भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 819, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें७६८ भावप्रकाशनिघण्टुः है। जैसे—सफेद, लाल, पीला तथा काला और ये क्रम से ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र ४ जाति के कहलाते हैं अर्थात् ब्राह्मण जाति का पारा सफेद वर्ण का, क्षत्रिय जाति का लाल वर्ण का, वैश्य जाति का पीले वर्ण का और शूद्र जाति का काले वर्ण का होता है। उपर्युक्त भेदों का उपयोग—सफेद वर्ण का पारा—रोगों के नाश करने में उत्तम होता है। लाल वर्ण का पारा—रसायन के कार्य में, पीले वर्ण का पारा—धातुवाद अर्थात् सोना-चाँदी आदि बनाने के कार्य में और काले वर्ण का पारा आकाश गमन के कार्य में उत्तम होता है। [८७-८९] अथ पारदस्य नामगुणानाह पारदो रसधातुश्च रसेन्द्रश्च महारसः ।।९०।। चपलः शिववीर्यश्च रसः सूतः शिवाह्वयः । पारदः षड्रसः स्निग्धस्त्रिदोषघ्नो रसायनः ।।९१।। योगवाही महावृष्यः सदा दृष्टिबलप्रदः । सर्वामयहरः प्रोक्तो विशेषात्सर्वकुष्ठनुत् ।।९२।। पारा के संस्कृत नाम—पारद, रसधातु, रसेन्द्र, महारस, चपल, शिववीर्य, रस, सूत, शिवजी के नामवाचक सभी शब्द। (जैसे—शिव, रुद्र, हर, धूर्जटि इत्यादि) ये सब हैं। पारद—पारा मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय तथा तिक्त इन छ रसों से युक्त, स्निग्ध, त्रिदोष नाशक, रसायन, योगवाही, अत्यन्त वीर्यवर्धक, सदा नेत्रों की शक्ति तथा बल को देने वाला, सम्पूर्ण रोगों को दूर करने वाला तथा विशेष रूप से कुष्ठ का नांशक होता है। [९०-९२] अथ पारदस्यावस्थाभेदेन नामानि सर्वश्रेष्ठतां चाह स्वस्थो रसो भवेद् ब्रह्मा बद्धो ज्ञेयो जनार्दनः । रञ्जितः १कामितश्चापि साक्षाद्देवो महेश्वरः ।।९३।। मूर्च्छितो हरति रुजं बन्धनमनुभूय खे गतिं कुरुते। अजरीकरोति हि मृतः कोऽन्यः करुणाऽऽकरः सूतात्।।९४।। असाध्यो यो भवेद्रोगो यस्य नास्ति चिकित्सितम् ।। रसेन्द्रो हन्ति तं रोगं नरकुञ्जरवाजिनाम् ।।९५।। पारे का अवस्था भेद से नाम—स्वस्थ पारा—ब्रह्मा, बद्ध (बँधा हुआ) पारा—जनार्दन (विष्णु), रञ्जित तथा कामित पारा—साक्षात् महेश्वर संज्ञक होता है। पारे की सर्वश्रेष्ठता—पारा—मूर्च्छित होकर रोगों को दूर करता है और बन्धन का अनुभव करके अर्थात् बद्धपारा— आकाश में चलने की शक्ति देता है और मरा हुआ होकर अर्थात् मृतपारा—मनुष्यों को अजर (वृद्धावस्थाशून्य) करता है, अतः पारे से बढ़ कर कोई दूसरा कृपासागर नहीं हो सकता है। मनुष्य, हाथी तथा घोड़ों के जो रोग असाध्य हो गये हों अथवा जिन रोगों की चिकित्सा नहीं हो सकती है ऐसे रोगों को केवल पारा ही दूर कर देता है। [९३-९५] अथ फलनिर्देशपूर्वकं पारदस्थितदोषानाह मलं विषं वह्निगिरित्वचापलं नैसर्गिकं दोषमुशन्ति पारदे । उपाधिजौ द्वौ त्रपुनागयोगजौ दोषौ रसेन्द्रे कथितौ मुनीश्वरैः ।।९६।। मलेन मूर्च्छा मरणं विषेण दाहोऽग्निना कष्टतरः शरीरे । देहस्य जाड्यं गिरिणा सदा स्युश्चाञ्चल्यतो वीर्यहृतिश्च पुंसाम् । वङ्गेन कुष्ठं भुजगेन षण्ढो भवेदतोऽसौ परिशोधनीयः ।।९७।। वह्निर्विषं मलं चेति मुख्या दोषास्त्रयो रसे । एते कुर्वन्ति सन्तापं मृतिं मूर्च्छा नृणांक्रमात् ।।९८।। अन्येऽपि कथिता दोषा भिषग्भिः पारदे यदि । तथाऽप्येते त्रयो दोषा हरणीया विशेषतः ।।९९।। १. क्रामित इति पाठो० ।