के लिए वज्र उठाया तब उससे उसकी चिनगारियां निकल कर आकाश में फैल गई। और उसके बाद वे सब मेघ का शब्द होने पर पर्वतों के शिखरों पर जाकर गिर पड़ीं और जिन-जिन पर्वतों पर वे गिरी थीं उन्हीं-उन्हीं पर्वतों पर उन चिनगारियों से अभ्रक की उत्पत्ति हुई। अभ्रक के कतिपय नामों के पड़ने का हेतु-वज्र से उत्पन्न होने से इसे 'वज्र', अभ्र अर्थात् मेघ के शब्द होने से उत्पत्ति हुई अतः 'अभ्रक' और गगन अर्थात्-आकाश से गिरा अतएव इसे 'गगन' भी कहते हैं। [१९३-१९५] अथाभ्रकभेदाँस्तेषामुपयोगविषयानाह विप्रक्षत्रियविट्शूद्रभेदात्तस्याच्चतुर्विधम्। क्रमेणैव सितं रक्तं पीतं कृष्णं च वर्णतः ।।१९६।। प्रशस्यते सितं तारे रक्तं तत्तु रसायने। पीतं हेमनि कृष्णं तु गदेषु द्रुतयेऽपि च ।।१९७।। अभ्रक के भेद-(१) ब्राह्मण-(२) क्षत्रिय, (३) वैश्य तथा (४) शूद्र ये ४ जातियाँ अभ्रक की होती हैं। उनके जाति वर्ण-क्रम से अर्थात् ब्राह्मण जाति का अभ्रक सफेद रंग का, क्षत्रिय जाति का लाल रंग का, वैश्य जाति का पीले रंग का और शूद्र जाति का काले रंग का होता है। उक्त भेदों के उपयोग-चाँदी बनाने के कार्य में सफेद अभ्रक का, रसायन के कार्य में लाल अभ्रक का, सोना बनाने में पीले अभ्रक का और रोग नष्ट करने में काले अभ्रक का उपयोग किया जाता है। [१९६-१९७] अथाभ्रकस्यान्यानपि भेदाँल्लक्षणगुणनिर्देशपूर्वकमाह पिनाकं दर्दुरं नागं वज्रं चेति चतुर्विधम्। मुञ्चत्यग्नौ विनिक्षिप्तं पिनाकं दलसञ्चयम् ।।१९८।। अज्ञानाद्भक्षणं तस्य महाकुष्ठप्रदायकम्। दर्दुरं त्वग्निनिक्षिप्तं कुरुते दर्दुरध्वनिम् ।।१९९।। गोलकान्बहुशः कृत्वा स स्यान्मृत्युप्रदायकः। नागं तु नागवद्वह्नौ फूत्कारं परिमुञ्चति ।।१२०।। तद्भक्षितमवश्यं तु विदधाति भगन्दरम्। वज्रं तु वज्रवत्तिष्ठेत्तन्नाग्नौ विकृतिं व्रजेत् ।। १२१ ।। सर्वाभ्रेषु वरं वज्रं व्याधिवाद्धैंक्यमृत्युहृत् ।।१२२।। अभ्रक के और भी भेदों के नाम-(१) पिनाक, (२) दर्दुर, (३) नाग, (४) वज्र, ये ४ भेद अभ्रक के हैं। उक्त भेदों के लक्षण-पिनाक नामक अभ्रक के लक्षण-अग्नि में डाल देने पर जिससे परत निकल-निकल कर अलग होने लगे उसे 'पिनाक' समझना चाहिये। पिनाक-यदि अज्ञान से खा लिया जाय तो महाकुष्ठ हो जाता है। दर्दुर के लक्षण-जो अग्नि में छोड़ने पर मेढक की भाँति शब्द करे वह 'दर्दुर' कहलाता है। दर्दुर-इसे खा लेने से शरीर में बहुत सी गाँठों की उत्पत्ति होकर मृत्यु हो जाती है। नागनामक अभ्रक के लक्षण-अग्नि में डालने पर जिससे साँप के समान फुंकार निकले उसे 'नाग' समझना चाहिये। नाग-इसके खाने से भगन्दर अवश्य हो जाता है। वज्र के लक्षण-जो कि अग्नि में डालने पर किसी तरह की विकृति को न प्राप्त होकर वज्र की भांति स्थिर रहता है वह "वज्र" नामक अभ्रक कहलाता है। वज्र-सम्पूर्ण अभ्रकों में वज्र नामक ही अभ्रक सर्वश्रेष्ठ होता है, क्योंकि यह रोग, बुढ़ापा तथा मृत्यु को भी दूर करने वाला होता है। [१९८-१२२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA