भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 826

धात्वादिवर्गः ७७५ गेरू के संस्कृत नाम-गैरिक, रक्तधातु, गैरेय, गिरिज ये सब हैं। गेरू के भेद-गेरू से भिन्न एक प्रकार का और भी गेरू होता है जो इसकी अपेक्षा अत्यन्त लाल रंग का होता है उसे संस्कृत में 'स्वर्णगैरिक' कहते हैं। दोनों गेरू (गेरू-सोना गेरू) - यह मधुर तथा कषाय रस युक्त, स्निग्ध, शीतल, नेत्रों के लिये हितकर एवम्-दाह-पित्त-रक्तविकार-कफ-हिचकी तथा विष इन सबों को दूर करने वाले होते हैं। [१४६-१४७] अथ खटिका गौरखटिका च (खडिया, गौरखरिया) । तयोर्नामगुणानाह खटिका कठिनी चापि लेखनी च निगद्यते । खटी दाहास्त्रजिच्छीता मधुरा विषशोथजित् ।।१४८।। लेपादेतद्गुणा प्रोक्ता भक्षिता मृत्तिकासमा । खटी गौरखटी द्वे च गुणैस्तुल्ये प्रकीर्त्तिते ।।१४९।। खड़िया के संस्कृत नाम-खटिका, कठिनी तथा लेखनी ये सब हैं। खड़िया-मधुर रस युक्त, शीतल एवं-दाह-रक्तविकार-विष तथा शोथ को दूर करने वाली होती है। लेप करने से ही उक्त गुण खड़िया के ज्ञात होते हैं। खाने पर तो मिट्टी के समान गुण वाली होती है। खड़िया तथा गैर खरिया ये दोनों ही गुणों में समान ही मानी जाती हैं। [१४८-१४९] अथ वालुका (बालू) । तस्या नामगुणानाह वालुका सिकता प्रोक्ता शर्करा रेतजाऽपि च । वालुका लेखनी शीता व्रणोरःक्षतनाशिनी ।।१५०।। बालू के संस्कृत नाम-वालुका, सिकता, शर्करा और रेतजा ये सब हैं। बालू-लेखन, शीतल तथा व्रण और उरःक्षत को दूर करने वाली होती है। [१५०] अथ तुत्थभेदः खर्परी (खपरिया) तस्या नामगुणानाह खर्परी तुत्थकं तुत्थादन्यत्तद्रसकं स्मृतम् । ये गुणास्तुत्थके प्रोक्तास्ते गुणा रसके स्मृताः ।।१५१।। खपरिया के संस्कृत नाम-खर्परी, तुत्थक, रसक, तुत्थभेद ये सब हैं। खपरिया-जो गुण तूतिया के कहे हुये हैं वे ही सब इसके भी होते हैं। [१५१] अथ काशीशम् (कसीस) । तस्य नामानि भेदान् गुणाँश्चाह काशीशं धातुकाशीशं पांशुकाशीशमित्यपि । तदेव किञ्चित्पीतं तु पुष्पकाशीशमुच्यते ।।१५२।। काशीशमम्लमुष्णं च तिक्तञ्च तुवरं तथा । वातश्लेष्महरं केश्यं नेत्रकण्डूविषप्रणुत् ।। मूत्रकृच्छ्राश्मरीश्वित्रनाशनं परिकीर्तितम् ।।१५३।। कसीस के संस्कृत नाम-काशीश, धातुकाशीश, पांशुकाशीश ये सब हैं। भेद-कसीस यदि थोड़ा पीला हो तो उसका संस्कृत नाम-पुष्पकाशीश होता है। कसीस-अम्ल, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, उष्ण (गरम), बालों के लिये हितकर, वात, कफ, नेत्रों की खुजली, विष, मूत्रकृच्छ्र, पथरी तथा श्वेत कुष्ठ को दूर करने वाला होता है। [१५२-१५३] अथ सौराष्ट्री मृत्तिका (सोरठी माटी) । तस्या नामगुणानाह सौराष्ट्री तुवरी काली मृत्तालकसुराष्ट्रजे ।। १५४ ।। आढकी चापि सा ख्याता मृत्स्ना च सुरमृत्तिका । स्फटिकाया गुणाः सर्वे सौराष्ट्र्या अपि कीर्तिताः ।। १५५ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA