भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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धात्वादिवर्गः ७६१ अथ रङ्गम् (राँगा)। तस्य नामानि भेदांश्चाह रङ्गं वङ्गं त्रपु प्रोक्तं तथा पिच्चटमित्यपि। खुरकं मिश्रकं चापि द्विविधं वङ्ग मुच्यते।।२९।। उत्तमं खुरकं तत्र मिश्रकं त्ववरं मतम्।।३०।। राँगा के संस्कृत नाम-रङ्ग, वङ्ग, त्रपु तथा पिच्चट ये सब हैं। राँगा के भेद-खुरक तथा मिश्रक ये दो भेद राँगा के होते हैं। इसमें “खुरक” उत्तम होता है एवम् “मिश्रक” निकृष्ट होता है ऐसा विद्वानों का मत है। [२९-३०] अथ सम्यङ्भारितरङ्गगुणानाह रङ्गं लघु सरं रूक्षमुष्णं मेहकफक्रिमीन्। निहन्ति पाण्डुं सश्वासं चक्षुष्यं पित्तलं मनाक् ।।३१।। सिंहो यथा हस्तिगणं निहन्ति तथैव वङ्गोऽखिलमेहवर्गम्। देहस्य सौख्यं प्रबलेन्द्रियत्वं नरस्य पुष्टिं विदधाति नूनम् ।।३२।। अच्छे प्रकार से भस्म किये हुये राँगे के गुण—राँगा का उत्तम भस्म—लघु, सारक, रूक्ष, उष्ण, नेत्रों के लिये हितकर, किञ्चित् पित्तजनक एवम्-प्रमेह, कफ, क्रिमि, पाण्डु और श्वास रोग को दूर करता है। और जिस प्रकार सिंह हाथियों के झुण्ड को नष्ट कर डालता है उसी प्रकार वंग (राँगा) भी सभी प्रकार के प्रमेहों को नष्ट कर डालता है। और देह सम्बन्धी सुख, इन्द्रियों की प्रबलता और पुष्टि ये सब सेवन करने वाले लोगों को निश्चित रूप से करता है। [३१-३२] अथ यशदम् (जस्ता)। तस्य नामगुणानाह यशदं रङ्गसदृशं रीतिहेतुश्च तन्मतम्। यशदं तुवरं तिक्तं शीतलं कफपित्तहृत्। चक्षुष्यं परमं मेहान् पाण्डुं श्वासं च नाशयेत् ।।३३।। जस्ता के संस्कृत नाम-यशद, रङ्गसदृश और रीतिहेतु ये सब हैं। जस्ता-कषाय तथा तिक्तरसयुक्त, शीतल, नेत्रों के लिये परम हितकर-एवम्-कफ-पित्त-समस्त प्रमेह-पाण्डु और श्वास को दूर करता है। [३३] अथ सीसम् (सीसा)। तस्योत्पत्तिं नामानि चाह दृष्ट्वा भोगिसुतां रम्यां वासुकिस्तु मुमोच यत्। वीर्यं जातस्ततो नागः सर्वरोगापहा नृणाम् ।।३४।। सीसं ब्रध्नं च वप्रं च योगेष्टं नागनामकम् ।।३५।। सीसा की उत्पत्ति—एक समय वासुकिनामक सर्पराज का किसी सुन्दरी नागकन्या को देखकर कामपीडित होने से जो शुक्र स्खलित हुआ उसी से मनुष्यों के सम्पूर्ण रोगों को नष्ट करने वाले सीसे की उत्पत्ति हुई इसी से इसे “नाग” कहते हैं। सीसा के संस्कृत नाम-सीस, ब्रध्न, वप्र, योगेष्ट और नागनामक (नाग के पर्यायवाची) शब्द, ये सब हैं। [३४-३५] ❖ नागनामकम् = नागो भुजङ्ग इत्यादि ।।३५।। यहाँ पर मूल में “नागनामक” पद से नाग के पर्यायवाची-नाग-भुजङ्ग-सर्प-उरग-द्विजिह्व इत्यादि सभी शब्द समझना चाहिये। [३४-३५] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA