भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७७२ भावप्रकाशनिघण्टुः अथोत्पत्तिस्थानाभेदेनाभ्रकस्य गुणभेदानाह अभ्रमुत्तरशैलोत्थं बहुसत्त्वं गुणाधिकम् । दक्षिणाद्रिभवं स्वल्पसत्त्वमल्पगुणप्रदम् ।।१२३।। उत्पत्ति स्थान के भेद से अभ्रक के गुणों में भेद—उत्तर के पर्वतों पर उत्पन्न होने वाला अभ्रक—अत्यन्त वीर्यशाली अतएव अधिक गुणकारी होता है और दक्षिण के पर्वतों पर उत्पन्न होने वाला अभ्रक—स्वल्प वीर्यवाला अतएव स्वल्प गुणकारी होता है । [१२३] अथ मृताभ्रकगुणानाह अभ्रं कषायं मधुरं सुशीतमायुष्करं धातुविवर्द्धनं च । हन्यात्रिदोषं व्रणमेहकुष्ठप्लीहोदरग्रन्थिविषक्रिमींश्च ।।१२४।। रोगान्हन्ति द्रढयति वपुर्वीर्यवृद्धिं विधत्ते तारुण्याढ्यं रमयति शतं योषितां नित्यमेव । दीर्घायुष्काञ्जनयति सुतान्विक्रमैःसिंहतुल्यान् मृत्योर्भीतिं हरति सततं सेव्यमानं मृताभ्रम् ।।१२५।। अभ्रक भस्म (मृत अभ्रक)—यह कषाय तथा मधुर रसयुक्त, अत्यन्त शीतल, आयु को बढ़ाने वाला, धातुवर्धक एवम्-त्रिदोष, व्रण, प्रमेह, कुष्ठ, प्लीहा, उदररोग, ग्रन्थि (गिल्टी), विष तथा क्रिमि को दूर करने वाला होता है । यदि मृत अभ्रक (अभ्रक भस्म) का नित्य सेवन किया जाय तो वह—रोगों को दूर करता है तथा शरीर को दृढ़ और वीर्य की वृद्धि करता है और नित्य तरुणाई से भरा हुआ सौ स्त्रियों से रमण करने की शक्ति देता है तथा सिंह के समान पराक्रमी, दीर्घ आयु वाले पुत्रों को उत्पन्न करता है और मृत्यु के भय को दूर करता है । [१२४-१२५] अथाशुद्धाभ्रकदोषानाह पीडां विधत्ते विविधां नराणां कुष्ठं क्षयं पाण्डुगदं च शोथम् । हृत्पार्श्वपीडां च करोत्यशुद्धमभ्रं त्वसिद्धं गुरु तापदं स्यात् ।।१२६।। अशुद्ध अभ्रक के दोष—बिना शोधन किया हुआ अभ्रक—सेवन करने से मनुष्यों को अनेक प्रकार की पीड़ा करता है एवं-कुष्ठ, क्षय, पाण्डुरोग, शोथ, हृदय तथा पार्श्व (पसुली) में पीड़ा करता है । असिद्ध अभ्रक के दोष—यदि अभ्रक भस्म असिद्ध (कच्ची) हो तो सेवन करने से अत्यन्त ताप देने वाला होता है । [१२६] अथ हरितालम् । तस्य गुणलक्षणसहितान् भेदान् गुणाँश्चाह हरितालं तु तालं स्यादालं तालकमित्यपि । हरितालं द्विधा प्रोक्तं पत्राख्यं पिण्डसंज्ञकम् ।।१२७।। तयोराद्यं गुणैः श्रेष्ठं ततो हीनगुणं परम् । स्वर्णवर्णं गुरु स्निग्धं सपत्रं चाभ्रपत्रवत् ।।१२८।। पत्राख्यं तालकं विद्याद् गुणाढ्यं तद्रसायनम् । निष्पत्रं पिण्डसदृशं स्वल्पसत्त्वं तथा गुरु ।।१२९।। स्त्रीपुष्पहरकं स्वल्पगुणं तत्पिण्डतालकम् । हरितालं कटु स्निग्धं कषायोष्णं हरिद्विषम् । कण्डुकुष्ठास्यरोगास्रकफपित्तकचव्रणान् ।।१३०।। हरताल के संस्कृत नाम—हरिताल, ताल, आल और तालक ये सब हैं। भेद—हरताल दो प्रकार का होता है। (१) पत्राख्य (तबकिया) हरताल, (२) पिण्डसंज्ञक हरताल। इनमें से पहला जो पत्राख्य (तबकिया) हरताल है वह गुणों में श्रेष्ठ होता है और दूसरा जो पिण्डसंज्ञक हरताल है वह हीन गुणवाला होता है। पत्राख्य (तबकिया) हरताल के लक्षण—सोने के समान वर्ण वाला, गुरु, स्निग्ध, अभ्रक के पत्र के समान पत्रवाला जो पत्राख्य (तबकिया) हरताल होता है, वह गुणों से युक्त तथा रसायन होता है। और जो पत्र से रहित पिण्ड के समान पिण्ड हरताल होता है, वह CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA.