भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 820, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 820

धात्वादिवर्गः ७६९ पारे के स्वाभाविक दोष-मल, विष, अग्नि, गिरिदोष, चपलता ये सब हैं और आगन्तुक दोष-राँगा और सीसा के योग से होने वाले अन्य दोष हैं। इस भाँति से पारे के सब ७ दोष मुनीश्वरों ने कहे हैं। उक्त दोषों के फल-मल से मूर्च्छा, विष से मरण, अग्नि से शरीर में अत्यन्त कष्टकर दाह, गिरि से सदा शरीर की जड़ता, चपलता से पुरुषों का वीर्यनाश, वङ्ग (राँगा) से कुष्ठ, भुजंग अर्थात् नाग से नपुंसकता ये सब क्रम से होते हैं। अतः पारे का शोधन उक्त दोष की निवृत्ति के लिये परमावश्यक है। मुख्यरूप से तो पारा में-(१) अग्नि-(२) विष तथा (३) मल ये ही तीन दोष होते हैं। ये तीनों क्रम से मनुष्यों को (१) सन्ताप-(२) मरण-(३) मूर्च्छा करने वाले होते हैं। इनके अतिरिक्त अन्य भी दोष यद्यपि पारे में ऋषियों ने कहे हैं तथापि पारे के ये ३ दोष ही विशेष रूप से दूर करने योग्य हैं। [९७-९९] अथसंस्कृतपारदसेवननिषेधमाह संस्कारहीनं खलु सूतराजं यः सेवते तस्य करोति बाधाम्। देहस्य नाशं विदधाति नूनं कष्टांश्च रोगाञ्जनयेन्नराणाम् ।।१००।। असंस्कृत पारे के सेवन का निषेध-जो कोई बिना संस्कार किये हुये ही पारे का सेवन करता है तो वह उस (सेवन करने वाले) को पीड़ा पहुँचाता है, देह का नाश कर देता है, निश्चित रूप से मनुष्यों के रोगों को उत्पन्न करता है। तात्पर्य यह है कि भूल कर भी असंस्कृत पारे का सेवन नहीं करना चाहिये अन्यथा कष्टाधिक्य से मृत्यु तक हो जाती है। [१००] अथोपरसाः । तेषां संख्यामाह गन्धो हिङ्गुलमभ्रतालकशिलाः स्रोतोऽञ्जनं टङ्कणं राजावर्तकचुम्बकौ स्फटिकया शङ्खः खटी गैरिकम्। कासीसं रसकं कपर्दसिकताबोलाश्च कङ्गुष्ठकं सौराष्ट्री च मता अमी उपरसाः सूतस्य किञ्चिद्गुणै ।।१०१।। उपरसों की संख्या-गन्धक, हिङ्गुल, अभ्रक, हरताल, मैनशिल, सुरमा, सुहागा, राजावर्तक, चुम्बक, फिटकरी, शंख, खरिया, गेरू, कसीस, खपरिया, कौड़ी, बालु, बोल, कङ्गुष्ठ एवं सोरठी माटी ये सब उपरस कहे जाते हैं क्योंकि ये कुछ रस (पारा) के गुणों से युक्त होते हैं। [१०१] अथ हिङ्गुलम् । तस्य नामानि सलक्षणभेदान् गुणांश्चाह हिङ्गुलं दरदं म्लेच्छमिङ्गुलं श्चूर्णपारदम्। दरदस्त्रिविधः प्रोक्तश्चर्मारः शुकतुण्डकः ।।१०२।। हंसपादस्तृतीयः स्याद् गुणवानुत्तरोत्तरम् ।।१०३।। चर्मारः शुक्लवर्णः स्यात्स पीतः शुकतुण्डकः । जपाकुसुमसंङ्काशो हंसपादो महोत्तमः ।।१०४।। तिक्तं कषायं कटु हिङ्गुलं स्यान्नेत्रामयघ्नं कफपित्तहारि । हल्लासकुष्ठज्वरकामलाश्च प्लीहामवातौ च गरं निहन्ति ।।१०५।। हिङ्गुल के संस्कृत नाम-हिङ्गुल, दरद, म्लेच्छ, इङ्गुल और चूर्णपारद ये सब हैं। भेद-हिङ्गुल तीन प्रकार का होता है। (१) चर्मार, (२) शुकतुण्डक, (३) हंसपाद । इनमें से एक दूसरे की अपेक्षा उत्तरोत्तर गुणवान् होता है। जैसे-चर्मार की अपेक्षा शुकतुण्ड और शुकतुण्ड की अपेक्षा हंसपाद अधिक गुणवान् होता है। [१०२-१०५] उक्त भेदों के लक्षण-चर्मार-सफेद वर्ण का होता है, शुकतुण्ड-पीले वर्ण का एवम् हंसपाद जो कि सर्वोत्तम है वह जपाकुसुम (अढ़ौल के फूल) के समान लाल वर्ण का होता है। हिङ्गुल-तिक्त, कषाय, कटुरस युक्त एवम्-नेत्रसम्बन्धी-रोग, कफ, पित्त, हल्लास (उबकाई), कुष्ठ, ज्वर, कामला, प्लीहा, आमवात और विष को दूर करने वाला होता है। ५२ भाव. I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA