भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 816, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंधात्वादिवर्गः ७६५ अथाशुद्धसुवर्णमाक्षिकदोषानाह मन्दानलत्वं बलहानिमुग्रां विष्टम्भितां नेत्रगदान्सकुष्ठान्। तथैव मालां व्रणपूर्विकां च करोति तापीजमशुद्धमेतत् ।। ६१ ।। अशुद्ध सोनामाखी के दोष-यदि यह सोनामाखी शोधी हुई न हो तो अग्नि की मन्दता, बल की हानि, अत्यन्त विष्टम्भ, नेत्ररोग, कुष्ठ तथा व्रणमाला (कण्ठमाला) आदि रोगों को उत्पन्न करने वाली होती है। [६१] अथ तारमाक्षिकम् (रूपामाखी) तस्य नामानि गुणाँश्चाह तारमाक्षिकमन्यत् तु तद्भवेद् रजतोपमम्। किञ्चिद्रजतसाहित्यात्तारमाक्षिकमीरितम् ।। ६२ ।। अनुकल्पतया तस्या ततो हीनगुणाः स्मृताः। न केवलं रूप्यगुणा यतः स्यात्तारमाक्षिकम् ।। ६३ ।। स्वादु पाके रसे किञ्चित्तिक्तं वृष्यं रसायनम्। चक्षुष्यं बस्तिरुक्कुष्ठपाण्डुमेह विषोदरान् ।। अर्श शोथं क्षयङ्कण्डूं त्रिदोषमपि नाशयेत् ।। ६४ ।। रूपामाखी के संस्कृत नाम-तारमाक्षिक, रौप्यमाक्षिक आदि हैं। रूपामाखी-दूसरा जो रूपामाखी है वह गुण में चाँदी के तुल्य ही होता है और कुछ चाँदी का संयोग होने से इसे 'रूपामाखी' कहते हैं। चाँदी का अनुकल्प होने से उसकी अपेक्षा इसके गुण स्वल्प होते हैं। और इसमें केवल चाँदी ही के गुण नहीं रहते हैं बल्कि दूसरे द्रव्यों का भी योग होने से औरों के भी गुण आ जाते हैं। रूपामाखी-विपाक में मधुर रसयुक्त तथा मधुर एवं किञ्चित् तिक्तरसयुक्त, वीर्यवर्धक, रसायन, नेत्रों के लिये हितकर एवम् बस्ति (मूत्राशय) सम्बन्धी रोग, कुष्ठ, पाण्डु, प्रमेह, विष, उदररोग, अर्श, शोथ, क्षय, खुजली तथा त्रिदोष को दूर करता है। [६२-६४] अथाशुद्धतारमाक्षिकदोषानाह मन्दानलत्वं बलहानिमुग्रां विष्टम्भितां नेत्रगदान्सकुष्ठान्। तथैव मालां व्रणपूर्विकाञ्च करोति तापीजमिदञ्च तद्वत् ।। ६५ ।। अशुद्ध रूपामाखी के दोष-यह भी सोनामाखी की भाँति यदि शोधी हुई न हो तो अग्नि की मन्दता, बल की हानि, अत्यन्त विष्टम्भ, नेत्ररोग, कुष्ठ तथा व्रणमाला (गण्डमाला आदि) रोगों को उत्पन्न करती है। [६५] अथ तुत्थम् (तूतिया) खर्परञ्च (खपरिया) तुत्थनामगुणान् खर्परगुणाँश्चाह तुत्थं वितुन्नकं चापि शिखिग्रीवं मयूरकम्। तुत्थं ताम्रोपधातुर्हि किञ्चित्ताम्रेण तद्भवेत् ।। ६६ ।। किञ्चित्ताम्रगुणं तस्माद्वक्ष्यमाणगुणं च तत्। तुत्थकं कटुकं क्षारं कषायं वामकं लघु ।। ६७ ।। लेखनं भेदनं शीतं चक्षुष्यं कफपित्तहृत्। विषाश्मकुष्ठकण्डूघ्नं खर्परं चापि तद्गुणम् ।। ६८ ।। तूतिया के संस्कृत नाम-तुत्थ, वितुन्नक, शिखिग्रीव तथा मयूरक ये सब हैं। तूतिया-यह ताँबे का उपधातु है, इससे कुछ ताँबा का भी अंश इसमें रहता है अतः कुछ ताँबे के गुण और अन्य द्रव्यों के संयोग से आगे कहे हुए गुण इसमें होते हैं। तूतिया-कटु तथा कषायरस युक्त, क्षार, वमन कराने वाला, लघु, लेखन, मलभेदक, शीतल, नेत्रों के लिए हितकर, एवम् कफ-पित्त-विष-पथरी-कुष्ठ तथा खुजली को दूर करने वाला होता है। खपरिया-खपरिया भी तूतिया के समान गुण वाली होती है। [६६-६८] अथ कांस्यम् (काँसा)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह ताम्रत्रपुजमाख्यातं कांस्यं घोषं च कंसकम्। उपधातुर्भवेत्कांस्यं द्वयोस्तरणिराङ्गयोः ।। ६९ ।। कांस्यस्य तु गुणा ज्ञेयाः स्वयोनिसदृशाजनैः। संयोगजप्रभावेण तस्यान्येऽपि गुणाः स्मृता ।। ७० ।। कास्यं कषायं तिक्तोष्णं लेखनं विशदं सरम्। गुरु नेत्रहितं रूक्षं कफपित्तहरं परम् ।। ७१ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA