भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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७५४। भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग-फलमज्जा तृषाशामक, रोचक एवं सौम्य विरेचक होती है। ज्वर में विबन्ध एवं दाह होने पर इसका पन्ना बनाकर देते हैं। विबन्ध में सनाय आदि के साथ इसको देते हैं यद्यपि रालीय विरेचक द्रव्यों के कार्य को यह कम करती है। फली की शुष्क त्वचा की राख (क्षार) पेट के दर्द एवं मन्दाग्नि में दी जाती है। इसके छाल की राख क्षारीय एवं मूत्रजनन होती है तथा सोजाक में दी जाती है। पत्तों को पीसकर व्रणशोथ में बाँधते हैं। इसके बीज प्रमेह में लाभदायक होते हैं। मात्रा-फल ४ से ३० माशा, बीजचूर्ण १ से ३ माशा, क्षार ५-१५ रत्ती। नोट-इमली का पर्याय तिन्तिडीका दिया हुआ है किन्तु तिन्तिडीक एक अन्य द्रव्य है। मसूर जैसे लाल रंग के खट्टे दाने (फल) समाक दानें के नाम से मिलते हैं। यूनानी चिकित्सक इनके छिलकों का उपयोग करते हैं। यह ले०- Rhus parviflora, Roxb. (हृस् पार्विफ्लोरा); Fam. Anacardiaceae (अॅनाकार्डिएसी) के फल हैं। नमक मिलाकर इमली की तरह इनका भी उपयोग किया जाता है। यह ग्राही, हृद्य, दीपन, शीत एवं रक्तपित्तशामक होते हैं। इनको पैत्तिक अतिसार, रक्तातिसार, वमन एवं हल्लास में देते हैं। ज्वर में दाह एवं तृषा कम करने के लिये इनका उपयोग किया जाता है। अथाम्लवेतसः (अमलबेंत)। तस्य नामानि तत्फलगुणांश्चाह स्यादम्लवेतसश्चुकं शतवेधि सहस्रनुत्। अम्लवेतसमत्यम्लं भेदनं लघु दीपनम् ।। १४४ ।। हृद्रोगशूलगुल्मघ्नं पित्तलं लोमहर्षणम्। रूक्षं विण्मूत्रदोषघ्नं प्लीहोदावर्त्तनाशनम् ।। १४५ ।। हिक्काऽऽनाहारुचिश्वासकासाजीर्णवमिप्रणुत् ।। कफवातामयध्वंसिच्छागमांसद्रवत्वकृत् । चणकाम्लगुणं ज्ञेयं लोहसूचीद्रवत्वकृत् ।। १४६ ।। अम्लवेतस के संस्कृत नाम-अम्लवेतस, चुक्र, शतवेधि तथा सहस्रनुत् ये सब हैं। अम्लवेतस-अत्यन्त अम्ल रसयुक्त, मलभेदक, लघु, अग्निदीपक, पित्तजनक, खाने से रोमाञ्च करने वाला, रूक्ष, बकरे के मांस को पकाने के समय डालने से शीघ्र गलाने वाला, लोहे की सूई को गलाने वाला, गुणों से चनाखार के समान एवम्-हृद्रोग-शूल-गुल्म-मल तथा मूत्रगत दोष-प्लीहा-उदावर्त्त-हिचकी-आनाह (अफरा)-अरुचि-श्वास-कास (खाँसी)- अजीर्ण-वमन-कफ तथा वातसम्बन्धी रोग इन सबों को नष्ट करने वाला होता है। [१४४-१४६] ५९. अम्लवेतस् अम्लवेतस क्या द्रव्य है इस संबन्ध में विद्वानों में मतभेद है। यहाँ इसका फलवर्ग में पाठ किया गया है जिससे यह कोई फल ही है ऐसा अनुमान होता है। चरक (सू० अ० २५) में इसका भेदनीय, दीपनीय आनुलोमिक, वातश्लेष्महर, हृद्य, श्वासहर एवं दीपनीय महाकषाय (च० सू० अ० ४) में पाठ है। निम्न द्रव्यों को अम्लवेतस माना जा रहा है जिनमें से थैकल या निम्बु प्रजाति (Citrus) के किसी खट्टे फल की अम्लवेतस होने की अधिक संभावना है। (१) रेवंद चीनी क्षुप (Rheum emodi Wall.)-हीयम् एमोडी; Fam. Polygonaceae (पोलीगोनेसी) की सुखाई हुई शाखाएँ-यह देखने में चोटी की तरह गुँथी हुई अमलवेत के नाम से बाजार में बिकती हैं। इनका स्वाद कुछ खट्टा होता है। (यादवजी-द्रव्यगुणविज्ञान उ० पृ० १२९)। इसकी पीली जड़ का उपयोग विरेचक गुण के लिये रेवाचीनी के नाम से किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA