भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 842, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 842

धान्यवर्गः ७९१ यहाँ पर भी मूल में ‘अवापित’ पद का वापित की भाँति ही जुते तथा बिना जुते खेत में बिना बोने से उत्पन्न हुये (अगहनी चावल) यह अर्थ समझना चाहिये। [१२] अथ नव-पुराण-रोपित-शालिगुणानाह रोपितास्तु नवा वृष्याः पुराणा लघवः स्मृताः। तेभ्यस्तुरोपिता भूयः शीघ्रपाका गुणाधिकाः ।।१३।। रोपण किये शालि (चावल) यदि नये हों तो-वीर्यवर्धक और यदि पुराने हों तो लघु होते हैं और उन्हीं से पुनः रोपण किये हुये शालि (चावल)-शीघ्र पचनेवाले तथा अधिक गुणकारी होते हैं। [१३] अथ छिन्नरूढशालिगुणानाह छिन्नरूढा हिमा रूक्षा बल्याः पित्तकफापहाः। बद्धविट्काः कषायाश्च लघवश्चाल्पतिक्तकाः ।।१४।। जो काटने के पश्चात् पुनः उगे हुये शालि (चावल) होते हैं वे-शीतल, रूक्ष, बलकारक, पित्त तथा कफ नाशक, मल को बाँधने वाले, कसैले, लघु तथा किञ्चित् तिक्त रसयुक्त होते हैं। [१४] अथ रक्तशालिः। तस्य गुणानाह रक्तशालिर्वरस्तेषु बल्यो वर्ण्यस्त्रिदोषजित्। चक्षुष्यो मूत्रलः स्वर्यः शुक्रलस्तृड्ज्वरापहः ।।१५।। विषव्रणश्वासकासदाहनुद् वह्निपुष्टिदः। तस्मादल्पान्तरगुणाः शालयो महदादयः ।।१६।। रक्तशालि-यह सभी शालिधान्यों में श्रेष्ठ होता है तथा बलकारक, शरीर के वर्ण को उत्तम करने वाला, त्रिदोषनाशक, नेत्रों के लिये हितकर, मूत्रजनक, कण्ठ स्वर को उत्तम करने वाला, शुक्रजनक, जठराग्नि को पुष्ट करने वाला एवम् तृषा, ज्वर, विष, व्रण, श्वास, कास तथा दाह को दूर करने वाला होता है और इसकी अपेक्षा महाशालि आदि जो दूसरे शालि (चावल) हैं वे स्वल्प गुण वाले होते हैं। [१५-१६] ❖ रक्तशालिः ‘दाऊदखानी’ इति लोके मगधदेशे प्रसिद्धः ।।१५-१६।। यहाँ पर मूल में “रक्तशालि” से मगध देश में “दाऊदखानी” नाम से प्रसिद्ध चावल समझना चाहिये। [१५-१६] अथ व्रीहिधान्यम् तस्य लक्षणसहितान् भेदान् गुणाँश्चाह वार्षिकाः कण्डिताः शुक्ला व्रीहयश्चिरपाकिनः। कृष्णव्रीहिः पाटलश्च कुक्कुटाण्डक इत्यपि ।।१७।। शालामुखो जतुमुख इत्याद्या व्रीहयः स्मृताः। कृष्णव्रीहिःस विज्ञेयो यत्कृष्णतुषतण्डुल ।।१८।। पाटलः पाटलापुष्पवर्णको व्रीहिरुच्यते। कुक्कुटाण्डाकृतिर्व्रीहिः कुक्कुटाण्डक उच्यते ।।१९।। शालामुखः कृष्णशूकः कृष्णतण्डुल उच्यते। लाक्षावर्णं मुखं यस्य ज्ञेयो जतुमुखस्तु सः ।।२०।। व्रीहयः कथिताः पाके मधुरा वीर्यतो हिमाः। अल्पाभिष्यन्दिनो बद्धवर्चस्का षष्टिकैः समाः ।। कृष्णव्रीहिर्वरस्तेषां तस्मादल्पगुणाः परे ।।२१।। व्रीहिधान्य के लक्षण-जो चावल वर्षा ऋतु में पैदा होते हैं अर्थात् पक कर तैयार होते हैं एवम् ओखली में छाँटने से जो सफेद होते हैं तथा देर में पकते हैं वे व्रीहिधान्य कहलाते हैं। व्रीहिधान्य के भेद-कृष्णव्रीहि, पाटल, कुक्कुटाण्डक, शालामुख और जतुमुख ये सब व्रीहि धान्य के भेद हैं। कृष्णव्रीहि के लक्षण-जिसकी भूसी तथा चावल दोनों काले हों वे “कृष्णव्रीहि” कहलाते हैं। पाटल (व्रीहि) के लक्षण-जिसका रंग पाटला (पाढल) के पुष्प के सदृश हो वह पाटल (व्रीहि) कहलाता है। कुक्कुटाण्डक (व्रीहि) के लक्षण-आकार में जो मुर्गे के अण्डे के समान होता है उसे कुक्कुटाण्डक (व्रीहि) कहते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA