भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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धात्वादिवर्गः ७७९ इसकी अन्य जाति हि. वेब्बिआनम् (R. webbianum Royle) में पुष्प हलके पीताभ, छोटे एवं फल भी छोटे होते हैं। यह नेपाल से काश्मीर तक १०-१४ हजार फीट तक पाई जाती है। इस प्रजाति की विभिन्न जातियों के मूल का रेवंदचीनी के नाम से व्यवहार होता है। ६-७ वर्ष पुराने पौधे की मूल का पुष्पोद्गम के पूर्व संग्रह किया जाता है। इसके टुकड़े भूरे पीले रंग के लंबगोल, १ से ८ इञ्च लम्बे, १/२ से ३ इञ्च तक व्यास के, लम्बाई में झुर्रीदार तथा धारीदार होते हैं। इसका स्वाद तिक्त एवं कषाय तथा इसमें विशेष गन्ध रहती है। इसे चबाने से इसमें के कैल्शियम् ऑक्जेलेट के कारण करकरापन मालूम होता है तथा इससे लार पीली हो जाती है। रासायनिक संगठन-इसमें मुख्य रूप से ॲन्थ्रॉक्विनोन (Anthraquinone) से व्युत्पन्न द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह अल्प मात्रा (१/२-४ रत्ती) में तिक्त, दीपन एवं ग्राही है। अधिक मात्रा (१-२ माशा) से इसका प्रभाव बृहदांत्र पर होकर ६ से ८ घंटे में विरेचन होता है जो इसमें के ग्राही तत्त्व के कारण अपने आप बाद में रुक जाता है। मृदु विरेचक रूप में तथा अजीर्ण से उत्पन्न अतिसार में इसे देते हैं। जीर्ण विबन्ध में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। इससे मूत्र का रंग गहरा हो जाता है। इसके साथ सोंठ, सौंफ आदि सुगंध द्रव्य देने से मरोड़ नहीं होती। इसको जल में पीसकर लेप करने से सूजन कम होती है। अथ रत्नम् । तस्य निरुक्तिमाह धनार्थिनो जनाः सर्वे रमन्तेऽस्मिन्नतीव यत् । ततो रत्नमिति प्रोक्तं शब्दशास्त्रविशारदैः ।। १६५।। रत्न शब्द की निरुक्ति—धन को चाहने वाले सभी लोग इसमें अत्यन्त रमण करते हैं अर्थात् अधिक आनन्दित हो अपना चित्त लगाते हैं—इससे शब्दशास्त्र के जानने वालों ने इसे 'रत्न' कहा है। [१६५] अथ रत्ननामान्याह रत्नं क्लीबे मणिः पुंसि स्त्रियामपि निगद्यते । तत्तु पाषाणभेदोऽस्ति मुक्तादि च तदुच्यते ।। १६६ ।। रत्न के संस्कृत नाम—रत्न (यह नपुंसकलिङ्गी होता है), मणि (यह पुंलिङ्ग तथा स्त्रीलिङ्ग दोनों में होता है) ये दोनों हैं। यह (रत्न) पत्थर के भेद हीरा आदि का तथा मोती आदि का बोधक होता है। [१६६] ❖ तथा चामरसिंहः— रत्नं मणिर्द्वयोरश्मजातौ मुक्ताऽऽदिकेऽपि च ।। १६६ ।। यहाँ पर अमरसिंह ने भी अमरकोश में इसी बात को कहा है कि—“रत्न (नपुंसकलिङ्गी तथा मणि (यह पुंलिङ्गी तथा स्त्रीलिङ्गी भी है) ये दोनों शब्द पत्थर की जाति हीरा आदि और मोती आदि के वाचक हैं।” यह समझना चाहिये। [१६६] अथ रत्नानां संख्यामाह रत्नं गारुत्मतं पुष्परागो माणिक्यमेव च। इन्द्रनीलश्च गोमेदस्तथा वैदूर्यमित्यपि ।। मौक्तिकं विद्रुमश्चेति रत्नान्युक्तानि वै नव ।। १६७।। रत्नों की संख्या—रत्न (हीरा), गारुत्मत (पन्ना), पुष्पराग (पुखराज), माणिक्य (मानिक), इन्द्रनील (नीलम), गोमेद, वैदूर्य (लहसुनिया), मौक्तिक (मोती), विद्रुम (मूँगा) ये नव रत्न कहे हुये हैं। [१६७] अथ विष्णुधर्मोत्तरेऽपि नवरत्ननिरूपणमाह मुक्ताफलं हीरकं च वैदूर्य पद्मरागकम् ।।१६८।। पुष्परागं च गोमेदं नीलं गारुत्मतं तथा। प्रवालयुक्तान्येतानि महारत्नानि वै नव ।। १६९ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA