भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६० भावप्रकाशनिघण्टुः अथ ताम्रम्। तस्योत्पत्तिमाह शुक्रं यत् कार्तिकेयस्य पतितं धरणीतले। तस्मात्ताम्रं समुत्पन्नमिदमाहुः पुराविदः ।।२२।। ताँबा की उत्पत्ति-कार्तिकेय भगवान् का जो शुक्र पृथ्वीतल पर गिरा उसी से ताँबे की उत्पत्ति हुई ऐसा पुराणज्ञ लोग कहते हैं। [२२] अथ ताम्रनामान्याह ताम्रमौदुम्बरं शुल्बमुदुम्बरमपि स्मृतम्। रविप्रियं म्लेच्छमुखं सूर्यपर्यायनामकम् ।।२३।। ताँबा के संस्कृत नाम-ताम्र, औदुम्बर, शुल्ब, उदुम्बर, रविप्रिय, म्लेच्छमुख तथा सूर्य के पर्याय वाची (अर्क- तपन-अहस्कर-भास्कर इत्यादि सभी) शब्द ये सब हैं। [२३] अथोत्तमताम्रलक्षणान्याह जपाकुसुमसदृशं स्निग्धं मृदु घनक्षमम्। लौहनागोज्झितं ताम्रं मारणाय प्रशस्यते ।।२४।। उत्तम ताँबा के लक्षण-भस्म करने के लिये वही ताँबा उत्तम होता है जो कि-अढ़ौल के फूल के समान लाल वर्ण वाला, स्निग्ध, कोमल, घन की चोट सहने वाला, लोहा तथा सीसा से रहित होता है। [२४] अथाधमताम्रलक्षणान्याह कृष्णं रूक्षमतिस्तब्धं श्वेतञ्चापि घनासहम्। लौहनागयुतञ्चेति शुल्बं दुष्टं प्रकीर्त्तितम् ।।२५।। निकृष्ट ताँबा के लक्षण-जो ताँबा-काला, रूखा, अत्यन्त कठिन, सफेद, घन की चोट न सहने वाला, लोहा तथा सीसा से युक्त होता है उसे निकृष्ट अर्थात् भस्म करने के अयोग्य समझना चाहिये। [२५] अथ सम्यङ्मारितताम्रगुणानाह ताम्रं कषायं मधुरं च तिक्तमम्लं च पाके कटु सारकं च। पित्तापहं श्लेष्महरं च शीतं तद्रोपणं स्याल्लघु लेखनञ्च ।।२६।। पाण्डूदराशोर्ज्वरकुष्ठकासश्वासक्षयान् पीनसमम्लपित्तम्। शोथं कृमिं शूलमपाकरोति प्राहुः परे बृंहणमल्पमेतत् ।।२७।। अच्छी प्रकार से भस्म किये हुये ताँबे के गुण-उत्तम ताम्रभस्म-कषाय, मधुर, तिक्त तथा अम्लरस युक्त, विपाक में कटु रस युक्त, सारक, पित्त तथा कफ नाशक, शीतल, रोपण (घाव भरने वाला), लघु, लेखन एवम्-पाण्डु तथा उदर रोग, अर्श, ज्वर, कुष्ठ, कास श्वास, क्षय, पीनस, अम्लपित्त, शोथ, क्रिमि तथा शूल का नाश करने वाला होता है। और कोई-कोई इसे थोड़ा बृंहण (रस रक्तादिवर्धक) भी मानते हैं। [२६-२७] अथसम्यङ्मारितताम्रस्य दोषाष्टकमाह एको दोषो विषे ताम्रेत्वसम्यङ्मारितेऽष्टते। दाहः स्वेदोऽरुचिर्मूर्च्छाक्लेदो रेको वमिर्भ्रमः ।।२८।। अच्छे प्रकार से भस्म न किये हुये ताँबे के आठ दोष-विष में तो केवल एक ही दोष है किन्तु अच्छे प्रकार ये भस्म न किये हुए ताँबे में (१) दाह, (२) स्वेद (पसीना), (३) अरुचि, (४) मूर्च्छा, (५) क्लेद (शरीर की आर्द्रता), (६) विरेचन, (७) वमन तथा ८ भ्रम का होना ये ८ दोष होते हैं अर्थात् उसके सेवन से उक्त दोष उत्पन्न होते हैं। [२८] ❖ रेकः = विरेकः ।।२८।। यहाँ पर मूल में 'रेक' पद से विरेक अर्थात् विरेचन अर्थ समझना चाहिये। [२८]