भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 828, कुल 1167 में से

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धात्वादिवर्गः ७७७ इसका वृक्ष उत्तर पूर्व अफ्रीका तथा अरब में पाया जाता है। यह करीब १० फीट ऊँचा होता है। इसकी अन्य प्रजातियाँ भी होती हैं जो २५-३० फीट तक ऊँची होती हैं। यह उपयुक्त वृक्ष का निर्यास है। इसका संग्रह सोमालीलैण्ड में होता है। वहाँ से यह अदन को भेजा जाता है। जहाँ से बंबई के रास्ते या सीधे इसका यूरोप में निर्यात होता है। अधिकतर यह अपने आप ही निकला हुआ पाया जाता है किन्तु कभी-कभी वृक्षों में चीरा लगाकर भी इसे प्राप्त करते हैं। यह पीताभ श्वेत गाढ़ा तरल पदार्थ होता है जो वृक्ष से निकलते ही गरमी से सूखकर रक्ताभ भूरा हो जाता है। स्वरूप—इसके विभिन्न नाप के टुकड़े या गोल दाने १-४ इञ्च व्यास के होते हैं। यह बाहर से रक्ताभ भूरा या रक्ताभ पीला तथा चूर्णावृत दिखलाई पड़ता है। यह आसानी से तोड़ा जा सकता है तथा तोड़ने पर अन्दर से यह गहरा भूरा तैलीय एवं कभी-कभी श्वेत चिह्नों से युक्त होता है। इसमें विशिष्ट गंध एवं स्वाद, सुगंधि, तिक्त एवं कटु होता है। परीक्षा—(१) जल के साथ घोटने से इसका पीला इमल्शन बनता है। (२) ईथरीय सत्व को सुखाकर उसका संयोग शोरे के तेजाब के धूएँ या ब्रोमीन के धूएँ से करने पर गहरा बैंगनी रंग इसमें आता है। (३) इसमें मद्यसार में अघुलनशील भाग ७०% से अधिक न हो तथा राख ५% से अधिक न हो। इसका एक भेद बीसाबोल होता है जो अन्य वृक्ष से निकलता है। वह अधिक गंधयुक्त होता है। उपर्युक्त परीक्षा से इसे अलग किया जा सकता है। संग्रह करते समय इसके साथ ही गोंद, गुग्गुल आदि का भी संग्रह होने के कारण बोल में इनकी भी मिलावट होती है। रासायनिक संगठन—इसमें उड़नशील तैल, राल, गोंद आदि द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—यह आर्तवजनन, श्लेष्मलकला के लिये उत्तेजक, प्रतिदूषक, कफनाशक एवं दीपन है। इसका प्रयोग अनार्तव, गर्भाशय शैथिल्य, श्वेतप्रदर, बस्तिशोथ, कास, श्वास एवं कुपचन में करते हैं। मुख पाक, गले की खराश एवं मसूड़े की सूजन में इसके द्रव से कुल्ला (गण्डूश) करने से लाभ होता है। इसका लेप व्रण पर किया जाता है। दंत मंजन में इसे डालते हैं। सुगंध के लिये धूप में इसका उपयोग होता है। मात्रा—१/२-२ रत्ती । अथ कङ्कुष्ठः । तस्योत्पत्तिं भेदाँश्चाह हिमवत्पादशिखरे कङ्कुष्ठमुपजायते । तत्रैकं रक्तकालं स्यात्तदन्यदण्डकं स्मृतम् ।।१६१।। कंकुष्ठ की उत्पत्ति—हिमालय के पास के पर्वतों के शिखर पर कंकुष्ठ की उत्पत्ति होती है। भेद—इसके दो भेद हैं—पहला रक्तकाल, दूसरा अण्डक—ये दोनों संस्कृत नाम हैं। [१६१] हिमवत्पादशिखरे = हिमवतः प्रत्यन्तपर्वतानां शिखरे ।। १६१ ।। यहाँ पर मूल में 'हिमवत्पादशिखरे' इस पद का 'हिमालय के पास के पर्वतों के शिखर पर' यह अर्थ समझना चाहिये । [१६१] अथोत्तमःधमकङ्कुष्ठयोर्लक्षणमाह पीतप्रभं गुरु स्निग्धं श्रेष्ठं कङ्कुष्ठमादिमम् । श्यामं पीतं लघु त्यक्तसत्त्वं नेष्टं तथाऽण्डकम् ।।१६२।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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