भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ भावप्रकाशनिघण्टुः मोती-शीतल, वीर्यवर्धक, नेत्रों के लिये हितकर, बल तथा पुष्टि को देने वाला होता है। [१८५] अथ प्रवालः (मूँगा) । तस्य नामान्याह पुंसि क्लीबे प्रवालः स्यात्पुमानेव तु विद्रुमः ।।१८६।। मूँगा के संस्कृत नाम-प्रवाल (यह पुँल्लिङ्ग तथा नपुंसकलिङ्ग में होता है) तथा विद्रुम (यह केवल पुंल्लिङ्ग में होता है) ये सब हैं। [१८६] अथ रत्नानां गुणानाह रत्नानि भक्षितानि स्युर्मधुराणि सराणि च। चक्षुष्याणि च शीतानि विषघ्नानि धृतानि च।। मङ्गल्यानि मनोज्ञानि ग्रहदोषहराणि च ।।१८७।। रत्नों के गुण-पूर्वोक्त रत्नों के भस्म खाने पर मधुर रसयुक्त, सारक, नेत्रों के लिये हितकर, शीतल तथा विषनाशक होते हैं और धारण करने पर-मङ्गलदायक, सुन्दरता को बढ़ाने वाले तथा ग्रह सम्बन्धी दोषों को दूर करने वाले होते हैं। [१८७] किं रत्नं कस्य ग्रहस्य प्रीतिकारित्वेन दोषहरं भवतीति प्रश्ने तदुत्तरमाह, रत्नमालायाम् माणिक्यं तरणेः सुजातममलं मुक्ताफलं शीतगोर्महेयस्य तु विद्रुमो निगदितः सौम्यस्य गारुत्मतम्। देवेज्यस्य च पुष्परागमसुराचार्यस्य वज्रं शनेर्नीलं निर्मलमन्ययोर्निगदिते गोमेदवैदूर्यके ।।१८८।। "कौन रत्न किस ग्रह की प्रसन्नता उत्पन्न करने से उसके दोष को दूर करने वाले होते हैं" इस प्रश्न का उत्तर "रत्नमाला" में इस प्रकार दिया हुआ है- माणिक-सूर्य का, अच्छी जाति का निर्मल मोती-चन्द्रमा का, मूँगा-मङ्गल का, पन्ना-बुध का, पोखराज-बृहस्पति का, हीरा-शुक्र का, निर्मल नीलम-शनि का, गोमेद और लहसुनिया ये दोनों-क्रम से राहु तथा केतु के रत्न कहे हुये हैं। अतः इनके धारण करने से उन-उन ग्रहों के दोष दूर होते हैं। [१८८] अथोपरत्नानि । तेषां निरूपणमाह उपरत्नानि काचश्च कर्पूराश्मा तथैव च। मुक्ताशुक्तिस्तथा शङ्ख इत्यादीनि बहून्यपि ।।१८९।। उपरत्नों का निरूपण-काच, कर्पूरनिया, सौप तथा शंख इत्यादि बहुत से उपरत्न हैं। [१८९] ❖ उपरत्नानि = गौणरत्नानि । कर्पूराश्मा = कर्पूरा, कर्पूरनिया । मुक्ताशुक्तिः = 'सीप' इति लोके प्रसिद्ध ।।१८९।। यहाँ पर मूल में- "उपरत्न" से गौणरत्न अर्थ समझना चाहिये। "कर्पूराश्मा" से कर्पूरा या कर्पूरनिया, "मुक्ताशुक्ति" से "सीप" अर्थ समझना चाहिये। [१८९] अथ तेषां गुणानाह गुणा यथैव रत्नानामुपरत्नेषु ते तथा। किन्तु किञ्चित्तो हीना विशेषोऽयमुदाहृतः ।।१९०।। उपरत्नों के गुण-रत्नों में जो गुण होते हैं वे ही गुण उपरत्नों में भी होते हैं किन्तु विशेषता यह है कि रत्नों की अपेक्षा इनमें स्वल्प होते हैं। [१९०] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA