भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७७८ भावप्रकाशनिघण्टुः उत्तम कंकुष्ठ के लक्षण-इसमें जो पहला भेद (रक्तकाल-संज्ञक) है, वह पीले रंग की कान्तिवाला गुरु तथा स्निग्ध होता है और वही उत्तम होता है। अधम कंकुष्ठ के लक्षण-जो अण्डक संज्ञक भेद होता है वह साँवला तथा पीला होता है एवं-लघु और निःसार होता है अतः यह निकृष्ट समझा जाता है। [१६२] अथ कङ्कुष्ठस्य नामगुणानाह कङ्कुष्ठं काककुष्ठं च विरङ्गं कोलकाकुलम् ।।१६३।। कङ्कुष्ठं रेचनं तिक्तं कटूष्णं वर्णकारकम्। कृमिशोथोदराध्मानगुल्मानाहकफापहम् ।।१६४।। कंकुष्ठ के संस्कृत नाम-कङ्कुष्ठ, काककुष्ठ, विरङ्ग तथा कोलकाकुल ये सब हैं। कंकुष्ठ-यह तिक्त तथा कटुरस युक्त, रेचक, उष्ण, वर्णकारक एवम्-कृमि, शोथ, उदररोग, आध्मान, गुल्म, आनाह (अफरा) तथा कफ को दूर करने वाला होता है। [१६३-१६४] कंकुष्ठ क्या है इस सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद रहा है। भावप्रकाशकार इसके दो भेद मानते हैं तथा उत्पत्ति हिमालय में मानते हैं। रसरत्नसमुच्चय में भी इसके दो भेद 'नलिकाख्य' एवं 'रेणुक' दिये हैं। यह पीतवर्ण का तीव्र विरेचक पदार्थ है जिसकी यवमात्रा (१/३ रत्ती) से विरेचन होता है तथा यह सत्वरूप होने के कारण इसका सत्व नहीं निकाला जाता ऐसा भी उल्लेख है। उपर्युक्त शास्त्रीय वर्णन के आधार पर अनेक विद्वानों ने 'गम्बोज' को कंकुष्ठ माना है जो उचित मालूम पड़ता है। इसका वर्णन वटादिवर्ग (पृष्ठ ५३३) में किया जा चुका है। अन्य मतों में कुछ इसे तत्काल जन्मे हुए हाथी के बच्चे की विष्ठा, कुछ घोड़े के बच्चे की नाल, कुछ मुर्दासंग (सीसे का यौगिक), स्वर्णक्षीरी, रेवंदचीनी इत्यादि पदार्थ मानते हैं जिनमें से रेवंदचीनी को ककुष्ठ माना जा सकता है। रेवंदचीनी की जड़ गॅम्बोज के जितनी तीव्र विरेचक नहीं होती। इसका संक्षेप में वर्णन आगे दिया जा रहा है। गॅम्बोज को बाजार में उसारे रेवंद (रेवंदचीनी का सत) कहते हैं किन्तु यह रेवंदचीनी का उसारा (सत) नहीं है। गॅम्बोज (उसारे रेवंद) यह एक वृक्ष का निर्यास है और रेवंदचीनी यह एक गुल्म की जड़ है। रेवंदचीनी की जड़ के सत्व की तरह गॅम्बोज में गुण होने के कारण संभवतः गॅम्बोज को भी उसारे रेवंद कहा जाता होगा। रेवंदचीनी सं०-पीतमूला, अम्लपर्णी। हिं०-रेवंदचीनी। नेपा०-पदमचल। गढ़०-अर्चु। अं०, फा०-रेवंद, रेबास। अं०-Rhubarb (हूबार्ब)। ले०-Rheum emodi Wall. (हिअम् एमोडी)। Fam. Polygonaceae (पॉलिगोनेसी)। यह हिमालय, नेपाल, सिक्किम में ११ से १२ हजार फीट की ऊँचाई तक एवं सिमला, कांगड़ा जिला तथा चीन तिब्बत आदि देशों में होती है। इसका पौधा दृढ़ होता है। काण्ड-पर्णवत्, मजबूत, ४-५ फीट लम्बा, हरी एवं भूरी धारियों से युक्त होता है। मूलपत्र-बहुत बड़े, लम्बे वृन्त से युक्त, गोलाकार या चौड़ाई लिये अंडाकार, आधार, हृदयाकार, ५-७ शिराओं से युक्त, नीचे से मृदुरोमश किन्तु ऊपरी सतह कुछ खुरदरी होती है। पुष्प-छोटे एवं गहरे बैंगनी एवं फल-बैंगनी, १/२ इञ्च लम्बे, अंडाकार-आयताकार होते हैं। इसकी शाखा एवं पत्ती जो अम्ल होती हैं, सुखाकार, वेणी की तरह गूंथकर अमलवेत के नाम से बेची जाती है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA