भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 825, कुल 1167 में से

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पृष्ठ 825

७७४ भावप्रकाशनिघण्टुः काला सुरमा—स्वादिष्ट, कषाय रसयुक्त, नेत्रों के लिये हितकर, लेखन, स्निग्ध, ग्राही तथा शीतल होता है एवम्—कफ, पित्त, वमन, विष, सिध्म (क्षुद्रकुष्ठ के भेद), क्षय तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। अतएव बुद्धिमानों को सदा इसे सेवन करना चाहिये। काले सुरमे में जो गुण हैं वे ही सब सफेद सुरमे में भी रहते हैं ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं। किन्तु इन दोनों अञ्जनों में श्रेष्ठ 'स्रोतोऽञ्जन' काला सुरमा ही समझा जाता है। [१३५-१३९] अथ टङ्कणः (सोहागा)। तस्य गुणानाह टङ्कणोऽग्निकरो रूक्षः कफघ्नो वातपित्तकृत् ।।१४०।। सुहागा—अग्निकारक, रूक्ष, कफनाशक तथा वात और पित्त को उत्पन्न करने वाला होता है। [१४०] अयमुपरसत्वात् पुनरुक्तः ।।१४०।। यहाँ पर यह समझना चाहिये कि—यह उपरस होने से पुनः यहाँ पर कहा गया है। [१४०] अथ स्फटिका (फिटकिरी)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह स्फटी च स्फटिका प्रोक्ता श्वेता शुभ्रा च रङ्गदा। दृढरङ्गा रङ्गदृढा रङ्गाङ्गाऽपि च कथ्यते ।।१४१।। स्फटिका तु कषायोष्णा वातपित्तकफव्रणान्। निहन्ति श्वित्रवीसर्पान् योनिसङ्कोचकारिणी ।।१४२।। फिटकिरी के संस्कृत नाम—स्फटी, स्फटिका, श्वेता, शुभ्रा, रङ्गदा, दृढरङ्गा, रङ्गाङ्गा ये सब हैं। फिटकिरी—कषाय रस युक्त, उष्ण, योनिमार्ग को संकुचित करने वाली एवम्—वात, पित्त, कफ, व्रण (घाव), श्वेत कुष्ठ तथा विसर्प को दूर करने वाली होती है। [१४१-१४२] अथ राजावर्त्तः (रेवटी)। तस्य नामगुणानाह राजावर्त्तो नृपावर्त्तो राजन्यावर्त्तकस्तथा। आवर्त्तमणिसंज्ञश्च ह्यावर्त्तोऽपि तथैव च ।।१४३।। राजावर्त्तः कटुस्तिक्तः शिशिरः पित्तनाशनः। राजावर्त्तः प्रमेहघ्नश्छर्दिहिक्कानिवारणः ।।१४४।। रेवटी के संस्कृत नाम—राजावर्त्त, नृपावर्त्त, राजन्यावर्त्तक, आवर्त्तमणिसंज्ञक, आवर्त्त (आवर्त्तक) ये सब हैं। राजावर्त्त—कटु तथा तिक्त रसयुक्त, शीतल, पित्तनाशक एवम्—प्रमेह, वमन तथा हिचकी को दूर करने वाली होती है। [१४३-१४४] अथ चुम्बकः। तस्य नामगुणानाह चुम्बकः कान्तपाषाणोऽयस्कान्तो लौहकर्षकः। चुम्बको लेखनः शीतो मेदोविषगरापहः ।।१४५।। चुम्बक के संस्कृत नाम—चुम्बक, कान्तपाषाण, अयस्कान्त और लौहकर्षक ये सब हैं। चुम्बक—लेखन, शीतल तथा मेद, विष और गर (उपविष) को नष्ट करने वाला होता है। यहाँ पर नानाप्राण्यङ्गजमलविरुद्धौषधभस्मनाम्। विषाणाञ्चाल्पवीर्याणां योगो गर इति स्मृतः ।।१।। अर्थ—अनेक प्रकार के प्राणियों के अङ्गों का मल, विरुद्ध औषधों के भस्म, अल्पवीर्य वाले विषों के परस्पर योग को 'गर' कहते हैं। यह गर का विशेष अर्थ समझना चाहिये। [१४५] अथ गैरिकं सुवर्णगैरिकं च (गेरू-सोनागेरू)। तयोर्नामगुणानाह गैरिकं रक्तधातुश्च गैरैयं गिरिजं तथा। सुवर्णगैरिकं त्वन्यत्ततो रक्ततरं हि तत् ।।१४६।। गैरिकद्वितयं स्निग्धं मधुरं तुवरं हिमम्। चक्षुष्यं दाहपित्तास्रकफहिक्काविषापहम् ।।१४७।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

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