भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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धात्वादिवर्गः ७८१ अथाशुद्धहीरकदोषानाह अशुद्धं कुरुते वज्रं कुष्ठं पार्श्वव्यथां तथा। पाण्डुतां पङ्गुत्वं च तस्मात्संशोध्य मारयेत् ।। १७८ ।। अशुद्ध हीरा के दोष—बिना शोधन किया हुआ हीरा—कुष्ठ, पसलियों में पीड़ा, पाण्डु तथा पङ्गु रोग (पङ्गुल) को उत्पन्न करने वाला होता है अतएव शोधन करके भस्म करना उचित है। [१७८] अथ मारितस्य वज्रस्य गुणानाह आयुः पुष्टिं बलं वीर्यं वर्णं सौख्यं करोति च। सेवितं सर्वरोगघ्नं मृतं वज्रं न संशयः ।। १७९ ।। भली भाँति शुद्ध हीरे के भस्म के गुण—हीराभस्म—आयु, पुष्टि, बल, वीर्य, शरीर का सुन्दर वर्ण तथा सुख की वृद्धि करता है। अतः सेवन करने से वह सम्पूर्ण रोगों को दूर करने वाला होता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। [१७९] अथ गारुत्मतम् (पन्ना इति लोके)। तस्य नामान्याह गारुत्मतं मरकतमश्मगर्भो हरिन्मणिः ।। १८० ।। पन्ना के संस्कृत नाम—गारुत्मत्, मरकत, अश्मगर्भ और हरिन्मणि ये सब हैं। [१८०] अथ माणिक्यम् (चुन्नी)। तस्य नामान्याह माणिक्यं पद्मरागः स्याच्छोणरत्नञ्च लोहितम् ।। १८१ ।। मानिक के संस्कृत नाम—माणिक्य, पद्मराग, शोणरत्न और लोहित ये सब हैं। [१८१] अथ पुष्परागः (पुखराज)। तस्य नामान्याह पुष्परागो मञ्जुमणिः स्याद्वाचस्पतिवल्लभः ।। १८२ ।। पोखराज के संस्कृत नाम—पुष्पराग, मञ्जुमणि तथा वाचस्पतिवल्लभ ये सब हैं। [१८२] अथेन्द्रनीलं गोमेदश्च (नीलम और गोमेदमणि)। तयोर्नामान्याह नीलं तथेन्द्रनीलञ्च गोमेदः पीतरत्नकम् ।। १८३ ।। नीलम के संस्कृत नाम—नील और इन्द्रनील ये सब हैं। गोमेद के संस्कृत नाम—गोमेद तथा पीतरत्नक ये सब हैं। [१८३] अथ वैदूर्यम् (लहसुनिया)। तस्य नामान्याह वैदूर्यं दूरजं रत्नं स्यात्केतुग्रहवल्लभम् ।। १८४ ।। लहसुनिया के संस्कृत नाम—वैदूर्य, दूरज रत्न तथा केतुग्रहवल्लभ ये सब हैं। [१८४] अथ मौक्तिकम् (मोती)। तस्य नामान्युद्भवस्थानानि गुणांश्चाह मौक्तिकं शौक्तिकं मुक्ता तथा मुक्ताफलञ्च तत्। शुक्तिः शङ्खो गजः क्रोडः फणी मत्स्यश्च दर्दुरः ।। वेणुरेते समाख्यातास्तज्ज्ञैर्मौक्तिकयोनयः। मौक्तिकं शीतलं वृष्यं चक्षुष्यं बलपुष्टिदम् ।। १८५ ।। मोती के संस्कृत नाम—मौक्तिक, शौक्तिक, मुक्ता तथा मुक्ताफल ये सब हैं। मोती के उत्पत्ति स्थान—सीप, शङ्ख, हाथी, सूअर, साँप, मछली, मेढक और बाँस ये आठ मोतियों के निकलने के स्थान मोतियों के विषय में अभिज्ञ लोगों ने बतलाये हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA