भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 827, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 827

७७६ भावप्रकाशनिघण्टुः सोरठी माटी के संस्कृत नाम-सौराष्ट्री, तुवरी, काली, मृत्तालक, सुराष्ट्रज, आढकी, मृत्स्ना तथा सुरमृत्तिका ये सब हैं। सोरठी माटी-फिटकिरी के जितने गुण कह आये हैं वे सब सोरठी माटी के भी होते हैं। [१५४-१५५] अथ कृष्णमृत्तिका (काली मिट्टी) तस्य नामगुणानाह मृन्मृदा मृत्तिका मृत्स्ना क्षेत्रजा कृष्णमृत्तिका । कृष्णमृत् क्षतदाहास्रप्रदरश्लेष्मपित्तनुत् ।। १५६ ।। काली मिट्टी के संस्कृत नाम-मृद्, मृदा, मृत्तिका, मृत्स्ना, क्षेत्रजा, कृष्णमृत्तिका और कृष्णमृत् ये सब हैं। काली मिट्टी-क्षत, दाह, रक्तप्रदर या रक्तविकार, प्रदररोग, कफ तथा पित्त को दूर करने वाली होती है। [१५६] अथ कर्दमः (कीचड़) तस्यगुणानाह पङ्कस्तु जलकल्काश्च चुलुकः कर्दमो मलः । चिकिलः पलितो द्रापः पललश्च निषद्दरः ।। कर्दमो दाहपित्तास्रशोथघ्नः शीतलः सरः ।। १५७ ।। कीचड़ के संस्कृत नाम-पङ्क, जलकल्क, चुलुक, कर्दम, मल, चिकिल, पलित, द्राप, पलल तथा निषद्दर ये सब हैं। कीचड़-शीतल तथा सारक होता है एवम्-दाह, पित्त, रक्तविकार और शोथ को नष्ट करने वाला होता है। [१५७] अथ कपर्दकम् (कौड़ी) । तस्य नामगुणानाह कपर्दको वराटश्च कपर्दी च वराटिका । कपर्दिका हिमा नेत्रहिता स्फोटक्षयापहा ।। कर्णस्रावाग्निमान्द्यघ्नो पित्तास्रकफनाशिनी ।। १५८ ।। कौड़ी के संस्कृत नाम-कपर्दक, वराट, कपर्दी, वराटिका तथा कपर्दिका ये सब हैं। कौड़ी-शीतल, नेत्रों के लिये हितकर, विस्फोट, क्षय, कर्णस्राव, अग्नि की मन्दता, पित्त, रक्तविकार तथा कफ को नष्ट करने वाली होती है। [१५८] अथ शङ्खः । तस्य नामगुणानाह शङ्खः समुद्रजः कम्बुः सुनादः पावनध्वनिः । शङ्खो नेत्र्यो हिमः शीतो लघुः पित्तकफास्रजित् ।। १५९ ।। शङ्ख के संस्कृत नाम-शंख, समुद्रज, कम्बु, सुनाद तथा पावनध्वनि ये सब हैं। शङ्ख-नेत्रों के लिये हितकर, शीतल, लघु एवम्-पित्त, कफ तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [१५९] अथ बोलम् । तस्य नामानि गुणांश्चाह बोलागन्धरसप्राणपिण्डगोपरसाः समाः । बोलं रक्तहरं शीतं मेध्यं दीपनपाचनम् ।। मधुरं कटु तिक्तं च दाहस्वेदत्रिदोषजित् । ज्वरापस्मारकण्ठघ्नं गर्भाशयविशुद्धिकृत् ।। १६० ।। बोल के संस्कृत नाम-बोल, गन्धरस, प्राण, पिण्ड तथा गोपरस ये सब हैं। बोल-मधुर, कटु तथा तिक्तरसयुक्त, रुधिरविकार नाशक, शीतल, मेधाशक्ति के लिये हितकर, अग्निदीपक, एवम्-दाह, स्वेद (पसीना), त्रिदोष, ज्वर, अपस्मार (मिर्गी) तथा कुष्ठ को दूर करने वाला होता है। [१३०] बोल, हीराबोल हिं०-बोल, हीराबोल । बं०-करम, बंदरकरम । अं०-Myrrh (मिर्ह) । ले०-Commiphora myrrha Holmes (कॉम्मिफोरा मिर्ह) । Fam. Burseraceae (बर्सेरिसी) । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा) · पृष्ठ 827, कुल 1167 में से · BharatKosha