भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 817

७६६ भावप्रकाशनिघण्टुः काँसा के संस्कृत नाम—ताम्रत्रपुज, कांस्य, घोष तथा कंसक ये सब हैं । काँसा—ताँबा तथा राँगा इन दोनों का उपधातु काँसा होता है । अतः अपनी उत्पत्ति का मूलकारण ताँबा तथा राँगा के होने से लोग काँसा को उपर्युक्त धातुओं (ताँबा तथा राँगा) के सदृश गुणवाला बतलाते हैं, अर्थात् जो ताँबा तथा राँगा के गुण हैं वे ही काँसा के भी होते हैं परन्तु स्वल्पमात्रा में, अन्य द्रव्यों का भी संयोग होने से अन्यों के भी गुण होते हैं । काँसा—कषाय तथा तिक्त रसयुक्त, उष्ण, लेखन, विशद गुणयुक्त, सारक, गुरु, नेत्रों के लिए हितकर, रूक्ष तथा कफ और पित्त का नाशक होता है । [६९-७१] अथारकूटम् (पीतल-कच्चापीतल) । तस्यनामगुणानाह पित्तलं त्वारकूटं स्यादारो रीतिश्च कथ्यते । राजरीतिर्ब्रह्मरीतिः कपिला पिङ्गलापि च ॥७२॥ रीतिरप्युपधातुः स्यात्ताम्रस्य यशदस्य च । पित्तलस्य गुणा ज्ञेयाः स्वयोनिसदृशा जनैः ॥७३॥ संयोगजप्रभावेण तस्याप्यन्ये गुणाः स्मृताः ॥७४॥ रीतिकायुगलं रूक्षं तिक्तञ्च लवणं रसे । शोधनं पाण्डुरोगघ्नं कृमिघ्नं नातिलेखनम् ॥७५॥ पीतल के संस्कृत नाम—पित्तल, आरकूट, आर एवं रीति हैं । इसके दूसरे भेद के नाम—राजरीति, ब्रह्मरीति, कपिला तथा पिङ्गला ये सब हैं । पीतल—ताँबा तथा जस्ता का उपधातु है, इससे अपने मूलकारण (ताँबा तथा जस्ता) के सदृश ही इसके भी गुण लोगों ने बतलाये हैं और अन्य द्रव्यों के संयोग से इसमें अन्यों के भी गुण रहते हैं । दोनों प्रकार के पीतल-तिक्त तथा लवण रसयुक्त, रूक्ष, शोधक, अत्यन्त लेखन नहीं अर्थात् किञ्चित् लेखन एवम्—पाण्डु और कृमिरोग के नाशक हैं । [७२- ७५] सिन्दूरम् । तस्य नामगुणानाह सिन्दूरं रक्तरेणुश्च नागगर्भश्च सीसजम् । सीसोपधातुः सिन्दूरं गुणैस्तत्सीसवन्मतम् ॥७६॥ संयोगजप्रभावेण तस्यान्येऽपि गुणाः स्मृताः । सिन्दूरमुष्णं वीसर्पकुष्ठकण्डूविषापहम् । भग्नसन्धानजननं व्रणशोधनरोपणम् ॥७७॥ सिन्दूर के संस्कृत नाम—सिन्दूर, रक्तरेणु, नागगर्भ तथा सीसज ये सब हैं । सिन्दूर—सीसा का उपधातु सिन्दूर है, अतः सीसा के समान इसके भी गुण हैं, अन्य द्रव्यों के संयोग-प्रभाव से इसके अत्य भी गुण होते हैं । सिन्दूर— उष्ण एवम् वीसर्प, कुष्ठ, खुजली तथा विष का नाशक है तथा टूटी अस्थियों को जोड़ने वाला, व्रण का शोधन और रोपण (पूरा) करने वाला होता है । [७६-७७] अथ शिलाजतु (शिलाजीत) तस्योत्पत्तिं भेदान् नामानि गुणांश्चाह निदाघे धर्मसन्तप्ता धातुसारं धराधराः । निर्यासवत्प्रमुञ्चन्ति तच्छिलाजतु कीर्त्तितम् ॥७८॥ सौवर्णं राजतं ताम्रमायसं तच्चतुर्विधम् । शिलाजत्वद्रिजतु च शैलनिर्यास इत्यपि ॥७९॥ गैरेयमश्मजं चापि गिरिजं शैलधातुजम् । शिलाजं कटु तिक्तोष्णं कटुपाकं रसायनम् ॥८०॥ छेदि योगवहं हन्ति कफमे १हाश्मशर्कराः । मूत्रकृच्छ्रं क्षयं श्वासं वातार्शांसि च पाण्डुताम् ॥८१॥ अपस्मारं तथोन्मादं शोथकुष्ठोदरकृमीन् ॥८२॥ १. मेदोश्मशर्कराः इति पाठ० ।