भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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धात्वादिवर्गः ७८५ श्रृङ्गिक विष वक्तव्य-इससे संबंधित वक्तव्य पहले विषवर्ग एवं वत्सनाभ के साथ लिखा गया है जिसे पाठक वहीं देखें। एकोनाइट की एक महत्त्व की जाति का वर्णन, गुण, प्रयोग आदि यहाँ दिया जा रहा है जो सभी विषैली एकोनाइट के लिये सामान्य है। वत्सनाभ से निम्न जाति अधिक वीर्यवान् होने के कारण ग्रन्थोक्त प्रमाण से इसको आधी मात्रा में योगों में डालना चाहिये। सं०-शृङ्गिक (जो रोग को नष्ट करे या जो शृङ्ग के सदृश हो)। हिं०-मोहरी, पिऊं, सिंधिया विष। कश्मी०- बनबलनग, मोहरी। अं०-Indian Aconite (इण्डियन एकोनाइट)। ले०-Aconitum chasmanthum Stapf ex Holmes (एकोनाइटम चेस्मेन्थम)। Fam. Ranuncula eae (रेनन्क्यूलेसी)। यह पश्चिम हिमालय के चित्राल एवं हजारा से कश्मीर तक, ७००० से १२००० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। इसका क्षुप-द्विवर्षायु एवं २ से ४ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-अनेक, नीचे के अधिक लम्बे वृन्त युक्त फलक १³/₄-२³/₄ इञ्च लम्बा एवं २-३³/₄ इञ्च चौड़ा, करतलाकार त्रिखण्डित जिनके खण्ड अनेक रेखाकार भागों में विभक्त रहते हैं। पुष्प-नीले या नील मिश्रित श्वेताभ प्रायः १ फीट लम्बे गुच्छ में आते हैं। फल-फलियां कंगूरेदार होती हैं। मूल-युग्म एवं कन्दसदृश होता है। नये वर्ष का कन्द शंक्वाकार, शंक्वाकार-बेलनाकार, आधार की तरफ चौड़ा, क्वचित् २ इञ्च तक लम्बा एवं ¹/₂-³/₄ इञ्च मोटा, गहरे भूरे या कृष्णाभ भूरे रंग का, चिकना किन्तु सूखने पर झुर्रीदार एवं अनेक उपमूलों या टेटे हुये उनके चिह्नों से युक्त होता है। तोड़ने पर भग्न उपास्थिसदृश (Cartilaginous), कठोर, बाह्य भाग में भूरापन लिये हुए एवं भीतर श्वेत होता है। प्रथमवर्ष का कंद सिकुड़ा हुआ एवं गहरी झुर्रियों से युक्त होता है। यह बाहर से कृष्ण एवं अन्दर सम्पूर्ण भूरा होता है। इनका स्वाद प्रारम्भ में कुछ कड़वा तथा बाद में चुनचुनाहट बनी रहती है। इनका संग्रह सितम्बर के अंत में किया जाता है। शोधन-इन्हीं मूलों का शोधन के पश्चात् चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। इनको टुकड़े-टुकड़े कर, ३ दिन ताजे गोमूत्र में भिंगोकर, चौथे दिन गाय के दूध में दोलायंत्र में ३ घंटे मंद आँच पर पकावे। फिर उष्णजल से धोकर छाया में सुखा लें। इस विधि से इनका विषैलापन कम हो जाता है। बाह्य प्रयोग के लिये अशोधित द्रव्य का उपयोग किया जा सकता है। रासायनिक संगठन-इसमें इण्डेकोनाइटिन (Indaconitine, C₃₄ H₄₇ O₁₀ N) नामक विषैला क्षाराभ ४.३% होता है। यह क्षाराभ की मात्रा ब्रिटिश फार्माकोपिया में मान्य द्रव्य ए. नेपेल्लस से १० गुना अधिक है किन्तु एकोनाइटिन से केवल ०.७ गुना कार्यकार है। इसके विलयन की अत्यल्प मात्रा को जिह्वाग्र पर लगाने से उसी की तरह चुनचुनाहट होती है। इसके अतिरिक्त इसमें एकोनाइटिक एसिड एवं स्टार्च पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, व्यवायि, ज्वरघ्न, स्वेदजनन, हृदयोत्तेजक, पीड़ामक, शोथहर, कफवातहर एवं बल्य है। यह अत्यन्त विषैला होने के कारण इसका सावधानी के साथ प्रयोग करना चाहिये। आधुनिक मत के अनुसार इसके प्रयोग से वातनाड़ियों के परिसरीय अंतिम भागों की क्रिया कम हो जाती है। अल्प मात्रा में इसका हृदय पर कोई परिणाम नहीं होता है किन्तु अधिक मात्रा से नाड़ी की गति तथा शक्ति कम होती है जिससे रक्त का दबाव भी कम हो जाता है। हृदय के विकारों में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। आयुर्वेद में इसका प्रयोग अन्य औषधियों के साथ ज्वर, अतिसार, अग्निमांद्य, ग्रहणी, कास, श्वास एवं वातरोगों में किया जाता है। शोथ के कारण जब ज्वर हो तथा शरीर के किसी अंग में पीड़ा हो तो इससे अच्छा लाभ होता है। ५३ भाव.I