भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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आम्रादिफलवर्गः ७५५ (२) थैक्ल—यह आसाम की तरफ होने वाले एक वृक्ष गर्सिनिया पेडन्क्युलेटा (Garcinia pedunculata Roxb.; Fam. Guttiferae-वर्ग, गट्टीफेरी) के फल हैं। यह गोलं, ३-४.५ इञ्च व्यास के, पीत रंग के, खट्टे एवं स्वादिष्ट होते हैं। इनका उपयोग नींबू या जमीरी नींबू की तरह किया जाता है और इसी के अम्लवेतस होने की अधिक संभावना है। (३) चुक्र—यह चूका साग, रूमेक्स हेसिकेरियस् (Rumex vesicarius Linn.) है जिसका वर्णन आगे शाकवर्ग में आया है। (४) निम्बु (साइट्रस-Citrus) प्रजाति के फल—कुछ विद्वानों ने चकोतरा को अम्लवेतस माना है किन्तु चकोतरा इतना खट्टा नहीं होता। इस प्रजाति में अनेक प्रकार के खट्टे फल अवश्य पाये जाते हैं। संभव है कि इनमें से कोई अत्यम्ल फल अम्लवेतस सिद्ध हो। अथ वृक्षाम्लकम् (विषाम्बिल, कोकम)। तस्य नामानि तत्पक्वापक्वफलगुणाँश्चाह वृक्षाम्लं तिन्तिडीकञ्चचुक्रं स्यादम्लवृक्षकम्। वृक्षाम्लमाममम्लोष्णं वातघ्नं कफपित्तलम् ।। पक्वन्तु गुरु संग्राहि कटुकं तुवरं लघु ।। १४८ ।। अम्लोष्णं रोचनं रूक्षं दीपनं कफवातकृत्। तृष्णाऽर्शोग्रहणीगुल्मशूलहृद्रोगजन्तुजित् ।। १४९ ।। कोकम के संस्कृत नाम—वृक्षाम्ल, तिन्तिडीक, चुक्र तथा अम्लवृक्षक ये सब हैं। कोकम का कच्चा फल—अम्लरसयुक्त, उष्ण, कफ तथा पित्त को उत्पन्न करने वाला एवम् वातनाशक होता है। पका फल—कटु, थोड़ा कषाय तथा अम्लरसयुक्त, गुरु, संग्राही, उष्ण, रोचक, रूक्ष, अग्निदीपक तथा कफवातकारक एवम्-तृषा-अर्श-ग्रहणी-गुल्म-शूल-हृद्रोग तथा जन्तु नाशक होता है। [१४७-१४९] ६०. कोकम हिं०-कोकम। म०-अमसूल, कोकम, रतांबि, भिरंड, वीरुंड। गु०-कोकम। क०-मुगिंग हुलि। गोवा०- ब्रिंडाओ। ता०-मुर्गल। अं०-Kokam Butter Tree (कोकम वटर ट्री)। ले०-Garcinia indica Chois. (गर्सिनिया इण्डिका)। Fam. Guttiferae (गट्टिफेरी)। कोंकण, कनारा आदि दक्षिणी प्रान्तों में यह पाया जाता है। इसका वृक्ष—छोटा होता है। शाखायें झुकी हुई रहती हैं। पत्ते—अंडाकार, आयताकार-भालाकार, २.५-३.५ इञ्च लम्बे, १-१.५ इञ्च चौड़े और ऊपर से गहरे हरे किन्तु नीचे से हलके रंग के होते हैं। फल—गोल, १-१.५ इञ्च व्यास के तथा पकने पर जामुनी लाल रंग के होते हैं जिनमें ५- ८ बड़े-बड़े बीज होते हैं। बीज निकाले हुए सुखाये हुए फल को अमसूल या कोकम कहा जाता है। बीजों से तेल निकलता है जो मोम जैसा जम जाता है। इसे कोकम का घी या तेल कहते हैं। कोकम का स्वाद मधुराम्ल रहता है तथा इसको खटाई के लिये लोग काम में लाते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें मॉलिक अम्ल एवं अल्प चिंचाम्ल या निम्बुकाम्ल रहता है। बीजों में गाढ़ा मोम जैसा तेल होता है। गुण और प्रयोग—यह हृद्य, ग्राही, उष्ण, वातकफनाशक एवं रक्तपित्तप्रशमन है। छाल स्तम्भन है। तेल स्तम्भन एवं व्रणरोपण है। पैत्तिक रोगों में पके फल का शरबत पिलाते हैं। अतिसार, रक्तातिसार, संग्रहणी आदि में कोकम का फांट पिलाते हैं। इनमें पुटपाक करके निकाला पत्तों का रस भी देते हैं। बरसात या शीतऋतु में हाथ-पैर फटते हैं उसमें इसका तेल गरम करके लगाते हैं।