भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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७८४ भावप्रकाशनिघण्टुः है। यह भी बाजार में कम आता है। ए. फेराक्स के नाम से बाजार में इसके साथ ए. डिनोहाइझम (A. deinorrhizum Stapf) एवं ए. बालफोराई (A. balfourii Stapf) के मूल अधिक मात्रा में आते हैं। इसमें ए. लेसिनिएटम (A. laciniatum Stapf) एवं ए. स्पाइकैटम (A. spicatum Stapf) के मूलों का भी मिश्रण रहता है। इन्हीं में से सफेद जाति के नाम से ए. डिनोहाइझम तथा ए. बालफोराई के मूल बिकते हैं। वत्सनाभ तथा शृङ्गिक इन्हीं विभिन्न जातियों में से हैं तथा इनके गुणकर्मों में समानता होने के कारण एक का दूसरे के स्थान पर प्रयोग होता है। शृङ्ग के समान मूल वैसे तो कुछ-कुछ सभी जातियों का है किन्तु ए. डिनोहाइझम का कुछ अधिक शृङ्ग समान मालूम होता है। मूलों को काला बनाने के लिये व्यापारी कई प्रक्रियाओं को करते हैं। एक में इन्हें कसीस के साथ गोमूत्र में भिंगोकर उबालते हैं तथा बाद में सुखाकर ऊपर से सरसों का तेल लगा देते हैं। ऐसी धारणा है कि इस विधि से इसमें कीड़े नहीं लगते। उपर्युक्त विषैली जातियों के अतिरिक्त एकोनाइट की कुछ ऐसी भी जातियाँ हैं जिनमें विषैलापन नहीं होता जैसे- अतिविषा एवं प्रतिविषा। इनको मुख में रखने से चुनचुनाहट नहीं होती जैसी विषैली जातियों में होती है। इनका वर्णन पहले हरीतक्यादि वर्ग में (पृष्ठ १२७) किया गया है। इन विषैली जातियों के गुणधर्मों में समानता होने के कारण इसके गुण, प्रयोग आदि आगे शृङ्गिक के साथ ही दिये गये हैं। अथ हारिद्रः । तस्य स्वरूपनिरूपणमाह हरिद्रातुल्यमूलो यो हारिद्रः स उदाहृतः ।।१९३।। हारिद्र विष का स्वरूप-हल्दी के तुल्य जिसकी जड़ हो उसे "हारिद्र विष" कहते हैं। [१९३] अथ सक्तुकः । तस्य स्वरूपमाह यद्ग्रन्थिः सक्तुकेनैव पूर्णमध्यः स सक्तुकः ।।१९४।। सक्तुक का स्वरूप-जिसकी गाँठें भीतर से सत्तू के समान चूर्ण से युक्त हों वह "सक्तुक" विष कहलाता है। [१९४] अथ प्रदीपनः । तस्य स्वरूपमाह वर्णतो लोहितो यः स्याद्दीप्तिमान् दहनप्रभः । महादाहकरः पूर्वैः कथितः स प्रदीपनः ।।१९५।। प्रदीपन विष का स्वरूप-जिसका वर्ण लाल हो तथा जो अग्नि के समान कान्ति वाला एवम् अत्यन्त दाहकारक हो उसे "प्रदीपन" विष पूर्व के विद्वानों ने कहा है। [१९५] अथ सौराष्ट्रिकः । तस्य स्वरूपमाह सुराष्ट्रविषये यः स्यात्स सौराष्ट्रिक उच्यते ।।१९६।। सौराष्ट्रिक विष का स्वरूप-सुराष्ट्र (गुजरात) देश में जो उत्पन्न होने वाला विष है उसे "सौराष्ट्रिक" कहते हैं। [१९६] अथ शृङ्गिकः । तस्य स्वरूपमाह यस्मिन् गोशृङ्गके बद्धे दुग्धं भवति लोहितम् । स शृङ्गिक इति प्रोक्तो द्रव्यतत्त्वविशारदैः ।।१९७।। शृङ्गिक का स्वरूप-द्रव्यों के तत्त्व को जानने वाले पण्डितों ने उसे "शृङ्गिक" कहा है जिसे गौ के सींग में बाँध देने से उसका दूध लाल वर्ण का हो जाता हो। [१९७] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA