भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
७६६ भावप्रकाशनिघण्टुः काँसा के संस्कृत नाम—ताम्रत्रपुज, कांस्य, घोष तथा कंसक ये सब हैं । काँसा—ताँबा तथा राँगा इन दोनों का उपधातु काँसा होता है । अतः अपनी उत्पत्ति का मूलकारण ताँबा तथा राँगा के होने से लोग काँसा को उपर्युक्त धातुओं (ताँबा तथा राँगा) के सदृश गुणवाला बतलाते हैं, अर्थात् जो ताँबा तथा राँगा के गुण हैं वे ही काँसा के भी होते हैं परन्तु स्वल्पमात्रा में, अन्य द्रव्यों का भी संयोग होने से अन्यों के भी गुण होते हैं । काँसा—कषाय तथा तिक्त रसयुक्त, उष्ण, लेखन, विशद गुणयुक्त, सारक, गुरु, नेत्रों के लिए हितकर, रूक्ष तथा कफ और पित्त का नाशक होता है । [६९-७१] अथारकूटम् (पीतल-कच्चापीतल) । तस्यनामगुणानाह पित्तलं त्वारकूटं स्यादारो रीतिश्च कथ्यते । राजरीतिर्ब्रह्मरीतिः कपिला पिङ्गलापि च ॥७२॥ रीतिरप्युपधातुः स्यात्ताम्रस्य यशदस्य च । पित्तलस्य गुणा ज्ञेयाः स्वयोनिसदृशा जनैः ॥७३॥ संयोगजप्रभावेण तस्याप्यन्ये गुणाः स्मृताः ॥७४॥ रीतिकायुगलं रूक्षं तिक्तञ्च लवणं रसे । शोधनं पाण्डुरोगघ्नं कृमिघ्नं नातिलेखनम् ॥७५॥ पीतल के संस्कृत नाम—पित्तल, आरकूट, आर एवं रीति हैं । इसके दूसरे भेद के नाम—राजरीति, ब्रह्मरीति, कपिला तथा पिङ्गला ये सब हैं । पीतल—ताँबा तथा जस्ता का उपधातु है, इससे अपने मूलकारण (ताँबा तथा जस्ता) के सदृश ही इसके भी गुण लोगों ने बतलाये हैं और अन्य द्रव्यों के संयोग से इसमें अन्यों के भी गुण रहते हैं । दोनों प्रकार के पीतल-तिक्त तथा लवण रसयुक्त, रूक्ष, शोधक, अत्यन्त लेखन नहीं अर्थात् किञ्चित् लेखन एवम्—पाण्डु और कृमिरोग के नाशक हैं । [७२- ७५] सिन्दूरम् । तस्य नामगुणानाह सिन्दूरं रक्तरेणुश्च नागगर्भश्च सीसजम् । सीसोपधातुः सिन्दूरं गुणैस्तत्सीसवन्मतम् ॥७६॥ संयोगजप्रभावेण तस्यान्येऽपि गुणाः स्मृताः । सिन्दूरमुष्णं वीसर्पकुष्ठकण्डूविषापहम् । भग्नसन्धानजननं व्रणशोधनरोपणम् ॥७७॥ सिन्दूर के संस्कृत नाम—सिन्दूर, रक्तरेणु, नागगर्भ तथा सीसज ये सब हैं । सिन्दूर—सीसा का उपधातु सिन्दूर है, अतः सीसा के समान इसके भी गुण हैं, अन्य द्रव्यों के संयोग-प्रभाव से इसके अत्य भी गुण होते हैं । सिन्दूर— उष्ण एवम् वीसर्प, कुष्ठ, खुजली तथा विष का नाशक है तथा टूटी अस्थियों को जोड़ने वाला, व्रण का शोधन और रोपण (पूरा) करने वाला होता है । [७६-७७] अथ शिलाजतु (शिलाजीत) तस्योत्पत्तिं भेदान् नामानि गुणांश्चाह निदाघे धर्मसन्तप्ता धातुसारं धराधराः । निर्यासवत्प्रमुञ्चन्ति तच्छिलाजतु कीर्त्तितम् ॥७८॥ सौवर्णं राजतं ताम्रमायसं तच्चतुर्विधम् । शिलाजत्वद्रिजतु च शैलनिर्यास इत्यपि ॥७९॥ गैरेयमश्मजं चापि गिरिजं शैलधातुजम् । शिलाजं कटु तिक्तोष्णं कटुपाकं रसायनम् ॥८०॥ छेदि योगवहं हन्ति कफमे १हाश्मशर्कराः । मूत्रकृच्छ्रं क्षयं श्वासं वातार्शांसि च पाण्डुताम् ॥८१॥ अपस्मारं तथोन्मादं शोथकुष्ठोदरकृमीन् ॥८२॥ १. मेदोश्मशर्कराः इति पाठ० ।
धात्वादिवर्गः ७६७ शिलाजीत की उत्पत्ति—ग्रीष्म ऋतु में धूप से तप्त होकर पर्वत धातुओं के सार भाग को गोंद की भाँति छोड़ते हैं अर्थात् पर्वतों पर गर्मी में जो धातुओं का सार पिघल कर पत्थरों से निकलता है—उसे “शिलाजीत" कहते हैं। भेद- (१) सौवर्ण (सोने का), (२) रजत (चांदी का), (३) ताम्र (तांबे का), (४) आयस (लोहे का) इस भाँति शिलाजीत के ४ भेद हैं। संस्कृत नाम-शिलाजतु, अद्रिजतु, शैलनिर्यास, गैरेय, अश्मज, गिरिज तथा शैलधातुज ये सब हैं। शिलाजीत-कटु तथा तिक्त रस युक्त, पाक में कटु, रसायन, मलों का छेदन करने वाला, योगवाही एवम्-कफ, प्रमेह, पथरी, शर्करा, मूत्रकृच्छ्र, क्षय, श्वास, बादी बवासीर, पाण्डुरोग, अपस्मार, उन्माद, शोथ, कुष्ठ तथा उदर के क्रिमि इन सबों को नष्ट करने वाला होता है। [७८-८२] अथ गुणलक्षणसहिताँस्तद्भेदानाह सौवर्णं तु जपापुष्पवर्णं भवति तद्रसात् । मधुरं कटु तिक्तं च शीतलं कटुपाकि च ।।८३।। रजतं पाण्डुरं शीतं कटुकं स्वादुपाकि च । ताम्रं मयूरकण्ठाभं तीक्ष्णमुष्णं च जायते ।।८४।। लौहं जटायुपक्षाभं सतिक्तं लवणं भवेत् । विपाके कटुकं शीतं सर्वश्रेष्ठमुदाहृतम् ।।८५।। सौवर्ण (सोने का) शिलाजीत के लक्षण-यह जपा (अढ़ौल) के पुष्प के समान लाल वर्ण का होता है। सौवर्णशिलाजीत-यह मधुर, कटु तथा तिक्त रस युक्त, विपाक में कटु रस युक्त तथा शीतल होता है। रजत (चाँदी का) शिलाजीत के लक्षण-यह पाण्डुर वर्ण का होता है। रजत शिलाजीत-यह कटु रस युक्त, विपाक में मधुर रस युक्त तथा शीतल होता है। ताम्र (ताँबे का) शिलाजीत के लक्षण-यह मयूर के कण्ठ के समान वर्ण वाला होता है। ताम्रशिलाजीत- यह तीक्ष्ण तथा उष्ण होता है। लौह (लोहे का) शिलाजीत के लक्षण-यह जटायु (गिद्ध) के पक्ष के सदृश वर्ण वाला होता है। लौह शिलाजीत-यह तिक्त तथा लवण रसयुक्त, विपाक में कटु रस युक्त तथा शीतल होता है और यही सर्वश्रेष्ठ होता है। [८३-८५] अथ रसः । तत्र रसशब्दस्य निरुक्तिमाह रसायनार्थिभिर्लोकैः पारदो रस्यते यतः। ततो रस इति प्रोक्तः स च धातुरपि स्मृतः ।।८६।। रस शब्द की निरुक्ति-रसायन को चाहने वाले लोग इस पारे का सेवन (भक्षण) करते हैं इससे यह ‘रस’ कहलाता है। और शरीर का पोषण करने से 'धातु' भी कहलाता है अर्थात् रस तथा धातु पद से पारे का बोध किया जाता है। [८६] अथ पारदः । तस्योत्पत्तिं भेदानाह शिवाङ्गात्प्रच्युतं रेत: पतितं धरणीतले। तद्देहसारजातत्वाच्छुक्लमच्छमभूच्च तत् ।।८७।। क्षेत्रभेदेन विज्ञेयं शिववीर्यं चतुर्विधम् । श्वेतं रक्तं तथा पीतं कृष्णं तत् तु भवेत्क्रमात् ।। ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रश्च खलु जातितः ।।८८।। श्वेतं शस्तं रुजां नाशे रक्तं किल रसायने। धातुवादे तु तत्पीतं खे गतौ कृष्णमेव च ।।८९।। पारे की उत्पत्ति-श्री शिवजी के अंग से स्खलित होकर जो वीर्य पृथ्वी पर गिरा वही ‘पारा' हुआ। और देह के सारभाग (वीर्य) से उत्पन्न होने से वह सफेद तथा स्वच्छ हुआ। भेद-क्षेत्रभेद से शिववीर्य (पारा) चार प्रकार का होता
७६८ भावप्रकाशनिघण्टुः है। जैसे—सफेद, लाल, पीला तथा काला और ये क्रम से ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र ४ जाति के कहलाते हैं अर्थात् ब्राह्मण जाति का पारा सफेद वर्ण का, क्षत्रिय जाति का लाल वर्ण का, वैश्य जाति का पीले वर्ण का और शूद्र जाति का काले वर्ण का होता है। उपर्युक्त भेदों का उपयोग—सफेद वर्ण का पारा—रोगों के नाश करने में उत्तम होता है। लाल वर्ण का पारा—रसायन के कार्य में, पीले वर्ण का पारा—धातुवाद अर्थात् सोना-चाँदी आदि बनाने के कार्य में और काले वर्ण का पारा आकाश गमन के कार्य में उत्तम होता है। [८७-८९] अथ पारदस्य नामगुणानाह पारदो रसधातुश्च रसेन्द्रश्च महारसः ।।९०।। चपलः शिववीर्यश्च रसः सूतः शिवाह्वयः । पारदः षड्रसः स्निग्धस्त्रिदोषघ्नो रसायनः ।।९१।। योगवाही महावृष्यः सदा दृष्टिबलप्रदः । सर्वामयहरः प्रोक्तो विशेषात्सर्वकुष्ठनुत् ।।९२।। पारा के संस्कृत नाम—पारद, रसधातु, रसेन्द्र, महारस, चपल, शिववीर्य, रस, सूत, शिवजी के नामवाचक सभी शब्द। (जैसे—शिव, रुद्र, हर, धूर्जटि इत्यादि) ये सब हैं। पारद—पारा मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय तथा तिक्त इन छ रसों से युक्त, स्निग्ध, त्रिदोष नाशक, रसायन, योगवाही, अत्यन्त वीर्यवर्धक, सदा नेत्रों की शक्ति तथा बल को देने वाला, सम्पूर्ण रोगों को दूर करने वाला तथा विशेष रूप से कुष्ठ का नांशक होता है। [९०-९२] अथ पारदस्यावस्थाभेदेन नामानि सर्वश्रेष्ठतां चाह स्वस्थो रसो भवेद् ब्रह्मा बद्धो ज्ञेयो जनार्दनः । रञ्जितः १कामितश्चापि साक्षाद्देवो महेश्वरः ।।९३।। मूर्च्छितो हरति रुजं बन्धनमनुभूय खे गतिं कुरुते। अजरीकरोति हि मृतः कोऽन्यः करुणाऽऽकरः सूतात्।।९४।। असाध्यो यो भवेद्रोगो यस्य नास्ति चिकित्सितम् ।। रसेन्द्रो हन्ति तं रोगं नरकुञ्जरवाजिनाम् ।।९५।। पारे का अवस्था भेद से नाम—स्वस्थ पारा—ब्रह्मा, बद्ध (बँधा हुआ) पारा—जनार्दन (विष्णु), रञ्जित तथा कामित पारा—साक्षात् महेश्वर संज्ञक होता है। पारे की सर्वश्रेष्ठता—पारा—मूर्च्छित होकर रोगों को दूर करता है और बन्धन का अनुभव करके अर्थात् बद्धपारा— आकाश में चलने की शक्ति देता है और मरा हुआ होकर अर्थात् मृतपारा—मनुष्यों को अजर (वृद्धावस्थाशून्य) करता है, अतः पारे से बढ़ कर कोई दूसरा कृपासागर नहीं हो सकता है। मनुष्य, हाथी तथा घोड़ों के जो रोग असाध्य हो गये हों अथवा जिन रोगों की चिकित्सा नहीं हो सकती है ऐसे रोगों को केवल पारा ही दूर कर देता है। [९३-९५] अथ फलनिर्देशपूर्वकं पारदस्थितदोषानाह मलं विषं वह्निगिरित्वचापलं नैसर्गिकं दोषमुशन्ति पारदे । उपाधिजौ द्वौ त्रपुनागयोगजौ दोषौ रसेन्द्रे कथितौ मुनीश्वरैः ।।९६।। मलेन मूर्च्छा मरणं विषेण दाहोऽग्निना कष्टतरः शरीरे । देहस्य जाड्यं गिरिणा सदा स्युश्चाञ्चल्यतो वीर्यहृतिश्च पुंसाम् । वङ्गेन कुष्ठं भुजगेन षण्ढो भवेदतोऽसौ परिशोधनीयः ।।९७।। वह्निर्विषं मलं चेति मुख्या दोषास्त्रयो रसे । एते कुर्वन्ति सन्तापं मृतिं मूर्च्छा नृणांक्रमात् ।।९८।। अन्येऽपि कथिता दोषा भिषग्भिः पारदे यदि । तथाऽप्येते त्रयो दोषा हरणीया विशेषतः ।।९९।। १. क्रामित इति पाठो० ।
धात्वादिवर्गः ७६९ पारे के स्वाभाविक दोष-मल, विष, अग्नि, गिरिदोष, चपलता ये सब हैं और आगन्तुक दोष-राँगा और सीसा के योग से होने वाले अन्य दोष हैं। इस भाँति से पारे के सब ७ दोष मुनीश्वरों ने कहे हैं। उक्त दोषों के फल-मल से मूर्च्छा, विष से मरण, अग्नि से शरीर में अत्यन्त कष्टकर दाह, गिरि से सदा शरीर की जड़ता, चपलता से पुरुषों का वीर्यनाश, वङ्ग (राँगा) से कुष्ठ, भुजंग अर्थात् नाग से नपुंसकता ये सब क्रम से होते हैं। अतः पारे का शोधन उक्त दोष की निवृत्ति के लिये परमावश्यक है। मुख्यरूप से तो पारा में-(१) अग्नि-(२) विष तथा (३) मल ये ही तीन दोष होते हैं। ये तीनों क्रम से मनुष्यों को (१) सन्ताप-(२) मरण-(३) मूर्च्छा करने वाले होते हैं। इनके अतिरिक्त अन्य भी दोष यद्यपि पारे में ऋषियों ने कहे हैं तथापि पारे के ये ३ दोष ही विशेष रूप से दूर करने योग्य हैं। [९७-९९] अथसंस्कृतपारदसेवननिषेधमाह संस्कारहीनं खलु सूतराजं यः सेवते तस्य करोति बाधाम्। देहस्य नाशं विदधाति नूनं कष्टांश्च रोगाञ्जनयेन्नराणाम् ।।१००।। असंस्कृत पारे के सेवन का निषेध-जो कोई बिना संस्कार किये हुये ही पारे का सेवन करता है तो वह उस (सेवन करने वाले) को पीड़ा पहुँचाता है, देह का नाश कर देता है, निश्चित रूप से मनुष्यों के रोगों को उत्पन्न करता है। तात्पर्य यह है कि भूल कर भी असंस्कृत पारे का सेवन नहीं करना चाहिये अन्यथा कष्टाधिक्य से मृत्यु तक हो जाती है। [१००] अथोपरसाः । तेषां संख्यामाह गन्धो हिङ्गुलमभ्रतालकशिलाः स्रोतोऽञ्जनं टङ्कणं राजावर्तकचुम्बकौ स्फटिकया शङ्खः खटी गैरिकम्। कासीसं रसकं कपर्दसिकताबोलाश्च कङ्गुष्ठकं सौराष्ट्री च मता अमी उपरसाः सूतस्य किञ्चिद्गुणै ।।१०१।। उपरसों की संख्या-गन्धक, हिङ्गुल, अभ्रक, हरताल, मैनशिल, सुरमा, सुहागा, राजावर्तक, चुम्बक, फिटकरी, शंख, खरिया, गेरू, कसीस, खपरिया, कौड़ी, बालु, बोल, कङ्गुष्ठ एवं सोरठी माटी ये सब उपरस कहे जाते हैं क्योंकि ये कुछ रस (पारा) के गुणों से युक्त होते हैं। [१०१] अथ हिङ्गुलम् । तस्य नामानि सलक्षणभेदान् गुणांश्चाह हिङ्गुलं दरदं म्लेच्छमिङ्गुलं श्चूर्णपारदम्। दरदस्त्रिविधः प्रोक्तश्चर्मारः शुकतुण्डकः ।।१०२।। हंसपादस्तृतीयः स्याद् गुणवानुत्तरोत्तरम् ।।१०३।। चर्मारः शुक्लवर्णः स्यात्स पीतः शुकतुण्डकः । जपाकुसुमसंङ्काशो हंसपादो महोत्तमः ।।१०४।। तिक्तं कषायं कटु हिङ्गुलं स्यान्नेत्रामयघ्नं कफपित्तहारि । हल्लासकुष्ठज्वरकामलाश्च प्लीहामवातौ च गरं निहन्ति ।।१०५।। हिङ्गुल के संस्कृत नाम-हिङ्गुल, दरद, म्लेच्छ, इङ्गुल और चूर्णपारद ये सब हैं। भेद-हिङ्गुल तीन प्रकार का होता है। (१) चर्मार, (२) शुकतुण्डक, (३) हंसपाद । इनमें से एक दूसरे की अपेक्षा उत्तरोत्तर गुणवान् होता है। जैसे-चर्मार की अपेक्षा शुकतुण्ड और शुकतुण्ड की अपेक्षा हंसपाद अधिक गुणवान् होता है। [१०२-१०५] उक्त भेदों के लक्षण-चर्मार-सफेद वर्ण का होता है, शुकतुण्ड-पीले वर्ण का एवम् हंसपाद जो कि सर्वोत्तम है वह जपाकुसुम (अढ़ौल के फूल) के समान लाल वर्ण का होता है। हिङ्गुल-तिक्त, कषाय, कटुरस युक्त एवम्-नेत्रसम्बन्धी-रोग, कफ, पित्त, हल्लास (उबकाई), कुष्ठ, ज्वर, कामला, प्लीहा, आमवात और विष को दूर करने वाला होता है। ५२ भाव. I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
७७० भावप्रकाशनिघण्टुः अथ हिङ्गुलोत्थं पारदं शुद्धमित्याह ऊर्ध्वपातनयुक्त्या तु डमरूयंत्रपाचितम्। हिङ्गुलं तस्य सूतं तु शुद्धमेव न शोधयेत् ।।१०६।। हिंगुल से निकाले हुये पारे की शुद्धि की अनावश्यकता—ऊर्ध्वपातन की युक्ति से डमरूयन्त्र में पकाया हुआ जो हिंगुल है, उससे निकाला हुआ जो पारा है वह स्वयं शुद्ध होता है अतः उसकी पुनः शुद्धी करने की आवश्यकता नहीं रहती है । [१०६] अथ गन्धकः । तस्योत्पत्तिं नामानि भेदांश्चाह श्वेतद्वीपे पुरा देव्याः क्रीडन्त्या रजसाऽऽप्लुतम् । दुकूलं तेन वस्त्रेण स्नातायाः क्षीरनीरधौ ।।१०७।। प्रसूतं यद्रजस्तस्माद्गन्धकः समभूत्ततः । गन्धको गन्धिकश्चापि गन्धपाषाण इत्यपि ।।१०८।। सौगन्धिकश्च कथितो बलिर्बलरसोऽपि च । चतुर्धा गन्धकः प्रोक्तो रक्तः पीतः सितोऽसितः ।।१०९।। गन्धक की उत्पत्ति—पहले एक समय श्वेतद्वीप में क्रीड़ा करती हुई श्री पार्वती जी का वस्त्र रजोधर्म होने से रज से भींग गया तब उसी समय क्षीर समुद्र में स्नान करने से जो रज इधर-उधर फैला उसी से गन्धक की उत्पत्ति हुई । गन्धक के संस्कृत नाम—गन्धक, गन्धिक, गन्धपाषाण, सौगन्धिक, बलि तथा बलरस ये सब हैं । भेद—गन्धक ४ प्रकार का होता है । (१) रक्तवर्ण का, (२) पीत वर्ण का, (३) श्वेत वर्ण का, (४) कृष्णवर्ण का होता है । [१०७-१०९] अथ गन्धकभेदानामुपयोगविषयानाह रक्तो हेमक्रियासूक्तः पीतश्चैव रसायने । व्रणादिलेपने श्वेतः कृष्णः श्रेष्ठः सुदुर्लभः ।।११०।। गन्धक के उक्त भेदों के उपयोग—रक्तवर्ण का गन्धक—सोना बनाने के कार्य में उपयुक्त होता है, पीत वर्ण का गन्धक—रसायन के कार्य में आता है, श्वेत वर्ण का गन्ध—व्रण आदि के ऊपर लेप करने के लिये उपयोगी होता है एवं कृष्णवर्ण का गन्ध-पूर्वोक्त सभी कार्यों में श्रेष्ठ होता है किन्तु यह अत्यन्त दुर्लभ होता है । [११०] ❖ श्रेष्ठः = हेमक्रियाऽऽदिषु सर्वत्र प्रशस्ततरः ।।११०।। यहाँ पर “श्रेष्ठ” पद से “हेमक्रिया (सोना बनाने) आदि पूर्वोक्त सभी कार्यों में अत्यन्त प्रशस्त होता है” यह अर्थ समझना चाहिये । [११०] अथ गन्धकगुणानाह गन्धकः कटुकस्तिक्तो वीर्योष्णास्तुवरः सरः । पित्तलः कटुकः पाके जन्तुकण्डूविसर्पजित् । हन्ति कुष्ठक्षयप्लीहकफवातान् रसायनः ।।१११।। गन्धक—कटु, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, विपाक में कटु रसयुक्त, उष्णवीर्य, सारक, पित्तजनक, रसायन एवम्- क्रिमि, खुजली, विसर्प, कुष्ठ, क्षय, प्लीहा, कफ तथा वात को दूर करने वाला होता है । [१११] अथाशुद्धगन्धकदोषानाह अशोधितो गन्धक एष कुष्ठं करोति तापं विषमं शरीरे । सौख्यं च रूपं च बलं तथौजः शुक्रं निहन्त्येव करोति चास्रम् ।।११२।। अशुद्ध गन्धक के दोष—बिना शोधा हुआ गन्धक यदि भक्षण किया जाय तो वह कुष्ठ, शरीर में विषम ज्वर तथा रक्तविकार को करता है एवम्—सुख, रूप, बल, ओज एवं शुक्र को नष्ट करता है । [११२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA
धात्वादिवर्गः ७७१ अथाभ्रकम्। तस्योत्पत्तिमाह पुरा वधाय वृत्रस्य वज्रिणा वज्रमुद्यतम्। विस्फुलिङ्गास्ततस्तस्य गगने परिसर्पिताः ।।१९३।। ते निपेतुर्घनध्वानाच्छिखरेषु महीभृताम्। तेम्य एवं समुत्पन्नं तत्तद्गिरिषु चाभ्रकम् ।।१९०४।। तद्वज्रं वज्रजातत्वादभ्रमभ्ररवोद्भवात्। गगनात्स्खलितं यस्माद्गगनं च ततो मतम् ।।१९५।। अभ्रक की उत्पत्ति-पहले एक समय जब इन्द्र ने वृत्रासुर के वध के लिए वज्र उठाया तब उससे उसकी चिनगारियां निकल कर आकाश में फैल गई। और उसके बाद वे सब मेघ का शब्द होने पर पर्वतों के शिखरों पर जाकर गिर पड़ीं और जिन-जिन पर्वतों पर वे गिरी थीं उन्हीं-उन्हीं पर्वतों पर उन चिनगारियों से अभ्रक की उत्पत्ति हुई। अभ्रक के कतिपय नामों के पड़ने का हेतु-वज्र से उत्पन्न होने से इसे 'वज्र', अभ्र अर्थात् मेघ के शब्द होने से उत्पत्ति हुई अतः 'अभ्रक' और गगन अर्थात्-आकाश से गिरा अतएव इसे 'गगन' भी कहते हैं। [१९३-१९५] अथाभ्रकभेदाँस्तेषामुपयोगविषयानाह विप्रक्षत्रियविट्शूद्रभेदात्तस्याच्चतुर्विधम्। क्रमेणैव सितं रक्तं पीतं कृष्णं च वर्णतः ।।१९६।। प्रशस्यते सितं तारे रक्तं तत्तु रसायने। पीतं हेमनि कृष्णं तु गदेषु द्रुतयेऽपि च ।।१९७।। अभ्रक के भेद-(१) ब्राह्मण-(२) क्षत्रिय, (३) वैश्य तथा (४) शूद्र ये ४ जातियाँ अभ्रक की होती हैं। उनके जाति वर्ण-क्रम से अर्थात् ब्राह्मण जाति का अभ्रक सफेद रंग का, क्षत्रिय जाति का लाल रंग का, वैश्य जाति का पीले रंग का और शूद्र जाति का काले रंग का होता है। उक्त भेदों के उपयोग-चाँदी बनाने के कार्य में सफेद अभ्रक का, रसायन के कार्य में लाल अभ्रक का, सोना बनाने में पीले अभ्रक का और रोग नष्ट करने में काले अभ्रक का उपयोग किया जाता है। [१९६-१९७] अथाभ्रकस्यान्यानपि भेदाँल्लक्षणगुणनिर्देशपूर्वकमाह पिनाकं दर्दुरं नागं वज्रं चेति चतुर्विधम्। मुञ्चत्यग्नौ विनिक्षिप्तं पिनाकं दलसञ्चयम् ।।१९८।। अज्ञानाद्भक्षणं तस्य महाकुष्ठप्रदायकम्। दर्दुरं त्वग्निनिक्षिप्तं कुरुते दर्दुरध्वनिम् ।।१९९।। गोलकान्बहुशः कृत्वा स स्यान्मृत्युप्रदायकः। नागं तु नागवद्वह्नौ फूत्कारं परिमुञ्चति ।।१२०।। तद्भक्षितमवश्यं तु विदधाति भगन्दरम्। वज्रं तु वज्रवत्तिष्ठेत्तन्नाग्नौ विकृतिं व्रजेत् ।। १२१ ।। सर्वाभ्रेषु वरं वज्रं व्याधिवाद्धैंक्यमृत्युहृत् ।।१२२।। अभ्रक के और भी भेदों के नाम-(१) पिनाक, (२) दर्दुर, (३) नाग, (४) वज्र, ये ४ भेद अभ्रक के हैं। उक्त भेदों के लक्षण-पिनाक नामक अभ्रक के लक्षण-अग्नि में डाल देने पर जिससे परत निकल-निकल कर अलग होने लगे उसे 'पिनाक' समझना चाहिये। पिनाक-यदि अज्ञान से खा लिया जाय तो महाकुष्ठ हो जाता है। दर्दुर के लक्षण-जो अग्नि में छोड़ने पर मेढक की भाँति शब्द करे वह 'दर्दुर' कहलाता है। दर्दुर-इसे खा लेने से शरीर में बहुत सी गाँठों की उत्पत्ति होकर मृत्यु हो जाती है। नागनामक अभ्रक के लक्षण-अग्नि में डालने पर जिससे साँप के समान फुंकार निकले उसे 'नाग' समझना चाहिये। नाग-इसके खाने से भगन्दर अवश्य हो जाता है। वज्र के लक्षण-जो कि अग्नि में डालने पर किसी तरह की विकृति को न प्राप्त होकर वज्र की भांति स्थिर रहता है वह "वज्र" नामक अभ्रक कहलाता है। वज्र-सम्पूर्ण अभ्रकों में वज्र नामक ही अभ्रक सर्वश्रेष्ठ होता है, क्योंकि यह रोग, बुढ़ापा तथा मृत्यु को भी दूर करने वाला होता है। [१९८-१२२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA
७७२ भावप्रकाशनिघण्टुः अथोत्पत्तिस्थानाभेदेनाभ्रकस्य गुणभेदानाह अभ्रमुत्तरशैलोत्थं बहुसत्त्वं गुणाधिकम् । दक्षिणाद्रिभवं स्वल्पसत्त्वमल्पगुणप्रदम् ।।१२३।। उत्पत्ति स्थान के भेद से अभ्रक के गुणों में भेद—उत्तर के पर्वतों पर उत्पन्न होने वाला अभ्रक—अत्यन्त वीर्यशाली अतएव अधिक गुणकारी होता है और दक्षिण के पर्वतों पर उत्पन्न होने वाला अभ्रक—स्वल्प वीर्यवाला अतएव स्वल्प गुणकारी होता है । [१२३] अथ मृताभ्रकगुणानाह अभ्रं कषायं मधुरं सुशीतमायुष्करं धातुविवर्द्धनं च । हन्यात्रिदोषं व्रणमेहकुष्ठप्लीहोदरग्रन्थिविषक्रिमींश्च ।।१२४।। रोगान्हन्ति द्रढयति वपुर्वीर्यवृद्धिं विधत्ते तारुण्याढ्यं रमयति शतं योषितां नित्यमेव । दीर्घायुष्काञ्जनयति सुतान्विक्रमैःसिंहतुल्यान् मृत्योर्भीतिं हरति सततं सेव्यमानं मृताभ्रम् ।।१२५।। अभ्रक भस्म (मृत अभ्रक)—यह कषाय तथा मधुर रसयुक्त, अत्यन्त शीतल, आयु को बढ़ाने वाला, धातुवर्धक एवम्-त्रिदोष, व्रण, प्रमेह, कुष्ठ, प्लीहा, उदररोग, ग्रन्थि (गिल्टी), विष तथा क्रिमि को दूर करने वाला होता है । यदि मृत अभ्रक (अभ्रक भस्म) का नित्य सेवन किया जाय तो वह—रोगों को दूर करता है तथा शरीर को दृढ़ और वीर्य की वृद्धि करता है और नित्य तरुणाई से भरा हुआ सौ स्त्रियों से रमण करने की शक्ति देता है तथा सिंह के समान पराक्रमी, दीर्घ आयु वाले पुत्रों को उत्पन्न करता है और मृत्यु के भय को दूर करता है । [१२४-१२५] अथाशुद्धाभ्रकदोषानाह पीडां विधत्ते विविधां नराणां कुष्ठं क्षयं पाण्डुगदं च शोथम् । हृत्पार्श्वपीडां च करोत्यशुद्धमभ्रं त्वसिद्धं गुरु तापदं स्यात् ।।१२६।। अशुद्ध अभ्रक के दोष—बिना शोधन किया हुआ अभ्रक—सेवन करने से मनुष्यों को अनेक प्रकार की पीड़ा करता है एवं-कुष्ठ, क्षय, पाण्डुरोग, शोथ, हृदय तथा पार्श्व (पसुली) में पीड़ा करता है । असिद्ध अभ्रक के दोष—यदि अभ्रक भस्म असिद्ध (कच्ची) हो तो सेवन करने से अत्यन्त ताप देने वाला होता है । [१२६] अथ हरितालम् । तस्य गुणलक्षणसहितान् भेदान् गुणाँश्चाह हरितालं तु तालं स्यादालं तालकमित्यपि । हरितालं द्विधा प्रोक्तं पत्राख्यं पिण्डसंज्ञकम् ।।१२७।। तयोराद्यं गुणैः श्रेष्ठं ततो हीनगुणं परम् । स्वर्णवर्णं गुरु स्निग्धं सपत्रं चाभ्रपत्रवत् ।।१२८।। पत्राख्यं तालकं विद्याद् गुणाढ्यं तद्रसायनम् । निष्पत्रं पिण्डसदृशं स्वल्पसत्त्वं तथा गुरु ।।१२९।। स्त्रीपुष्पहरकं स्वल्पगुणं तत्पिण्डतालकम् । हरितालं कटु स्निग्धं कषायोष्णं हरिद्विषम् । कण्डुकुष्ठास्यरोगास्रकफपित्तकचव्रणान् ।।१३०।। हरताल के संस्कृत नाम—हरिताल, ताल, आल और तालक ये सब हैं। भेद—हरताल दो प्रकार का होता है। (१) पत्राख्य (तबकिया) हरताल, (२) पिण्डसंज्ञक हरताल। इनमें से पहला जो पत्राख्य (तबकिया) हरताल है वह गुणों में श्रेष्ठ होता है और दूसरा जो पिण्डसंज्ञक हरताल है वह हीन गुणवाला होता है। पत्राख्य (तबकिया) हरताल के लक्षण—सोने के समान वर्ण वाला, गुरु, स्निग्ध, अभ्रक के पत्र के समान पत्रवाला जो पत्राख्य (तबकिया) हरताल होता है, वह गुणों से युक्त तथा रसायन होता है। और जो पत्र से रहित पिण्ड के समान पिण्ड हरताल होता है, वह CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA.
धात्वादिवर्गः ७७३ स्वल्प वीर्यशाली, गुरु, स्त्री के पुष्प को नष्ट करने वाला एवं अल्प गुणयुक्त होता है। हरताल-कटु तथा कषाय रसयुक्त, स्निग्ध, उष्ण होता है एवं-विष, खुजली, कुष्ठ, मुख के रोग, रक्तविकार, कफ, पित्त, केश तथा व्रण (घाव) को नष्ट करनेवाला होता है। [१२७-१३०] अथाशुद्धस्यासम्यङ्मारितस्य च हरितालस्य दोषानाह हरति च हरितालं चारुतां देहजातां सृजति च बहुतापञ्चाङ्गसङ्कोचपीडाम्। वितरति कफवातौ कुष्ठरोगं विदध्या दिदमाशितमशुद्धं मारितं चाप्यसम्यक् ।।१३१।। बिना शोधा हुआ दोनों प्रकार का हरताल-भक्षण करने से शरीर की सुन्दरता को दूर करता है, अत्यन्त ताप को उत्पन्न करता है, अंगों में सङ्कोच की पीड़ा देता है एवम्-कफ, वात तथा कुष्ठ को करता है। [१३१] अथ मनःशिला (मैनसिला)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह मनःशिला मनोगुप्ता मनोह्वा नागजिह्विका। नेपाली कुनटी गोला शिला दिव्यौषधिः स्मृता ।।१३२।। मनःशिला गुरुर्वर्ण्या सरोष्णा लेखनी कटुः । तिक्ता स्निग्धा विषश्वासकासभूतकफास्रनुत् ।।१३३।। मैनशिल के संस्कृत नाम-मनःशिला, मनोगुप्ता, मनोह्वा, नागजिह्विका, नेपाली, कुनटी, गोला, शिला तथा दिव्यौषधि ये सब हैं। मैनशिल-यह कटु तथा तिक्त रसयुक्त, गुरु, शरीर के वर्ण को उत्तम बनाने वाली, सारक, उष्ण, लेखन तथा स्निग्ध होती है एवम्-विष, श्वास, कास, भूतबाधा, कफ तथा रक्तविकार को दूर करने वाली होती है। [१३२-१३३] अथाशुद्धायास्तस्यादोषानाह मनःशिला मन्दबलं करोति जन्तुं ध्रुवं शोधनमन्तरेण। मलानुबन्धं किल मूत्ररोधं सशर्करं कृच्छ्रगदं च कुर्यात् ।।१३४।। अशुद्ध मैनशिल के दोष-बिना शोधी हुई मैनशिल-सेवन करने वाले मनुष्य के बल को मन्द करने वाली तथा मल का अनुबन्ध (दस्त की रुकावट), मूत्ररोध और शर्करायुक्त मूत्रकृच्छ्र रोग को पैदा करती है। [१३४] अथ स्रोतोऽञ्जनं सौवीरं च (काला, सफेद सुरमा)। तयोर्नामलक्षणगुणानाह अञ्जनं यामुनंवापि कापोताञ्जनमित्यपि। तत्तु स्रोतोऽञ्जनं कृष्णं सौवीरं श्वेतमीरितम् ।।१३५।। वल्मीकशिखराकारे भिन्नमञ्जनसन्निभम्। घृष्टं तु गैरिकाकारमेतत्स्त्रोतोऽञ्जनं स्मृतम् ।।१३६।। स्रोतोऽञ्जनसमं ज्ञेयं सौवीरं तत्तु पाण्डुरम्। स्रोतोऽञ्जनं स्मृत स्वादु चक्षुष्यं कफपित्तनुत् ।।१३७।। कषायं लेखनं स्निग्धं ग्राहि च्छर्दिविषापहम्। सिध्माक्षयास्रहृच्छीतं सेवनीयं सदा बुधैः ।।१३८।। स्रोतोऽञ्जनगुणाः सर्वे सौवीरेऽपिमता बुधः। किन्तु द्वयोरञ्जनयोः श्रेष्ठं स्रोतोऽञ्जनं स्मृतम् ।।१३९।। सुरमा के साधारण संस्कृत नाम-अञ्जन, यामुन तथा कापोताञ्जन ये सब हैं। भेद और उनके लक्षण-सुरमा में जो काला होता है उसे संस्कृत में "स्रोतोऽञ्जन" कहते हैं और जो सफेद होता है उसे "सौवीर" कहते हैं। लक्षण-स्रोतोऽञ्जन (काला सुरमा)-यह वल्मीक (बाँबी) के शिखर के समान आकारवाला, तोड़ने पर अञ्जन के टुकड़ों के समान एवं घिसने पर "गेरू" के समान होता है। सौवीर (सफेद सुरमा)-यह पाण्डुर वर्ण का तथा गुणों में काले सुरमे के समान ही होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
७७४ भावप्रकाशनिघण्टुः काला सुरमा—स्वादिष्ट, कषाय रसयुक्त, नेत्रों के लिये हितकर, लेखन, स्निग्ध, ग्राही तथा शीतल होता है एवम्—कफ, पित्त, वमन, विष, सिध्म (क्षुद्रकुष्ठ के भेद), क्षय तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। अतएव बुद्धिमानों को सदा इसे सेवन करना चाहिये। काले सुरमे में जो गुण हैं वे ही सब सफेद सुरमे में भी रहते हैं ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं। किन्तु इन दोनों अञ्जनों में श्रेष्ठ 'स्रोतोऽञ्जन' काला सुरमा ही समझा जाता है। [१३५-१३९] अथ टङ्कणः (सोहागा)। तस्य गुणानाह टङ्कणोऽग्निकरो रूक्षः कफघ्नो वातपित्तकृत् ।।१४०।। सुहागा—अग्निकारक, रूक्ष, कफनाशक तथा वात और पित्त को उत्पन्न करने वाला होता है। [१४०] अयमुपरसत्वात् पुनरुक्तः ।।१४०।। यहाँ पर यह समझना चाहिये कि—यह उपरस होने से पुनः यहाँ पर कहा गया है। [१४०] अथ स्फटिका (फिटकिरी)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह स्फटी च स्फटिका प्रोक्ता श्वेता शुभ्रा च रङ्गदा। दृढरङ्गा रङ्गदृढा रङ्गाङ्गाऽपि च कथ्यते ।।१४१।। स्फटिका तु कषायोष्णा वातपित्तकफव्रणान्। निहन्ति श्वित्रवीसर्पान् योनिसङ्कोचकारिणी ।।१४२।। फिटकिरी के संस्कृत नाम—स्फटी, स्फटिका, श्वेता, शुभ्रा, रङ्गदा, दृढरङ्गा, रङ्गाङ्गा ये सब हैं। फिटकिरी—कषाय रस युक्त, उष्ण, योनिमार्ग को संकुचित करने वाली एवम्—वात, पित्त, कफ, व्रण (घाव), श्वेत कुष्ठ तथा विसर्प को दूर करने वाली होती है। [१४१-१४२] अथ राजावर्त्तः (रेवटी)। तस्य नामगुणानाह राजावर्त्तो नृपावर्त्तो राजन्यावर्त्तकस्तथा। आवर्त्तमणिसंज्ञश्च ह्यावर्त्तोऽपि तथैव च ।।१४३।। राजावर्त्तः कटुस्तिक्तः शिशिरः पित्तनाशनः। राजावर्त्तः प्रमेहघ्नश्छर्दिहिक्कानिवारणः ।।१४४।। रेवटी के संस्कृत नाम—राजावर्त्त, नृपावर्त्त, राजन्यावर्त्तक, आवर्त्तमणिसंज्ञक, आवर्त्त (आवर्त्तक) ये सब हैं। राजावर्त्त—कटु तथा तिक्त रसयुक्त, शीतल, पित्तनाशक एवम्—प्रमेह, वमन तथा हिचकी को दूर करने वाली होती है। [१४३-१४४] अथ चुम्बकः। तस्य नामगुणानाह चुम्बकः कान्तपाषाणोऽयस्कान्तो लौहकर्षकः। चुम्बको लेखनः शीतो मेदोविषगरापहः ।।१४५।। चुम्बक के संस्कृत नाम—चुम्बक, कान्तपाषाण, अयस्कान्त और लौहकर्षक ये सब हैं। चुम्बक—लेखन, शीतल तथा मेद, विष और गर (उपविष) को नष्ट करने वाला होता है। यहाँ पर नानाप्राण्यङ्गजमलविरुद्धौषधभस्मनाम्। विषाणाञ्चाल्पवीर्याणां योगो गर इति स्मृतः ।।१।। अर्थ—अनेक प्रकार के प्राणियों के अङ्गों का मल, विरुद्ध औषधों के भस्म, अल्पवीर्य वाले विषों के परस्पर योग को 'गर' कहते हैं। यह गर का विशेष अर्थ समझना चाहिये। [१४५] अथ गैरिकं सुवर्णगैरिकं च (गेरू-सोनागेरू)। तयोर्नामगुणानाह गैरिकं रक्तधातुश्च गैरैयं गिरिजं तथा। सुवर्णगैरिकं त्वन्यत्ततो रक्ततरं हि तत् ।।१४६।। गैरिकद्वितयं स्निग्धं मधुरं तुवरं हिमम्। चक्षुष्यं दाहपित्तास्रकफहिक्काविषापहम् ।।१४७।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
धात्वादिवर्गः ७७५ गेरू के संस्कृत नाम-गैरिक, रक्तधातु, गैरेय, गिरिज ये सब हैं। गेरू के भेद-गेरू से भिन्न एक प्रकार का और भी गेरू होता है जो इसकी अपेक्षा अत्यन्त लाल रंग का होता है उसे संस्कृत में 'स्वर्णगैरिक' कहते हैं। दोनों गेरू (गेरू-सोना गेरू) - यह मधुर तथा कषाय रस युक्त, स्निग्ध, शीतल, नेत्रों के लिये हितकर एवम्-दाह-पित्त-रक्तविकार-कफ-हिचकी तथा विष इन सबों को दूर करने वाले होते हैं। [१४६-१४७] अथ खटिका गौरखटिका च (खडिया, गौरखरिया) । तयोर्नामगुणानाह खटिका कठिनी चापि लेखनी च निगद्यते । खटी दाहास्त्रजिच्छीता मधुरा विषशोथजित् ।।१४८।। लेपादेतद्गुणा प्रोक्ता भक्षिता मृत्तिकासमा । खटी गौरखटी द्वे च गुणैस्तुल्ये प्रकीर्त्तिते ।।१४९।। खड़िया के संस्कृत नाम-खटिका, कठिनी तथा लेखनी ये सब हैं। खड़िया-मधुर रस युक्त, शीतल एवं-दाह-रक्तविकार-विष तथा शोथ को दूर करने वाली होती है। लेप करने से ही उक्त गुण खड़िया के ज्ञात होते हैं। खाने पर तो मिट्टी के समान गुण वाली होती है। खड़िया तथा गैर खरिया ये दोनों ही गुणों में समान ही मानी जाती हैं। [१४८-१४९] अथ वालुका (बालू) । तस्या नामगुणानाह वालुका सिकता प्रोक्ता शर्करा रेतजाऽपि च । वालुका लेखनी शीता व्रणोरःक्षतनाशिनी ।।१५०।। बालू के संस्कृत नाम-वालुका, सिकता, शर्करा और रेतजा ये सब हैं। बालू-लेखन, शीतल तथा व्रण और उरःक्षत को दूर करने वाली होती है। [१५०] अथ तुत्थभेदः खर्परी (खपरिया) तस्या नामगुणानाह खर्परी तुत्थकं तुत्थादन्यत्तद्रसकं स्मृतम् । ये गुणास्तुत्थके प्रोक्तास्ते गुणा रसके स्मृताः ।।१५१।। खपरिया के संस्कृत नाम-खर्परी, तुत्थक, रसक, तुत्थभेद ये सब हैं। खपरिया-जो गुण तूतिया के कहे हुये हैं वे ही सब इसके भी होते हैं। [१५१] अथ काशीशम् (कसीस) । तस्य नामानि भेदान् गुणाँश्चाह काशीशं धातुकाशीशं पांशुकाशीशमित्यपि । तदेव किञ्चित्पीतं तु पुष्पकाशीशमुच्यते ।।१५२।। काशीशमम्लमुष्णं च तिक्तञ्च तुवरं तथा । वातश्लेष्महरं केश्यं नेत्रकण्डूविषप्रणुत् ।। मूत्रकृच्छ्राश्मरीश्वित्रनाशनं परिकीर्तितम् ।।१५३।। कसीस के संस्कृत नाम-काशीश, धातुकाशीश, पांशुकाशीश ये सब हैं। भेद-कसीस यदि थोड़ा पीला हो तो उसका संस्कृत नाम-पुष्पकाशीश होता है। कसीस-अम्ल, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, उष्ण (गरम), बालों के लिये हितकर, वात, कफ, नेत्रों की खुजली, विष, मूत्रकृच्छ्र, पथरी तथा श्वेत कुष्ठ को दूर करने वाला होता है। [१५२-१५३] अथ सौराष्ट्री मृत्तिका (सोरठी माटी) । तस्या नामगुणानाह सौराष्ट्री तुवरी काली मृत्तालकसुराष्ट्रजे ।। १५४ ।। आढकी चापि सा ख्याता मृत्स्ना च सुरमृत्तिका । स्फटिकाया गुणाः सर्वे सौराष्ट्र्या अपि कीर्तिताः ।। १५५ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
७७६ भावप्रकाशनिघण्टुः सोरठी माटी के संस्कृत नाम-सौराष्ट्री, तुवरी, काली, मृत्तालक, सुराष्ट्रज, आढकी, मृत्स्ना तथा सुरमृत्तिका ये सब हैं। सोरठी माटी-फिटकिरी के जितने गुण कह आये हैं वे सब सोरठी माटी के भी होते हैं। [१५४-१५५] अथ कृष्णमृत्तिका (काली मिट्टी) तस्य नामगुणानाह मृन्मृदा मृत्तिका मृत्स्ना क्षेत्रजा कृष्णमृत्तिका । कृष्णमृत् क्षतदाहास्रप्रदरश्लेष्मपित्तनुत् ।। १५६ ।। काली मिट्टी के संस्कृत नाम-मृद्, मृदा, मृत्तिका, मृत्स्ना, क्षेत्रजा, कृष्णमृत्तिका और कृष्णमृत् ये सब हैं। काली मिट्टी-क्षत, दाह, रक्तप्रदर या रक्तविकार, प्रदररोग, कफ तथा पित्त को दूर करने वाली होती है। [१५६] अथ कर्दमः (कीचड़) तस्यगुणानाह पङ्कस्तु जलकल्काश्च चुलुकः कर्दमो मलः । चिकिलः पलितो द्रापः पललश्च निषद्दरः ।। कर्दमो दाहपित्तास्रशोथघ्नः शीतलः सरः ।। १५७ ।। कीचड़ के संस्कृत नाम-पङ्क, जलकल्क, चुलुक, कर्दम, मल, चिकिल, पलित, द्राप, पलल तथा निषद्दर ये सब हैं। कीचड़-शीतल तथा सारक होता है एवम्-दाह, पित्त, रक्तविकार और शोथ को नष्ट करने वाला होता है। [१५७] अथ कपर्दकम् (कौड़ी) । तस्य नामगुणानाह कपर्दको वराटश्च कपर्दी च वराटिका । कपर्दिका हिमा नेत्रहिता स्फोटक्षयापहा ।। कर्णस्रावाग्निमान्द्यघ्नो पित्तास्रकफनाशिनी ।। १५८ ।। कौड़ी के संस्कृत नाम-कपर्दक, वराट, कपर्दी, वराटिका तथा कपर्दिका ये सब हैं। कौड़ी-शीतल, नेत्रों के लिये हितकर, विस्फोट, क्षय, कर्णस्राव, अग्नि की मन्दता, पित्त, रक्तविकार तथा कफ को नष्ट करने वाली होती है। [१५८] अथ शङ्खः । तस्य नामगुणानाह शङ्खः समुद्रजः कम्बुः सुनादः पावनध्वनिः । शङ्खो नेत्र्यो हिमः शीतो लघुः पित्तकफास्रजित् ।। १५९ ।। शङ्ख के संस्कृत नाम-शंख, समुद्रज, कम्बु, सुनाद तथा पावनध्वनि ये सब हैं। शङ्ख-नेत्रों के लिये हितकर, शीतल, लघु एवम्-पित्त, कफ तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [१५९] अथ बोलम् । तस्य नामानि गुणांश्चाह बोलागन्धरसप्राणपिण्डगोपरसाः समाः । बोलं रक्तहरं शीतं मेध्यं दीपनपाचनम् ।। मधुरं कटु तिक्तं च दाहस्वेदत्रिदोषजित् । ज्वरापस्मारकण्ठघ्नं गर्भाशयविशुद्धिकृत् ।। १६० ।। बोल के संस्कृत नाम-बोल, गन्धरस, प्राण, पिण्ड तथा गोपरस ये सब हैं। बोल-मधुर, कटु तथा तिक्तरसयुक्त, रुधिरविकार नाशक, शीतल, मेधाशक्ति के लिये हितकर, अग्निदीपक, एवम्-दाह, स्वेद (पसीना), त्रिदोष, ज्वर, अपस्मार (मिर्गी) तथा कुष्ठ को दूर करने वाला होता है। [१३०] बोल, हीराबोल हिं०-बोल, हीराबोल । बं०-करम, बंदरकरम । अं०-Myrrh (मिर्ह) । ले०-Commiphora myrrha Holmes (कॉम्मिफोरा मिर्ह) । Fam. Burseraceae (बर्सेरिसी) । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
धात्वादिवर्गः ७७७ इसका वृक्ष उत्तर पूर्व अफ्रीका तथा अरब में पाया जाता है। यह करीब १० फीट ऊँचा होता है। इसकी अन्य प्रजातियाँ भी होती हैं जो २५-३० फीट तक ऊँची होती हैं। यह उपयुक्त वृक्ष का निर्यास है। इसका संग्रह सोमालीलैण्ड में होता है। वहाँ से यह अदन को भेजा जाता है। जहाँ से बंबई के रास्ते या सीधे इसका यूरोप में निर्यात होता है। अधिकतर यह अपने आप ही निकला हुआ पाया जाता है किन्तु कभी-कभी वृक्षों में चीरा लगाकर भी इसे प्राप्त करते हैं। यह पीताभ श्वेत गाढ़ा तरल पदार्थ होता है जो वृक्ष से निकलते ही गरमी से सूखकर रक्ताभ भूरा हो जाता है। स्वरूप—इसके विभिन्न नाप के टुकड़े या गोल दाने १-४ इञ्च व्यास के होते हैं। यह बाहर से रक्ताभ भूरा या रक्ताभ पीला तथा चूर्णावृत दिखलाई पड़ता है। यह आसानी से तोड़ा जा सकता है तथा तोड़ने पर अन्दर से यह गहरा भूरा तैलीय एवं कभी-कभी श्वेत चिह्नों से युक्त होता है। इसमें विशिष्ट गंध एवं स्वाद, सुगंधि, तिक्त एवं कटु होता है। परीक्षा—(१) जल के साथ घोटने से इसका पीला इमल्शन बनता है। (२) ईथरीय सत्व को सुखाकर उसका संयोग शोरे के तेजाब के धूएँ या ब्रोमीन के धूएँ से करने पर गहरा बैंगनी रंग इसमें आता है। (३) इसमें मद्यसार में अघुलनशील भाग ७०% से अधिक न हो तथा राख ५% से अधिक न हो। इसका एक भेद बीसाबोल होता है जो अन्य वृक्ष से निकलता है। वह अधिक गंधयुक्त होता है। उपर्युक्त परीक्षा से इसे अलग किया जा सकता है। संग्रह करते समय इसके साथ ही गोंद, गुग्गुल आदि का भी संग्रह होने के कारण बोल में इनकी भी मिलावट होती है। रासायनिक संगठन—इसमें उड़नशील तैल, राल, गोंद आदि द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—यह आर्तवजनन, श्लेष्मलकला के लिये उत्तेजक, प्रतिदूषक, कफनाशक एवं दीपन है। इसका प्रयोग अनार्तव, गर्भाशय शैथिल्य, श्वेतप्रदर, बस्तिशोथ, कास, श्वास एवं कुपचन में करते हैं। मुख पाक, गले की खराश एवं मसूड़े की सूजन में इसके द्रव से कुल्ला (गण्डूश) करने से लाभ होता है। इसका लेप व्रण पर किया जाता है। दंत मंजन में इसे डालते हैं। सुगंध के लिये धूप में इसका उपयोग होता है। मात्रा—१/२-२ रत्ती । अथ कङ्कुष्ठः । तस्योत्पत्तिं भेदाँश्चाह हिमवत्पादशिखरे कङ्कुष्ठमुपजायते । तत्रैकं रक्तकालं स्यात्तदन्यदण्डकं स्मृतम् ।।१६१।। कंकुष्ठ की उत्पत्ति—हिमालय के पास के पर्वतों के शिखर पर कंकुष्ठ की उत्पत्ति होती है। भेद—इसके दो भेद हैं—पहला रक्तकाल, दूसरा अण्डक—ये दोनों संस्कृत नाम हैं। [१६१] हिमवत्पादशिखरे = हिमवतः प्रत्यन्तपर्वतानां शिखरे ।। १६१ ।। यहाँ पर मूल में 'हिमवत्पादशिखरे' इस पद का 'हिमालय के पास के पर्वतों के शिखर पर' यह अर्थ समझना चाहिये । [१६१] अथोत्तमःधमकङ्कुष्ठयोर्लक्षणमाह पीतप्रभं गुरु स्निग्धं श्रेष्ठं कङ्कुष्ठमादिमम् । श्यामं पीतं लघु त्यक्तसत्त्वं नेष्टं तथाऽण्डकम् ।।१६२।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
७७८ भावप्रकाशनिघण्टुः उत्तम कंकुष्ठ के लक्षण-इसमें जो पहला भेद (रक्तकाल-संज्ञक) है, वह पीले रंग की कान्तिवाला गुरु तथा स्निग्ध होता है और वही उत्तम होता है। अधम कंकुष्ठ के लक्षण-जो अण्डक संज्ञक भेद होता है वह साँवला तथा पीला होता है एवं-लघु और निःसार होता है अतः यह निकृष्ट समझा जाता है। [१६२] अथ कङ्कुष्ठस्य नामगुणानाह कङ्कुष्ठं काककुष्ठं च विरङ्गं कोलकाकुलम् ।।१६३।। कङ्कुष्ठं रेचनं तिक्तं कटूष्णं वर्णकारकम्। कृमिशोथोदराध्मानगुल्मानाहकफापहम् ।।१६४।। कंकुष्ठ के संस्कृत नाम-कङ्कुष्ठ, काककुष्ठ, विरङ्ग तथा कोलकाकुल ये सब हैं। कंकुष्ठ-यह तिक्त तथा कटुरस युक्त, रेचक, उष्ण, वर्णकारक एवम्-कृमि, शोथ, उदररोग, आध्मान, गुल्म, आनाह (अफरा) तथा कफ को दूर करने वाला होता है। [१६३-१६४] कंकुष्ठ क्या है इस सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद रहा है। भावप्रकाशकार इसके दो भेद मानते हैं तथा उत्पत्ति हिमालय में मानते हैं। रसरत्नसमुच्चय में भी इसके दो भेद 'नलिकाख्य' एवं 'रेणुक' दिये हैं। यह पीतवर्ण का तीव्र विरेचक पदार्थ है जिसकी यवमात्रा (१/३ रत्ती) से विरेचन होता है तथा यह सत्वरूप होने के कारण इसका सत्व नहीं निकाला जाता ऐसा भी उल्लेख है। उपर्युक्त शास्त्रीय वर्णन के आधार पर अनेक विद्वानों ने 'गम्बोज' को कंकुष्ठ माना है जो उचित मालूम पड़ता है। इसका वर्णन वटादिवर्ग (पृष्ठ ५३३) में किया जा चुका है। अन्य मतों में कुछ इसे तत्काल जन्मे हुए हाथी के बच्चे की विष्ठा, कुछ घोड़े के बच्चे की नाल, कुछ मुर्दासंग (सीसे का यौगिक), स्वर्णक्षीरी, रेवंदचीनी इत्यादि पदार्थ मानते हैं जिनमें से रेवंदचीनी को ककुष्ठ माना जा सकता है। रेवंदचीनी की जड़ गॅम्बोज के जितनी तीव्र विरेचक नहीं होती। इसका संक्षेप में वर्णन आगे दिया जा रहा है। गॅम्बोज को बाजार में उसारे रेवंद (रेवंदचीनी का सत) कहते हैं किन्तु यह रेवंदचीनी का उसारा (सत) नहीं है। गॅम्बोज (उसारे रेवंद) यह एक वृक्ष का निर्यास है और रेवंदचीनी यह एक गुल्म की जड़ है। रेवंदचीनी की जड़ के सत्व की तरह गॅम्बोज में गुण होने के कारण संभवतः गॅम्बोज को भी उसारे रेवंद कहा जाता होगा। रेवंदचीनी सं०-पीतमूला, अम्लपर्णी। हिं०-रेवंदचीनी। नेपा०-पदमचल। गढ़०-अर्चु। अं०, फा०-रेवंद, रेबास। अं०-Rhubarb (हूबार्ब)। ले०-Rheum emodi Wall. (हिअम् एमोडी)। Fam. Polygonaceae (पॉलिगोनेसी)। यह हिमालय, नेपाल, सिक्किम में ११ से १२ हजार फीट की ऊँचाई तक एवं सिमला, कांगड़ा जिला तथा चीन तिब्बत आदि देशों में होती है। इसका पौधा दृढ़ होता है। काण्ड-पर्णवत्, मजबूत, ४-५ फीट लम्बा, हरी एवं भूरी धारियों से युक्त होता है। मूलपत्र-बहुत बड़े, लम्बे वृन्त से युक्त, गोलाकार या चौड़ाई लिये अंडाकार, आधार, हृदयाकार, ५-७ शिराओं से युक्त, नीचे से मृदुरोमश किन्तु ऊपरी सतह कुछ खुरदरी होती है। पुष्प-छोटे एवं गहरे बैंगनी एवं फल-बैंगनी, १/२ इञ्च लम्बे, अंडाकार-आयताकार होते हैं। इसकी शाखा एवं पत्ती जो अम्ल होती हैं, सुखाकार, वेणी की तरह गूंथकर अमलवेत के नाम से बेची जाती है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA
धात्वादिवर्गः ७७९ इसकी अन्य जाति हि. वेब्बिआनम् (R. webbianum Royle) में पुष्प हलके पीताभ, छोटे एवं फल भी छोटे होते हैं। यह नेपाल से काश्मीर तक १०-१४ हजार फीट तक पाई जाती है। इस प्रजाति की विभिन्न जातियों के मूल का रेवंदचीनी के नाम से व्यवहार होता है। ६-७ वर्ष पुराने पौधे की मूल का पुष्पोद्गम के पूर्व संग्रह किया जाता है। इसके टुकड़े भूरे पीले रंग के लंबगोल, १ से ८ इञ्च लम्बे, १/२ से ३ इञ्च तक व्यास के, लम्बाई में झुर्रीदार तथा धारीदार होते हैं। इसका स्वाद तिक्त एवं कषाय तथा इसमें विशेष गन्ध रहती है। इसे चबाने से इसमें के कैल्शियम् ऑक्जेलेट के कारण करकरापन मालूम होता है तथा इससे लार पीली हो जाती है। रासायनिक संगठन-इसमें मुख्य रूप से ॲन्थ्रॉक्विनोन (Anthraquinone) से व्युत्पन्न द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह अल्प मात्रा (१/२-४ रत्ती) में तिक्त, दीपन एवं ग्राही है। अधिक मात्रा (१-२ माशा) से इसका प्रभाव बृहदांत्र पर होकर ६ से ८ घंटे में विरेचन होता है जो इसमें के ग्राही तत्त्व के कारण अपने आप बाद में रुक जाता है। मृदु विरेचक रूप में तथा अजीर्ण से उत्पन्न अतिसार में इसे देते हैं। जीर्ण विबन्ध में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। इससे मूत्र का रंग गहरा हो जाता है। इसके साथ सोंठ, सौंफ आदि सुगंध द्रव्य देने से मरोड़ नहीं होती। इसको जल में पीसकर लेप करने से सूजन कम होती है। अथ रत्नम् । तस्य निरुक्तिमाह धनार्थिनो जनाः सर्वे रमन्तेऽस्मिन्नतीव यत् । ततो रत्नमिति प्रोक्तं शब्दशास्त्रविशारदैः ।। १६५।। रत्न शब्द की निरुक्ति—धन को चाहने वाले सभी लोग इसमें अत्यन्त रमण करते हैं अर्थात् अधिक आनन्दित हो अपना चित्त लगाते हैं—इससे शब्दशास्त्र के जानने वालों ने इसे 'रत्न' कहा है। [१६५] अथ रत्ननामान्याह रत्नं क्लीबे मणिः पुंसि स्त्रियामपि निगद्यते । तत्तु पाषाणभेदोऽस्ति मुक्तादि च तदुच्यते ।। १६६ ।। रत्न के संस्कृत नाम—रत्न (यह नपुंसकलिङ्गी होता है), मणि (यह पुंलिङ्ग तथा स्त्रीलिङ्ग दोनों में होता है) ये दोनों हैं। यह (रत्न) पत्थर के भेद हीरा आदि का तथा मोती आदि का बोधक होता है। [१६६] ❖ तथा चामरसिंहः— रत्नं मणिर्द्वयोरश्मजातौ मुक्ताऽऽदिकेऽपि च ।। १६६ ।। यहाँ पर अमरसिंह ने भी अमरकोश में इसी बात को कहा है कि—“रत्न (नपुंसकलिङ्गी तथा मणि (यह पुंलिङ्गी तथा स्त्रीलिङ्गी भी है) ये दोनों शब्द पत्थर की जाति हीरा आदि और मोती आदि के वाचक हैं।” यह समझना चाहिये। [१६६] अथ रत्नानां संख्यामाह रत्नं गारुत्मतं पुष्परागो माणिक्यमेव च। इन्द्रनीलश्च गोमेदस्तथा वैदूर्यमित्यपि ।। मौक्तिकं विद्रुमश्चेति रत्नान्युक्तानि वै नव ।। १६७।। रत्नों की संख्या—रत्न (हीरा), गारुत्मत (पन्ना), पुष्पराग (पुखराज), माणिक्य (मानिक), इन्द्रनील (नीलम), गोमेद, वैदूर्य (लहसुनिया), मौक्तिक (मोती), विद्रुम (मूँगा) ये नव रत्न कहे हुये हैं। [१६७] अथ विष्णुधर्मोत्तरेऽपि नवरत्ननिरूपणमाह मुक्ताफलं हीरकं च वैदूर्य पद्मरागकम् ।।१६८।। पुष्परागं च गोमेदं नीलं गारुत्मतं तथा। प्रवालयुक्तान्येतानि महारत्नानि वै नव ।। १६९ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
७८० भावप्रकाशनिघण्टुः विष्णुधर्मोत्तर में भी नवरत्न का निरूपण इस प्रकार है कि-(१) मोती, (२) हीरा, (३) लहसुनिया, (४) मानिक, (५) पोखराज, (६) गोमेद, (७) नीलम, (८) पन्ना, (९) मूँगा ये नव महारत्न हैं । [ १६८-१६९ ] तत्र हीरकः । तस्य नामानि सलक्षणान् भेदानाह हीरकः पुंसि वज्रोऽस्त्री चन्द्रो मणिवरश्च सः । स तु श्वेतः स्मृतो विप्रो लोहितः क्षत्रियः स्मृतः । पीतो वैश्योऽसितः शूद्रश्चतुर्वर्णात्मकश्च सः ।।१७०।। हीरा के संस्कृत नाम-हीरक (पुंलिङ्गी), वज्र (पुंलिङ्गी तथा नपुंसकलिङ्गी), चन्द्र और मणिवर ये सब हैं । भेदों के लक्षण-जो हीरा सफेद रंग का होता है वह-ब्राह्मण, लाल रंग का-क्षत्रिय, पीले रंग का-वैश्य, असित रंग का शूद्र वर्ण का होता है, इस भाँति से हीरा की चार जातियाँ होती हैं । [१७०] अथ तद्भेदानां गुणानाह रसायने मतो विप्रः सर्वसिद्धिप्रदायकः । क्षत्रियो व्याधिविध्वंसी जरामृत्युहरः स्मृतः ।। १७१ ।। वैश्यो धनप्रदः प्रोक्तस्तथा देहस्यदार्ढ्यकृत् । शूद्रो नाशयति व्याधीन् वयःस्तम्भं करोति च ।। १७२ ।। हीरा के भेदों के गुण-ब्राह्मण वर्ण का हीरा-रसायन के लिये उपयोगी तथा सर्वसिद्धियों का देनेवाला होता है । क्षत्रिय वर्ण का हीरा-रोगों को नष्ट करने वाला एवम् जरा (बुढ़ापा) तथा मृत्यु को दूर करने वाला होता है । वैश्यवर्ण का हीरा धन देनेवाला तथा देह को दृढ़ करने वाला होता है । शूद्रवर्ण का हीरा-रोगों का नाश करने वाला तथा आयु को स्थिर रखने वाला अर्थात् शरीर में वृद्धावस्थाजन्य क्षीणता को नहीं आने देने वाला होता है । [१७१-१७२] अथ पुंस्त्रीनपुंसकभेदात् त्रिविधस्य तस्य लक्षणानिगुणानुपयोगविषयाँश्चाह पुंस्त्रीनपुंसकानीह लक्षणीयानि लक्षणैः । सुवृत्ताः फलसम्पूर्णास्तेजो युक्त बृहत्तराः ।। १७३ ।। पुरुषास्ते समाख्याता रेखा बिन्दु विवर्जिताः । रेखाबिन्दुसमायुक्ताः षडस्रास्ते स्त्रियः स्मृताः ।। १७४ ।। हीरे के अन्य प्रकार से तीन भेद-हीरे के पुरुष, स्त्री तथा नपुंसक ये तीन भेद होते हैं जो आगे कहे जाने वाले लक्षणों से पहचाने जाते हैं । लक्षण-पुरुष जाति के जो हीरे होते हैं वे भली भाँति गोलाकार, फल से पूर्ण, तेज से युक्त, अत्यन्त बड़े एवम् रेखा तथा बिन्दु से रहित होते हैं । स्त्री जाति के हीरे-पूर्वोक्त गुणों से युक्त होते हुये केवल रेखा बिन्दुओं से युक्त तथा ६ कोण वाले होते हैं । [१७३-१७४] ❖ षडस्रा = षट्कोणा ।। १७३-१७४।। यहाँ पर मूल में "षडस्राः" पद से ६ कोण वाले यह अर्थ समझना चाहिये । [१७३-१७४] त्रिकोणाश्च सुदीर्घास्ते विज्ञेयाश्च नपुंसकाः । तेषु स्युः पुरुषाः श्रेष्ठा रसबन्धनकारिणाः ।। १७५ ।। स्त्रियः कुर्वन्ति कायस्य कान्तिं स्त्रीणां सुखप्रदाः । नपुंसकास्त्ववीर्याः स्युरकामा सत्ववर्जिताः ।। १७६ ।। स्त्रियः स्त्रीभ्यः प्रदातव्याः क्लीबंक्लीबे प्रयोजयेत् । सर्वेभ्यः सर्वदादेयाःपुरुषा वीर्यवर्धना ।। १७७ ।। नपुंसक जाति के हीरे-त्रिकोण युक्त तथा अधिक लम्बे होते हैं । गुण-इनमें पुरुष-जाति के हीरे-श्रेष्ठ तथा रस के बन्धन करने वाले होते हैं । स्त्री-जाति के हीरे-शरीर की कान्ति को बढ़ाने वाले एवं विशेष रूप से स्त्रियों के लिये सुखदायी होते हैं । नपुंसकजाति के हीरे-वीर्यहीन, काम हासक तथा शक्ति से रहित होते हैं । उपयोग के विषय-स्त्री जाति के हीरे-स्त्रियों के लिये, नपुंसक जाति के हीरे-नपुंसकों के लिये देने चाहिये एवं वीर्यवर्धक पुरुष जाति के हीरे-सभी के लिये सदा देने योग्य होते हैं । [१७५-१७७] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA
धात्वादिवर्गः ७८१ अथाशुद्धहीरकदोषानाह अशुद्धं कुरुते वज्रं कुष्ठं पार्श्वव्यथां तथा। पाण्डुतां पङ्गुत्वं च तस्मात्संशोध्य मारयेत् ।। १७८ ।। अशुद्ध हीरा के दोष—बिना शोधन किया हुआ हीरा—कुष्ठ, पसलियों में पीड़ा, पाण्डु तथा पङ्गु रोग (पङ्गुल) को उत्पन्न करने वाला होता है अतएव शोधन करके भस्म करना उचित है। [१७८] अथ मारितस्य वज्रस्य गुणानाह आयुः पुष्टिं बलं वीर्यं वर्णं सौख्यं करोति च। सेवितं सर्वरोगघ्नं मृतं वज्रं न संशयः ।। १७९ ।। भली भाँति शुद्ध हीरे के भस्म के गुण—हीराभस्म—आयु, पुष्टि, बल, वीर्य, शरीर का सुन्दर वर्ण तथा सुख की वृद्धि करता है। अतः सेवन करने से वह सम्पूर्ण रोगों को दूर करने वाला होता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। [१७९] अथ गारुत्मतम् (पन्ना इति लोके)। तस्य नामान्याह गारुत्मतं मरकतमश्मगर्भो हरिन्मणिः ।। १८० ।। पन्ना के संस्कृत नाम—गारुत्मत्, मरकत, अश्मगर्भ और हरिन्मणि ये सब हैं। [१८०] अथ माणिक्यम् (चुन्नी)। तस्य नामान्याह माणिक्यं पद्मरागः स्याच्छोणरत्नञ्च लोहितम् ।। १८१ ।। मानिक के संस्कृत नाम—माणिक्य, पद्मराग, शोणरत्न और लोहित ये सब हैं। [१८१] अथ पुष्परागः (पुखराज)। तस्य नामान्याह पुष्परागो मञ्जुमणिः स्याद्वाचस्पतिवल्लभः ।। १८२ ।। पोखराज के संस्कृत नाम—पुष्पराग, मञ्जुमणि तथा वाचस्पतिवल्लभ ये सब हैं। [१८२] अथेन्द्रनीलं गोमेदश्च (नीलम और गोमेदमणि)। तयोर्नामान्याह नीलं तथेन्द्रनीलञ्च गोमेदः पीतरत्नकम् ।। १८३ ।। नीलम के संस्कृत नाम—नील और इन्द्रनील ये सब हैं। गोमेद के संस्कृत नाम—गोमेद तथा पीतरत्नक ये सब हैं। [१८३] अथ वैदूर्यम् (लहसुनिया)। तस्य नामान्याह वैदूर्यं दूरजं रत्नं स्यात्केतुग्रहवल्लभम् ।। १८४ ।। लहसुनिया के संस्कृत नाम—वैदूर्य, दूरज रत्न तथा केतुग्रहवल्लभ ये सब हैं। [१८४] अथ मौक्तिकम् (मोती)। तस्य नामान्युद्भवस्थानानि गुणांश्चाह मौक्तिकं शौक्तिकं मुक्ता तथा मुक्ताफलञ्च तत्। शुक्तिः शङ्खो गजः क्रोडः फणी मत्स्यश्च दर्दुरः ।। वेणुरेते समाख्यातास्तज्ज्ञैर्मौक्तिकयोनयः। मौक्तिकं शीतलं वृष्यं चक्षुष्यं बलपुष्टिदम् ।। १८५ ।। मोती के संस्कृत नाम—मौक्तिक, शौक्तिक, मुक्ता तथा मुक्ताफल ये सब हैं। मोती के उत्पत्ति स्थान—सीप, शङ्ख, हाथी, सूअर, साँप, मछली, मेढक और बाँस ये आठ मोतियों के निकलने के स्थान मोतियों के विषय में अभिज्ञ लोगों ने बतलाये हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
८२ भावप्रकाशनिघण्टुः मोती-शीतल, वीर्यवर्धक, नेत्रों के लिये हितकर, बल तथा पुष्टि को देने वाला होता है। [१८५] अथ प्रवालः (मूँगा) । तस्य नामान्याह पुंसि क्लीबे प्रवालः स्यात्पुमानेव तु विद्रुमः ।।१८६।। मूँगा के संस्कृत नाम-प्रवाल (यह पुँल्लिङ्ग तथा नपुंसकलिङ्ग में होता है) तथा विद्रुम (यह केवल पुंल्लिङ्ग में होता है) ये सब हैं। [१८६] अथ रत्नानां गुणानाह रत्नानि भक्षितानि स्युर्मधुराणि सराणि च। चक्षुष्याणि च शीतानि विषघ्नानि धृतानि च।। मङ्गल्यानि मनोज्ञानि ग्रहदोषहराणि च ।।१८७।। रत्नों के गुण-पूर्वोक्त रत्नों के भस्म खाने पर मधुर रसयुक्त, सारक, नेत्रों के लिये हितकर, शीतल तथा विषनाशक होते हैं और धारण करने पर-मङ्गलदायक, सुन्दरता को बढ़ाने वाले तथा ग्रह सम्बन्धी दोषों को दूर करने वाले होते हैं। [१८७] किं रत्नं कस्य ग्रहस्य प्रीतिकारित्वेन दोषहरं भवतीति प्रश्ने तदुत्तरमाह, रत्नमालायाम् माणिक्यं तरणेः सुजातममलं मुक्ताफलं शीतगोर्महेयस्य तु विद्रुमो निगदितः सौम्यस्य गारुत्मतम्। देवेज्यस्य च पुष्परागमसुराचार्यस्य वज्रं शनेर्नीलं निर्मलमन्ययोर्निगदिते गोमेदवैदूर्यके ।।१८८।। "कौन रत्न किस ग्रह की प्रसन्नता उत्पन्न करने से उसके दोष को दूर करने वाले होते हैं" इस प्रश्न का उत्तर "रत्नमाला" में इस प्रकार दिया हुआ है- माणिक-सूर्य का, अच्छी जाति का निर्मल मोती-चन्द्रमा का, मूँगा-मङ्गल का, पन्ना-बुध का, पोखराज-बृहस्पति का, हीरा-शुक्र का, निर्मल नीलम-शनि का, गोमेद और लहसुनिया ये दोनों-क्रम से राहु तथा केतु के रत्न कहे हुये हैं। अतः इनके धारण करने से उन-उन ग्रहों के दोष दूर होते हैं। [१८८] अथोपरत्नानि । तेषां निरूपणमाह उपरत्नानि काचश्च कर्पूराश्मा तथैव च। मुक्ताशुक्तिस्तथा शङ्ख इत्यादीनि बहून्यपि ।।१८९।। उपरत्नों का निरूपण-काच, कर्पूरनिया, सौप तथा शंख इत्यादि बहुत से उपरत्न हैं। [१८९] ❖ उपरत्नानि = गौणरत्नानि । कर्पूराश्मा = कर्पूरा, कर्पूरनिया । मुक्ताशुक्तिः = 'सीप' इति लोके प्रसिद्ध ।।१८९।। यहाँ पर मूल में- "उपरत्न" से गौणरत्न अर्थ समझना चाहिये। "कर्पूराश्मा" से कर्पूरा या कर्पूरनिया, "मुक्ताशुक्ति" से "सीप" अर्थ समझना चाहिये। [१८९] अथ तेषां गुणानाह गुणा यथैव रत्नानामुपरत्नेषु ते तथा। किन्तु किञ्चित्तो हीना विशेषोऽयमुदाहृतः ।।१९०।। उपरत्नों के गुण-रत्नों में जो गुण होते हैं वे ही गुण उपरत्नों में भी होते हैं किन्तु विशेषता यह है कि रत्नों की अपेक्षा इनमें स्वल्प होते हैं। [१९०] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
धात्वादिवर्गः ७८३ अथ विषम् । तस्य नाम भेदानाह विषं तु गरलः च्वेडस्तस्य भेदानुदाहरे । वत्सनाभः सहारिद्रः सक्तुकश्च प्रदीपनः ।। सौराष्ट्रिकः शृङ्गिकश्च कालकूटस्तथव च । हालाहलो ब्रह्मपुत्रो विषभेदा अमी नव ।।१९१।। विष के संस्कृत नाम-विष (नपुंसकलङ्गी), गरल तथा क्ष्वेड ये सब हैं। भेद-(१) वत्सनाभ, (२) हारिद्र, (३) सक्तुक, (४) प्रदीपन, (५) सौराष्ट्रिक, (६) शृङ्गिक, (७) कालकूट, (८) हालाहल, (९) ब्रह्मपुत्र ये ९ भेद स्थावर विष के होते हैं। [१९१] विषवर्ग वक्तव्य-यहाँ पर विषों के ९ भेद बतलाये गये हैं जिनमें से वत्सनाभ एवं शृङ्गिक व्यवहार में प्रयोग में लाये जाते हैं। अन्य विषों का व्यावहारिक ज्ञान लुप्तपाय है। वत्सनाभ एवं शृङ्गिक के नाम से जिन द्रव्यों का व्यवहार में उपयोग किया जाता है वह एकोनाइट (Aconite) की विभिन्न जातियों (Species) के मूल हैं किन्तु इनका जो स्वरूप निम्न मूल श्लोकों में वर्णन किया गया है वह एकोनाइट से पूर्ण रूप से मेल नहीं खाता। चूँकि एकोनाइट की और भी अनेक विषैली जातियाँ पाई जाती हैं इसलिये संभव है कि उपर्युक्त विषों में से कुछ अन्य भेद भी इन्हीं में से हों। इस संबन्ध में व्यापक अनुसंधान की आवश्यकता है। तत्र वत्सनाभः । तस्य स्वरूपनिरूपणमाह सिन्दुवारसदृक्पत्रो वत्सनाभ्याकृतिस्तथा । यत्पार्श्वे न तरोर्वृद्धिर्वत्सनाभः स भाषितः ।।१९२।। वत्सनाभ विष के स्वरूप का वर्णन-जिसके पत्ते संभालू के पत्तों के समान हों तथा आकार बछड़े की नाभि के समान हो और जिसके नजदीक दूसरे वृक्षों की वृद्धि न हो सकती हो उसे 'वत्सनाभ' समझना चाहिये । [१९२] वक्तव्य-व्यवहार में जिस द्रव्य का उपयोग किया जाता है उससे उपर्युक्त वर्णन मेल नहीं खाता। वत्सनाभ हिं०-विष, मीठा विष, वच्छनाग, वचनाग, तेलिया विष । बं०-कठ विष, वत्सनाब विष, विष । म०- बचनाग । गु०-बच्छनाग, वसनाग । क०-वसनाबी । ते०-नाभि, वसनाभि । पं०-मीठा विष । ता०-वत्सनाभि । अ०-विष । फा०-विषनाग, जहर । अं०-Aconite (एकोनाइट) । ले०-Aconitum ferox Wall. (एकोनाइटम फेरॉक्स) । Fam. Ranunculaceae (रेनन्क्यूलेसी) । यह हिमालय की चोटियों पर, नेपाल तथा आसाम में उत्पन्न होता है। इसका क्षुप-१-२ हाथ ऊँचा होता है। पत्ते-करतलाकार एवं अनेक भागों में विभक्त होते हैं। पुष्प-लम्बे पुष्पडण्ड पर नीले पुष्प आते हैं। मूल-युग्म एवं कंदसदृश होता है जिसमें नये वर्ष का कन्द १-११/५ इञ्च लम्बा २/५-३/५ इञ्च मोटा, अंडाकार आयताकार से लेकर दीर्घवृत्ताकार, कुछ सूत्राकार उपमूलों से युक्त एवं तोड़ने पर कुछ पिष्टमय पीताभ होता है तथा पहले वर्ष का कन्द बहुत सिकुड़ा हुआ एवं झुर्रीदार होता है। इसमें गन्ध नहीं होती और स्वाद में पहले मीठा और फिर कुछ कड़वा जान पड़ता है। चबाने से थोड़ी देर बाद चिनचिनाहट और शून्यता मालूम होती है जो कुछ समय तक बनी रहती है। वक्तव्य-भारत में एकोनाइट (Aconite) की २४ जातियाँ (Species) पाई जाती हैं। एकोनाइटम नेपेल्लस (Aconitum napellus Linn.) जो ब्रिटिश फार्माकोपिया में मान्य है अपने यहाँ नहीं होता । उसका प्रतिनिधि ए. चॅस्मेन्थमू है जिसका विस्तृत वर्णन आगे शृङ्गिक के अन्तर्गत किया गया है। यह ए. नेपेल्लस से अधिक वीर्यवाला होता
७८४ भावप्रकाशनिघण्टुः है। यह भी बाजार में कम आता है। ए. फेराक्स के नाम से बाजार में इसके साथ ए. डिनोहाइझम (A. deinorrhizum Stapf) एवं ए. बालफोराई (A. balfourii Stapf) के मूल अधिक मात्रा में आते हैं। इसमें ए. लेसिनिएटम (A. laciniatum Stapf) एवं ए. स्पाइकैटम (A. spicatum Stapf) के मूलों का भी मिश्रण रहता है। इन्हीं में से सफेद जाति के नाम से ए. डिनोहाइझम तथा ए. बालफोराई के मूल बिकते हैं। वत्सनाभ तथा शृङ्गिक इन्हीं विभिन्न जातियों में से हैं तथा इनके गुणकर्मों में समानता होने के कारण एक का दूसरे के स्थान पर प्रयोग होता है। शृङ्ग के समान मूल वैसे तो कुछ-कुछ सभी जातियों का है किन्तु ए. डिनोहाइझम का कुछ अधिक शृङ्ग समान मालूम होता है। मूलों को काला बनाने के लिये व्यापारी कई प्रक्रियाओं को करते हैं। एक में इन्हें कसीस के साथ गोमूत्र में भिंगोकर उबालते हैं तथा बाद में सुखाकर ऊपर से सरसों का तेल लगा देते हैं। ऐसी धारणा है कि इस विधि से इसमें कीड़े नहीं लगते। उपर्युक्त विषैली जातियों के अतिरिक्त एकोनाइट की कुछ ऐसी भी जातियाँ हैं जिनमें विषैलापन नहीं होता जैसे- अतिविषा एवं प्रतिविषा। इनको मुख में रखने से चुनचुनाहट नहीं होती जैसी विषैली जातियों में होती है। इनका वर्णन पहले हरीतक्यादि वर्ग में (पृष्ठ १२७) किया गया है। इन विषैली जातियों के गुणधर्मों में समानता होने के कारण इसके गुण, प्रयोग आदि आगे शृङ्गिक के साथ ही दिये गये हैं। अथ हारिद्रः । तस्य स्वरूपनिरूपणमाह हरिद्रातुल्यमूलो यो हारिद्रः स उदाहृतः ।।१९३।। हारिद्र विष का स्वरूप-हल्दी के तुल्य जिसकी जड़ हो उसे "हारिद्र विष" कहते हैं। [१९३] अथ सक्तुकः । तस्य स्वरूपमाह यद्ग्रन्थिः सक्तुकेनैव पूर्णमध्यः स सक्तुकः ।।१९४।। सक्तुक का स्वरूप-जिसकी गाँठें भीतर से सत्तू के समान चूर्ण से युक्त हों वह "सक्तुक" विष कहलाता है। [१९४] अथ प्रदीपनः । तस्य स्वरूपमाह वर्णतो लोहितो यः स्याद्दीप्तिमान् दहनप्रभः । महादाहकरः पूर्वैः कथितः स प्रदीपनः ।।१९५।। प्रदीपन विष का स्वरूप-जिसका वर्ण लाल हो तथा जो अग्नि के समान कान्ति वाला एवम् अत्यन्त दाहकारक हो उसे "प्रदीपन" विष पूर्व के विद्वानों ने कहा है। [१९५] अथ सौराष्ट्रिकः । तस्य स्वरूपमाह सुराष्ट्रविषये यः स्यात्स सौराष्ट्रिक उच्यते ।।१९६।। सौराष्ट्रिक विष का स्वरूप-सुराष्ट्र (गुजरात) देश में जो उत्पन्न होने वाला विष है उसे "सौराष्ट्रिक" कहते हैं। [१९६] अथ शृङ्गिकः । तस्य स्वरूपमाह यस्मिन् गोशृङ्गके बद्धे दुग्धं भवति लोहितम् । स शृङ्गिक इति प्रोक्तो द्रव्यतत्त्वविशारदैः ।।१९७।। शृङ्गिक का स्वरूप-द्रव्यों के तत्त्व को जानने वाले पण्डितों ने उसे "शृङ्गिक" कहा है जिसे गौ के सींग में बाँध देने से उसका दूध लाल वर्ण का हो जाता हो। [१९७] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
धात्वादिवर्गः ७८५ श्रृङ्गिक विष वक्तव्य-इससे संबंधित वक्तव्य पहले विषवर्ग एवं वत्सनाभ के साथ लिखा गया है जिसे पाठक वहीं देखें। एकोनाइट की एक महत्त्व की जाति का वर्णन, गुण, प्रयोग आदि यहाँ दिया जा रहा है जो सभी विषैली एकोनाइट के लिये सामान्य है। वत्सनाभ से निम्न जाति अधिक वीर्यवान् होने के कारण ग्रन्थोक्त प्रमाण से इसको आधी मात्रा में योगों में डालना चाहिये। सं०-शृङ्गिक (जो रोग को नष्ट करे या जो शृङ्ग के सदृश हो)। हिं०-मोहरी, पिऊं, सिंधिया विष। कश्मी०- बनबलनग, मोहरी। अं०-Indian Aconite (इण्डियन एकोनाइट)। ले०-Aconitum chasmanthum Stapf ex Holmes (एकोनाइटम चेस्मेन्थम)। Fam. Ranuncula eae (रेनन्क्यूलेसी)। यह पश्चिम हिमालय के चित्राल एवं हजारा से कश्मीर तक, ७००० से १२००० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। इसका क्षुप-द्विवर्षायु एवं २ से ४ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-अनेक, नीचे के अधिक लम्बे वृन्त युक्त फलक १³/₄-२³/₄ इञ्च लम्बा एवं २-३³/₄ इञ्च चौड़ा, करतलाकार त्रिखण्डित जिनके खण्ड अनेक रेखाकार भागों में विभक्त रहते हैं। पुष्प-नीले या नील मिश्रित श्वेताभ प्रायः १ फीट लम्बे गुच्छ में आते हैं। फल-फलियां कंगूरेदार होती हैं। मूल-युग्म एवं कन्दसदृश होता है। नये वर्ष का कन्द शंक्वाकार, शंक्वाकार-बेलनाकार, आधार की तरफ चौड़ा, क्वचित् २ इञ्च तक लम्बा एवं ¹/₂-³/₄ इञ्च मोटा, गहरे भूरे या कृष्णाभ भूरे रंग का, चिकना किन्तु सूखने पर झुर्रीदार एवं अनेक उपमूलों या टेटे हुये उनके चिह्नों से युक्त होता है। तोड़ने पर भग्न उपास्थिसदृश (Cartilaginous), कठोर, बाह्य भाग में भूरापन लिये हुए एवं भीतर श्वेत होता है। प्रथमवर्ष का कंद सिकुड़ा हुआ एवं गहरी झुर्रियों से युक्त होता है। यह बाहर से कृष्ण एवं अन्दर सम्पूर्ण भूरा होता है। इनका स्वाद प्रारम्भ में कुछ कड़वा तथा बाद में चुनचुनाहट बनी रहती है। इनका संग्रह सितम्बर के अंत में किया जाता है। शोधन-इन्हीं मूलों का शोधन के पश्चात् चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। इनको टुकड़े-टुकड़े कर, ३ दिन ताजे गोमूत्र में भिंगोकर, चौथे दिन गाय के दूध में दोलायंत्र में ३ घंटे मंद आँच पर पकावे। फिर उष्णजल से धोकर छाया में सुखा लें। इस विधि से इनका विषैलापन कम हो जाता है। बाह्य प्रयोग के लिये अशोधित द्रव्य का उपयोग किया जा सकता है। रासायनिक संगठन-इसमें इण्डेकोनाइटिन (Indaconitine, C₃₄ H₄₇ O₁₀ N) नामक विषैला क्षाराभ ४.३% होता है। यह क्षाराभ की मात्रा ब्रिटिश फार्माकोपिया में मान्य द्रव्य ए. नेपेल्लस से १० गुना अधिक है किन्तु एकोनाइटिन से केवल ०.७ गुना कार्यकार है। इसके विलयन की अत्यल्प मात्रा को जिह्वाग्र पर लगाने से उसी की तरह चुनचुनाहट होती है। इसके अतिरिक्त इसमें एकोनाइटिक एसिड एवं स्टार्च पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, व्यवायि, ज्वरघ्न, स्वेदजनन, हृदयोत्तेजक, पीड़ामक, शोथहर, कफवातहर एवं बल्य है। यह अत्यन्त विषैला होने के कारण इसका सावधानी के साथ प्रयोग करना चाहिये। आधुनिक मत के अनुसार इसके प्रयोग से वातनाड़ियों के परिसरीय अंतिम भागों की क्रिया कम हो जाती है। अल्प मात्रा में इसका हृदय पर कोई परिणाम नहीं होता है किन्तु अधिक मात्रा से नाड़ी की गति तथा शक्ति कम होती है जिससे रक्त का दबाव भी कम हो जाता है। हृदय के विकारों में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। आयुर्वेद में इसका प्रयोग अन्य औषधियों के साथ ज्वर, अतिसार, अग्निमांद्य, ग्रहणी, कास, श्वास एवं वातरोगों में किया जाता है। शोथ के कारण जब ज्वर हो तथा शरीर के किसी अंग में पीड़ा हो तो इससे अच्छा लाभ होता है। ५३ भाव.I