भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७७० भावप्रकाशनिघण्टुः अथ हिङ्गुलोत्थं पारदं शुद्धमित्याह ऊर्ध्वपातनयुक्त्या तु डमरूयंत्रपाचितम्। हिङ्गुलं तस्य सूतं तु शुद्धमेव न शोधयेत् ।।१०६।। हिंगुल से निकाले हुये पारे की शुद्धि की अनावश्यकता—ऊर्ध्वपातन की युक्ति से डमरूयन्त्र में पकाया हुआ जो हिंगुल है, उससे निकाला हुआ जो पारा है वह स्वयं शुद्ध होता है अतः उसकी पुनः शुद्धी करने की आवश्यकता नहीं रहती है । [१०६] अथ गन्धकः । तस्योत्पत्तिं नामानि भेदांश्चाह श्वेतद्वीपे पुरा देव्याः क्रीडन्त्या रजसाऽऽप्लुतम् । दुकूलं तेन वस्त्रेण स्नातायाः क्षीरनीरधौ ।।१०७।। प्रसूतं यद्रजस्तस्माद्गन्धकः समभूत्ततः । गन्धको गन्धिकश्चापि गन्धपाषाण इत्यपि ।।१०८।। सौगन्धिकश्च कथितो बलिर्बलरसोऽपि च । चतुर्धा गन्धकः प्रोक्तो रक्तः पीतः सितोऽसितः ।।१०९।। गन्धक की उत्पत्ति—पहले एक समय श्वेतद्वीप में क्रीड़ा करती हुई श्री पार्वती जी का वस्त्र रजोधर्म होने से रज से भींग गया तब उसी समय क्षीर समुद्र में स्नान करने से जो रज इधर-उधर फैला उसी से गन्धक की उत्पत्ति हुई । गन्धक के संस्कृत नाम—गन्धक, गन्धिक, गन्धपाषाण, सौगन्धिक, बलि तथा बलरस ये सब हैं । भेद—गन्धक ४ प्रकार का होता है । (१) रक्तवर्ण का, (२) पीत वर्ण का, (३) श्वेत वर्ण का, (४) कृष्णवर्ण का होता है । [१०७-१०९] अथ गन्धकभेदानामुपयोगविषयानाह रक्तो हेमक्रियासूक्तः पीतश्चैव रसायने । व्रणादिलेपने श्वेतः कृष्णः श्रेष्ठः सुदुर्लभः ।।११०।। गन्धक के उक्त भेदों के उपयोग—रक्तवर्ण का गन्धक—सोना बनाने के कार्य में उपयुक्त होता है, पीत वर्ण का गन्धक—रसायन के कार्य में आता है, श्वेत वर्ण का गन्ध—व्रण आदि के ऊपर लेप करने के लिये उपयोगी होता है एवं कृष्णवर्ण का गन्ध-पूर्वोक्त सभी कार्यों में श्रेष्ठ होता है किन्तु यह अत्यन्त दुर्लभ होता है । [११०] ❖ श्रेष्ठः = हेमक्रियाऽऽदिषु सर्वत्र प्रशस्ततरः ।।११०।। यहाँ पर “श्रेष्ठ” पद से “हेमक्रिया (सोना बनाने) आदि पूर्वोक्त सभी कार्यों में अत्यन्त प्रशस्त होता है” यह अर्थ समझना चाहिये । [११०] अथ गन्धकगुणानाह गन्धकः कटुकस्तिक्तो वीर्योष्णास्तुवरः सरः । पित्तलः कटुकः पाके जन्तुकण्डूविसर्पजित् । हन्ति कुष्ठक्षयप्लीहकफवातान् रसायनः ।।१११।। गन्धक—कटु, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, विपाक में कटु रसयुक्त, उष्णवीर्य, सारक, पित्तजनक, रसायन एवम्- क्रिमि, खुजली, विसर्प, कुष्ठ, क्षय, प्लीहा, कफ तथा वात को दूर करने वाला होता है । [१११] अथाशुद्धगन्धकदोषानाह अशोधितो गन्धक एष कुष्ठं करोति तापं विषमं शरीरे । सौख्यं च रूपं च बलं तथौजः शुक्रं निहन्त्येव करोति चास्रम् ।।११२।। अशुद्ध गन्धक के दोष—बिना शोधा हुआ गन्धक यदि भक्षण किया जाय तो वह कुष्ठ, शरीर में विषम ज्वर तथा रक्तविकार को करता है एवम्—सुख, रूप, बल, ओज एवं शुक्र को नष्ट करता है । [११२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA