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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

७७४ भावप्रकाशनिघण्टुः काला सुरमा—स्वादिष्ट, कषाय रसयुक्त, नेत्रों के लिये हितकर, लेखन, स्निग्ध, ग्राही तथा शीतल होता है एवम्—कफ, पित्त, वमन, विष, सिध्म (क्षुद्रकुष्ठ के भेद), क्षय तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। अतएव बुद्धिमानों को सदा इसे सेवन करना चाहिये। काले सुरमे में जो गुण हैं वे ही सब सफेद सुरमे में भी रहते हैं ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं। किन्तु इन दोनों अञ्जनों में श्रेष्ठ 'स्रोतोऽञ्जन' काला सुरमा ही समझा जाता है। [१३५-१३९] अथ टङ्कणः (सोहागा)। तस्य गुणानाह टङ्कणोऽग्निकरो रूक्षः कफघ्नो वातपित्तकृत् ।।१४०।। सुहागा—अग्निकारक, रूक्ष, कफनाशक तथा वात और पित्त को उत्पन्न करने वाला होता है। [१४०] अयमुपरसत्वात् पुनरुक्तः ।।१४०।। यहाँ पर यह समझना चाहिये कि—यह उपरस होने से पुनः यहाँ पर कहा गया है। [१४०] अथ स्फटिका (फिटकिरी)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह स्फटी च स्फटिका प्रोक्ता श्वेता शुभ्रा च रङ्गदा। दृढरङ्गा रङ्गदृढा रङ्गाङ्गाऽपि च कथ्यते ।।१४१।। स्फटिका तु कषायोष्णा वातपित्तकफव्रणान्। निहन्ति श्वित्रवीसर्पान् योनिसङ्कोचकारिणी ।।१४२।। फिटकिरी के संस्कृत नाम—स्फटी, स्फटिका, श्वेता, शुभ्रा, रङ्गदा, दृढरङ्गा, रङ्गाङ्गा ये सब हैं। फिटकिरी—कषाय रस युक्त, उष्ण, योनिमार्ग को संकुचित करने वाली एवम्—वात, पित्त, कफ, व्रण (घाव), श्वेत कुष्ठ तथा विसर्प को दूर करने वाली होती है। [१४१-१४२] अथ राजावर्त्तः (रेवटी)। तस्य नामगुणानाह राजावर्त्तो नृपावर्त्तो राजन्यावर्त्तकस्तथा। आवर्त्तमणिसंज्ञश्च ह्यावर्त्तोऽपि तथैव च ।।१४३।। राजावर्त्तः कटुस्तिक्तः शिशिरः पित्तनाशनः। राजावर्त्तः प्रमेहघ्नश्छर्दिहिक्कानिवारणः ।।१४४।। रेवटी के संस्कृत नाम—राजावर्त्त, नृपावर्त्त, राजन्यावर्त्तक, आवर्त्तमणिसंज्ञक, आवर्त्त (आवर्त्तक) ये सब हैं। राजावर्त्त—कटु तथा तिक्त रसयुक्त, शीतल, पित्तनाशक एवम्—प्रमेह, वमन तथा हिचकी को दूर करने वाली होती है। [१४३-१४४] अथ चुम्बकः। तस्य नामगुणानाह चुम्बकः कान्तपाषाणोऽयस्कान्तो लौहकर्षकः। चुम्बको लेखनः शीतो मेदोविषगरापहः ।।१४५।। चुम्बक के संस्कृत नाम—चुम्बक, कान्तपाषाण, अयस्कान्त और लौहकर्षक ये सब हैं। चुम्बक—लेखन, शीतल तथा मेद, विष और गर (उपविष) को नष्ट करने वाला होता है। यहाँ पर नानाप्राण्यङ्गजमलविरुद्धौषधभस्मनाम्। विषाणाञ्चाल्पवीर्याणां योगो गर इति स्मृतः ।।१।। अर्थ—अनेक प्रकार के प्राणियों के अङ्गों का मल, विरुद्ध औषधों के भस्म, अल्पवीर्य वाले विषों के परस्पर योग को 'गर' कहते हैं। यह गर का विशेष अर्थ समझना चाहिये। [१४५] अथ गैरिकं सुवर्णगैरिकं च (गेरू-सोनागेरू)। तयोर्नामगुणानाह गैरिकं रक्तधातुश्च गैरैयं गिरिजं तथा। सुवर्णगैरिकं त्वन्यत्ततो रक्ततरं हि तत् ।।१४६।। गैरिकद्वितयं स्निग्धं मधुरं तुवरं हिमम्। चक्षुष्यं दाहपित्तास्रकफहिक्काविषापहम् ।।१४७।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

धात्वादिवर्गः ७७५ गेरू के संस्कृत नाम-गैरिक, रक्तधातु, गैरेय, गिरिज ये सब हैं। गेरू के भेद-गेरू से भिन्न एक प्रकार का और भी गेरू होता है जो इसकी अपेक्षा अत्यन्त लाल रंग का होता है उसे संस्कृत में 'स्वर्णगैरिक' कहते हैं। दोनों गेरू (गेरू-सोना गेरू) - यह मधुर तथा कषाय रस युक्त, स्निग्ध, शीतल, नेत्रों के लिये हितकर एवम्-दाह-पित्त-रक्तविकार-कफ-हिचकी तथा विष इन सबों को दूर करने वाले होते हैं। [१४६-१४७] अथ खटिका गौरखटिका च (खडिया, गौरखरिया) । तयोर्नामगुणानाह खटिका कठिनी चापि लेखनी च निगद्यते । खटी दाहास्त्रजिच्छीता मधुरा विषशोथजित् ।।१४८।। लेपादेतद्गुणा प्रोक्ता भक्षिता मृत्तिकासमा । खटी गौरखटी द्वे च गुणैस्तुल्ये प्रकीर्त्तिते ।।१४९।। खड़िया के संस्कृत नाम-खटिका, कठिनी तथा लेखनी ये सब हैं। खड़िया-मधुर रस युक्त, शीतल एवं-दाह-रक्तविकार-विष तथा शोथ को दूर करने वाली होती है। लेप करने से ही उक्त गुण खड़िया के ज्ञात होते हैं। खाने पर तो मिट्टी के समान गुण वाली होती है। खड़िया तथा गैर खरिया ये दोनों ही गुणों में समान ही मानी जाती हैं। [१४८-१४९] अथ वालुका (बालू) । तस्या नामगुणानाह वालुका सिकता प्रोक्ता शर्करा रेतजाऽपि च । वालुका लेखनी शीता व्रणोरःक्षतनाशिनी ।।१५०।। बालू के संस्कृत नाम-वालुका, सिकता, शर्करा और रेतजा ये सब हैं। बालू-लेखन, शीतल तथा व्रण और उरःक्षत को दूर करने वाली होती है। [१५०] अथ तुत्थभेदः खर्परी (खपरिया) तस्या नामगुणानाह खर्परी तुत्थकं तुत्थादन्यत्तद्रसकं स्मृतम् । ये गुणास्तुत्थके प्रोक्तास्ते गुणा रसके स्मृताः ।।१५१।। खपरिया के संस्कृत नाम-खर्परी, तुत्थक, रसक, तुत्थभेद ये सब हैं। खपरिया-जो गुण तूतिया के कहे हुये हैं वे ही सब इसके भी होते हैं। [१५१] अथ काशीशम् (कसीस) । तस्य नामानि भेदान् गुणाँश्चाह काशीशं धातुकाशीशं पांशुकाशीशमित्यपि । तदेव किञ्चित्पीतं तु पुष्पकाशीशमुच्यते ।।१५२।। काशीशमम्लमुष्णं च तिक्तञ्च तुवरं तथा । वातश्लेष्महरं केश्यं नेत्रकण्डूविषप्रणुत् ।। मूत्रकृच्छ्राश्मरीश्वित्रनाशनं परिकीर्तितम् ।।१५३।। कसीस के संस्कृत नाम-काशीश, धातुकाशीश, पांशुकाशीश ये सब हैं। भेद-कसीस यदि थोड़ा पीला हो तो उसका संस्कृत नाम-पुष्पकाशीश होता है। कसीस-अम्ल, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, उष्ण (गरम), बालों के लिये हितकर, वात, कफ, नेत्रों की खुजली, विष, मूत्रकृच्छ्र, पथरी तथा श्वेत कुष्ठ को दूर करने वाला होता है। [१५२-१५३] अथ सौराष्ट्री मृत्तिका (सोरठी माटी) । तस्या नामगुणानाह सौराष्ट्री तुवरी काली मृत्तालकसुराष्ट्रजे ।। १५४ ।। आढकी चापि सा ख्याता मृत्स्ना च सुरमृत्तिका । स्फटिकाया गुणाः सर्वे सौराष्ट्र्या अपि कीर्तिताः ।। १५५ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

७७६ भावप्रकाशनिघण्टुः सोरठी माटी के संस्कृत नाम-सौराष्ट्री, तुवरी, काली, मृत्तालक, सुराष्ट्रज, आढकी, मृत्स्ना तथा सुरमृत्तिका ये सब हैं। सोरठी माटी-फिटकिरी के जितने गुण कह आये हैं वे सब सोरठी माटी के भी होते हैं। [१५४-१५५] अथ कृष्णमृत्तिका (काली मिट्टी) तस्य नामगुणानाह मृन्मृदा मृत्तिका मृत्स्ना क्षेत्रजा कृष्णमृत्तिका । कृष्णमृत् क्षतदाहास्रप्रदरश्लेष्मपित्तनुत् ।। १५६ ।। काली मिट्टी के संस्कृत नाम-मृद्, मृदा, मृत्तिका, मृत्स्ना, क्षेत्रजा, कृष्णमृत्तिका और कृष्णमृत् ये सब हैं। काली मिट्टी-क्षत, दाह, रक्तप्रदर या रक्तविकार, प्रदररोग, कफ तथा पित्त को दूर करने वाली होती है। [१५६] अथ कर्दमः (कीचड़) तस्यगुणानाह पङ्कस्तु जलकल्काश्च चुलुकः कर्दमो मलः । चिकिलः पलितो द्रापः पललश्च निषद्दरः ।। कर्दमो दाहपित्तास्रशोथघ्नः शीतलः सरः ।। १५७ ।। कीचड़ के संस्कृत नाम-पङ्क, जलकल्क, चुलुक, कर्दम, मल, चिकिल, पलित, द्राप, पलल तथा निषद्दर ये सब हैं। कीचड़-शीतल तथा सारक होता है एवम्-दाह, पित्त, रक्तविकार और शोथ को नष्ट करने वाला होता है। [१५७] अथ कपर्दकम् (कौड़ी) । तस्य नामगुणानाह कपर्दको वराटश्च कपर्दी च वराटिका । कपर्दिका हिमा नेत्रहिता स्फोटक्षयापहा ।। कर्णस्रावाग्निमान्द्यघ्नो पित्तास्रकफनाशिनी ।। १५८ ।। कौड़ी के संस्कृत नाम-कपर्दक, वराट, कपर्दी, वराटिका तथा कपर्दिका ये सब हैं। कौड़ी-शीतल, नेत्रों के लिये हितकर, विस्फोट, क्षय, कर्णस्राव, अग्नि की मन्दता, पित्त, रक्तविकार तथा कफ को नष्ट करने वाली होती है। [१५८] अथ शङ्खः । तस्य नामगुणानाह शङ्खः समुद्रजः कम्बुः सुनादः पावनध्वनिः । शङ्खो नेत्र्यो हिमः शीतो लघुः पित्तकफास्रजित् ।। १५९ ।। शङ्ख के संस्कृत नाम-शंख, समुद्रज, कम्बु, सुनाद तथा पावनध्वनि ये सब हैं। शङ्ख-नेत्रों के लिये हितकर, शीतल, लघु एवम्-पित्त, कफ तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [१५९] अथ बोलम् । तस्य नामानि गुणांश्चाह बोलागन्धरसप्राणपिण्डगोपरसाः समाः । बोलं रक्तहरं शीतं मेध्यं दीपनपाचनम् ।। मधुरं कटु तिक्तं च दाहस्वेदत्रिदोषजित् । ज्वरापस्मारकण्ठघ्नं गर्भाशयविशुद्धिकृत् ।। १६० ।। बोल के संस्कृत नाम-बोल, गन्धरस, प्राण, पिण्ड तथा गोपरस ये सब हैं। बोल-मधुर, कटु तथा तिक्तरसयुक्त, रुधिरविकार नाशक, शीतल, मेधाशक्ति के लिये हितकर, अग्निदीपक, एवम्-दाह, स्वेद (पसीना), त्रिदोष, ज्वर, अपस्मार (मिर्गी) तथा कुष्ठ को दूर करने वाला होता है। [१३०] बोल, हीराबोल हिं०-बोल, हीराबोल । बं०-करम, बंदरकरम । अं०-Myrrh (मिर्ह) । ले०-Commiphora myrrha Holmes (कॉम्मिफोरा मिर्ह) । Fam. Burseraceae (बर्सेरिसी) । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

धात्वादिवर्गः ७७७ इसका वृक्ष उत्तर पूर्व अफ्रीका तथा अरब में पाया जाता है। यह करीब १० फीट ऊँचा होता है। इसकी अन्य प्रजातियाँ भी होती हैं जो २५-३० फीट तक ऊँची होती हैं। यह उपयुक्त वृक्ष का निर्यास है। इसका संग्रह सोमालीलैण्ड में होता है। वहाँ से यह अदन को भेजा जाता है। जहाँ से बंबई के रास्ते या सीधे इसका यूरोप में निर्यात होता है। अधिकतर यह अपने आप ही निकला हुआ पाया जाता है किन्तु कभी-कभी वृक्षों में चीरा लगाकर भी इसे प्राप्त करते हैं। यह पीताभ श्वेत गाढ़ा तरल पदार्थ होता है जो वृक्ष से निकलते ही गरमी से सूखकर रक्ताभ भूरा हो जाता है। स्वरूप—इसके विभिन्न नाप के टुकड़े या गोल दाने १-४ इञ्च व्यास के होते हैं। यह बाहर से रक्ताभ भूरा या रक्ताभ पीला तथा चूर्णावृत दिखलाई पड़ता है। यह आसानी से तोड़ा जा सकता है तथा तोड़ने पर अन्दर से यह गहरा भूरा तैलीय एवं कभी-कभी श्वेत चिह्नों से युक्त होता है। इसमें विशिष्ट गंध एवं स्वाद, सुगंधि, तिक्त एवं कटु होता है। परीक्षा—(१) जल के साथ घोटने से इसका पीला इमल्शन बनता है। (२) ईथरीय सत्व को सुखाकर उसका संयोग शोरे के तेजाब के धूएँ या ब्रोमीन के धूएँ से करने पर गहरा बैंगनी रंग इसमें आता है। (३) इसमें मद्यसार में अघुलनशील भाग ७०% से अधिक न हो तथा राख ५% से अधिक न हो। इसका एक भेद बीसाबोल होता है जो अन्य वृक्ष से निकलता है। वह अधिक गंधयुक्त होता है। उपर्युक्त परीक्षा से इसे अलग किया जा सकता है। संग्रह करते समय इसके साथ ही गोंद, गुग्गुल आदि का भी संग्रह होने के कारण बोल में इनकी भी मिलावट होती है। रासायनिक संगठन—इसमें उड़नशील तैल, राल, गोंद आदि द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—यह आर्तवजनन, श्लेष्मलकला के लिये उत्तेजक, प्रतिदूषक, कफनाशक एवं दीपन है। इसका प्रयोग अनार्तव, गर्भाशय शैथिल्य, श्वेतप्रदर, बस्तिशोथ, कास, श्वास एवं कुपचन में करते हैं। मुख पाक, गले की खराश एवं मसूड़े की सूजन में इसके द्रव से कुल्ला (गण्डूश) करने से लाभ होता है। इसका लेप व्रण पर किया जाता है। दंत मंजन में इसे डालते हैं। सुगंध के लिये धूप में इसका उपयोग होता है। मात्रा—१/२-२ रत्ती । अथ कङ्कुष्ठः । तस्योत्पत्तिं भेदाँश्चाह हिमवत्पादशिखरे कङ्कुष्ठमुपजायते । तत्रैकं रक्तकालं स्यात्तदन्यदण्डकं स्मृतम् ।।१६१।। कंकुष्ठ की उत्पत्ति—हिमालय के पास के पर्वतों के शिखर पर कंकुष्ठ की उत्पत्ति होती है। भेद—इसके दो भेद हैं—पहला रक्तकाल, दूसरा अण्डक—ये दोनों संस्कृत नाम हैं। [१६१] हिमवत्पादशिखरे = हिमवतः प्रत्यन्तपर्वतानां शिखरे ।। १६१ ।। यहाँ पर मूल में 'हिमवत्पादशिखरे' इस पद का 'हिमालय के पास के पर्वतों के शिखर पर' यह अर्थ समझना चाहिये । [१६१] अथोत्तमःधमकङ्कुष्ठयोर्लक्षणमाह पीतप्रभं गुरु स्निग्धं श्रेष्ठं कङ्कुष्ठमादिमम् । श्यामं पीतं लघु त्यक्तसत्त्वं नेष्टं तथाऽण्डकम् ।।१६२।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

७७८ भावप्रकाशनिघण्टुः उत्तम कंकुष्ठ के लक्षण-इसमें जो पहला भेद (रक्तकाल-संज्ञक) है, वह पीले रंग की कान्तिवाला गुरु तथा स्निग्ध होता है और वही उत्तम होता है। अधम कंकुष्ठ के लक्षण-जो अण्डक संज्ञक भेद होता है वह साँवला तथा पीला होता है एवं-लघु और निःसार होता है अतः यह निकृष्ट समझा जाता है। [१६२] अथ कङ्कुष्ठस्य नामगुणानाह कङ्कुष्ठं काककुष्ठं च विरङ्गं कोलकाकुलम् ।।१६३।। कङ्कुष्ठं रेचनं तिक्तं कटूष्णं वर्णकारकम्। कृमिशोथोदराध्मानगुल्मानाहकफापहम् ।।१६४।। कंकुष्ठ के संस्कृत नाम-कङ्कुष्ठ, काककुष्ठ, विरङ्ग तथा कोलकाकुल ये सब हैं। कंकुष्ठ-यह तिक्त तथा कटुरस युक्त, रेचक, उष्ण, वर्णकारक एवम्-कृमि, शोथ, उदररोग, आध्मान, गुल्म, आनाह (अफरा) तथा कफ को दूर करने वाला होता है। [१६३-१६४] कंकुष्ठ क्या है इस सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद रहा है। भावप्रकाशकार इसके दो भेद मानते हैं तथा उत्पत्ति हिमालय में मानते हैं। रसरत्नसमुच्चय में भी इसके दो भेद 'नलिकाख्य' एवं 'रेणुक' दिये हैं। यह पीतवर्ण का तीव्र विरेचक पदार्थ है जिसकी यवमात्रा (१/३ रत्ती) से विरेचन होता है तथा यह सत्वरूप होने के कारण इसका सत्व नहीं निकाला जाता ऐसा भी उल्लेख है। उपर्युक्त शास्त्रीय वर्णन के आधार पर अनेक विद्वानों ने 'गम्बोज' को कंकुष्ठ माना है जो उचित मालूम पड़ता है। इसका वर्णन वटादिवर्ग (पृष्ठ ५३३) में किया जा चुका है। अन्य मतों में कुछ इसे तत्काल जन्मे हुए हाथी के बच्चे की विष्ठा, कुछ घोड़े के बच्चे की नाल, कुछ मुर्दासंग (सीसे का यौगिक), स्वर्णक्षीरी, रेवंदचीनी इत्यादि पदार्थ मानते हैं जिनमें से रेवंदचीनी को ककुष्ठ माना जा सकता है। रेवंदचीनी की जड़ गॅम्बोज के जितनी तीव्र विरेचक नहीं होती। इसका संक्षेप में वर्णन आगे दिया जा रहा है। गॅम्बोज को बाजार में उसारे रेवंद (रेवंदचीनी का सत) कहते हैं किन्तु यह रेवंदचीनी का उसारा (सत) नहीं है। गॅम्बोज (उसारे रेवंद) यह एक वृक्ष का निर्यास है और रेवंदचीनी यह एक गुल्म की जड़ है। रेवंदचीनी की जड़ के सत्व की तरह गॅम्बोज में गुण होने के कारण संभवतः गॅम्बोज को भी उसारे रेवंद कहा जाता होगा। रेवंदचीनी सं०-पीतमूला, अम्लपर्णी। हिं०-रेवंदचीनी। नेपा०-पदमचल। गढ़०-अर्चु। अं०, फा०-रेवंद, रेबास। अं०-Rhubarb (हूबार्ब)। ले०-Rheum emodi Wall. (हिअम् एमोडी)। Fam. Polygonaceae (पॉलिगोनेसी)। यह हिमालय, नेपाल, सिक्किम में ११ से १२ हजार फीट की ऊँचाई तक एवं सिमला, कांगड़ा जिला तथा चीन तिब्बत आदि देशों में होती है। इसका पौधा दृढ़ होता है। काण्ड-पर्णवत्, मजबूत, ४-५ फीट लम्बा, हरी एवं भूरी धारियों से युक्त होता है। मूलपत्र-बहुत बड़े, लम्बे वृन्त से युक्त, गोलाकार या चौड़ाई लिये अंडाकार, आधार, हृदयाकार, ५-७ शिराओं से युक्त, नीचे से मृदुरोमश किन्तु ऊपरी सतह कुछ खुरदरी होती है। पुष्प-छोटे एवं गहरे बैंगनी एवं फल-बैंगनी, १/२ इञ्च लम्बे, अंडाकार-आयताकार होते हैं। इसकी शाखा एवं पत्ती जो अम्ल होती हैं, सुखाकार, वेणी की तरह गूंथकर अमलवेत के नाम से बेची जाती है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA

धात्वादिवर्गः ७७९ इसकी अन्य जाति हि. वेब्बिआनम् (R. webbianum Royle) में पुष्प हलके पीताभ, छोटे एवं फल भी छोटे होते हैं। यह नेपाल से काश्मीर तक १०-१४ हजार फीट तक पाई जाती है। इस प्रजाति की विभिन्न जातियों के मूल का रेवंदचीनी के नाम से व्यवहार होता है। ६-७ वर्ष पुराने पौधे की मूल का पुष्पोद्गम के पूर्व संग्रह किया जाता है। इसके टुकड़े भूरे पीले रंग के लंबगोल, १ से ८ इञ्च लम्बे, १/२ से ३ इञ्च तक व्यास के, लम्बाई में झुर्रीदार तथा धारीदार होते हैं। इसका स्वाद तिक्त एवं कषाय तथा इसमें विशेष गन्ध रहती है। इसे चबाने से इसमें के कैल्शियम् ऑक्जेलेट के कारण करकरापन मालूम होता है तथा इससे लार पीली हो जाती है। रासायनिक संगठन-इसमें मुख्य रूप से ॲन्थ्रॉक्विनोन (Anthraquinone) से व्युत्पन्न द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह अल्प मात्रा (१/२-४ रत्ती) में तिक्त, दीपन एवं ग्राही है। अधिक मात्रा (१-२ माशा) से इसका प्रभाव बृहदांत्र पर होकर ६ से ८ घंटे में विरेचन होता है जो इसमें के ग्राही तत्त्व के कारण अपने आप बाद में रुक जाता है। मृदु विरेचक रूप में तथा अजीर्ण से उत्पन्न अतिसार में इसे देते हैं। जीर्ण विबन्ध में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। इससे मूत्र का रंग गहरा हो जाता है। इसके साथ सोंठ, सौंफ आदि सुगंध द्रव्य देने से मरोड़ नहीं होती। इसको जल में पीसकर लेप करने से सूजन कम होती है। अथ रत्नम् । तस्य निरुक्तिमाह धनार्थिनो जनाः सर्वे रमन्तेऽस्मिन्नतीव यत् । ततो रत्नमिति प्रोक्तं शब्दशास्त्रविशारदैः ।। १६५।। रत्न शब्द की निरुक्ति—धन को चाहने वाले सभी लोग इसमें अत्यन्त रमण करते हैं अर्थात् अधिक आनन्दित हो अपना चित्त लगाते हैं—इससे शब्दशास्त्र के जानने वालों ने इसे 'रत्न' कहा है। [१६५] अथ रत्ननामान्याह रत्नं क्लीबे मणिः पुंसि स्त्रियामपि निगद्यते । तत्तु पाषाणभेदोऽस्ति मुक्तादि च तदुच्यते ।। १६६ ।। रत्न के संस्कृत नाम—रत्न (यह नपुंसकलिङ्गी होता है), मणि (यह पुंलिङ्ग तथा स्त्रीलिङ्ग दोनों में होता है) ये दोनों हैं। यह (रत्न) पत्थर के भेद हीरा आदि का तथा मोती आदि का बोधक होता है। [१६६] ❖ तथा चामरसिंहः— रत्नं मणिर्द्वयोरश्मजातौ मुक्ताऽऽदिकेऽपि च ।। १६६ ।। यहाँ पर अमरसिंह ने भी अमरकोश में इसी बात को कहा है कि—“रत्न (नपुंसकलिङ्गी तथा मणि (यह पुंलिङ्गी तथा स्त्रीलिङ्गी भी है) ये दोनों शब्द पत्थर की जाति हीरा आदि और मोती आदि के वाचक हैं।” यह समझना चाहिये। [१६६] अथ रत्नानां संख्यामाह रत्नं गारुत्मतं पुष्परागो माणिक्यमेव च। इन्द्रनीलश्च गोमेदस्तथा वैदूर्यमित्यपि ।। मौक्तिकं विद्रुमश्चेति रत्नान्युक्तानि वै नव ।। १६७।। रत्नों की संख्या—रत्न (हीरा), गारुत्मत (पन्ना), पुष्पराग (पुखराज), माणिक्य (मानिक), इन्द्रनील (नीलम), गोमेद, वैदूर्य (लहसुनिया), मौक्तिक (मोती), विद्रुम (मूँगा) ये नव रत्न कहे हुये हैं। [१६७] अथ विष्णुधर्मोत्तरेऽपि नवरत्ननिरूपणमाह मुक्ताफलं हीरकं च वैदूर्य पद्मरागकम् ।।१६८।। पुष्परागं च गोमेदं नीलं गारुत्मतं तथा। प्रवालयुक्तान्येतानि महारत्नानि वै नव ।। १६९ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

७८० भावप्रकाशनिघण्टुः विष्णुधर्मोत्तर में भी नवरत्न का निरूपण इस प्रकार है कि-(१) मोती, (२) हीरा, (३) लहसुनिया, (४) मानिक, (५) पोखराज, (६) गोमेद, (७) नीलम, (८) पन्ना, (९) मूँगा ये नव महारत्न हैं । [ १६८-१६९ ] तत्र हीरकः । तस्य नामानि सलक्षणान् भेदानाह हीरकः पुंसि वज्रोऽस्त्री चन्द्रो मणिवरश्च सः । स तु श्वेतः स्मृतो विप्रो लोहितः क्षत्रियः स्मृतः । पीतो वैश्योऽसितः शूद्रश्चतुर्वर्णात्मकश्च सः ।।१७०।। हीरा के संस्कृत नाम-हीरक (पुंलिङ्गी), वज्र (पुंलिङ्गी तथा नपुंसकलिङ्गी), चन्द्र और मणिवर ये सब हैं । भेदों के लक्षण-जो हीरा सफेद रंग का होता है वह-ब्राह्मण, लाल रंग का-क्षत्रिय, पीले रंग का-वैश्य, असित रंग का शूद्र वर्ण का होता है, इस भाँति से हीरा की चार जातियाँ होती हैं । [१७०] अथ तद्भेदानां गुणानाह रसायने मतो विप्रः सर्वसिद्धिप्रदायकः । क्षत्रियो व्याधिविध्वंसी जरामृत्युहरः स्मृतः ।। १७१ ।। वैश्यो धनप्रदः प्रोक्तस्तथा देहस्यदार्ढ्यकृत् । शूद्रो नाशयति व्याधीन् वयःस्तम्भं करोति च ।। १७२ ।। हीरा के भेदों के गुण-ब्राह्मण वर्ण का हीरा-रसायन के लिये उपयोगी तथा सर्वसिद्धियों का देनेवाला होता है । क्षत्रिय वर्ण का हीरा-रोगों को नष्ट करने वाला एवम् जरा (बुढ़ापा) तथा मृत्यु को दूर करने वाला होता है । वैश्यवर्ण का हीरा धन देनेवाला तथा देह को दृढ़ करने वाला होता है । शूद्रवर्ण का हीरा-रोगों का नाश करने वाला तथा आयु को स्थिर रखने वाला अर्थात् शरीर में वृद्धावस्थाजन्य क्षीणता को नहीं आने देने वाला होता है । [१७१-१७२] अथ पुंस्त्रीनपुंसकभेदात् त्रिविधस्य तस्य लक्षणानिगुणानुपयोगविषयाँश्चाह पुंस्त्रीनपुंसकानीह लक्षणीयानि लक्षणैः । सुवृत्ताः फलसम्पूर्णास्तेजो युक्त बृहत्तराः ।। १७३ ।। पुरुषास्ते समाख्याता रेखा बिन्दु विवर्जिताः । रेखाबिन्दुसमायुक्ताः षडस्रास्ते स्त्रियः स्मृताः ।। १७४ ।। हीरे के अन्य प्रकार से तीन भेद-हीरे के पुरुष, स्त्री तथा नपुंसक ये तीन भेद होते हैं जो आगे कहे जाने वाले लक्षणों से पहचाने जाते हैं । लक्षण-पुरुष जाति के जो हीरे होते हैं वे भली भाँति गोलाकार, फल से पूर्ण, तेज से युक्त, अत्यन्त बड़े एवम् रेखा तथा बिन्दु से रहित होते हैं । स्त्री जाति के हीरे-पूर्वोक्त गुणों से युक्त होते हुये केवल रेखा बिन्दुओं से युक्त तथा ६ कोण वाले होते हैं । [१७३-१७४] ❖ षडस्रा = षट्कोणा ।। १७३-१७४।। यहाँ पर मूल में "षडस्राः" पद से ६ कोण वाले यह अर्थ समझना चाहिये । [१७३-१७४] त्रिकोणाश्च सुदीर्घास्ते विज्ञेयाश्च नपुंसकाः । तेषु स्युः पुरुषाः श्रेष्ठा रसबन्धनकारिणाः ।। १७५ ।। स्त्रियः कुर्वन्ति कायस्य कान्तिं स्त्रीणां सुखप्रदाः । नपुंसकास्त्ववीर्याः स्युरकामा सत्ववर्जिताः ।। १७६ ।। स्त्रियः स्त्रीभ्यः प्रदातव्याः क्लीबंक्लीबे प्रयोजयेत् । सर्वेभ्यः सर्वदादेयाःपुरुषा वीर्यवर्धना ।। १७७ ।। नपुंसक जाति के हीरे-त्रिकोण युक्त तथा अधिक लम्बे होते हैं । गुण-इनमें पुरुष-जाति के हीरे-श्रेष्ठ तथा रस के बन्धन करने वाले होते हैं । स्त्री-जाति के हीरे-शरीर की कान्ति को बढ़ाने वाले एवं विशेष रूप से स्त्रियों के लिये सुखदायी होते हैं । नपुंसकजाति के हीरे-वीर्यहीन, काम हासक तथा शक्ति से रहित होते हैं । उपयोग के विषय-स्त्री जाति के हीरे-स्त्रियों के लिये, नपुंसक जाति के हीरे-नपुंसकों के लिये देने चाहिये एवं वीर्यवर्धक पुरुष जाति के हीरे-सभी के लिये सदा देने योग्य होते हैं । [१७५-१७७] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA

धात्वादिवर्गः ७८१ अथाशुद्धहीरकदोषानाह अशुद्धं कुरुते वज्रं कुष्ठं पार्श्वव्यथां तथा। पाण्डुतां पङ्गुत्वं च तस्मात्संशोध्य मारयेत् ।। १७८ ।। अशुद्ध हीरा के दोष—बिना शोधन किया हुआ हीरा—कुष्ठ, पसलियों में पीड़ा, पाण्डु तथा पङ्गु रोग (पङ्गुल) को उत्पन्न करने वाला होता है अतएव शोधन करके भस्म करना उचित है। [१७८] अथ मारितस्य वज्रस्य गुणानाह आयुः पुष्टिं बलं वीर्यं वर्णं सौख्यं करोति च। सेवितं सर्वरोगघ्नं मृतं वज्रं न संशयः ।। १७९ ।। भली भाँति शुद्ध हीरे के भस्म के गुण—हीराभस्म—आयु, पुष्टि, बल, वीर्य, शरीर का सुन्दर वर्ण तथा सुख की वृद्धि करता है। अतः सेवन करने से वह सम्पूर्ण रोगों को दूर करने वाला होता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। [१७९] अथ गारुत्मतम् (पन्ना इति लोके)। तस्य नामान्याह गारुत्मतं मरकतमश्मगर्भो हरिन्मणिः ।। १८० ।। पन्ना के संस्कृत नाम—गारुत्मत्, मरकत, अश्मगर्भ और हरिन्मणि ये सब हैं। [१८०] अथ माणिक्यम् (चुन्नी)। तस्य नामान्याह माणिक्यं पद्मरागः स्याच्छोणरत्नञ्च लोहितम् ।। १८१ ।। मानिक के संस्कृत नाम—माणिक्य, पद्मराग, शोणरत्न और लोहित ये सब हैं। [१८१] अथ पुष्परागः (पुखराज)। तस्य नामान्याह पुष्परागो मञ्जुमणिः स्याद्वाचस्पतिवल्लभः ।। १८२ ।। पोखराज के संस्कृत नाम—पुष्पराग, मञ्जुमणि तथा वाचस्पतिवल्लभ ये सब हैं। [१८२] अथेन्द्रनीलं गोमेदश्च (नीलम और गोमेदमणि)। तयोर्नामान्याह नीलं तथेन्द्रनीलञ्च गोमेदः पीतरत्नकम् ।। १८३ ।। नीलम के संस्कृत नाम—नील और इन्द्रनील ये सब हैं। गोमेद के संस्कृत नाम—गोमेद तथा पीतरत्नक ये सब हैं। [१८३] अथ वैदूर्यम् (लहसुनिया)। तस्य नामान्याह वैदूर्यं दूरजं रत्नं स्यात्केतुग्रहवल्लभम् ।। १८४ ।। लहसुनिया के संस्कृत नाम—वैदूर्य, दूरज रत्न तथा केतुग्रहवल्लभ ये सब हैं। [१८४] अथ मौक्तिकम् (मोती)। तस्य नामान्युद्भवस्थानानि गुणांश्चाह मौक्तिकं शौक्तिकं मुक्ता तथा मुक्ताफलञ्च तत्। शुक्तिः शङ्खो गजः क्रोडः फणी मत्स्यश्च दर्दुरः ।। वेणुरेते समाख्यातास्तज्ज्ञैर्मौक्तिकयोनयः। मौक्तिकं शीतलं वृष्यं चक्षुष्यं बलपुष्टिदम् ।। १८५ ।। मोती के संस्कृत नाम—मौक्तिक, शौक्तिक, मुक्ता तथा मुक्ताफल ये सब हैं। मोती के उत्पत्ति स्थान—सीप, शङ्ख, हाथी, सूअर, साँप, मछली, मेढक और बाँस ये आठ मोतियों के निकलने के स्थान मोतियों के विषय में अभिज्ञ लोगों ने बतलाये हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

८२ भावप्रकाशनिघण्टुः मोती-शीतल, वीर्यवर्धक, नेत्रों के लिये हितकर, बल तथा पुष्टि को देने वाला होता है। [१८५] अथ प्रवालः (मूँगा) । तस्य नामान्याह पुंसि क्लीबे प्रवालः स्यात्पुमानेव तु विद्रुमः ।।१८६।। मूँगा के संस्कृत नाम-प्रवाल (यह पुँल्लिङ्ग तथा नपुंसकलिङ्ग में होता है) तथा विद्रुम (यह केवल पुंल्लिङ्ग में होता है) ये सब हैं। [१८६] अथ रत्नानां गुणानाह रत्नानि भक्षितानि स्युर्मधुराणि सराणि च। चक्षुष्याणि च शीतानि विषघ्नानि धृतानि च।। मङ्गल्यानि मनोज्ञानि ग्रहदोषहराणि च ।।१८७।। रत्नों के गुण-पूर्वोक्त रत्नों के भस्म खाने पर मधुर रसयुक्त, सारक, नेत्रों के लिये हितकर, शीतल तथा विषनाशक होते हैं और धारण करने पर-मङ्गलदायक, सुन्दरता को बढ़ाने वाले तथा ग्रह सम्बन्धी दोषों को दूर करने वाले होते हैं। [१८७] किं रत्नं कस्य ग्रहस्य प्रीतिकारित्वेन दोषहरं भवतीति प्रश्ने तदुत्तरमाह, रत्नमालायाम् माणिक्यं तरणेः सुजातममलं मुक्ताफलं शीतगोर्महेयस्य तु विद्रुमो निगदितः सौम्यस्य गारुत्मतम्। देवेज्यस्य च पुष्परागमसुराचार्यस्य वज्रं शनेर्नीलं निर्मलमन्ययोर्निगदिते गोमेदवैदूर्यके ।।१८८।। "कौन रत्न किस ग्रह की प्रसन्नता उत्पन्न करने से उसके दोष को दूर करने वाले होते हैं" इस प्रश्न का उत्तर "रत्नमाला" में इस प्रकार दिया हुआ है- माणिक-सूर्य का, अच्छी जाति का निर्मल मोती-चन्द्रमा का, मूँगा-मङ्गल का, पन्ना-बुध का, पोखराज-बृहस्पति का, हीरा-शुक्र का, निर्मल नीलम-शनि का, गोमेद और लहसुनिया ये दोनों-क्रम से राहु तथा केतु के रत्न कहे हुये हैं। अतः इनके धारण करने से उन-उन ग्रहों के दोष दूर होते हैं। [१८८] अथोपरत्नानि । तेषां निरूपणमाह उपरत्नानि काचश्च कर्पूराश्मा तथैव च। मुक्ताशुक्तिस्तथा शङ्ख इत्यादीनि बहून्यपि ।।१८९।। उपरत्नों का निरूपण-काच, कर्पूरनिया, सौप तथा शंख इत्यादि बहुत से उपरत्न हैं। [१८९] ❖ उपरत्नानि = गौणरत्नानि । कर्पूराश्मा = कर्पूरा, कर्पूरनिया । मुक्ताशुक्तिः = 'सीप' इति लोके प्रसिद्ध ।।१८९।। यहाँ पर मूल में- "उपरत्न" से गौणरत्न अर्थ समझना चाहिये। "कर्पूराश्मा" से कर्पूरा या कर्पूरनिया, "मुक्ताशुक्ति" से "सीप" अर्थ समझना चाहिये। [१८९] अथ तेषां गुणानाह गुणा यथैव रत्नानामुपरत्नेषु ते तथा। किन्तु किञ्चित्तो हीना विशेषोऽयमुदाहृतः ।।१९०।। उपरत्नों के गुण-रत्नों में जो गुण होते हैं वे ही गुण उपरत्नों में भी होते हैं किन्तु विशेषता यह है कि रत्नों की अपेक्षा इनमें स्वल्प होते हैं। [१९०] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

धात्वादिवर्गः ७८३ अथ विषम् । तस्य नाम भेदानाह विषं तु गरलः च्वेडस्तस्य भेदानुदाहरे । वत्सनाभः सहारिद्रः सक्तुकश्च प्रदीपनः ।। सौराष्ट्रिकः शृङ्गिकश्च कालकूटस्तथव च । हालाहलो ब्रह्मपुत्रो विषभेदा अमी नव ।।१९१।। विष के संस्कृत नाम-विष (नपुंसकलङ्गी), गरल तथा क्ष्वेड ये सब हैं। भेद-(१) वत्सनाभ, (२) हारिद्र, (३) सक्तुक, (४) प्रदीपन, (५) सौराष्ट्रिक, (६) शृङ्गिक, (७) कालकूट, (८) हालाहल, (९) ब्रह्मपुत्र ये ९ भेद स्थावर विष के होते हैं। [१९१] विषवर्ग वक्तव्य-यहाँ पर विषों के ९ भेद बतलाये गये हैं जिनमें से वत्सनाभ एवं शृङ्गिक व्यवहार में प्रयोग में लाये जाते हैं। अन्य विषों का व्यावहारिक ज्ञान लुप्तपाय है। वत्सनाभ एवं शृङ्गिक के नाम से जिन द्रव्यों का व्यवहार में उपयोग किया जाता है वह एकोनाइट (Aconite) की विभिन्न जातियों (Species) के मूल हैं किन्तु इनका जो स्वरूप निम्न मूल श्लोकों में वर्णन किया गया है वह एकोनाइट से पूर्ण रूप से मेल नहीं खाता। चूँकि एकोनाइट की और भी अनेक विषैली जातियाँ पाई जाती हैं इसलिये संभव है कि उपर्युक्त विषों में से कुछ अन्य भेद भी इन्हीं में से हों। इस संबन्ध में व्यापक अनुसंधान की आवश्यकता है। तत्र वत्सनाभः । तस्य स्वरूपनिरूपणमाह सिन्दुवारसदृक्पत्रो वत्सनाभ्याकृतिस्तथा । यत्पार्श्वे न तरोर्वृद्धिर्वत्सनाभः स भाषितः ।।१९२।। वत्सनाभ विष के स्वरूप का वर्णन-जिसके पत्ते संभालू के पत्तों के समान हों तथा आकार बछड़े की नाभि के समान हो और जिसके नजदीक दूसरे वृक्षों की वृद्धि न हो सकती हो उसे 'वत्सनाभ' समझना चाहिये । [१९२] वक्तव्य-व्यवहार में जिस द्रव्य का उपयोग किया जाता है उससे उपर्युक्त वर्णन मेल नहीं खाता। वत्सनाभ हिं०-विष, मीठा विष, वच्छनाग, वचनाग, तेलिया विष । बं०-कठ विष, वत्सनाब विष, विष । म०- बचनाग । गु०-बच्छनाग, वसनाग । क०-वसनाबी । ते०-नाभि, वसनाभि । पं०-मीठा विष । ता०-वत्सनाभि । अ०-विष । फा०-विषनाग, जहर । अं०-Aconite (एकोनाइट) । ले०-Aconitum ferox Wall. (एकोनाइटम फेरॉक्स) । Fam. Ranunculaceae (रेनन्क्यूलेसी) । यह हिमालय की चोटियों पर, नेपाल तथा आसाम में उत्पन्न होता है। इसका क्षुप-१-२ हाथ ऊँचा होता है। पत्ते-करतलाकार एवं अनेक भागों में विभक्त होते हैं। पुष्प-लम्बे पुष्पडण्ड पर नीले पुष्प आते हैं। मूल-युग्म एवं कंदसदृश होता है जिसमें नये वर्ष का कन्द १-११/५ इञ्च लम्बा २/५-३/५ इञ्च मोटा, अंडाकार आयताकार से लेकर दीर्घवृत्ताकार, कुछ सूत्राकार उपमूलों से युक्त एवं तोड़ने पर कुछ पिष्टमय पीताभ होता है तथा पहले वर्ष का कन्द बहुत सिकुड़ा हुआ एवं झुर्रीदार होता है। इसमें गन्ध नहीं होती और स्वाद में पहले मीठा और फिर कुछ कड़वा जान पड़ता है। चबाने से थोड़ी देर बाद चिनचिनाहट और शून्यता मालूम होती है जो कुछ समय तक बनी रहती है। वक्तव्य-भारत में एकोनाइट (Aconite) की २४ जातियाँ (Species) पाई जाती हैं। एकोनाइटम नेपेल्लस (Aconitum napellus Linn.) जो ब्रिटिश फार्माकोपिया में मान्य है अपने यहाँ नहीं होता । उसका प्रतिनिधि ए. चॅस्मेन्थमू है जिसका विस्तृत वर्णन आगे शृङ्गिक के अन्तर्गत किया गया है। यह ए. नेपेल्लस से अधिक वीर्यवाला होता

७८४ भावप्रकाशनिघण्टुः है। यह भी बाजार में कम आता है। ए. फेराक्स के नाम से बाजार में इसके साथ ए. डिनोहाइझम (A. deinorrhizum Stapf) एवं ए. बालफोराई (A. balfourii Stapf) के मूल अधिक मात्रा में आते हैं। इसमें ए. लेसिनिएटम (A. laciniatum Stapf) एवं ए. स्पाइकैटम (A. spicatum Stapf) के मूलों का भी मिश्रण रहता है। इन्हीं में से सफेद जाति के नाम से ए. डिनोहाइझम तथा ए. बालफोराई के मूल बिकते हैं। वत्सनाभ तथा शृङ्गिक इन्हीं विभिन्न जातियों में से हैं तथा इनके गुणकर्मों में समानता होने के कारण एक का दूसरे के स्थान पर प्रयोग होता है। शृङ्ग के समान मूल वैसे तो कुछ-कुछ सभी जातियों का है किन्तु ए. डिनोहाइझम का कुछ अधिक शृङ्ग समान मालूम होता है। मूलों को काला बनाने के लिये व्यापारी कई प्रक्रियाओं को करते हैं। एक में इन्हें कसीस के साथ गोमूत्र में भिंगोकर उबालते हैं तथा बाद में सुखाकर ऊपर से सरसों का तेल लगा देते हैं। ऐसी धारणा है कि इस विधि से इसमें कीड़े नहीं लगते। उपर्युक्त विषैली जातियों के अतिरिक्त एकोनाइट की कुछ ऐसी भी जातियाँ हैं जिनमें विषैलापन नहीं होता जैसे- अतिविषा एवं प्रतिविषा। इनको मुख में रखने से चुनचुनाहट नहीं होती जैसी विषैली जातियों में होती है। इनका वर्णन पहले हरीतक्यादि वर्ग में (पृष्ठ १२७) किया गया है। इन विषैली जातियों के गुणधर्मों में समानता होने के कारण इसके गुण, प्रयोग आदि आगे शृङ्गिक के साथ ही दिये गये हैं। अथ हारिद्रः । तस्य स्वरूपनिरूपणमाह हरिद्रातुल्यमूलो यो हारिद्रः स उदाहृतः ।।१९३।। हारिद्र विष का स्वरूप-हल्दी के तुल्य जिसकी जड़ हो उसे "हारिद्र विष" कहते हैं। [१९३] अथ सक्तुकः । तस्य स्वरूपमाह यद्ग्रन्थिः सक्तुकेनैव पूर्णमध्यः स सक्तुकः ।।१९४।। सक्तुक का स्वरूप-जिसकी गाँठें भीतर से सत्तू के समान चूर्ण से युक्त हों वह "सक्तुक" विष कहलाता है। [१९४] अथ प्रदीपनः । तस्य स्वरूपमाह वर्णतो लोहितो यः स्याद्दीप्तिमान् दहनप्रभः । महादाहकरः पूर्वैः कथितः स प्रदीपनः ।।१९५।। प्रदीपन विष का स्वरूप-जिसका वर्ण लाल हो तथा जो अग्नि के समान कान्ति वाला एवम् अत्यन्त दाहकारक हो उसे "प्रदीपन" विष पूर्व के विद्वानों ने कहा है। [१९५] अथ सौराष्ट्रिकः । तस्य स्वरूपमाह सुराष्ट्रविषये यः स्यात्स सौराष्ट्रिक उच्यते ।।१९६।। सौराष्ट्रिक विष का स्वरूप-सुराष्ट्र (गुजरात) देश में जो उत्पन्न होने वाला विष है उसे "सौराष्ट्रिक" कहते हैं। [१९६] अथ शृङ्गिकः । तस्य स्वरूपमाह यस्मिन् गोशृङ्गके बद्धे दुग्धं भवति लोहितम् । स शृङ्गिक इति प्रोक्तो द्रव्यतत्त्वविशारदैः ।।१९७।। शृङ्गिक का स्वरूप-द्रव्यों के तत्त्व को जानने वाले पण्डितों ने उसे "शृङ्गिक" कहा है जिसे गौ के सींग में बाँध देने से उसका दूध लाल वर्ण का हो जाता हो। [१९७] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

धात्वादिवर्गः ७८५ श्रृङ्गिक विष वक्तव्य-इससे संबंधित वक्तव्य पहले विषवर्ग एवं वत्सनाभ के साथ लिखा गया है जिसे पाठक वहीं देखें। एकोनाइट की एक महत्त्व की जाति का वर्णन, गुण, प्रयोग आदि यहाँ दिया जा रहा है जो सभी विषैली एकोनाइट के लिये सामान्य है। वत्सनाभ से निम्न जाति अधिक वीर्यवान् होने के कारण ग्रन्थोक्त प्रमाण से इसको आधी मात्रा में योगों में डालना चाहिये। सं०-शृङ्गिक (जो रोग को नष्ट करे या जो शृङ्ग के सदृश हो)। हिं०-मोहरी, पिऊं, सिंधिया विष। कश्मी०- बनबलनग, मोहरी। अं०-Indian Aconite (इण्डियन एकोनाइट)। ले०-Aconitum chasmanthum Stapf ex Holmes (एकोनाइटम चेस्मेन्थम)। Fam. Ranuncula eae (रेनन्क्यूलेसी)। यह पश्चिम हिमालय के चित्राल एवं हजारा से कश्मीर तक, ७००० से १२००० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। इसका क्षुप-द्विवर्षायु एवं २ से ४ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-अनेक, नीचे के अधिक लम्बे वृन्त युक्त फलक १³/₄-२³/₄ इञ्च लम्बा एवं २-३³/₄ इञ्च चौड़ा, करतलाकार त्रिखण्डित जिनके खण्ड अनेक रेखाकार भागों में विभक्त रहते हैं। पुष्प-नीले या नील मिश्रित श्वेताभ प्रायः १ फीट लम्बे गुच्छ में आते हैं। फल-फलियां कंगूरेदार होती हैं। मूल-युग्म एवं कन्दसदृश होता है। नये वर्ष का कन्द शंक्वाकार, शंक्वाकार-बेलनाकार, आधार की तरफ चौड़ा, क्वचित् २ इञ्च तक लम्बा एवं ¹/₂-³/₄ इञ्च मोटा, गहरे भूरे या कृष्णाभ भूरे रंग का, चिकना किन्तु सूखने पर झुर्रीदार एवं अनेक उपमूलों या टेटे हुये उनके चिह्नों से युक्त होता है। तोड़ने पर भग्न उपास्थिसदृश (Cartilaginous), कठोर, बाह्य भाग में भूरापन लिये हुए एवं भीतर श्वेत होता है। प्रथमवर्ष का कंद सिकुड़ा हुआ एवं गहरी झुर्रियों से युक्त होता है। यह बाहर से कृष्ण एवं अन्दर सम्पूर्ण भूरा होता है। इनका स्वाद प्रारम्भ में कुछ कड़वा तथा बाद में चुनचुनाहट बनी रहती है। इनका संग्रह सितम्बर के अंत में किया जाता है। शोधन-इन्हीं मूलों का शोधन के पश्चात् चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। इनको टुकड़े-टुकड़े कर, ३ दिन ताजे गोमूत्र में भिंगोकर, चौथे दिन गाय के दूध में दोलायंत्र में ३ घंटे मंद आँच पर पकावे। फिर उष्णजल से धोकर छाया में सुखा लें। इस विधि से इनका विषैलापन कम हो जाता है। बाह्य प्रयोग के लिये अशोधित द्रव्य का उपयोग किया जा सकता है। रासायनिक संगठन-इसमें इण्डेकोनाइटिन (Indaconitine, C₃₄ H₄₇ O₁₀ N) नामक विषैला क्षाराभ ४.३% होता है। यह क्षाराभ की मात्रा ब्रिटिश फार्माकोपिया में मान्य द्रव्य ए. नेपेल्लस से १० गुना अधिक है किन्तु एकोनाइटिन से केवल ०.७ गुना कार्यकार है। इसके विलयन की अत्यल्प मात्रा को जिह्वाग्र पर लगाने से उसी की तरह चुनचुनाहट होती है। इसके अतिरिक्त इसमें एकोनाइटिक एसिड एवं स्टार्च पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, व्यवायि, ज्वरघ्न, स्वेदजनन, हृदयोत्तेजक, पीड़ामक, शोथहर, कफवातहर एवं बल्य है। यह अत्यन्त विषैला होने के कारण इसका सावधानी के साथ प्रयोग करना चाहिये। आधुनिक मत के अनुसार इसके प्रयोग से वातनाड़ियों के परिसरीय अंतिम भागों की क्रिया कम हो जाती है। अल्प मात्रा में इसका हृदय पर कोई परिणाम नहीं होता है किन्तु अधिक मात्रा से नाड़ी की गति तथा शक्ति कम होती है जिससे रक्त का दबाव भी कम हो जाता है। हृदय के विकारों में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। आयुर्वेद में इसका प्रयोग अन्य औषधियों के साथ ज्वर, अतिसार, अग्निमांद्य, ग्रहणी, कास, श्वास एवं वातरोगों में किया जाता है। शोथ के कारण जब ज्वर हो तथा शरीर के किसी अंग में पीड़ा हो तो इससे अच्छा लाभ होता है। ५३ भाव.I

? No. Let's look at १/१२ से १/८ रत्ती।- actually, look at the spacing:मात्रा- १/१२ से १/८ रत्ती।orमात्रा-१/१२? There's a tiny space or hyphen: मात्रा- १/१२ से १/८ रत्ती।(or१/१६`). Let's render it faithfully.

Let's continue to line 12:
`अथ कालकूटः । तस्योत्पत्तिं स्वरूपञ्चाह`
(Wait, `स्वरूपञ्चाह` or `स्वरूपं चाह`? Image has no space: `तस्योत्पत्तिं स्वरूपञ्चाह`)

Line 13 (Shloka 198, first half):
`देवासुररणे देवैर्हतस्य पृथुमालिनः । दैत्यस्य रुधिराज्जातस्तरुराश्वत्थसन्निभः ॥`
Wait, let's re-examine that word:
`त रु` then what?
Look at the characters:
`त`
`रु`
then a character: it has a top horizontal bar, a vertical down, wait, it's `र्`?
Wait, let's look at:
`त` `रु` `र्` `ह्व` `श्व` `त्थ`?

धात्वादिवर्गः ७८७ उपयोग—इनमें ब्राह्मण जाति का विष—रसायन के कार्य में, क्षत्रिय जाति का विष—शरीर को पुष्ट करने के लिये, वैश्य जाति का विष—कुष्ठ दूर करने के लिये तथा शूद्र जाति का विष—वध करने के कार्य में उपयोगी होता है। [२०१-२०२] अथ विषस्य दुर्गुणानाह विषं प्राणहरं प्रोक्तं व्यवायि च विकाशि च। आग्नेयं वातकफहृद्योगवाहि मदावहम् ।।२०३।। विष के दुर्गुण—विष—प्राणनाशक, व्यवायी, विकाशी, आग्नेय, वात तथा कफ नाशक, योगवाही तथा मदावह होता है। [२०३] ❖ व्यवायि = सकलकायगुणव्यापनपूर्वकं पाकगमनशीलम्। विकाशि = ओजः शोषपूर्वकं सन्धिबन्धशिथिलीकरणशीलम्। आग्नेयम् = अधिकाग्न्यंशम्। योगवाहि = सङ्गिगुणग्राहकम्। मदावहं = तमोगुणाधिक्येन बुद्धिविध्वंसकम् ।।२०३।। यहाँ पर मूल में "व्यवायि" का "प्रथम सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर तत्पश्चात् पचने वाला" यह अर्थ समझना चाहिये और "विकाशि" पद का 'शरीर में स्थित ओज को सुखाता हुआ सारे सन्धिबन्धनों को शिथिल करने वाला"; "आग्नेयम्" पद का "अधिक अग्नि के अंश से युक्त"; "योगवाहि" पद का "अपने साथी के गुणों को उत्तेजित करने वाला" तथा "मदावहम्" पद का "तमो गुण की अधिकता से बुद्धि का विध्वंस करने वाला" यह अर्थ समझना चाहिये। [२०३] अथ शोधितविषस्य गुणानाह तदेव युक्तियुक्तं तु प्राणदायि रसायनम्। योगवाहि त्रिदोषघ्नं बृंहणं वीर्यवर्द्धनम् ।।२०४।। शुद्ध किया हुआ विष—यदि पूर्वोक्त विषों को युक्ति युक्त करके अर्थात् शास्त्रानुकूल शुद्ध करके खाया जाय तो वे ही प्राण शक्ति को बढ़ाने वाले, रसायन (जरा-अपमृत्यु को दूर करने वाले), योगवाही, त्रिदोषनाशक, बृंहण (रस रक्तादि वर्धक) एवं वीर्यवर्धक हो जाते हैं। [२०४] अथ विषशोधनस्यावश्यकतामाह ये दुर्गुणा विषेऽशुद्धे ते स्युर्हीना विशोधनात्। तस्माद्विषं प्रयोगेषु शोधयित्वा प्रयोजयेत् ।।२०५।। विषों के शोधने की आवश्यकता—जो दुर्गुण अशुद्ध (बिना शोधे हुए) विष में कहे हुये हैं, वे सब शोधन करने से अत्यन्त कम हो जाते हैं। अतः औषधियों में विष का शोधन करके ही प्रयोग करना उचित है। [।२०५] अथोपविषाः । तेषां निरूपणमाह अर्कक्षीरं स्नुहीक्षीरं लाङ्गली करवीरकः । गुञ्जाऽहिफेनो धत्तूरः सप्तोपविषजातयः ।।२०६।। उपविषों का निरूपण—(१) मदार का दूध, (२) थूहर का दूध, (३) कलिहारी, (४) कनेर, (५) घुंमची, (६) अफीम एवं (७) धतूरा ये सात उपविष की जातियाँ हैं। [२०६] उपविषाः = गौणविषाः । एषां गुणास्तत्र तत्र द्रष्टव्याः ।।२०६।। यहाँ पर मूल में "उपविषः" का "गौणविष" यह अर्थ समझना चाहिये और इन सब के गुण जहाँ-जहाँ पर पहले उल्लिखित हों वहाँ-वहाँ पर कृपया देख लें, जैसे—

७८८ भावप्रकाशनिघण्टुः मंदार के दूध का गुण— गुडूच्यादिवर्ग— पृ० ४७८ थूहर के ,, ,, ,, ४८२ कलिहारीका गुण ,, ,, ४८७ कनेर का ,, ,, ,, ४८९ गुञ्जा का ,, ,, ५२५ अफीम का ,, हरीतक्यादिवर्ग— ,, ३३८ धतूरे का ,, गुडूच्यादिवर्ग— ,, ४९२ गूगल ,, कर्पूरादिवर्ग— ,, ३९० इन सब स्थानों पर देख लें । इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे धात्वादिवर्गः समाप्तः ।

अथ नवमो धान्यवर्गः तत्र धान्यानां भेदाः । तानाह शालिधान्यं व्रीहिधान्यं शूकधान्यं तृतीयकम् । शिम्बीधान्यं क्षुद्रधान्यमित्युक्तं धान्यपञ्चकम् ।। १ ।। धान्यों के भेद-(१) शालिधान्य, (२) व्रीहिधान्य, (३) शूकधान्य, (४) शिम्बीधान्य, (५) क्षुद्रधान्य ये ५ भेद हैं। अथ शाल्यादीनां भेदानाह शालयो रक्तशाल्याद्या व्रीहयः षष्टिकादयः । यवादिकं शूकधान्यं मुद्गान्यं मुद्गाद्यं शिम्बिधान्यकम् ।। कङ्ग्वादिकं क्षुद्रधान्यं तृणधान्यञ्च तत्स्मृतम् ।। २ ।। शालिधान्य आदि के भेद-शालिधान्य के-रक्तशालि (लाल चावल) आदि, व्रीहिधान्य के-षष्टिक (साठी) आदि, शूकधान्य के-जौ आदि, शिम्बीधान्य के-मूँग आदि, क्षुद्रधान्य के कंगुनी आदि भेद है और क्षुद्रधान्य का नामान्तर तृणधान्य भी है । [२] अथ शालिधान्यम् तस्य लक्षणमाह कण्डनेन विना शुक्ला हैमन्ताः शालयः स्मृताः ।। ३ ।। शालिधान्य के लक्षण-बिना कूटे ही जो सफेद होते हों तथा हेमन्त ऋतु में उत्पन्न हों वे शालिधान्य (जड़हन) कहलाते हैं । [३] अथ शालयः (चावल) । तेषां जातिभेदेन नामान्याह रक्तशालिः सकलमः पाण्डुकः शकुनाहृतः । सुगन्धकः कर्दमको महाशालिश्च दूषकः ।। ४ ।। पुष्पाण्डकः पुण्डरीकस्तथा महिषमस्तकः । दीर्घशूकः काञ्चनको हायनो लोध्रपुष्पकः ।। ५ ।। इत्याद्याः शालयः सन्ति बहवो बहुदेशजाः । ग्रन्थविस्तरभीतेस्ते समस्ता नात्र भाषिताः ।। ६ ।। शाली (चावलो) के जातिभेद से नाम-रक्तशालि, कलम, पाण्डुक, शकुनाहृत, सुगन्धक, कर्दमक, महाशालि, दूषक, पुष्पाण्डक, पुण्डरीक, महिषमस्तक, दीर्घशूक, काञ्चनक, हायन और लोध्रपुष्पक इत्यादि शालि (चावल) बहुत से देशों में उत्पन्न होने वाले अनेक प्रकार के होते हैं, जिनका यहाँ पर पूर्ण वर्णन ग्रन्थ के बढ़ जाने के भय से नहीं किया जा रहा है । [४-६] अथ शालीनां गुणानाह शालयो मधुराः स्निग्धा बल्या बद्धाल्पवर्चसः । कषाया लघवो रुच्याः स्वर्या वृष्याश्च बृंहणाः ।। अल्पानिलकफाः शीताः पित्तघ्ना मूत्रलास्तथा ।। ७ ।। शालियों (अगहनी चावलों) के गुण-शालि (अगहनी चावल) मधुर तथा कषाय रसयुक्त, स्निग्ध, बलकारक, थोड़ी मात्रा में बँधे हुये मल को निकालने वाले, लघु, रुचिकारक, कण्ठ स्वर को उत्तम बनाने वाले, वृष्य (वीर्यवर्धक), बृंहण (रसरक्तादिवर्धक), किंचित् वात तथा कफ कारक, शीतल, पित्तनाशक और मूत्रल (मूत्र की अधिक मात्रा में उत्पन्न करने वाले) होते हैं। [७]

७९० भावप्रकाशनिघण्टुः अथ दग्धमृज्जातशालिगुणानाह शालयो दग्धमृज्जाताः कषाया लघुपाकिनः । सृष्टमूत्रपुरीषाश्च रूक्षाः श्लेष्मापकर्षणाः ॥८॥ जली हुई मिट्टी में उत्पन्न होने वाले शालि के गुण—जो शालि (अगहनी चावल)—जली हुई मिट्टी में उत्पन्न हुये हैं वे कषाय रसयुक्त, लघुपाकी (शीघ्र पचनेवाले), मूत्र तथा मल को निकालने वाले, रूक्ष तथा कफ का अपकर्षण करने वाले अर्थात् बढ़े हुये कफ को कम करने वाले होते हैं। [८] अथ कैदारशालिगुणानाह कैदारा वातपित्तघ्ना गुरवः कफशुक्रलाः । कषायाश्चाल्पवर्चस्का मेध्याश्चैव बलावहाः ॥९॥ केदार (जुते हुये खेत) में बोने से उत्पन्न हुए जो चावल होते हैं वे–कषाय रसयुक्त, वात-पित्त नाशक, गुरु, कफ तथा शुक्र की वृद्धि करने वाले, थोड़ी मात्रा में मल को निकालने वाले, मेधाशक्ति के लिये हितकर तथा बलकारक होते हैं। [९] ❖ कैदाराः = कृष्टक्षेत्रजा उप्ताः ॥९॥ यहाँ पर मूल में 'कैदार' पद से 'जुते हुए खेत में बोने से उत्पन्न हुये चावल' यह अर्थ समझना चाहिये। [९] अथ स्थलजशालिगुणानाह स्थलजाः स्वादवः पित्तकफघ्ना वातवह्निदाः । किञ्चित्तिक्ताः कषायाश्च विपाके कटुका अपि ॥१०॥ स्थलज शालि के गुण—स्थलज (बिना जुती हुई भूमि में उत्पन्न हुये अर्थात् बिना जोते बोये स्वयम् उत्पन्न हुये) जो शालि होते हैं वे—स्वादिष्ट, पित्त तथा कफ नाशक, वात तथा जठराग्निवर्धक, किंचित् तिक्त रसयुक्त, कसैले तथा विपाक में कटु रसयुक्त होते हैं। [१०] ❖ स्थलजाः = अकृष्टभूमिजाताः स्वयं जाताः ॥१०॥ यहाँ पर मूल में 'स्थलज' पद से 'बिना जुती हुई भूमि में उत्पन्न हुये अर्थात् बिना जोते बोये स्वयम् उत्पन्न हुये' यह अर्थ समझना चाहिये। [१०] अथ वापितशालिगुणानाह वापिता मधुरा वृष्या बल्याः पित्तप्रणाशनाः । श्लेष्मलाश्चाल्पवर्चस्काः कषाया गुरवो हिमाः ॥११॥ ❖ वापिताः = कृष्टक्षेत्रेऽकृष्टक्षेत्रे च ॥११॥ बोये हुये शालि के गुण—वापित (जुते हुये या बिना जुते हुये खेत में बोने से उत्पन्न हुये) जो शालि (अगहनी चावल) हैं वे–मधुर तथा कषाय रसयुक्त, वीर्यवर्द्धक, बलकारक, पित्तनाशक, कफ जनक, थोड़ी मात्रा में मल को निकालने वाले, गुरु तथा शीतल होते हैं। [११] अथावापितशालिगुणानाह वापितेभ्यो गुणैः किञ्चिद्धीनाः प्रोक्ता अवापिताः ॥१२॥ अवापित शालि के गुण—वापित की अपेक्षा अवापित शालि गुणों में कुछ न्यून होते हैं। [१२] ❖ कृष्टक्षेत्रेऽकृष्टक्षेत्रे वा ॥१२॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

धान्यवर्गः ७९१ यहाँ पर भी मूल में ‘अवापित’ पद का वापित की भाँति ही जुते तथा बिना जुते खेत में बिना बोने से उत्पन्न हुये (अगहनी चावल) यह अर्थ समझना चाहिये। [१२] अथ नव-पुराण-रोपित-शालिगुणानाह रोपितास्तु नवा वृष्याः पुराणा लघवः स्मृताः। तेभ्यस्तुरोपिता भूयः शीघ्रपाका गुणाधिकाः ।।१३।। रोपण किये शालि (चावल) यदि नये हों तो-वीर्यवर्धक और यदि पुराने हों तो लघु होते हैं और उन्हीं से पुनः रोपण किये हुये शालि (चावल)-शीघ्र पचनेवाले तथा अधिक गुणकारी होते हैं। [१३] अथ छिन्नरूढशालिगुणानाह छिन्नरूढा हिमा रूक्षा बल्याः पित्तकफापहाः। बद्धविट्काः कषायाश्च लघवश्चाल्पतिक्तकाः ।।१४।। जो काटने के पश्चात् पुनः उगे हुये शालि (चावल) होते हैं वे-शीतल, रूक्ष, बलकारक, पित्त तथा कफ नाशक, मल को बाँधने वाले, कसैले, लघु तथा किञ्चित् तिक्त रसयुक्त होते हैं। [१४] अथ रक्तशालिः। तस्य गुणानाह रक्तशालिर्वरस्तेषु बल्यो वर्ण्यस्त्रिदोषजित्। चक्षुष्यो मूत्रलः स्वर्यः शुक्रलस्तृड्ज्वरापहः ।।१५।। विषव्रणश्वासकासदाहनुद् वह्निपुष्टिदः। तस्मादल्पान्तरगुणाः शालयो महदादयः ।।१६।। रक्तशालि-यह सभी शालिधान्यों में श्रेष्ठ होता है तथा बलकारक, शरीर के वर्ण को उत्तम करने वाला, त्रिदोषनाशक, नेत्रों के लिये हितकर, मूत्रजनक, कण्ठ स्वर को उत्तम करने वाला, शुक्रजनक, जठराग्नि को पुष्ट करने वाला एवम् तृषा, ज्वर, विष, व्रण, श्वास, कास तथा दाह को दूर करने वाला होता है और इसकी अपेक्षा महाशालि आदि जो दूसरे शालि (चावल) हैं वे स्वल्प गुण वाले होते हैं। [१५-१६] ❖ रक्तशालिः ‘दाऊदखानी’ इति लोके मगधदेशे प्रसिद्धः ।।१५-१६।। यहाँ पर मूल में “रक्तशालि” से मगध देश में “दाऊदखानी” नाम से प्रसिद्ध चावल समझना चाहिये। [१५-१६] अथ व्रीहिधान्यम् तस्य लक्षणसहितान् भेदान् गुणाँश्चाह वार्षिकाः कण्डिताः शुक्ला व्रीहयश्चिरपाकिनः। कृष्णव्रीहिः पाटलश्च कुक्कुटाण्डक इत्यपि ।।१७।। शालामुखो जतुमुख इत्याद्या व्रीहयः स्मृताः। कृष्णव्रीहिःस विज्ञेयो यत्कृष्णतुषतण्डुल ।।१८।। पाटलः पाटलापुष्पवर्णको व्रीहिरुच्यते। कुक्कुटाण्डाकृतिर्व्रीहिः कुक्कुटाण्डक उच्यते ।।१९।। शालामुखः कृष्णशूकः कृष्णतण्डुल उच्यते। लाक्षावर्णं मुखं यस्य ज्ञेयो जतुमुखस्तु सः ।।२०।। व्रीहयः कथिताः पाके मधुरा वीर्यतो हिमाः। अल्पाभिष्यन्दिनो बद्धवर्चस्का षष्टिकैः समाः ।। कृष्णव्रीहिर्वरस्तेषां तस्मादल्पगुणाः परे ।।२१।। व्रीहिधान्य के लक्षण-जो चावल वर्षा ऋतु में पैदा होते हैं अर्थात् पक कर तैयार होते हैं एवम् ओखली में छाँटने से जो सफेद होते हैं तथा देर में पकते हैं वे व्रीहिधान्य कहलाते हैं। व्रीहिधान्य के भेद-कृष्णव्रीहि, पाटल, कुक्कुटाण्डक, शालामुख और जतुमुख ये सब व्रीहि धान्य के भेद हैं। कृष्णव्रीहि के लक्षण-जिसकी भूसी तथा चावल दोनों काले हों वे “कृष्णव्रीहि” कहलाते हैं। पाटल (व्रीहि) के लक्षण-जिसका रंग पाटला (पाढल) के पुष्प के सदृश हो वह पाटल (व्रीहि) कहलाता है। कुक्कुटाण्डक (व्रीहि) के लक्षण-आकार में जो मुर्गे के अण्डे के समान होता है उसे कुक्कुटाण्डक (व्रीहि) कहते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

७९२ भावप्रकाशनिघण्टुः शालामुख (व्रीहि) के लक्षण-जिसके शूक (धान्य के मुख पर रहने वाला सूक्ष्म, लम्बा काँटा) तथा चावल दोनों कृष्णवर्ण के हों उसे शालामुख (व्रीहि) समझना चाहिये। जतुमुख (व्रीहि) के लक्षण-जिसका मुख लाख के सदृश लाल रंग का हो उसे जतुमुख (व्रीहि) समझना चाहिये। व्रीहिधान्य-पाक में मधुर, शीतवीर्य, किञ्चित् अभिष्यन्दी, मल को बाँधने वाले, गुण में षष्टिक (साठी चावल) के समान होते हैं। इन व्रीहियों में कृष्णव्रीहि सर्वोत्तम होता है और इसकी अपेक्षा अन्य व्रीहिधान्य न्यून गुणवाले होते हैं। [१७-२१] अथ षष्टिकाः (साठीचावल)। तेषां लक्षणमाह गर्भस्या एव ये पाकं यान्ति ते षष्टिका मताः ॥२२॥ षष्टिक (साठी चावल) के लक्षण-जो धान्य-गर्भ में ही अर्थात् बिना फूटे ही पक जाते हैं, वे-षष्टिक धान्य कहलाते हैं (और ६० दिन में पक कर तैयार होने वाले धान को भी षष्टिक कहते हैं)। [२२] अथ तेषां नामान्याह षष्टिकः शतपुष्पश्च प्रमोदकमुकुन्दकौ। महाषष्टिक इत्याद्याः षष्टिकाः समुदाहृताः। एतेऽपि व्रीहयः प्रोक्ता व्रीहिलक्षणदर्शनात् ॥२३॥ षष्टिक (साठी धान्य) के भेद-षष्टिक, शतपुष्प, प्रमोदक, मुकुन्दक और महाषष्टिक ये सब षष्टिक के भेद हैं। और ये भी व्रीहि कहलाते हैं क्योंकि इनमें व्रीहि के लक्षण-वर्षा ऋतु में पक कर तैयार होना आदि देखे जाते हैं। [२३] अथ तेषां गुणानाह षष्टिका मधुरा शीता लघवो बद्धवर्चसः। वातपित्तप्रशमनाः शालिभिः सदृशा गुणैः ॥२४॥ षष्टिकधान्य मात्र-मधुर, शीतल, लघु, मल को बाँधने वाले, वात तथा पित्त को शमन करने वाले और गुणों में शालिधान्य के सदृश होते हैं। [२४] तत्र षष्टिकाया गुणानाह षष्टिका प्रवरा तेषां लघ्वी स्निग्धा त्रिदोषजित् ॥२५॥ स्वाद्वी मृद्वी ग्राहिणी च बलदा ज्वरहारिणी। रक्तशालिगुणैस्तुल्या ततः स्वल्पगुणाः परे ॥२६॥ षष्टिक नामक षष्टिक धान्य के गुण-षष्टिक-सम्पूर्ण षष्टिक धान्यों में उत्तम होता है और लघु, स्निग्ध, त्रिदोषनाशक, स्वादिष्ट, मृदु, ग्राही, बलदायक तथा ज्वर को दूर करने वाला और गुणों में रक्तशालि के समान होता है। शेष षष्टिकधान्य इसकी अपेक्षा स्वल्प गुणवाले होते हैं। [२५-२६] १. चावल (धान) हिं०-चावल, धान। म०-तांदूल, भात। गु०-भात, चोरवा। बं०-धान, चावल। ता०-अरशी, नेल्लु। ते०-धान्यमु, ओदलु। क०-भट्टा। अं०-Rice (राइस), Paddy (पॅड्डी-धान)। ले०-Oryza sativa Linn. (ओरिझा सटाइवा)। Fam. Gramineae. (ग्रेमिनी)। यह सभी स्थानों पर कृषित होता है। इसका क्षुप-छोटा, जलीय, वर्षायु होता है। काण्ड गोल एवं पोला होता है। पत्ते-बहुत, खुरदरे, पतले तथा भालाकार होते हैं। पुष्प-गुच्छ के रूप में, अनेक शाखायुक्त तथा झुके हुए रहते

धान्यवर्गः ७९३ हैं जिनमें पुंकेशर ६ तथा स्त्रीकेशर की कुक्षि पंखसदृश एवं संख्या में २ होती हैं। लाल चावल में स्त्रीकेशर लाल रहते हैं। यद्यपि चावल की एक ही जाति (Species) है तथापि इसके सैकड़ों प्रकार पाये जाते हैं। भावप्रकाशकार भी इससे सहमत होते हुए इसके मुख्य ४ भेद, (१) शालि, (२) रक्तशालि, (३) व्रीहि एवं (४) षष्टिक करते हैं। इनमें से प्रथम हेमन्त ऋतु में पककर तैयार होता है। दूसरा लाल रंग का होता है। तीसरा वर्षाकाल में पककर तैयार होता है। चौथा ६० दिन में या जल्दी तैयार होता है। अधिकतर प्रथम ही होता है। स्थानभेद, पकने के ऋतु के भेद, पकने के काल (अवधि) भेद, चावल के अन्दर रहने वाले पिष्टमय पदार्थ, चावल या धान के रंग, आकार, नाप, शूक रहित या शूक युक्त भेद से इसके अनेक प्रकार मिलते हैं। घटिया किस्म में अधिकतर लाल चावल के प्रकार पाये जाते हैं। यह लाली बहुत अन्दर तक नहीं रहती। किसी- किसी अच्छे प्रकार में भी लाल चावल होते हैं तथा उनका स्वाद भी अच्छा होता है। इसीलिए कहीं-कहीं चावल को रंग देते हैं किन्तु यह रंग जल से धोने पर निकल जाता है। नये चावल की अपेक्षा पुराना चावल सुपाच्य होता है। परीक्षणों से देखा गया है कि नये चावल की पचन क्षमता पुराने की अपेक्षा आधी से कम होती है। रखने से इसमें से स्टार्च में परिवर्तन होने से यह प्रभाव देखा जाता है। पकाने में भी नये का भात चिपचिपा तथा गोला सा हो जाता है किन्तु पुराने का बहुत अच्छा बनता है। चावल साफ करने की विधि के अनुसार भी चावल के पोषक तत्त्वों में परिवर्तन हो जाता है। कुछ उबाल कर फिर धान छुड़ाये हुए भुजिया चावल (Paraboiled-पैराबॉइल्ड) में तथा हाथ कुटे चावल में, मिल से साफ किये हुये की अपेक्षा नाइट्रोजन द्रव्य अधिक रहते हैं। निम्नलिखित तालिका से इसका अन्तर साफ मालूम होता है। रासायनिक संगठन-

- - -जलअलब्यूनिनाम द्रव्यस्नेहकार्बोहाइड्रेटरेशाराख
हाथ कुटा चावल१२.२८.५०.६७८.००.६०.७
मिल का साफ किया हुआ चावल१३.०६.९०.४७९.२०.५
भुजिया, हाथकुटा चावल१२.६८.५०.६७७.४०.९
भुजिया, मिल का साफ किया हुआ चावल१३.३६.४०.४७९.१०.८
लावा१४.७७.५०.१७४.३३.४
चिउड़ा१२.२६.६१.२७८.२१.८

गुण और प्रयोग-प्रधान भोजन के रूप में अनेक प्रान्तों में इसका उपयोग किया जाता है। इसको अधिक जल में पतला पकाकर अतिसार, संग्रहणी तथा अन्य पाचन के विकारों में देते हैं। चावल की धोवन दाहशामक तथा स्नेहन होने से ज्वर, दाह एवं आंत्रिकप्रदाह आदि में दी जाती है।