भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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धात्वादिवर्गः ७७३ स्वल्प वीर्यशाली, गुरु, स्त्री के पुष्प को नष्ट करने वाला एवं अल्प गुणयुक्त होता है। हरताल-कटु तथा कषाय रसयुक्त, स्निग्ध, उष्ण होता है एवं-विष, खुजली, कुष्ठ, मुख के रोग, रक्तविकार, कफ, पित्त, केश तथा व्रण (घाव) को नष्ट करनेवाला होता है। [१२७-१३०] अथाशुद्धस्यासम्यङ्मारितस्य च हरितालस्य दोषानाह हरति च हरितालं चारुतां देहजातां सृजति च बहुतापञ्चाङ्गसङ्कोचपीडाम्। वितरति कफवातौ कुष्ठरोगं विदध्या दिदमाशितमशुद्धं मारितं चाप्यसम्यक् ।।१३१।। बिना शोधा हुआ दोनों प्रकार का हरताल-भक्षण करने से शरीर की सुन्दरता को दूर करता है, अत्यन्त ताप को उत्पन्न करता है, अंगों में सङ्कोच की पीड़ा देता है एवम्-कफ, वात तथा कुष्ठ को करता है। [१३१] अथ मनःशिला (मैनसिला)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह मनःशिला मनोगुप्ता मनोह्वा नागजिह्विका। नेपाली कुनटी गोला शिला दिव्यौषधिः स्मृता ।।१३२।। मनःशिला गुरुर्वर्ण्या सरोष्णा लेखनी कटुः । तिक्ता स्निग्धा विषश्वासकासभूतकफास्रनुत् ।।१३३।। मैनशिल के संस्कृत नाम-मनःशिला, मनोगुप्ता, मनोह्वा, नागजिह्विका, नेपाली, कुनटी, गोला, शिला तथा दिव्यौषधि ये सब हैं। मैनशिल-यह कटु तथा तिक्त रसयुक्त, गुरु, शरीर के वर्ण को उत्तम बनाने वाली, सारक, उष्ण, लेखन तथा स्निग्ध होती है एवम्-विष, श्वास, कास, भूतबाधा, कफ तथा रक्तविकार को दूर करने वाली होती है। [१३२-१३३] अथाशुद्धायास्तस्यादोषानाह मनःशिला मन्दबलं करोति जन्तुं ध्रुवं शोधनमन्तरेण। मलानुबन्धं किल मूत्ररोधं सशर्करं कृच्छ्रगदं च कुर्यात् ।।१३४।। अशुद्ध मैनशिल के दोष-बिना शोधी हुई मैनशिल-सेवन करने वाले मनुष्य के बल को मन्द करने वाली तथा मल का अनुबन्ध (दस्त की रुकावट), मूत्ररोध और शर्करायुक्त मूत्रकृच्छ्र रोग को पैदा करती है। [१३४] अथ स्रोतोऽञ्जनं सौवीरं च (काला, सफेद सुरमा)। तयोर्नामलक्षणगुणानाह अञ्जनं यामुनंवापि कापोताञ्जनमित्यपि। तत्तु स्रोतोऽञ्जनं कृष्णं सौवीरं श्वेतमीरितम् ।।१३५।। वल्मीकशिखराकारे भिन्नमञ्जनसन्निभम्। घृष्टं तु गैरिकाकारमेतत्स्त्रोतोऽञ्जनं स्मृतम् ।।१३६।। स्रोतोऽञ्जनसमं ज्ञेयं सौवीरं तत्तु पाण्डुरम्। स्रोतोऽञ्जनं स्मृत स्वादु चक्षुष्यं कफपित्तनुत् ।।१३७।। कषायं लेखनं स्निग्धं ग्राहि च्छर्दिविषापहम्। सिध्माक्षयास्रहृच्छीतं सेवनीयं सदा बुधैः ।।१३८।। स्रोतोऽञ्जनगुणाः सर्वे सौवीरेऽपिमता बुधः। किन्तु द्वयोरञ्जनयोः श्रेष्ठं स्रोतोऽञ्जनं स्मृतम् ।।१३९।। सुरमा के साधारण संस्कृत नाम-अञ्जन, यामुन तथा कापोताञ्जन ये सब हैं। भेद और उनके लक्षण-सुरमा में जो काला होता है उसे संस्कृत में "स्रोतोऽञ्जन" कहते हैं और जो सफेद होता है उसे "सौवीर" कहते हैं। लक्षण-स्रोतोऽञ्जन (काला सुरमा)-यह वल्मीक (बाँबी) के शिखर के समान आकारवाला, तोड़ने पर अञ्जन के टुकड़ों के समान एवं घिसने पर "गेरू" के समान होता है। सौवीर (सफेद सुरमा)-यह पाण्डुर वर्ण का तथा गुणों में काले सुरमे के समान ही होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA