भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७९२ भावप्रकाशनिघण्टुः शालामुख (व्रीहि) के लक्षण-जिसके शूक (धान्य के मुख पर रहने वाला सूक्ष्म, लम्बा काँटा) तथा चावल दोनों कृष्णवर्ण के हों उसे शालामुख (व्रीहि) समझना चाहिये। जतुमुख (व्रीहि) के लक्षण-जिसका मुख लाख के सदृश लाल रंग का हो उसे जतुमुख (व्रीहि) समझना चाहिये। व्रीहिधान्य-पाक में मधुर, शीतवीर्य, किञ्चित् अभिष्यन्दी, मल को बाँधने वाले, गुण में षष्टिक (साठी चावल) के समान होते हैं। इन व्रीहियों में कृष्णव्रीहि सर्वोत्तम होता है और इसकी अपेक्षा अन्य व्रीहिधान्य न्यून गुणवाले होते हैं। [१७-२१] अथ षष्टिकाः (साठीचावल)। तेषां लक्षणमाह गर्भस्या एव ये पाकं यान्ति ते षष्टिका मताः ॥२२॥ षष्टिक (साठी चावल) के लक्षण-जो धान्य-गर्भ में ही अर्थात् बिना फूटे ही पक जाते हैं, वे-षष्टिक धान्य कहलाते हैं (और ६० दिन में पक कर तैयार होने वाले धान को भी षष्टिक कहते हैं)। [२२] अथ तेषां नामान्याह षष्टिकः शतपुष्पश्च प्रमोदकमुकुन्दकौ। महाषष्टिक इत्याद्याः षष्टिकाः समुदाहृताः। एतेऽपि व्रीहयः प्रोक्ता व्रीहिलक्षणदर्शनात् ॥२३॥ षष्टिक (साठी धान्य) के भेद-षष्टिक, शतपुष्प, प्रमोदक, मुकुन्दक और महाषष्टिक ये सब षष्टिक के भेद हैं। और ये भी व्रीहि कहलाते हैं क्योंकि इनमें व्रीहि के लक्षण-वर्षा ऋतु में पक कर तैयार होना आदि देखे जाते हैं। [२३] अथ तेषां गुणानाह षष्टिका मधुरा शीता लघवो बद्धवर्चसः। वातपित्तप्रशमनाः शालिभिः सदृशा गुणैः ॥२४॥ षष्टिकधान्य मात्र-मधुर, शीतल, लघु, मल को बाँधने वाले, वात तथा पित्त को शमन करने वाले और गुणों में शालिधान्य के सदृश होते हैं। [२४] तत्र षष्टिकाया गुणानाह षष्टिका प्रवरा तेषां लघ्वी स्निग्धा त्रिदोषजित् ॥२५॥ स्वाद्वी मृद्वी ग्राहिणी च बलदा ज्वरहारिणी। रक्तशालिगुणैस्तुल्या ततः स्वल्पगुणाः परे ॥२६॥ षष्टिक नामक षष्टिक धान्य के गुण-षष्टिक-सम्पूर्ण षष्टिक धान्यों में उत्तम होता है और लघु, स्निग्ध, त्रिदोषनाशक, स्वादिष्ट, मृदु, ग्राही, बलदायक तथा ज्वर को दूर करने वाला और गुणों में रक्तशालि के समान होता है। शेष षष्टिकधान्य इसकी अपेक्षा स्वल्प गुणवाले होते हैं। [२५-२६] १. चावल (धान) हिं०-चावल, धान। म०-तांदूल, भात। गु०-भात, चोरवा। बं०-धान, चावल। ता०-अरशी, नेल्लु। ते०-धान्यमु, ओदलु। क०-भट्टा। अं०-Rice (राइस), Paddy (पॅड्डी-धान)। ले०-Oryza sativa Linn. (ओरिझा सटाइवा)। Fam. Gramineae. (ग्रेमिनी)। यह सभी स्थानों पर कृषित होता है। इसका क्षुप-छोटा, जलीय, वर्षायु होता है। काण्ड गोल एवं पोला होता है। पत्ते-बहुत, खुरदरे, पतले तथा भालाकार होते हैं। पुष्प-गुच्छ के रूप में, अनेक शाखायुक्त तथा झुके हुए रहते