भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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आम्रादिफलवर्गः ७५३ यह गरम प्रान्तों की वाटिकाओं में रोपण किया जाता है। इसका वृक्ष-छोटा, १५-३० फीट ऊँचा एवं सदाहरित होता है और शाखायें बहुत होती हैं। पत्ते-कसौंदी के पत्तों के समान अंडाकार और नुकीले होते हैं। फूल-छोटे-छोटे सफेद या किञ्चित् लाली लिये आते हैं। फल-३-४ इञ्च लम्बे, पाँच कोनेवाले, गूदेदार, सुगन्धि, हरे रंग के एवं पकने पर पीले रंग के होते हैं। कच्ची अवस्था में इनका स्वाद कषाय रहता है किन्तु पकने पर किंचित् मधुराभ अम्ल हो जाता है। इसके दो प्रकार खट्टे एवं मीठे पाये जाते हैं जिनमें से मीठा बंगाल की तरफ होता है। इसका साग, चटनी, अचार एवं शर्बत बनाया जाता है। इससे लोहे इत्यादि धातुओं में लगी जंग छुड़ाई जाती है। रासायनिक संगठन-इसमें विटामिन 'ए', १०० ग्राम में २४० एकक होता है तथा एसिड पोटेशियम् आक्सॅलेट ] भी पाया जाता है। गुण और प्रयोग-पका फल शीतल, बल्य, रोचक एवं रक्तशोधक है। इसका शरबत बनाकर ज्वर, रक्तपित्त, रक्तार्श एवं तृष्णा आदि में पिलाते हैं। अथाम्लिका (इमली) । तस्या नामानि तत्पक्वफलगुणाँश्चाह अम्लिका चुक्रिकाऽम्ली च चुक्रा दन्तशठाऽपि च्। अम्ला च चिञ्चिका चिञ्चा तिन्तिडीका च तिन्तिडी।।१४२।। अम्लिकाऽम्ला गुरुर्वातहरी पित्तकफास्रकृत्। पक्वा तु दीपनी रूक्षा सरोष्णा कफवातनुत्।।१४३।। इमली के संस्कृत नाम-अम्लिका, चुक्रिका, अम्ली, चुक्रा, दन्तशठा, अम्ला, चिञ्चिका, चिञ्चा, तिन्तिडीका तथा तिन्तिडी ये सब हैं। कच्ची इमली-अम्ल रसयुक्त गुरु, वातनाशक एवम् पित्त-कफ तथा रुधिरविकार को करने वाली होती है। पकी इमली-अग्निदीपक, रूक्ष, सारक, उष्ण एवम्-कफ तथा वातनाशक होती है। [१४२-१४३] ५८. इमली हिं०-इमली। बं०-तेंदुल। म०-चिञ्च। क०-हुणिसे। गु०-आँवली। ते०-चिंत। ता०-पुलि। फा०- तिमिर हिन्दी। अ०-तमर हिन्दी। अं०-Tamarind Tree (टेमरिंड ट्री)। ले०-Tamarindus indica Linn. (टेमरीण्डस् इण्डिका)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। इमली के वृक्ष प्रायः सब प्रान्तों में उत्पन्न होते हैं। इसका वृक्ष-बहुत बड़ा होता है और सदा हरा-भरा रहता है। शाखायें-बहुत फैली हुई होती हैं। पत्ते-२ से ५ इञ्च लम्बे, संयुक्त पक्षाकार होते हैं। पत्रक-संख्या में १० से २० जोड़े, ८-३० x ५-८ मि० मी० बड़े, आयताकार कुण्ठिताग्र, चिकने एवं शिराविन्यास जालीदार होता है। फूल-लाली युक्त पीले रंग के आते हैं। फलियाँ-३ से ८ इञ्च लम्बी, १ इञ्च चौड़ी, ०.४ इञ्च मोटी कुछ टेढ़ी एवं भूरे रंग की होती हैं। बीज-३ से १२, चिकने, चमकीले, चिपटे तथा भूरे रंग के होते हैं। इमली का स्वाद अम्ल एवं मधुर रहता है तथा इसमें सुगंध रहती है। इसके फल, बीज, पत्र, पुष्प एवं क्षार का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। खटाई के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें साइट्रिक ॲसिड (Citric acid), टार्टरिक् ॲसिड (Tartaric acid), पोटॅशियम बाइटार्टरेट (Potassium bitartrate) एवं शर्करा आदि द्रव्य होते हैं। ५१ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA