भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 831

७८० भावप्रकाशनिघण्टुः विष्णुधर्मोत्तर में भी नवरत्न का निरूपण इस प्रकार है कि-(१) मोती, (२) हीरा, (३) लहसुनिया, (४) मानिक, (५) पोखराज, (६) गोमेद, (७) नीलम, (८) पन्ना, (९) मूँगा ये नव महारत्न हैं । [ १६८-१६९ ] तत्र हीरकः । तस्य नामानि सलक्षणान् भेदानाह हीरकः पुंसि वज्रोऽस्त्री चन्द्रो मणिवरश्च सः । स तु श्वेतः स्मृतो विप्रो लोहितः क्षत्रियः स्मृतः । पीतो वैश्योऽसितः शूद्रश्चतुर्वर्णात्मकश्च सः ।।१७०।। हीरा के संस्कृत नाम-हीरक (पुंलिङ्गी), वज्र (पुंलिङ्गी तथा नपुंसकलिङ्गी), चन्द्र और मणिवर ये सब हैं । भेदों के लक्षण-जो हीरा सफेद रंग का होता है वह-ब्राह्मण, लाल रंग का-क्षत्रिय, पीले रंग का-वैश्य, असित रंग का शूद्र वर्ण का होता है, इस भाँति से हीरा की चार जातियाँ होती हैं । [१७०] अथ तद्भेदानां गुणानाह रसायने मतो विप्रः सर्वसिद्धिप्रदायकः । क्षत्रियो व्याधिविध्वंसी जरामृत्युहरः स्मृतः ।। १७१ ।। वैश्यो धनप्रदः प्रोक्तस्तथा देहस्यदार्ढ्यकृत् । शूद्रो नाशयति व्याधीन् वयःस्तम्भं करोति च ।। १७२ ।। हीरा के भेदों के गुण-ब्राह्मण वर्ण का हीरा-रसायन के लिये उपयोगी तथा सर्वसिद्धियों का देनेवाला होता है । क्षत्रिय वर्ण का हीरा-रोगों को नष्ट करने वाला एवम् जरा (बुढ़ापा) तथा मृत्यु को दूर करने वाला होता है । वैश्यवर्ण का हीरा धन देनेवाला तथा देह को दृढ़ करने वाला होता है । शूद्रवर्ण का हीरा-रोगों का नाश करने वाला तथा आयु को स्थिर रखने वाला अर्थात् शरीर में वृद्धावस्थाजन्य क्षीणता को नहीं आने देने वाला होता है । [१७१-१७२] अथ पुंस्त्रीनपुंसकभेदात् त्रिविधस्य तस्य लक्षणानिगुणानुपयोगविषयाँश्चाह पुंस्त्रीनपुंसकानीह लक्षणीयानि लक्षणैः । सुवृत्ताः फलसम्पूर्णास्तेजो युक्त बृहत्तराः ।। १७३ ।। पुरुषास्ते समाख्याता रेखा बिन्दु विवर्जिताः । रेखाबिन्दुसमायुक्ताः षडस्रास्ते स्त्रियः स्मृताः ।। १७४ ।। हीरे के अन्य प्रकार से तीन भेद-हीरे के पुरुष, स्त्री तथा नपुंसक ये तीन भेद होते हैं जो आगे कहे जाने वाले लक्षणों से पहचाने जाते हैं । लक्षण-पुरुष जाति के जो हीरे होते हैं वे भली भाँति गोलाकार, फल से पूर्ण, तेज से युक्त, अत्यन्त बड़े एवम् रेखा तथा बिन्दु से रहित होते हैं । स्त्री जाति के हीरे-पूर्वोक्त गुणों से युक्त होते हुये केवल रेखा बिन्दुओं से युक्त तथा ६ कोण वाले होते हैं । [१७३-१७४] ❖ षडस्रा = षट्कोणा ।। १७३-१७४।। यहाँ पर मूल में "षडस्राः" पद से ६ कोण वाले यह अर्थ समझना चाहिये । [१७३-१७४] त्रिकोणाश्च सुदीर्घास्ते विज्ञेयाश्च नपुंसकाः । तेषु स्युः पुरुषाः श्रेष्ठा रसबन्धनकारिणाः ।। १७५ ।। स्त्रियः कुर्वन्ति कायस्य कान्तिं स्त्रीणां सुखप्रदाः । नपुंसकास्त्ववीर्याः स्युरकामा सत्ववर्जिताः ।। १७६ ।। स्त्रियः स्त्रीभ्यः प्रदातव्याः क्लीबंक्लीबे प्रयोजयेत् । सर्वेभ्यः सर्वदादेयाःपुरुषा वीर्यवर्धना ।। १७७ ।। नपुंसक जाति के हीरे-त्रिकोण युक्त तथा अधिक लम्बे होते हैं । गुण-इनमें पुरुष-जाति के हीरे-श्रेष्ठ तथा रस के बन्धन करने वाले होते हैं । स्त्री-जाति के हीरे-शरीर की कान्ति को बढ़ाने वाले एवं विशेष रूप से स्त्रियों के लिये सुखदायी होते हैं । नपुंसकजाति के हीरे-वीर्यहीन, काम हासक तथा शक्ति से रहित होते हैं । उपयोग के विषय-स्त्री जाति के हीरे-स्त्रियों के लिये, नपुंसक जाति के हीरे-नपुंसकों के लिये देने चाहिये एवं वीर्यवर्धक पुरुष जाति के हीरे-सभी के लिये सदा देने योग्य होते हैं । [१७५-१७७] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA